प्यार कभी कारण का मुहताज नहीं रहा और इसका कारण आज भी ढु़ढ़ने पर भी नहीं मिलता। और किशोरावस्था भी किसी चीज की परवाह नहीं करता । रीना अभी नाराज ही चल रही थी। एक आध प्रेम पत्र दिया भी तो उसने उसे उठा तो लिया पर उसे फाड़ कर फेंक दिया। उसको मनाने का जतन मैं करने लगा। कई तरह की कोशिश पर बेकार।
इसी बीच ऐसा ही हो रहा था। खैर चने की बात चली तो एक और कहानी बता ही दूं। एक शिक्षक हुआ करते थे आर के पी एस। यह उनका पुकारू नाम था जो बच्चों के द्वारा दिया गया था। जिसके बारे में डिटेल मैं यहां नहीं लिख सकता। खैर उनकी आदत थी बराबर चने के समय में खेतों से चने लाने के लिए वे छात्रों को कहते थे। एक दो बार मुझे भी कही, पर बार बार मुझे कहने लगे जिससे मन में छोभ हो गया। आज फिर उन्होंने मुझे कहा। मैं अपने एक अन्य मित्र के साथ चना लाने चला गया पर मन ही मन खिन्न था कि रोज रोज मुझको ही क्यों कहते है। मैं अपने खेत चना लाने पहूंचने ही वाला था कि मेरे मन में एक प्लान आया और मैं लौट गया। स्कूल के बगल में ही स्कूल की खेत थी, जिसमें हेड मास्टर साहब के द्वारा चना लगवाया गया था। मैंने आव देखा न ताव स्कूल के खेत का चना एक पांजा उखाड़ लिया और जाकर मास्टर साहब को दे दिया। मास्टर जी गदगद। साइकिल के पीछे चना का बोझा बांध कर मास्टर जी गदगद घर चले गए। दूसरे दिन मैं घर से स्कूल नहीं गया। पता था हंगामा होगा। ऐसा ही हुआ। चने के खेत में चना उखाड़े जाने की चर्चा फैली और किसी ने हेडमास्टर साहब को बता दिया कि कल ही एक बोझा चना मैं स्कूल लेकर आया था। मेरी खोज हुई और पकड़ कर लाया गया। पहले तो बिना पूछे पिटाई हुई फिर सवाल हुआ की क्यों उखाड़ा। मैंने तपाक से जबाब दिया कि सर ने कहा था खेत से चना लेकर आओ तो मैं ले आया। फिर उनको बुलाया गया तो पता चला की सर कल साईकिल के पीछे चना बांध कर ले जा रहे थे। सर ने कहा कि मैंने स्कूल के खेत से लाने तो नहीं कहा था। पर यह बात जान कर हेड सर ने उनको भी बहुत डांट पिलाई और उसके बाद से चना लाने का सिलसिला बंद।
इसी तरह बेपरवाह जिंदगी कटती गई। कभी नहीं सोंचता आगे क्या करना है। यही फरवरी मार्च का महीना चने का महीना होता था। खेतों में जा कर ‘‘ओरहा’’ पकाना और खाना यही दिनचर्या थी। ओरहा। चने के आधे तैयार पैधे को दूसरे की खेत से उखाड़िये और उसे छुपाकर किसी बागीचे में लाइए। एक मित्र के पास इसके लिए हमेशा एक माचीस होती थी और थोड़ी बहुत जलाबन इक्ठठा कर चने के पैधे को छीमी सहित आग के हवाले किया और तैयार हो गया ओरहा। फिर उसकी छीमी तोड़कर खाने का आनन्द आज पांच सितारा होटलों के खाने में भी नहीं। बेपरवाह धुमते हुए शाम में घर आना और फिर गमछी का घोघी बना कर उसमें भुंजा लेना और निकल जाना खेलने के लिए। यही दिनचर्या। कांपी-किताब, पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता नहीं।
शाम में दोस्तों के साथा घूमना होता था और शाम में दोस्तों के साथ घूमना भी कभी कभी खतरनाक हो जाता और एक दिन ऐसा ही हुआ। मैं दोस्त गुडडू और बब्लू तीनों मिलकर घर से बाहर निकले और भंुजा खाते हुए गांव से बाहर सड़क पर आ गए। यूं ही नदी किनारे टहलते टहलते जा ही रहे थे कि कुछ दूर जाने पर सड़क पर गंदी बात लिखी हुई नजर आई। गंदा शब्द जिसे आज मैं लिखने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। कुछ दूर बढ़ा तो फिर वही शब्द। बालमन यही होता है। अन्तिम शब्द जहां लिखे थे वहां देखा कि लिखने वाला खल्ली, ‘चौक’ भी वहीं फेंका हुआ है। एक मित्र ने पहले उसे उठा लिया। फिर शुरू हो गई शैतानी। उस चौक के सहारे हम लोगों ने उसी तरह के शब्द जहां तहां लिखना शुरू कर दिया। आगे जा ही रहा था की रतन दा ने देख लिखा।
फिर आफत
‘‘अरे अरे की करो हीं रे।’’ उनका इतना कहना की हंगामा। बब्लू तो सबसे पहले नौ दो ग्यारह हो गया। गुडडू भी भागा पर उसके पीछे रतन दा भी दौड़ पड़े और थोड़ी दूर जाने पर ही गुडडू गिर गया और मार खाने से पूर्व ही वह इतना जोर जोर से रोने लगा की लगा जैसे क्या हो गया और रतन दा उसे छोड़ मेरी ओर भागे और मैं भी धड़ा गया। रतन दा डीजल चलाने खेत जा रहे थे और उनके हाथ में पतली सी एक प्लास्टिक की पाइप थी और वह मेरे उपर बरसने लगा। सटाक सटाक सटाक। मैं लोछिया गया और भागा वहां से।
खैर..
