24 December 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-44


प्रेम-शायद भाव-संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है। कभी अभिव्यक्ति का माध्यम जुबां होती है तो कभी आंखें और कभी कभी इसकी अभिव्यक्ति मौन होती है। पर मौन अभिव्यक्ति की इस भाषा को पढ़ना ही शायद प्यार है।

आज ऐसा ही कुछ हुआ। वह मेरे घर आ कर धमक गई। शायद वह समझती थी कि पत्र में दिये गए अल्टीमेटम के अनुसार मैं कुछ नहीं सुनूंगा। यह कोई दोपहर का समय था। मैं ओसारे पर बैठा था कि एक खनकती हुई आवाज सुनाई दी।
‘‘की शेरपरवली यहीं रहे के मन करो हो।’’
यह खनकती हुई आवाज चिरपरिचत थी। रीना की आवाज। उसने कुछ अधिक जोर देकर आवाज लगाई ताकि मैं इधर उधर भी होंउ तो सुन सकूं। फूआ और मां डेउढी  में हुई थी और रीना अपनी एक सहेली के साथ आकर धमक गई। मेरा गांव चुंकी बाजार से कुछ ही फासले पर था सो बाजार के बहाने यहां आना मुश्किल नहीं थी। 
‘‘नैहरा है न रीना बउआ, केकरा मन नै करो हई। कहां आइलहो हें।’’ फूआ ने कहा।
‘‘बाजार आइलीओं हल, सोचलिओं तोरा से मिलते चलो हिओं।’’
‘‘बढ़िया कइलहो बउआ, आबों।
मैं लपक कर दरवाजे तक गया। मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा था। लगा जैसे दिन में जागते हुए सपना तो नही देख रहा। पर नहीं यह सच था। रीना मेरी मां के पैर पर छुकी हुई थी।
‘‘तोरी, ई रास्ता कैसे भुला गेलही।’’ मेरे मुंह से बरबस निकल गया पर वह कुछ नहीं बोली। यह उसकी नाराजगी जाहिर करने का अपना तरिका था।

फिर रीना और उसकी सहेली को मां ने धर के अंदर बुलाया। उसे ओसारे पर बिछी खटिया पर बैठाया गया। मां ने उसके लिए शरबत बनाने की बात कहते हुए मुझे मोदी जी की दुकान से चीनी लाने के लिए भेज दिया। चीनी लेकर आया तो देखा रीना मां और फूआ के साथ धुलमिल कर बातें कर रही थी। फिर मां ने मुझे शरबत बनाने के लिए कहा और मैं उसी काम में लग गया। और फिर वह लग गई अपने चिर परिचित अंदाज में।
‘‘तेरी, बबलुआ के शरबत बनाबे ले आबो हई शेरपर बली। ऐकरा तो खली लड़े और रूस के भागे ले आबो हई।’’ वह मुखर हो गई। 
‘‘जादे मामा नै बन।’ तोरा से पूछ के सब काम नै करे के है।’’
‘‘तोरी घर आल मेहमान से ऐसे बोलो हई।’’
चलता रहा।
मां, फूआ और रीना, सभी इस सच्चाई को जानते थे। पर सभी औपचारिक रूप से यह जता रहे थे जैसे वह एक मेहमान है, बस। मैं भी उसी अभिनय में लगा रहा। थोड़ी देर में गिलास में शरबत भरने लगा तो रीना उठ कर गिलास मेरे हाथ से छीन लिया। 
‘‘चल हट हमरा नै आबो है की, अपने घर ने हई।’’
यह सारा अभिनय चल रहा था और दोनो समझ रहे थे, एक दूसरे के दिल की हालत। दोनों के अंदर दर्द थे पर जुबां पर हंसी। इसी बीच उसके जाने की बात आ गई और मैं उसको थोड़ी दूर छोड़ने के लिए जाने लगा, तभी दरबाजे पर जैसे ही वह एक क्षण के लिए सभी के आंख से ओछल हुई, फफक कर रो पड़ी।
‘‘जब परबाह नै त प्रेम कैसन, इहे ले हमरा प्यार कलहीं हल, छोड़ देबे ले। इहे यदि प्रेम के परीक्षा है त हम भी इकरा मे फेल नै होबै।’’
‘‘देख अभी हम बड़ी दुख में हिऔ, हमरा माफ कर दे।’’
‘‘इहे से तो, दुख के घड़ी है त हमरा अलग काहे समझो ही, अगर भोला हमरा दुख में तोरा साथ रहेले बदलखीन हें त तो बंचित करे बाला तों के।’’ 
और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और उसके आंखू की एक बूंद हाथों पर आकर गिर पड़े। भोला। फिर वह जाने लगी। थोड़ी दूर तक उसे छोड़ कर आ गया। वह खामोश थी। पर उसकी यह खामोशी दर्द बुझी थी। इसे मैं समझ सकता था। उसने अपनी तरफ से अंतिम कोशिश के तौर पर यह कदम उठाया था।
अगले रोज मैं फूआ के साथ उसके गांव में था। मेरे गांव पहूंचते ही जैसे हवाओं ने जाकर उसे संदेशा दे दिया हो। न मैं उसे देख सका और न उसने मुझे। कम से कम मैं तो उसे भी देखते हुए नहीं ही देख सका। पर मुझे भी भरोसा था कि उसे मेरे आने की खबर मिल गई होगी। अमूमन कई लोग ऐसे वक्त में साथ भी दे देते है। न कहते हुए जानबुझ कर कह देतें है। जैसे की सुनाते हुए कहा दे-बबलुआ आ गेलै। 

