07 August 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-27

मेरी मुर्छा कुछ ही क्षणों के लिए थी और फिर मैं वहां से उठा और घर आ गया। ऐसा पहली बार हुआ था और मुझे इसकी आशंका नहीं थी। आमने सामने से किसी को हाथ लगाने की हिम्मत नहीं थी और वह इसलिए मैं शरीर से सुडॉल था और गाहे बिगाहे जब भी किसी से लड़ता तो उसकी पिटाई कर देता।

खैर, अगली रोज वह कहीं नहीं दिखी, शाम में आकर रामू ने बताया कि उसकी पिटाई हुई है। अगले दिन मैं पटना के लिए रवाना हो गया और फिर से अपनी दिनचर्या में लग गया। वहीं कोंचिग से डेरा और डेरा से कोचिंग। क्यांेकि पटना पहूंचते ही राजीव दा ने जो पटना में रहने के लिए एक दिया- देख पटना में रहना है तो दो चीज समेट के रखना , जी और .................।
मैं दोनों बातों पर अमल कर रहा था। शाम में बस सब्जी लाने के लिए डेरा से बाहर जाता था। जिंदगी अपने रफतार से चली जा रही थी पर रीना की याद मुझे सता रही थी। एक तरफ पढ़ाई की बात सोंचता तो दुसरी तरफ प्रेम की। जी नहीं लग रहा था। उसके सपने रोज रोज आ जाते फिर भी कलेजा पर पत्थर रख कर कई माह गुजार दिया और फिर फागून भी आ गया। इस बार कोचिंग से महज तीन दिन की छुटटी मिली थी और मैं घर आ गया था। जैसे ही घर पहूंचा रीना को नजर तलाशने लगी थी। कई माहिनों से उसे देखा तक नहीं था। मेरी बेचैन नजर हर उस संभावित जगहों पर किसी न किसी बहाने से उसकी तलाश कर ली पर वह नहीं मिली और फिर शाम में जब टहलने के लिए जा रहा था तभी साथ हुए एक मित्र ने सहानुभूति के तौर पर बताया कि रीना को उसके नानी घर भेज दिया गया है, शायद उसके शादी की बात चल रही थी। उसका ननिहाल सुदूर गांव में था जो शेखपुरा शहर से दस किलोमिटर दूर कुरौनी गांव में था। जब यह बात मेरे कान में पड़ी तो मुझे तो जैसे लकबा मार गया। काटो तो खून नही। बेचैन मन से मैं घर लौट आया। दुविधा दो बातों के लिए गंभीर थी। पहली यह कि पढ़ाई के साथ भविष्य संवारना है और दूसरी यह की रीना इतने दिनों तक कैसी होगी? या फिर कहीं उसकी शादी तो नहीं कर दी गई? क्या वह सोंच रही होगी की मैंने उसे धोखा दे दिया? और इसी बेचैनी के बीच इस साल की होली मैंने घर में सो कर कट दिया और फिर दूसरे दिन पटना रवाना हो गया। पटना में रहे हुए अभी एक सप्ताह ही हुआ होगा कि गांव से आए नरेश मास्टर साहव ने बताया कि रीना के मां को ब्रेन हेमरेज हुआ है और वह बहुत सीरियस है उनको यहीं डा. सहजानन्द के पास भर्ती कराया गया है। मैं फिर से बचैन हो गया और सुबह मास्टर साहब को साईकिल पर पीछे बैठा कर डाक्टर के यहां चल पडा। वहां से क्लिनिक करीब छः-आठ किलोमिटर होगी पर उस समय जोश ही कुछ और थी। जैसे ही क्लिनिक पर पहूंचा कि रीना के पिताजी पर नजर पड़ी, वह रो रहे थे। रीना की मां को देखने के लिए दोनों अन्दर गए। वैसे तो मुझे हिम्मत नहीं होती पर मास्टर साहव साथ थे। वे बेहोशी की हालत में थी और कभी कभी उनकी आंख खुल जाती थी। जैसे ही मैं उनके पास जा कर खड़ा हुआ उनकी आंखों में आंसू छलक गए। मैने उनको आश्वासन देने के लिए उनके हाथ का स्पर्श किया कि तभी उन्होने मेरे हाथ का कस कर पकड़ लिया। मैं बिचलित हो गया। एक मां आज अपनी बेचैनी को जाहिर कर रही थी, शायद यह अपनी बेटी के लिए थी।

