‘‘माफ नै करमी यार, ऐतना बड़ा सजा नै दहीई...".एक शाम अपने कुछ दोस्तों के साथ बैठा था कि देखा वह वहां से गुजर रही है मैंने झट उसे सुना कर कहा। वह इठला कर चली गई। दोस्तों को यह बात समझ में नहीं आई कि आखीर मैंने यह किससे कहा और वे पूछते रहे ‘‘केकरा से माफी मांगलहीं रे,’’ पर कौन बताता। रूठने का यह सिलसिला अब बर्दाश्त से बाहर था और मैं उसे मनाने का फिर से एक बार सभी हथकंडे अपनाना प्रारंभ कर दिया।
प्यार किससे और कब हो यह कोई कह नहीं सकता सो मैं भी यह दाबे से नहीं कह सकता की मैंने रीना से प्रेम किया। यह तो वस हो गया और किशोरावस्था के इस उम्र मंे यह समझ भी नहीं पाता था पर एक बेचैनी सी होने लगती थी उसके बगैर।
रीना, लंबा सितुआ नाक, सांवला रंग, औसत कद काठी की एक साधारण लड़की थी। फ्रॉक पहनकर जब वह निकलती थी तो किसी गुड़िया की तरह लगती थी। उसकी चंचलता-चपलता मुझे बहुत भाती थी। घर की छोटी बेटी होने के नाते वह नकचढ़ी भी थी। खुमारी के उस दौर में जब भी कोई सिनेमा देखता तो उसमें रीना ही नजर आती।
अब मेरी बेचैनी ने मुझे मजंनू बना दिया था। ‘‘तेरी गलियों में न रखेंगें कदम आज के बाद,’’ ‘‘चांदी की दिवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया।’’ सरीखे गीत मेरे होठों पर तैरने लगे और उसके घर के बगल के कंुऐं से पानी भरते हुए यह गीत मैं गाता रहता, यह बाद दिगर है की उसमें न सुर थे न ताल। पर मैं कुंआ पर नहाने के क्रम में गीत गुनगुनाता रहता था और रीना के कमरे की खिड़की ठीक कुंआ के सामने थी पर कमरे में अंधेरा होने की वजह से मैं उसे नहीं देख पाता था पर मुझे पता था कि वह जरूर देख रही होगी।
इतने प्रयासों के बाद भी वह नहीं मानी और अब मैं निराश होने लगा। लगा जैसे सब कुछ खत्म हो जाएगा।
‘‘की बात है हो आज कल सुस्ताल लगो ही’’ ऐसे शब्द मुझे रोज सुनने को मिलते। पढ़ना तो था ही नहीं पर खेलने और काम करने में भी अब मन नहीं लगता था।
आज शुक्रबार था और हमेशा की तरह रिंकू के घर सभी लोग टीवी पर सिनेमा देखने जाएगें। रात्री नौ बजे से प्रारंभ होने वाले सिनेमा को देखने के लिए दो तीन दर्जन लोग जमा होते थे जिसमें बुढ़े, बच्चे, जवान और महिलाऐं सभी शामिल थी। उस समय गांव मंे रंगीन टीवी का जमाना नहीं आया था और स्वेत-श्याम टीवी भी सनमाइका के बने एक अजीब से सरकाने वाले डिब्बे में बंद रहती थी जिससे वह अतिविशिष्ट लगती।
खैर, आज दूरदर्शन पर एक दूजे के लिए सिनेमा आना है और रीना को भी सिनेमा देखने आना ही है। मैं वहां सबसे पहले पहूंच कर इंतजार करने लगा। प्यार को लेकर बातचीत तो आजतक कभी कुछ हुआ नहीं पर नजरों की भाषा से हमदोनों मन की बात समझ जाते थे। पर आज वह बहुत देर से आई। मैं भी ओसारे पर सबसे पीछे ही बैठा था ताकि उसे देख सकूं पर आते ही वह भीड़ में समा गई।
हां एक बात यह हुई की उसने अपनी सहेली सीमा को सुना कर जोर से कहा
‘‘ आज बहुत सुस्ताल लग रहली हें, गर्मीया ठंढा हो गेलौ की’’