कुछ दिन शांति से बीत गया। शायद एक पखबारा। दोनों एक दूसरे से दूर दूर रहने का प्रयास करने लगे ताकि लोगों को लगे कि हमारा बिलगाव हो चुका है। यह कदम दोनों ने उठाया और कहा इसके बारे में किसी ने किसी से नहीं था। यही होता है प्यार। मौन की भाषा। अदृश्य का दृश्य। न देखते हुए भी मैं उसे देख रहा था और वह मुझे महसूस कर रही थी।

आज सावन की पुर्णिमा थी। आज के दिन बिना किसी के कहे दोनांे को पता था कि मिलना था। मैं चुपचाप बूढ़ा बरगद की गोद मे जाकर बैठ गया। हल्कि बूंदा बांदी शाम में हो चुकी थी और रात में झिंगुर की आवाज आज एक बार फिर से चिर परिचित सी अपना लगने लगा। कोई और हो तो शायद ही इस रात में यहां बैठे पर मैं, एक अजीब सा शकुन। लगे जैसे कोई साथ हो मेरे हमेशा। एक अदृश्य। मुझे हौसला देता हुआ। डरो मत। जो होना है होगा। रात के ग्यारह बजे के बाद मैं घर से निकला। ग्यारह बजे तक रेडियो पर विविध भारती पर पुराने गीतों का कार्यक्रम सुन रहा था। भुले बिसरे गीत। जान बुझ कर डांट सुन कर भी रेडीयों की आवाज मैं तेज रखता था ताकि वह समझ सके। ग्यारह बजे जब विविध भारती पर गूंज की आज का कार्यक्रम अब यहीं समाप्त होता है तो उसे बंद कर थोड़ी देरे सोने का नाटक किया और फिर निकल गया। घर का दरबाजा बाहर से बद कर दिया। बरगद के पेंड़ के नीचे बैठे हुए करीब तीन से चार धंटा हो चुका होगा। सुबह के होने का एहसास भी होने लगा। वह नहीं आई। जब मैं वहां से उठ कर जाने ही वाला था कि एक छाया सी हिलती हुई दिखाई दी। वह आ रही थी। चांदनी रात थी। टहापोर अंजोरिया। पर उस चांद की चांदनी ने मेरे प्रियतम का जैसे श्रृंगार कर दिया हो। सफेद सलबार सूट में आज वह चमक रही थी। मैंने बांहें फैला दी और वह आकर उसी तरह समा गई जैसे....गाय के बछरे को गहीरबाल खरीद कर ले गया हो और वह खुंटा तोड़ कर भागी और मां से मिल रही हो।

