26 June 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी--21


समय कुछ यूं ही बीतता जा रहा था और जिंदगी के चौराहे पर मैं टेफिक पोस्ट की तरह ही दुविधा में पड़ा था। काफी मान-मनौअल के बाद पटना जा कर मेडिकल की तैयारी करवाने के लिए घर वाले तैयार हो गए। इस बात की भनक रीना को लगी तो वह काफी नाराज हो गई और गुस्से में आकर कई दिनों तक दर्शन नहीं दिया और जब एक दिन गली में मिल गई तो मैंने यूं ही आवाज दे दी -

‘‘की यार, आज कल दर्शनों दुर्लभ हो गेलै हें, की बात है, लगो है की कोई दुसर जोगार हो गेलै की।’’
मेरा इतना कहना की उधर से रीना की खनकती हुई आवाज गुंजी-
‘‘ तब की कहो हीं, तों पटना में दोसर जुगाड़ करमहीं त हम यहां करबै। हमहूं खूब समझो ही की तों पटना हमरा से दूर जा के जोगार में हीं, पढ़े के नै।’’

ओह तो यह बात है, पटना जाने की खबर मिलने से यह नाराज है। चलो फिर ठीक है मनाने की कला तो मुझे आती ही है यह सोचते हुए मैने भी जबाब दे दिया।
‘‘ तोरे ले जा रहलिए हें, बाबूजी खोजथुन डाक्टर, इंजिनियर दुल्हा त हमरा तैयारी करे ने पड़तै।’’

’’बाबूजी जे खोजथीन ओकरे से बियाह करे के रहतै हल त तोरा से काहे ले खोसामत करतिए हल। हमरा डाक्टर-इंजिनियर नै चाही, हमरा तोरा से मतलब है, जइसन हहीं औसने जादे नै।’’
मतलब साफ था की वह बहुत गुस्से में थी और वह मुझे दूर जाता नहीं देखना चाहती थी। चाहता तो मैं भी नहीं था पर जब कल की सोंचता तो चिंता बढ़ जाती और फिर विवश होकर कल के लिए प्रयास करने लग जाता। चार पांच सालों से साथ साथ रहते हुए जुदा होने की सोंच कर भी मन घबड़ा जाता पर होना तो था ही, सो मैने मन को कठोर कर लिया।

आज अहले सुबह जब रीना निकली तो उससे आगे आगे मैं जा रहा था और फिर एक प्रेम पत्र उसके आगे गिरा कर मैं चलता रहा उसने उठाया की नहीं मैं मुड़ कर नहीं देख पाया पर उसने जबाब दिया-
‘‘ हमरा पता है कि एकरा में की लिखल है, इ सब से काम नै चलतौ।’’