पता नहीं उसने मुझे देखा या ऐसे ही समझ गई थी और मुझसे अपने गुस्से का इजहार कर दिया। पर सिनेमा देखने के क्रम में पहले के भांति प्यार के गीत आने पर अथवा प्यार भरेे डायलॉग बोले जाने पर पीछे मुड़ कर आज वह नहीं देख रही थी। गांव की मर्यादा कहिए या मेरा दब्बूपन मैं भी कुछ बोल नहीं पा रहा था सो अंदर से गुस्से से मैं भर गया और सोंच लिया की अब यह सिनेमा किसी को देखने नहीं दूंगा। मेरा गुस्सा उस समय परवान पर चढ़ गया जब ‘‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए’’ गाना आया। यह गीत टीवी पर चल ही रहा था कि मैं झटके से वहां से बाहर निकला और मेरे दिमाग मंे चले रहे खुराफात ने रिंकू के घर में जाने वाली मुख्य बिजली के तार को हाथ से पकड़ा और जोर से खिंच दिया चर्रर्र से एक चिंगारी निकली और जोर का झटका मुझे लगा और मैं वहीं फेंका गया। पर हिम्मत कर मैं तुरंत वहां से उठा और बगल की गली में खिसक गया और जब सभी लोग यह जानने के लिए निकले ििहक क्या हुआ तो मैं भी उस भीड़ में शामिल हो गया। छानबीन करने पर पता चला की किसी ने बिजली के तार को नोंच दिया है। कोई समझे न समझे पर रीना समझ गई और उसे इस बात का अंदाजा भी हो गया कि इससे मुझे करंट भी लग सकती थी और उसके आंख मे फिर एक बार आंसू डबडबा गए और वह वहां से चली गई।
मेरी तरकीब काम कर गई और अगले रोज सफेद पन्नों पर लिखे सुनहले शब्द आ गए जिसका मजमून यही था कि तुमको हो न हो मुझे तुम्हारी जान की परवाह है और मेरी खातीर यह सब मत करो। मैंने भी दे मारा कि जब तुम नाराज हो तो फिर जीवन क्या और मौत क्या।
बात चल रही थी प्यार पल रहा था। निश्छल अन्नत सागर की तरह गहराते प्यार में गोते लगाता मैं जीवन के किसी अन्य पहलू की तरफ नहीं देख रहा था।
इसी बीच शिवरात्री का दिन आ गया और पिछले दो साल से मैं शिवरात्री के दिन रीना के लिए उपवास कर रहा था और वह भी उपवास कर रही थी मेरे लिए। उस दिन दोपहर को मैं बालक ंिसंह के दलान पर बैठा था, कई लोग थे वह भी आ गई।
‘‘सुनऽलो ने मरांची बली आज कल मरदनमों शिवरात करो है, नइका फैशन चललै है।’’ उसने मुझे छेड़ा। मरांचीबली बालक सिंह की पत्नी का नाम था और गांव में बहुओं को उसके मायके के नाम से ही जाना जाता है। मरांचीबली ने भी पूछ दिया
‘‘के रीना बउआ, के मरदाना शिवरात करो है।’’
के करतै, जे मउगा रहतइ उहे ने करतै, इस सब तो जन्नी के करेवाला परब है। रीना ने जबाब दिया। इतना सुनना कि मैने भी तपाक से जबाब दे दिया
‘‘काहे जनीये के करे ले शिवरात बनलै है और भोलाबाबा मरदनमां से पूजा नै कराबो हखिन।’’
इसी तरह से वह मुझे चिढ़ाती रही और मैं चिंढ़ता रहा। मैं वास्तव में भोलाबाबा का बड़ा भक्त था और उनमें मेरी श्रद्धा थी। शिवरात के दिन उपवास रखता और अगले दिन गांव से दस किलोमीटर दूर पंचबदन स्थान स्थित शिवमंदिर पैदल चल कर पूजा करने के लिए जाता था। गांव से कई बच्चे भी जाते थे। इस बार शाम में रीना की मां आई और मेरी बुआ से बोली की चलभो पंचबदन स्थान पूजा करेले। फुआ भी तैयार हो गई। और मैं संभावित सासू मां के साथ भगवान शिव की आराधना करने चला गया। रास्ते में मैं बड़ी श्रद्धा से उनका सामान भी लेता गया जिसमें भुंजा था और कुछ कपड़ा लत्ता। पंचवदन स्थान रीना नहीं गई पता नहीं क्यों मैने उससे कहा भी पर वह नहीं गई ‘‘के जा है उतना दूर पैदल।’’ पंचवदन स्थान में पूजा करने के बाद मैंने भगवान शिव से रीना को पत्नी के रूप में मांग लिया।
शेष अगले किस्त में ......बने रहिए.............