रीना घर में सबसे छोटी रहने के कारण नकचढ़ी और बदमाश थी पर घर के सभी लोग उसको खूब चाहते थे पर जब से अपना प्र्रसंग आया है उसके घर में उसके मां को छोड़ सबका स्वभाव उसके प्रति बदल गया है जिस बात का जिक्र रीना ने कई बार किया था। एक बार रीना ने यह भी बताया कि मां से अपनी शादी की बात की थी और उसने बाबूजी को भी बताया था पर बाबूजी बहुत गरम होकर बोेले कि

‘‘मेरी लाश पर ही यह शादी होगी। ओकर रोजिए की है जे हम अपन बेटी के ओकर संग बियाहबै।’’
शाम में जब कोचिंग से लौट कर मैं अपने डेरा में बैठा तभी उधर से मास्टर साहब आए । वह बहुत उदास थे।

‘‘की होलई मास्टर साहब’’

‘‘की होतई हो, अर्जून दा के कन्याय गुजर गेलखिन। बेचारी लक्ष्मी हलखिन’’

रीना के मां के मरने की बात ने मुझे हिला दिया। हम दोनों को महज उनके उपर ही भरोसा था और ईश्वर ने उन्हें भी तोड़ दिया। इस घटना को तीन चार दिन हुए होगें, मैं घर लौटा। इस उम्मीद से कि रीना का दर्शन कर पाउंगा और हुआ भी। शाम का वक्त था और वह छत पर उदास बैठी थी। देर शाम मैं उसके घर के आस पास से किसी न किसी बहाने गुजरने लगा पर वह नीचे नहीं आई पर रास्ते से गुजरते हुए एक डिबीया आ कर गिरी जिसे मैंने उठा लिया उसमें प्रेम पत्र था। रीना के मन की बेचैनी और मां के गुजरने का दर्द उकेर दिया था। उसी पत्र में उसने अपनी शादी की बात चलने की बात कही और यह भी की मां के गुजर जाने के बाद अब हम दोनांे के मिलन के रास्ते कितने मुश्किल हो गए।
अहले सुबह लगभग चार बजे चांदनी रात में जब मेरी नींद खुली, रीना अपने छत पर टहल रही थी और मैं उठ कर बैठा तो वह छत से नीचे आई और शौच के लिए घर से बाहर निकलने लगी। यह मुलाकात का अंतिम हथियार था। मैं भी झट से अपने छत से नीचे उतारा और रास्ते पर आकर खड़ा हो गया। वह आई रही थी। वह पीछे पीछे, मैं आगे आगे। फासले से बात भी हो रही थी। ‘‘

बहुत दुख होलउ, पर मांजी के देखेले हमहूं गेलिओ हल।’’

‘‘हां, घर में चर्चा होबे करो हलई कि बबलुओ अइलई हल देखे ले।’’

‘‘तब की करमीं, पर जाना तो एक दिन सब के हई।’’

‘‘ हां ई सब तो ठीके हई पर अब हमर बात सुने बाला कोई नै हई, ऐगो मईये हलै जे मन के बात बिना कहले समझ जा हल।’’

‘‘तब की करमहीं, भगवान से बढ़ के कुछ हई।’’

‘‘तब नानी घर कहे ले भेज देल गेलई।’’

तब रीना ने बताया कि अपने प्रेम के बारे में जानकर सब घर बालों ने मिल कर मेरी शादी करने की योजना बनाई थी और मैं अकेले सब से लड़ी थी। उसने बताया कि शादी के नियत से ही उसे ननिहाल भेजा गया पर उसकी मर्जी के खिलाफ यह शादी नहीं हो सकती। मां के श्रद्ध कर्म के बाद उसे फिर से नानीहाल भेज दिया जाएगा और जो भी करना हो पर जल्दी ही कुछ करना होगा।



शेष अगले किश्त में...बने रहिए।

11 टिप्पणियाँ:

  1. पढ़ रहा हूँ मगर चाल धीमी है.

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  2. अगली कडीयो का बेसब्री से इंतजार...!!

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  3. कहानी गंभीर रुख अख्तियार कर रही है। बादल के गहराने के साथ मन भारी होता जा रहा है।

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  4. अगली कड़ी का इंतजार रहेगा। कहानी अच्छी चल रही है।

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  5. अरुण जी की इअस छोटी सी लव स्टोरी को गया से प्रकाशित सांध्य दैनिक अबतक बिहार में हम प्रकाशित करने जा रहे हैं। अरुण भाई यह वाकई एक सच्ची लव स्टोरी है .

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  6. जैसे जैसे ये कहानी आगे बढ़ रही है गंभीर रूख अख्तियार कर रही है।

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  7. bolchal kee bhasha ka prayog se kahani swabhawikta se saarthak ban padi hai..
    haardik shubhkamnayen!

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