शिकबे शिकायत। रोना धोना। सब हुआ। पर हां आज रोना मेरा अधिक हुआ, रीना का कम। मैं फफक फफक कर रोने लगा। ओह-जैसे जान जाते जाते बची हो। वह मुझे बच्चे की तरह दुलार रही थी। आंसू पोंछ रही थी। ‘‘चुप रहीं न तो। हमरा रहते तों कोई परबाह काहे करो ही। हमरा कुछ होतै तब तोरा कुछ होतै। इहे कठीन घड़ी में तो प्रेम के परीक्षा होबो हई औ हमरा दुनु के पास करे के है अग्निपरीक्षा।’’

ढेर देर तक संवेदनाओं का ज्वार उठता गिरता रहा। दोनों ने इस विपरीत घड़ी  में एक दूसरे का हाथ नहीं छोड़ने का निर्णय लिया। चाहे जो हो। साथ देखेगे।

अब अंतिम निर्णय करना ही होगा। तय हो गया। परसों घर से भाग जाना है। उसने कल रात अपना सामान मुझे लाकर देने की बात कही। ले जाने वाला सब सरिया लेना है।

शेष अलगे किस्त में, बने रहिए।

20 December 2011

जनलोक पाल भगाओ संधर्ष समिति।


     ज मंतर मंतर मुक्ताकाश मंच में जनलोक पाल भगाओ संधर्ष समिति की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता जाने माने  ढोलक डुग्गी राजा ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में डुग्गी राजा ने कहा - मित्रों जिस तरह से इस देश के सर्वोच्च सत्ता  (मैडम) को चुनौती देने का प्रयास किया जा रहा है वह इस देश ही नहीं पूरी दुनिया के नेताओं के लिए खतरनाक है। आज इस बैठक का आयोजन मैडम एवं चिर युवा सह हाइजिनिक दलित प्रेमी युवराज के आदेश पर किया गया है। हमारी सबसे बड़ी चिंता इस विषय को लेकर है कि जिस देशवासियों ने हम जैसे  के भरोस  देश (दूध) की रखवाली का भार छोड़ रखा है उस पर से हमारा अधिकार छिन्ने का प्रयास एक बुढ़ा आदमी कर रहा है। साथियों बंाझ क्या जाने प्रसव पीड़ा का हाल उन्हें क्या पता कि कैसे कैसे तिकड़म और कितने काला धन को खर्च कर हम नोट को वोट में बदलते है और तब जाकर हमे यह अधिकार मिलता है और अब इसपर ही खतरा मंडराने लगा है इसलिए हमें एक जुट होकर इसका विरोध करना चाहिए। वहीं बैठक में अपने विचार व्यक्त करते हुए अधिक वक्ता टिम्पल जी ने कहा कि इस देश को इस जैसे बुढे आदमी से बचाना होगा और इसके लिए जरूरी है कि जनलोक पाल भगाओं संधर्ष समिति के बैनर तले हम लोग एक जुट होकर आंदोलनकारियों पर हमला करें और करायें। हलांकि कई हमले मैंने करा कर देख लिया पर मंुह की खानी पड़ी और जब हमलोगों ने बुढें की फैजी को केश मे फंसाने की कोशीश की तब भी कामयाबी नहीं मिली अतः अब हार कर इस बैठक में ही रणनीति तय कर हमला करना होगा। साथियों हमने मैडम के इशारे पर सोशल मीडिया पर भी अंकुश लगाने का प्रयास किया पर सब मिल कर चिल्लाने लगे। भला बताई, यह भी कोई बात हुई, सर हमार और धर कुत्ते का। वहीं बैठक में बोलते हुए पी चिंता हरण ने कहा कि मित्रों आज के समय जब हमारे प्रमुख फंड मैनेजरों को तिहाड़ की हवा खिला दी गई तब अब मेरे उपर भी विरोधी लग गए है। भला बताई 2 जी हो या 3 जी, जब तक फंड की व्यवस्था नहीं होगी तब तक हमलोग कैसे बार बार सिंहासन पर बैठ सकेगें।
इसी तरह के विचारो के साथ अन्त में बैठक में निर्णय लिया गया कि हर हाल में जनलोक पाल को लटकानों के लिए संधर्ष को तेज करना है वरना हम सभी लोगों को इतिहास कालीदास के रूप में जानेगा। इतनी मेहनत और मशक्त से यहां तक पहूंचते है और जब गंगा ही नहीं बहेगी तो  भला हाथ कैसे धोबेगें। बैठक में एक बाबू साहेब टाइप ने भी खड़ा होकर समिति के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह सब वही लोग करबा रहें है जिन्हें मौका नहीं मिला कमाने का। भला इसमें भ्रष्टाचार कहां कि कुछ पैसा लेकर किसी का काम समय पर कर दिया जाय। अजि महाराज जब नगद नारायण ही नहीं मिलेगा तब भला कौन बुरबक है जो ओवर टाइम करके काम का निवटारा करेगा।

