01 July 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-२२



रीना से मिलकर जैसे घर की ओर जाने लगा वैसे ही फूफा और फूआ के झगड़ने की आवाज गूंजने लगी। घर पहूंचा तो कोहराम मचा हुआ था। फूफा और फूआ के झगड़े का कोई खास बजह नहीं होती थी पर एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता था जब दोनों में झगड़े नहीं होते हो और कभी कभी फूफा कें द्वारा फूआ की जबरदस्त पिटाई कर दी जाती थी। बचपन से यह सब देखते हुए आज किशोर हुआ था। जब मैं कमरे में गया तो फूआ रोते हुए गाली दे रही थी। 
‘‘ कोढ़ीया, भंगलहवा, निरवंशा’’ मरबो नै करो हई कने से कने हमर मथवा में लिख्खल हलई’’
‘‘हां बोलमीं नै, तकदीरवा तो हमर ,खराब हलइ जे तोरा से वियाह होलई’’

लड़ाई का कभी कोई बड़ा कारण नहीं रहता था और ऐसा अक्सर होता रहता था। दो कमरे के इस घर मंे एक में जानवर के खाने का कटटू भुस्सा रहता था और एक में हम लोग रहते थे। यह कमरा बड़ा सा था लगभग पच्चीस बाई पच्चीस का। जब फुआ के जबरदस्त प्रतिरोध के बाद बंटबारा हुआ था तो उसके हिस्से में पुराना घर नहीं था और बैक से कर्ज लेकर और जमीन बेचकर गांव के बाहरी भाग में एक दो कमरे का घर बनाया गया जिसमंे से दोनो कमरा इसी साइज का था। कमरे में ओसारा भी नहीं था और उसके बाहरी भाग मंे जानवर का बथान था। जानवर के नाम पर दो भैंस और एक बैल थी जिसकी सेवा ही फूफा का प्रमुख काम था। जिस कमरे मंे हमलोग रहते थे उसके अनाज रखने का तीन बड़ी  बड़ी कोठी लगभग तीन बाई दो की चौड़ाई और आठ फुट की उंचाई रखी हुई थी। सभी कोठी फुआ ने ही अपने हाथों से बनाया था जिसमें से एक गोल कोठी मेरे चौकी के बगल में तथा दो कमरे के बीचो बीचो लगा हुआ था। जिसमें से एक कोठी दो खाना का था और सभी में अनाज भरा रहता था और वह तभी खुलता जब कभी अनाज बेच कर कुछ घर का सामान लाना रहता या फिर दवा इत्यादी खरीदनी होती। कोठी खोल कर अन्न निकालने का फूआ एक नियम एक दम कड़ा था, मंगल, गुरू  और शनि चाहे जो हो कोठी नहीं खुलना है। फूफा के बारे मे फूआ का कहना एक दम सटीक था कि यह बतलहवा हमरे लिख हलई। गांव का एक सीधा साधा या यूं कहे बुरबक आदमी मेरे फूफा को माना जाता था। गांव से बाहर कभी अकेले नहीं गए। उन्हें चिढ़ाने के लोग अक्सर कहा करते आयं सुराज थाना का मुंह किधर है हो और वह उसको गरियाने लगते। उन्हें पुरब पश्चिम का ज्ञान नहीं था हां एक बात उनमें जबरदस्त थी वह था अपने जानवरों से उनका लगाव। वह सीधा कहते जानवर तो भगवान है, निमूंहा धन, गौरक्षणी होबों है। लड़ाई का ज्यादा कारण जानवर ही  होता था। आज भी जानवर को लेकर दोनों में ठनी हुई थी। कारण था जानवर को फूफा ने आज फिर से चोरी कर गेंहू का आंटा कटटू में मिला कर दे दिया था। अक्सर जब वे सानी-पानी लगाते थे तो फुआ घर में रहती थी पर आज वह बाहर गई हुई थी कि उन्होने ने मौका देखा आटा मिला दिया। तभी फूआ आ गई।
‘‘आदमी कें खाना नसीब नै है, मुदा तोरा जानवर के खाइले आंटा चाही, कोढीया के कामाबे में भार पड़ो है और घर के समानवां बरबाद करो है।’’
बरबाद कौची, इहे लक्ष्मी सब कमा के दे हखीन की तों।’’