अच्छी कहानी है अरुन जी ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंअरुण भैया
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रणाम!
देश में बुलेट ट्रेन भले कभी आये या ना आये, आपकी लव स्टोरी तो बुलेट की रफ़्तार से दौड़ रही है.
माशा अल्लाह!
सुभान अल्लाह!!
जो कहा जाये, सो कम!
इस किस्त पर की गई आपकी मिहनत स्पष्ट झलक रही है.
बहुत सुन्दर लेखन.
बहुत प्यारी ओरिजिनल कहानी.
मगही की छौंक से गजब का तड़का लगा है!
जय शिवरात्रि!
बम-बम भोले!
जय शिवशंकर!
हर-हर महादेव!
अब नहीं तो कब आशीर्वाद दोगे भोलेनाथ? आज के दिन मौका भी है और दस्तूर भी!
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com/
intjaar agle bhag ka
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छा लगा कहानी का यह हिस्सा।
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्यार में रूठने और मनाने का मजा ही अलग है।
पिछली कडी में मैंने भटकने की बात इसलिए की थी कि गांव का अलग ही प्रसंग आ गया था हालांकि वह प्रसंग भी अच्छा ही था लेकिन मुझे ऐसा लगा कि 'प्रेम कहानी' कहीं भटक तो नहीं गई।
वैसे आप सही जा रहे हो।
आगे के इंतजार में.....
जीवन में प्रेम के साथ साथ कई रंग कई उतर चढ़ाव आते ही हैं...... सुंदर
प्रत्युत्तर देंहटाएंजारी रखें ........
अच्छा लिखा है आशा है इस कहानी का अंत सुखमय होगा!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढ़िया प्रवाह और उत्सुक्ता बनी हुई है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमहाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें
बहुत सुन्दर प्रस्तुति|
प्रत्युत्तर देंहटाएंमहाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएँ|
रोचक ...फिर क्या हुआ ?
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप सबों ने मेरे इस छोटे से प्रयास के लिए जो हौसलाफजाई की है इसके लिए मैं आपसब का शुक्रगुजार हूं। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इसी तरह आप सब अपने विचारों से मेरा मार्गदर्शन करते रहेगे।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसाथ ही मैं एक बात कह देना चाहता हूं कि एक छोटी सी लव स्टोरी का यह शिर्षक इस लिए दिया है कि यह गांव की कहानी है और उसमें भी एक साधारण से युवा की, पर इसके इर्द गिर्द जो समाजिक सोंच, गांवों का भोला पन, उसके त्योहार, सामाजिक बुराई और उसके पतन का ताना बाना है उसे भी मैं रखू्रगां, निःसंकोच, निःछल भाव से....आपका अरूण साथी।
पूरी कहानी मे छोटी छोटी घटनाओं मे भी जो उत्सुकता रोचकता बनाये रखी वही कहानी की सफलता है। सुन्दर कहानी के लिये बधाई।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छी लगी कहानी ..आगे के लिए उत्सुकता बनी हुई है ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंअरुण जी आपकी लव स्टोरी पढ़ते पढ़ते कई बार मुस्कुराई हूँ .....
प्रत्युत्तर देंहटाएं‘‘तेरी गलियों में न रखेंगें कदम आज के बाद,’’ ‘‘चांदी की दिवार न तोड़ी प्यार भरा दिल तोड़ दिया...
हा...हा...हा.......धनवान की बेटी थी क्या ....?
@ मैं झटके से वहां से बाहर निकला और मेरे दिमाग मंे चले रहे खुराफात ने रिंकू के घर में जाने वाली मुख्य बिजली के तार को हाथ से पकड़ा और जोर से खिंच दिया चर्रर्र से एक चिंगारी निकली और जोर का झटका मुझे लगा और मैं वहीं फेंका गया।
ये हुई न मर्दों वाली बात .....ख़त तो आया .....
आगे इन्तजार है .....
अच्छी लगी पूरी कहानी ..उत्सुकता बनी हुई है ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंआगे इन्तजार है ....
पहली बार आए लेकिन पिछली सारी किश्तें सहज प्रवाह में पढ़ आए..... कुछ देर में फिर अगली किश्त पढ़ेंगे...
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