कार्टून= साभार गुगल देवता

18 December 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-43


दर्द, फांकाकशी और बेवशी ने सीने के अंदर आकर घर बसा लिया, जिसका परिणाम हीनता की भावना के रूप में सामने आया। अपने आज तक के कामों पर अफसोस के सिवा अब मेरे पास कुछ नहीं रह गया था। प्यार के लिए सोंचने का वक्त जिंदगी नहीं दे रही थी और जिंदगी के लिए सोंचने भर से काम नहीं चलने वाला, सो कुछ काम करने की ठानी। हलांकि मैं अक्सर ही यही सोंचा करता ‘‘जो तुध भावे नानका, सोई भली तू कर।’’ ईश्वर को जो अच्छा लगे वही होना चाहिए। इस समय ओशो की पुस्तकों ने बड़ा सहारा दिया जिसमें कर्ता भाव से जीवन को जीने का सबक दिया। जिंदगी जीने का नाम है और जीना ही जिंदादिली है। कई तरह के नाकारात्मक भाव घर कर गए और मैं खामोश रहने लगा। हलंाकि जब फूआ के घर था तब भी गरीबी का साथ था पर वहां उससे लड़ने का हौसला भी था और हल बैल और कलम औजार थे पर यहां पिताजी ने इस हौसले को तोड़ दिया। 

     आज भी याद है मुझे, वह कोई अस्सी का दशक था। ईलाके में  अकाल पड़ गया  था और जो किसान महज खेती पर ही निर्भर थे उनकी कोठी खाली हो गई थी अंौर घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। इस सब के बाबजूद आमदनी का कोई जरिया भी नहीं था। पर हां एक भैंस थी जिसने उस अकाल में भी अपने दूध से पूरे परिवार का पेट पाल दिया। बाजार में दूध बेचने मैं ही जाता था और फिर बाजार से खाने के लिए बाजरे का आटा लेकर आता था। गेंहूं का आटा मंहगा था और बाजरे का आटा सस्ता। आकाल से पहले बाजरे का आटा बाजार में नहीं मिलता था पर इस साल अकाल पड़ा था सो बनिये की दुकान में बाजरे का आटा जमकर बिक रहा था। बाजरे का आंटा पांच रूपये पसेरी था तो गेंहूं का आटा पन्द्रह रूपये पसेरी। पर हां बाजरे के आंटे से गेंहूं की रोटी की तरह रोटी नहीं बनती थी, पतली पतली और नरम। बाजरे के आंटे से मोटी रोटी बनती थी जिसे हमलोग मोटकी रोटी कहते थे। फूआ दस बारह इंच गोलाई मे और आधा से पौन इंच मोटी रोटी पका देती सुबह और वही हमलोगों का भोजन होता। दूध के साथ बाजरे की रोटी गूर कर खाते। पर कभी उस हालात में भी गरीबी का मलाल नहीं रहा। संतोष के साथ ही जी रहे थे। बल्कि बाजरे की रोटी और दूध का वह स्वाद आज तक याद है। दूध रोटी के साथ चीनी मिलने की जरूरत नहीं होती थी और वह यूं ही मीठी लगती या शायद यह मन का संतोष था जो मिठास बन कर मुंह के स्वाद में धुल मिठास बन जाती। उसी क्रम में एक वाकया फूफा बारबार सुनाया करते है। ‘‘कैसे हमर बुतरू गरीबी के हालत में भी हमर साथ रहल।’’-  मै एक दिन बाजरे के आंटे का बोरा बाजार से लेकर आ रहा था। जाड़े का मौसम था और बीच रास्ते में बरसात होने लगी। पूरा भींग गया और उसी तरह कंपकपंतें हुए आंटा लेकर घर आया। आंटा का बोरा प्लास्टिक का था सो उसको ज्यादा क्षति नहीं पहूंची।