और फिर महाभारत शुरू। दोनों के अंदर एक अजीब सी कुंठा थी, खालीपन भी। अपना  बच्चा नहीं होने को लेकर वे कफी परेशान थे और गांव में उनका जीना दुभर हो गया था। बच्चे को लेकर अनपढ़ होते हुए भी दोनों ने किसी न किसी गांव कंे लोग को पकड़ कर पटना के शांति राय से लेकर कहां कहां ईलाज नहीं कराया और कौन कौन ओझा गुणी से नहीं दिखाया। अभी हाल ही में एक मात्र मेरी प्यारी छोटी सी गाय को एक ओझा ने दोनों से ठग लिया था। किसी ने बताया था कि बहुत पहूंचे हुए है और फिर दोनों ने उन्हें घर बुलाया टोना टोटका हुआ। ओझा आते ही अपनी ओझई दिखाने लगा और उसने नास्ते के रूप में एक कटौरा शुद्व देशी धी पी गया उसके अनुसार यही उसका भोजन है। और फिर उसने जाते जाते एक मात्र देशी मेरी प्यारी गाय को फूआ से दक्षिणा के रूप में मांग लिया। 

फूआ फूफा को पगला कहते और फुफा पगली। यह प्रेम की अभिव्यक्ति का एक सशक्त तरीका था। लड़ाई चाहे जितनी हो पर दोनों का प्रेम भी अमर था और अक्सर फूफा ही मनाने मे जुट जाते- 
‘‘खा ले पगली, फेर तबीयताबा खराब हो जइतौ’’। 
और फिर सबकुछ सामान्य। फूफा का एक गुण या अवगुण भी अक्सर घर मंे कलह का कारण बनता और वह था उनके गप्पी होने की आदत। घर से खेत जाना हों या खलिहान, पानी लाना हो या हरीयरी उनको घंटो लग जाते। जो भी रास्ते में मिल जाता उसे टोक कर बतियाने लगते।

फुफा मुंहफट भी थे और एक दिन इसी को लेकर महाभारत हो गई। गांव के एक महिला थी सुनैयनमां। जिसके बारे में फूफा कह रहे थे। 
‘‘हरमजादी, रतिया मे सुते ले जा है भतरा के साथ तब रतिये मे नहाबो है, जन्नी है करकसनी।’’
सुनैयनमां के बारे में गांव में कई तरह के किस्से थे जिसमें से सबसे चर्चित यह था कि शादी के बाद उसने अपने पति को कभी सटने तक नहीं दिया। उसका साफ मानना था कि शारीरिक संबंध एक अपवित्र चीज है और इससे भगवान नखुश होते है। गांव में गाहे बेगाहे दालान पर इसकी चर्चा निकल जाती थी। गांव की बेटी होकर भी वह कभी ससुराल में नहीं रही, इसी कारण से। एक दिन मैंने भी इसी चर्चा के क्रम में पूछ लिया 
‘‘फिर एक बेटा कैसे है? ’’
जबाब और चौंकाने वाला था।
जबाब दिया था  कामो सिंह ने- 
‘‘ अरे एकरा ले केतना पंचयती होलई और पंच के फैसला पर इ करकसनीया सांय के साथ सुतलै हें।’’
एक दिन सुनैयनमां को देख फुफा ने टोक दिया,-
‘‘ देखीं देखीं हो, भैंसीया बोरलौ पानी में।’’
सुनैयनमां की आदत भी विचित्र थी। शाम या सुबह जब वह शौच से आती थी तो पनछुआरी के लिए अन्य औरतों की तरह वह सावधानी नहीं बरतती थी और कोई आता जाता रहे वह पूरी साड़ी उघाड़ कर पोखर में बैठ जाती और छपड़ छपड़ करती रहती, देर तक। इसी को देख दूर से फुफा ने किसी को सुनाया था। बोरलै भैंसीया पानी में।
और फिर लड़ाई शुरू....

शेष अगले किश्त में, बने रहिए।
यह छोटी सी लव स्टोरी कैसी लगी इस पर  अपने विचार अवश्य दें ताकि आगे के लिए प्रेरणा मिल सके, आपका साथी...

4 टिप्पणियाँ:

  1. आमजीवन में होने वाली छोटी छोटी घटनाएँ और आदतें बहुत अहमियत रखती हैं......

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  2. आपकी लव स्टोरी अनूठी है । इसे आप प्रकाशित करवायें।

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  3. @यह छोटी सी लव स्टोरी कैसी लगी इस पर अपने विचार अवश्य दें ताकि आगे के लिए प्रेरणा मिल सके, आपका साथी...



    कैसी लगी ये प्रेम कहानी,
    भैया आज सुबह से तुम्हरे डेरा में बैठकी लगाये हैं... एक के बाद एक किस्त...

    बेहतरीन प्रवाह .

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं