सिलसिला प्यार का चल रहा था कभी रूक कर, तो तेज-तेज पर रास्ते से भटकने की बात नहीं थी। किशोर मन हिचकोले ले रहा था और आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी। बुढ़े बरगद के पास मिलना क्या हुआ कि जैसे एक आसरा मिल गया। दशहरे के दिन वह हर साल सपरिवार मेला देखने के लिए जाती थी इस साल मैं भी साथ हो लिया,चुपके से। मेला में वह जिधर जाती मैं फासले से उसके पीछे पीछे हो लेता। मुझपे उसकी नजर थी और वह इठला रही थी, तितली की तरह। मेला, जैसे महिलाओं का जन सैलाब उमड़ सा पड़ता हो। देह से देह रगड़ कर लोग चलते और जलेवी प्रमुख मिठाई रहती। अमीर से लेकर गरीब के घर तक इसकी पहूंच थी। इसमें एक बड़ी विकृति भी थी वह इस रूप मंे कि कुछ नौजवान लड़कियों के छेड़ने या और उनके साथ हथरस करने में लगे रहते। मेरे कुछ दोस्तों ने भी कहा -
‘‘कि चल न याद बड़की देवी जी भीर, कतना के मैंज देलिए हें।’’
पर मेरी दुनिया तो सपाट थी... रमजा जोगी की तरह।
खैर चलते चलते दो बज गए, थके हारे घर की ओर चला जा रहा था कि तभी रीना सबसे पिछड़ने लगी और फिर पगदंडी से होकर गुजरते हुए मैं उसके करीब जैसे ही पहूंचा उसने मुझे चुम लिया और फिर एक मिठाई मेरे मुंह में डालते हुए बोली-
‘‘तोरा ले कखने से ई रसगुल्ला अपन हिस्सा से बचा के रखले हिऔ, तोरा नियर डरपोक, की दस बांस पीछे ही रहो हइ।’’
हां कहमीं नै, तों सब दुर्गा जी देखो हलीं और हम अपना दुर्गा के पीछे पीछे पगलाल।’’
फिर पीछे से किसी के आने की आहट और वह छटक कर आगे निकल गई। इस समय रात के दो बज रहे थे और जाते जाते उसने कहा-
‘‘ अडडा पर मिलो हिऔ तनी देर में।’’
रीना आज कुछ ज्यादा ही प्रसन्न थी। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था पर फिर भी बूढ़ा बरगद की गोद में जाकर बैठ गया। करीब एक घंटे कें बाद धंधरेदार फ्रॉक पहने वह चली आ रही थी। आज उसकी चाल में कुछ अजीब सी मादकता सी थी। मटक मटक कर चलती हुई जैसे वह कुछ बताना चाहती हो। जैसे ही वह करीब आई मैं हाथ पकड़ना चाहा और छटक कर वह परे हट गई। आज वह हिरणी की तरह मटक रही थी मचल रही थी।
‘‘ की बात है हो आज खूब मटक रहलीं है।’’
‘‘तोरा काहे जलन लगो है, हमरा से कुछ डाह हौ की।’’
‘‘ डाह कौची पर जलन तो होबे करतै पर आज कबुतरा नियर फुदूक काहे रहलीं हे।’’
‘‘आज बाबू जी से बोल देलिऔ की हम ब्याह तोरे से करबौ नै त अपन जान दे देबौ।’’
‘‘तब बाबू जी कहलखुन।’’
‘‘कहथिन की, इहे की कहां से खिलैतउ और कहां रखतै, तब हमहूं कह देलिए की जब भगवाने के इ मर्जी है तब तों कहे ले चिंता करो हो।’’
यानि की उसकी खुशी का राज यही था।
मैं भी कुछ ज्यादा ही खुश होकर एक बार फिर उसके बगल होकर उसे बांहों में जकड़ना चाहा पर वह फिर छिटक गई। पता नहीं क्यों पर आज मेरा मन उसे बांहों में लेने के लिए छटपटा रहा था और वह पहले से विपरीत छटक रही थी। कुछ नियोजित नहीं था पर कुछ कुछ हो रहा था। परसों दहशहरे की छुटटी के बाद मुझे जाना था और कुछ हासील करने की ललक सी पता नहीं क्यों पर जाग गई थी। इस लुकाछुपी के बीच कुछ ही देर में रीना आत्मसमर्पण करते हुए मेरे बांहों में थी।
‘‘ की ईरादा है हो, आज लगो है मन मिजाज हाथ में नै है की।’’ रीना ने व्यंग वाण मारा।
‘‘ईरादा तो सच में आज ठीक नै है, साला के अलग होला के बाद हाथ मले परो है।’’
‘‘ इ हाथा अभी मलैइए पड़तै।’’
उसने इतना कहा ही था कि मैं और अधिक जोर से उसे सीने से सटा लिया। छोड़-छोड़ की आवाज बढ़ने लगी। मैं अब अपने आपे में नहीं था और मेरा हाथ उसकी कमर की ओर सरकने ही लगा था कि वह पूरी ताकत लगा मेरी बांहों से आजाद होने की कोशिश करने लगी, इसी बीच वह मेरी बांहों से तो आजाद थी पर उसकी नथुनी मेरे हाथ में थी और वह रोने लगी। इस खिंचा-तानी में मैंने उसकी नथुनी खींच लिया था और फिर उसके नाक से खून निकलने लगा। वह रोने लगी और मैं ग्लानी से भर गया।
कोई मुझे धिक्कारने लगा। मैंने नथुनी को उसकी हथेली पर रख दिया और शर्मिन्दगी से मेरा सर झुका हुआ था। और फिर वह रोती हुई वहां से चली गई। वह अपने घर की ओर जा ही रही थी की तभी उसके घर के आस पास दो तीन टार्च जलने लगे। सुबह होने वाली थी और गांव मंे जानवरों के खिलाने के लिए एक आध लोग जगने लगे थे। रीना के घर वालों को उसके बाहर होने का पता चल चुका था....हे भगवान... कल फिर हंगामा होगा। यह सब भांपने और यह जानने की कहीं रीना के साथ मारपीट नहीं हो रही हो, मैं चुपके से रीना के घर के पास जाने की कोशीश कर रहा था कि तभी धमाक से मेरी पीठ पर एक इंट का अध्धा आ कर लगा और मैं मुर्छित हो वहीं गिर गया......
शेष अगले किश्त में, बने रहिए
जब तक आपका अगला अंक आता है तब तक पिछला भूल जाता है। कहानी से पहले थोडी पिछली भूमिका भी दिया करें तो अच्छा है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहानी जोरदार लग रही है लेकिन निर्मला जी से सहमत हूँ थोड़ा रिकेप दीजिये तो अच्छा रहेगा
प्रत्युत्तर देंहटाएंजल्दी जारी करो भाई रस आ रहा है । इंतजार रहेगा अगली किश्त का
प्रत्युत्तर देंहटाएंये इश्क नहीं है आसां ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंभाई आगे क्या हुआ?
बहुत ही ज़ोरदार चल रही है यह स्टोरी, बहुत दिलचस्ब. हालाँकि कुछ शब्द पूरी तरह समझ में नहीं आते हैं...
प्रत्युत्तर देंहटाएंI am eagerly waiting foe next episode
प्रत्युत्तर देंहटाएंI am eagerly waiting foe next episode
प्रत्युत्तर देंहटाएंजोरदार स्टोरी ...अरुण जी
प्रत्युत्तर देंहटाएंरोचकता से भरपूर...
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कम्प्यूटर से तेज़!
इस दर्द की दवा क्या है....
ये इश्क नहीं है आसां ...
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