खैर, गरीबी की भी अपनी यादें होती है पर यदि उस गरीबी में भी गरीबी के होने का एहसास न हो तो गरीबी नहीं होती थी। तो इस तरह के हालत को बचपन से झेतले हुए किशोर हुआ और आज परिस्थितियां सामने और भी विकट थी।

इन्हीं सब चीजों से जुझता जी रहा था कि आज सुबह फूआ आ कर धमक गई। वह मुझे अपने गांव ले जाना चाहती थी। बहुत समझाने बुझाने के बाद जब मैं नहीं माना तो वह गुस्सा भी हो गई।
‘‘हां रे हम निरवंश ही तब ने तो ऐसे करो  हीं, हमर बाल बच्चा रहतै हल त कि करथी हल।’’
अक्सर जब फूआ मुझे अपने बश में करना चाहती थी तो यह उसका अंतिम ब्रहम्सत्र था। वह अपने बांझ होने का दर्द जब उगल देती तो मैं विवश हो जाता पर इस बार मैं ज्यादा ही गुस्से में और निराश था। खास कर घर की परिस्थिति को लेकर। इस बीच मां ने भी बहुत समझाया। 
‘‘की करमहीं बेटा, बाप जब ऐसन हो गेलै तब कौन उपाय, तो जाके  वहीं रह, यहां तो हम सब झेल रहबे कैलिए हें तो काहे ले परेशान ही।’’
मतलब साफ था, मां नहीं चाहती थी की घर के परिस्थिति का मैं शिकार बनू और इस लिए वह मुझे घर से जाने के लिए कह रही थी।

खैर एक हफते तक बाबूजी बाजार नहीं गए और परिस्थिति सामान्य थी। शाम को उन्होंने ने मुझे बुलाया और पैर दबाने के लिए कहा। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। और इसी क्रम में बातों ही बातों में उन्हांेने अपने शराब पीने और उसकी लत की विवशता पर गंभीरता से बातें करने लगे। उनके अंदर भी एक टीस थी जो आज शब्दों के रूप में सामने आ रही थी।
‘‘अहो की करीऐ, बहुत छोड़े ले चाहो ही पर छुटबे नै करो है।’’
‘‘कोशीश करला से कौन काम नै होबो है’’
‘‘हां से तो है मुदा कैसे छुटतै भगवान जाने।’’
अंदर से निकली यह आवाज उनकी विवशत को दर्शा रही थी। कितने ही देर बातचीत चलती रही और बाबूजी के इस आत्मीय लगाव ने मुझे अंदर तक द्रवित कर दिया।

खैर जिंदगी है चलती रहेगी। मेरे लिए रोजगार की तलाश पहली और अंतिम तलाश वर्तमान में थी। इसी कड़ी में आर्मी की बहाली निकली और मैं दौड़ में भाग लेने के लिए कटिहार के लिए चल दिया। महज पच्चास रूपये का जुगाड़ करके मां ने दिया। शेखपुरा रेलबे स्टेशन पर कई दोस्त मिल गए और बिना टिकट रेलवे की सवारी परीक्षार्थियों का जन्म सिद्व अधिकार की तरह कटिहार चला गया। शाम को चला और सुबह दस बजे कटिहार पहूंचा। रेलवे स्टेशन से लेकर मैदान तक हजारांे युवाओं की भीड़। देवा। इस युवा-शैलाव में मेरी कहां जगह? फिर भी आए है तो दौड़ जाते है। दौड़ के लिए मैदान मे गया तो पहले ही चक्कर में हिम्मत पस्त हो गई। कभी दौड़ का अभ्यास नहीं किया था और मैदान में दौड़ने वाले सभी अभ्यस्त थे। दूसरे चक्कर में धड़ाम से गिर पड़ा। किसी ने लंधी मार दी और फिर निराश होकर घर लौट आया। घर आया तो देखा की दोस्त मनोज मेरा इंतजार कर अब लौटने बाला था। मुलाकात हो गई। कई सारी बातें हुई। अन्त में रास्ते में जाते हूए उसने रीना का प्रेम पत्र थमा दिया।