अभी तो बचपन हर गम से बेगाना होता है। और इसी का चरितार्थ करते हुए मैं जी रहा था। स्कूल से भाग कर बराबर सिनेमा देखता। पढ़ने की भी आदत थी पर गंदी किताब। दफा 302, मायापुरी यही सब। बहुत ही बेहन्डल था। एक दिन रीना घर आई और मुझसे नाराज ही चल रही थी
मैं मन ही मन सोंचा जरूर यह शिकायत करने आई होगी। स्कूल में पिटाई की बात को लेकर।
मैं चौंकी पर लेटा दफा 302 पढ़ रहा था। उपर में कोर्स की किताब और नीचे दफा 302। फूआ से छुपा कर, तभी रीना ने उसे छपट कर फुआ को जाकर दिखाने लगी।
‘‘देखो देखो कतना गंदा किताब पढ़ो हो।’’ फुआ कुछ देख पाती उससे पहले ही मैंने रीना का हाथ उमेठ कर किताब छीन लिया और एक मुक्का लगा दिया।
करारा।
धम्म।
वह उकड़ कर बैठ गई।
गुस्सा तो पहले से ही था और गुस्सा हो गई। वह रोने लगी। फूआ की डांट खानी पड़ी। पर कहां फर्क पड़ता है। जो होना था, हो गया और रीना रोती हुई चली गई। बाद मंे अफसोस भी हुआ न जाने अब कब प्रेम पत्र दे सकूंगा, बात बिगड़ तो नही जाएगी। बहुत तरह के सवाल मन में आते रहते। फिर कई दिनो तक उसको देखने के लिए बेचैन रहा और वह ईद का चांद बन गई। यह सजा था मेरे गुनाह का। बहुत बड़ी सजा।........
शेष अगले किश्त में, बने रहिए।
गाँव के जीवन से जुड़ी बचपन की घटनाएँ जीवंत लग रही हैं.......
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छी चल रही है कहानी अब इस इतनी बड़ी सजा के बाद क्या ....?
बात जहाँ छोडी है वहाँ से उत्सुकता और बढ गयी। आगे का इन्तजार। आभार।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकितनी मार्मिक हैं आपकी कहन. अच्छी रचना. बधाई स्वीकारें. अवनीश सिंह चौहान
प्रत्युत्तर देंहटाएं्कहानी रोचक चल रही है आगे का इंतज़ार है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं चौंकी पर लेटा दफा 302 पढ़ रहा था। उपर में कोर्स की किताब और नीचे दफा 302। फूआ से छुपा कर, तभी रीना ने उसे छपट कर फुआ को जाकर दिखाने लगी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहा हा हा हा हा ......
एकदम पारदर्शी कहानी लिख रहें हैं भैया...जो बिता - ज्यों का त्यों...
ऐसा लग रहा है जैसे कुछ भी छुपाया नहीं जा रहा.
ऐसी हिम्मत सब कहाँ दिखा पाते हैं?
बहुत बढ़िया...
चलते रहिये..
अन्तराल कुछ ज्यादा हो जा रहा है अगली किस्त का..!
अरूण जी बुरा मत मानना लेकिन लगता है आपकी 'छोटी सी प्रेम कहानी' भटक रही है....।
प्रत्युत्तर देंहटाएंवैसे ग्राम्य जीवन का प्रसंग अच्छा लगा। बधाई भी स्वीकारें।
ग्राम्य जीवन का प्रसंग अच्छा लगा। बधाई|
प्रत्युत्तर देंहटाएंInteresting! अगली किश्त का इंतज़ार है :-)
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छी चल रही है कहानी .आगे का इंतज़ार है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ ,आकर अच्छा लगा .कभी समय मिले तो http//shiva12877.blogspot.com ब्लॉग पर अपनी एक नज़र डालें .
फोलोवर बनकर उत्साह बढ़ाएं .. धन्यवाद् .
ओहरा... आनंदम ... हरियाणा राजस्थान में इसे होला कहते हैं..
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