वह एक दम प्रतिरोध के मुद्र मंे आ गई थी और मैंने भी निर्णय ले लिया था की जाना है तो जाना है। इस पत्र के माध्यम से मैं उसे समझाने की पूरी कोशिश की थी की आने वाला कल क्या होना है और फिर उसके लिए हमें क्या करना चाहिए। पर उसपर इस सब का कोई असर नहीं हुआ। वह एक विरहनी की तरह रहने लगी। उदास होकर छत पर भी बैठी रहती जैसे किसी का सबकुछ लुट गया हो। मैं भी काफी सोच विचार कर पटना जाने की तैयारी में जुटा था। पराडाइज कोचिंग का अखबार में विज्ञापन देखकर कर उससे फोन से सारी जानकारी ली और जाने की तौयारी करने ल्रगा। सोलह हजार रूपया लगना था पर नामांकन के लिए अभी तीन हजार की जरूरत थी जिसके लिए कुछ पिताजी तो कुछ फूफा से कह कर जुगाड़ हुआ। जाने के लिए  आटा, चावल, दाल सहित कई समान घर से ले लिया और फिर सुबह शाम के नास्ते के लिए भुंजा तो था ही। जैसे जैसे जाने के दिन नजदीक आ रहे थे वैसे वैसे रीना उदास रहने लगी थी। आज दोपहर में रीना की मां मेरे घर आई थी और फुआ से गलबात हो रही थी।
‘‘ बबलुआ जा रहलो है पटना पढ़े ले, पढ़ा दे हीई, पता नै कल की होतै।’’ फुआ कह रही थी।
‘‘ आदमी के अपन करतब करे के चाही आगे ईश्वर जानथी।’’ रीना के मां ने कहा।
‘‘और रीना बउआ के की हाल है, नजर नै आबो हथीन,’’
‘‘की नजर आइतो, पता नै की होबो हइ, छौड़ी दु दिन से खाना नै खा रहलो हें।’’
‘‘ काहे कुछ पता नै चलो हई’’
‘‘नै कुछ बोलै तब ने।’’
मेरे जाने की तारीख तै हो गई। पहली बार पटना जाना था। रहने का जुगाड़ मैंने गांव के ही राजीव दा से कह कर नालान्दा मेडिकल कॉलेज अगमकुंआ के पास स्थित फार्मेसी कॉलेज के होस्टल में की थी। उन्हीं के कमरे में रहना था। जाने के लिए तीन दिन बचा था और अब मैं भी बचैन हो रहा था। जाने का मन नहीं करने लगा। पता नहीं ऐसा पहली बार घर से बाहर जाने को लेकर हो रही थी या फिर रीना को लेकर पर मन बेचैन रहने लगा। आज सुबह से मैने भी खाना छोड़ दिया । रात भर छत पर आंखों आंखो में काट दिया। रात के उस जागती आंखों में एक पत्र लिखा जिसे अहले सुबह रीना को देना चाहता था पर वह नहीं निकली और मैं और बेचैन हो गया। शाम मे अपने दालान वह बाबूजी के लिए लोटा में लेकर चाय जा रही थी। मैने मौका देख कर उसकी कलाई पकड़ ली।

‘‘ पागल नियर काहे करो ही, अपना ले जा रहलिए हें की तोरे ले।’’
‘‘ छोड़, छोड़ जादे बाबा नै बन, तोरा की भरम हौ की तोरा बिना नै रहबै तब उहो टूट जइतै।’’
रीना एक दम भड़कती हुई बोली।

तभी देखा रास्ते से महेश दा गुजर रहे थे, आम दिन होता तो मैं और वह दोनो वहां से खिसक लेते पर आज नहीं खिसका। हां मैने उसकी कलाई छोड़ दी और वहीं खड़ा रह कर पटना कोचिंग जाने की बात करने लगा।

कौची के तैयारी करे ले जा रहलीं है, डागडर बनभीं की?’’
‘‘काहे डाक्टर गाछ से टपको है की?’’
जैसे ही महेश दा गुजरे बातचीत का टौपीक बदल गया।
रीना एक दम गुस्से में बोली हमरा से नै बरदास्त होतै, हम अकेले नै रहबै, पता नै यहां की होतऔ।
’’ अब तो हमर शादी के चर्चा भी घर में होबे लगलौ हें।’’

‘‘कुछ नै होतई, हम अइते रहबै।’’
उ सब कुछ नै हम जानो ही, नै जाना है तब नै जाना है।’’
‘‘ठीक है नै जइबे।’’ पर तोरा परसों रात में पोखरिया पर हमरा से मिल ले आबे पड़तौ तब नै जइबै। बरगद के पेंड़ के नीचे।’,’
बोल, ‘मंजूर।’’
‘‘मंजूर।’’
शेष अलगे किश्त में, बने रहिए।

9 टिप्पणियाँ:

  1. छोटी सी लव स्टोरी बढ़ रही है आगे धीरे- धीरे ..
    पटना पहुंचे या नहीं , देखते हैं अगली किश्त में !

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  2. रोचक लव स्टोरी ... छोटी होकर भी लंबी ..

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  3. बस, उपन्यास तैयारी पर है....बढ़िया प्रवाह!!!

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  4. अरुण भाई दिल को छुने वाली है आपकी यह लव स्टोरी

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  5. आगे आगे देखिये होता है क्या।

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  6. सुंदर प्रवाह ...आम घटनाएँ खास ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं....

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  7. सचमुच बेहद रोचक...!

    आगे कि कड़ियों का इन्तजार..!!

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