जान से भी प्यारे बब्लू।
प्यार क्या होता है शायद तुमसे जुदाई के एहसास से पहले तक नहीं जान सकी थी। शायद शरीर से प्राण के अलग होने पर भी इतनी तकलीफ नहीं होती होगी। होगी भी तो कैसे जब तकलीफ को महसूस करने वाली आत्मा ही नहीं रहेगी तब। पर आज मैं उस तकलीफ को महसूस कर रहीं हूं जो शरीर से आत्मा के जुदा होने पर भी शरीर के तकलीफ को आत्मा भोग रही है। कहतें है प्यार एक पागलपन है फिर इसमें समझदारी की बातें कैसी? धर-परिवार, रिश्ते-नाते और सबसे बढ़कर जिम्मेदारी। मैं सारी चीजों को समझती हूं पर नहीं समझती तो इस बात को कि क्या मैं तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं? कहतें हैं प्यार की परीक्षा मुश्किल वक्त में ही होती है। तो क्या हम इस परीक्षा में असफल हो जाएगें? जिस प्यार के दंभ पर मैं अपने परिवार से सर उठा कर बात करती थी आज वही लोग जब मेरी ओर देखते हैं तो मैं नजर नहीं मिला पाती। क्यों?..................................................................................... 
कैसी भी परिस्थिति हो, कैसा भी समय हो, साथ जियेगें साथ मरेगे।

तुम साथ नहीं हो तो जिंदगी क्या है?
तुम साथ यदि हो तो जिंदगी क्या है!...

तुम पहलु मंे हो तो मौत भी मुझे प्यारी है,
तुम पहलु में नही हो तो मौत से ही यारी है।

जानती हूं मैं, बिना प्यार, शरीर आत्मा बिहीन है,
        फिर अपनी ही लाश ढोना भला कैसी समझदारी है?

तुम यदि एक सप्ताह के अंदर अंदर नहीं आये तो फिर मेरा मरा हुआ मुंह देखोगे...

तुम्हारी प्यारी रीना.....

शेष अगले किस्त में, बने रहिए...

07 December 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-42

जीवन और प्रेम के बीच प्रारंभ हुआ संधर्ष प्रेम की अग्निपरीक्षा थी और इसमें आग के जिस दरिया की बात किसी शायर ने की थी शायद वह इसी संदर्भ में कही होगी, मैं ऐसा सोंच रहा था। रीना के गांव से अपने गांव चला तो आया पर जीवन को पटरी पर न ला सका। अपने पैतृक घर आये हुए एक सप्ताह से अधिक हो गया था पर किसी तरह का काम नहीं कर सका। रोजगार मिले इस कोशिश में अपनी सारी शक्ति लगा दी पर अन्ततोगत्वा कुछ हाथ न आ सका और खाली हाथ शाम में बैठ कर उदासी के साथ बार्ता करता रहता।

शाम ढलते ही सूरज की सिंदूरी किरण प्रियतम की छवि धर कर प्रेम के डूबते जाने का एहसास कराता और निराशा में डूबा मन उगते सूरज की सुखद अनुभुति से बंचित रह जाता। दिन बीतते गए, रात आंखों में कटती गई। नींद आंखों से उसी प्रकार दूर हो गई थी जिस प्रकार मैं रीना से दूर था। 

कहीं खेत खलिहान में बैठे हुए देर शाम झिंगुर की करकश अवाज भी डरावनी नहीं लगती और न ही सियार के हुआं हुआं मुझे कुछ सुनाई देता। अजीब सी तन्हाई और नैराश्य ने आकर अपनी आगोश में मुझे जकड़ लिया था।

जीवन की तल्ख जमीन पर पांव रखते ही सपनों की सच्चाई सामने आने लगी। मन में किसी तरह का रोजगार कर कमा खा लेने की विचार ख्याली बन गए। पहली कोशीश ट्युशन पढ़ाने की सोंची पर इसमें जितनी कठोर बात सुनने को मिली उससे यही लगा की शायद जीवन की जमीन इतनी ही कठोर मिलेगी। गांव के मास्टर साहब शहर में जाकर ट्युशन पढ़ाने का काम करते थे और मुझे पहली झलक के रूप में उनसे मदद की उम्मीद जगी और रास्ते में जब वे साईकिल से जा रहे थे तभी हमने उन्हें रूकवाया। शिष्टाचार निभाते हुए प्रणाम किया और फिर सकुचाते हुए बोला-

‘‘सर हमरो एकागो टीशन धरा देथो हल त कुछ रोजी रोजगार हो जइतै हल।’’
‘‘काहे हो, कहां तो डाक्टर बने बाला हलहीं, की होलऔ। मइया तो बड़ी बड़ाई करो हलौ।’’
‘‘की होलई मास्टर साहब इ ता तांे जनबे करो हो, मदद कर सको हो ता कर हो और एकागो ट्युशन पकड़ा दहो।’’
‘‘ट्युशन की पढ़इमीं हो, ओकरा से अच्छा कटोरा ले के भीख मांग।’’
स्तब्ध रह गया। इतना कह कर वे साईकिल से निकल गए और मुझे बेरोजगार होने की सजा के तौर पर जलती हुई आग में ढकेल गए। सच में आज से पहले जिंदगी को इतने नजदीक से नहीं देखा था और पता ही नहीं था कि यह इतनी कठोर और निर्मम होती है। 


छोटे किसान परिवार होने की वजह से खेत भी अधिक नहीं थी जिससे खेतीबारी करके गुजारा कर सकता था। गांव में मुख्य रूप से सब्जी की खेती की जाती थी जिसमें बैगन की खेती प्रमुखता और प्रचुरता से होती थी और इसी वजह से मेरे गांव को लोग ‘‘बैगन-बेचबा’’ गांव के रूप में जानते थे और अक्सर जब कहीं कुटूम-नाता के यहां जाता था तो यह सुनना पड़ता था, शेरपर, अच्छा बैगन-बेचबा गांव के। कहीं कहीं बड़े बुजुर्ग जहां मजाक का रिस्ता होता वहां एक कहानी सुनाते हुए कहते-

शेरपर में बैगन के खेत में काम कर रहे किसान से जब हाल चाल पुछो तो वह इस प्रकार बताते है। 
‘‘ की हाल चाल हई बाबा।’’
‘‘हां कुटूम, बैगन कनाहा (कीड़ा लगने से सड़ना) हो गेलो।’’
‘‘और घर में सब ठीक ठाक।’’
‘‘की बताईओ, केतना दबाई देलिओ पर फायदा नै करो हो।’’
‘‘बाल-बच्चा सब ठीक हो।’’
‘‘की कहीओ कुंजरा (व्यापारी) ई साल बहुत कम पैसा दे हलो त अपने से बजार में जाके बेचो हिओ बैगन।’’

ऐसा था मेरा गांव। कम खेत बाले किसान भी बाजार नजदीक होने की वजह से सब्जी की खेती करते पर किसान को बहुत अधिक फायदा नहीं होता। इसका एक प्रमुख कारण किसान का बाजार जाकर सब्जी को नहीं बेचना था और गांव में ही आकर सब्जी के व्यापारी (कुंजरा) खेत की फसल को खरीद लेते, औने पौने दाम पर, पर जो किसान मेहनती और होशियार होते वह बाजार में जाकर सब्जी की टोकरी लेकर बैठ जाते और अच्छी आमदनी करते। सब्जी की खेती के लिए गांव से सटे भीठ्ठा की जमीन चाहिए जहां सिंचाई की सुविधा हो। गांव से थोड़ी दूर पर दस कट्ठा का एक खेत थी जिसमें अरहर की खेती होती थी। अरहर की खेती उसी खेत में होती थी जो सबसे खराब हो पर मैने उसमें सब्जी की खेती करने का निर्णय लिया। घर मे प्रस्ताव रखा, विरोध हुआ पर मुझ पर कुछ करने का जुनून सवार था। सो हल-बैल लेकर निकल गया। हल चलाना फूफा से ही सीखा था। खैर अकेले दम पर उस खेत में बैगन की फसल लगा दिया। कई दिन बीत गए और मेरा एक सुत्री काम था बैगन की फसल की देख रेख करना जैसे यह मेरे लिए एक चुनौती थी अपने आप को अपने ही नजर में साबीत करने की, और कर दिया। 

देर शाम जब घर लौटा तो बाबूजी का कोहराम मचा हुआ था। रोज की तरह दारू की भभका देने बाली गंध घर के बाहर तक महक रही थी। मां रो ही थी। खामोश। चुपचाप। बाबूजी बे-बात कुछ से कुछ बोले जा रहे थे। पिछले अनुभवों को देखते हुए मैं किसी प्रकार का प्रतिवाद नहीं कर रहा था। हर बार सुबह नशा टूटने पर बात करने की सोंचता पर कभी जब बाबूजी नशा में नहीं होते तो बात करने की हिम्मत नहीं होती और कभी सुबह उठकर ही निकल जाते और फिर पीकर ही लौटते। मुझे इस तरह के माहौल को झेलने की आदत नहीं थी। गुस्सैल स्वभाव का होने की वजह से शुरूआत के कुछ दिन जबरदस्त प्रतिबाद किया और बाबूजी को मारने भी दौड़ा पर मां बीच में आकर इस तरह खड़ी हो जाती जैसे...मां अपने बच्चे को कोई बड़ा पाप करने से रोक रही हो।
‘‘की कहतै समाज बेटा।’’


आज फिर वही माहौल था। घर में सभी उदास थे, बाबा दरबाजे पर बैठे बाबूजी को गलिया रहे थे। भाई चुप था और मां रो रही थी। मैं और दिनों को याद कर मां पर ही गुस्सा किया-
‘‘तोरे बजह से यह सब हो रहलौ हें, बिगाड़ देलहीं हें ता भोगहीं।’’ 
‘‘की करीये बेटा, ई बाधा के कुछ सुझबे नै करो है तब।’’ मां ने फिर प्रतिवाद किया। मैं बगल में पड़े खटीया पर लेट गया। अभी कुछ ही क्षण हुआ कि बाबूजी उठे और  मां को एक झापड़ लगा दिया।
मन में आग का गुब्बार सा उठा-फक्काक। हे भोला। बगल में रखी लाठी उठाया और फटाक फटाक, कई लाठी बाबूजी के देह पर। वे गिर पड़े। मां मुझे पीट रही थी और मेरे आंख से अविरल आंश्रू की धारा बह रही थी। हे भोला। मैं आत्मग्लानी से गड़ा जा रहा था और गुस्से से माथे से आग की लपट सी निकल रही थी।


सुबह बाबू जी कराह रहे थे। मां उदास, खाना बना रही थी। बड़की चाची मुझे बुलाकर अपने घर ले गई। समझाने। शायद मां ने कहा होगा। समझाने लगी। -
‘‘बेटा, सहबा सब दिन ऐसने नै हलै। जब तों पैदा होलहीं तब उहे पार्टी में पहला बार दारू पिलकै और साश्रंग खराब हो गेलै। इहे साहबा हलई जे तोरा चाचा के दारू पीला पर मारो हलै और आज अपने पीये लगलै।’’

समझाते हुए चाची अपने घर और पुर्वज की कई सारी बातें बताने लगी। कैसे बाबू जी गांव के गिने चुने उन लोगों में थे जिसने अपने समय में ग्रेजुएट किया। कैसे बाबू जी बेल-बटम शर्ट और फुलपैंट के शौकीन थे। और कई तरह का रोजगार करते हुए काफी कुछ कमाया पर समय ने साथ नहीं दिया और आज यहां पहूंच गए। चाची ने पहली बार यह भी बताया कि हमारा परिवर और पुर्वज काफी सुखी सम्पन्न थे और गांव में प्रमुख और प्रतिष्ठित भी। पंद्रह एकड़ खेत थी और आज गांव के कई संपन्न लोगों के  पुर्वज मेरे यहां आकर नौकर का काम करते थे। पर आज यह हालत हुई कैसे। दो दिन पीढ़ीयों के नाकारापन इसका प्रमुख कारण के रूप में सामने आया। देवा...

शेष अलगे किश्त में, बने रहने का शुक्रिया-----