प्रेम-शायद भाव-संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है। कभी अभिव्यक्ति का माध्यम जुबां होती है तो कभी आंखें और कभी कभी इसकी अभिव्यक्ति मौन होती है। पर मौन अभिव्यक्ति की इस भाषा को पढ़ना ही शायद प्यार है।
आज ऐसा ही कुछ हुआ। वह मेरे घर आ कर धमक गई। शायद वह समझती थी कि पत्र में दिये गए अल्टीमेटम के अनुसार मैं कुछ नहीं सुनूंगा। यह कोई दोपहर का समय था। मैं ओसारे पर बैठा था कि एक खनकती हुई आवाज सुनाई दी।
‘‘की शेरपरवली यहीं रहे के मन करो हो।’’
यह खनकती हुई आवाज चिरपरिचत थी। रीना की आवाज। उसने कुछ अधिक जोर देकर आवाज लगाई ताकि मैं इधर उधर भी होंउ तो सुन सकूं। फूआ और मां डेउढी में हुई थी और रीना अपनी एक सहेली के साथ आकर धमक गई। मेरा गांव चुंकी बाजार से कुछ ही फासले पर था सो बाजार के बहाने यहां आना मुश्किल नहीं थी।
‘‘नैहरा है न रीना बउआ, केकरा मन नै करो हई। कहां आइलहो हें।’’ फूआ ने कहा।
‘‘बाजार आइलीओं हल, सोचलिओं तोरा से मिलते चलो हिओं।’’
‘‘बढ़िया कइलहो बउआ, आबों।
मैं लपक कर दरवाजे तक गया। मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा था। लगा जैसे दिन में जागते हुए सपना तो नही देख रहा। पर नहीं यह सच था। रीना मेरी मां के पैर पर छुकी हुई थी।
‘‘तोरी, ई रास्ता कैसे भुला गेलही।’’ मेरे मुंह से बरबस निकल गया पर वह कुछ नहीं बोली। यह उसकी नाराजगी जाहिर करने का अपना तरिका था।
फिर रीना और उसकी सहेली को मां ने धर के अंदर बुलाया। उसे ओसारे पर बिछी खटिया पर बैठाया गया। मां ने उसके लिए शरबत बनाने की बात कहते हुए मुझे मोदी जी की दुकान से चीनी लाने के लिए भेज दिया। चीनी लेकर आया तो देखा रीना मां और फूआ के साथ धुलमिल कर बातें कर रही थी। फिर मां ने मुझे शरबत बनाने के लिए कहा और मैं उसी काम में लग गया। और फिर वह लग गई अपने चिर परिचित अंदाज में।
‘‘तेरी, बबलुआ के शरबत बनाबे ले आबो हई शेरपर बली। ऐकरा तो खली लड़े और रूस के भागे ले आबो हई।’’ वह मुखर हो गई।
‘‘जादे मामा नै बन।’ तोरा से पूछ के सब काम नै करे के है।’’
‘‘तोरी घर आल मेहमान से ऐसे बोलो हई।’’
चलता रहा।
मां, फूआ और रीना, सभी इस सच्चाई को जानते थे। पर सभी औपचारिक रूप से यह जता रहे थे जैसे वह एक मेहमान है, बस। मैं भी उसी अभिनय में लगा रहा। थोड़ी देर में गिलास में शरबत भरने लगा तो रीना उठ कर गिलास मेरे हाथ से छीन लिया।
‘‘चल हट हमरा नै आबो है की, अपने घर ने हई।’’
यह सारा अभिनय चल रहा था और दोनो समझ रहे थे, एक दूसरे के दिल की हालत। दोनों के अंदर दर्द थे पर जुबां पर हंसी। इसी बीच उसके जाने की बात आ गई और मैं उसको थोड़ी दूर छोड़ने के लिए जाने लगा, तभी दरबाजे पर जैसे ही वह एक क्षण के लिए सभी के आंख से ओछल हुई, फफक कर रो पड़ी।
‘‘जब परबाह नै त प्रेम कैसन, इहे ले हमरा प्यार कलहीं हल, छोड़ देबे ले। इहे यदि प्रेम के परीक्षा है त हम भी इकरा मे फेल नै होबै।’’
‘‘देख अभी हम बड़ी दुख में हिऔ, हमरा माफ कर दे।’’
‘‘इहे से तो, दुख के घड़ी है त हमरा अलग काहे समझो ही, अगर भोला हमरा दुख में तोरा साथ रहेले बदलखीन हें त तो बंचित करे बाला तों के।’’
और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और उसके आंखू की एक बूंद हाथों पर आकर गिर पड़े। भोला। फिर वह जाने लगी। थोड़ी दूर तक उसे छोड़ कर आ गया। वह खामोश थी। पर उसकी यह खामोशी दर्द बुझी थी। इसे मैं समझ सकता था। उसने अपनी तरफ से अंतिम कोशिश के तौर पर यह कदम उठाया था।
अगले रोज मैं फूआ के साथ उसके गांव में था। मेरे गांव पहूंचते ही जैसे हवाओं ने जाकर उसे संदेशा दे दिया हो। न मैं उसे देख सका और न उसने मुझे। कम से कम मैं तो उसे भी देखते हुए नहीं ही देख सका। पर मुझे भी भरोसा था कि उसे मेरे आने की खबर मिल गई होगी। अमूमन कई लोग ऐसे वक्त में साथ भी दे देते है। न कहते हुए जानबुझ कर कह देतें है। जैसे की सुनाते हुए कहा दे-बबलुआ आ गेलै।
कुछ दिन शांति से बीत गया। शायद एक पखबारा। दोनों एक दूसरे से दूर दूर रहने का प्रयास करने लगे ताकि लोगों को लगे कि हमारा बिलगाव हो चुका है। यह कदम दोनों ने उठाया और कहा इसके बारे में किसी ने किसी से नहीं था। यही होता है प्यार। मौन की भाषा। अदृश्य का दृश्य। न देखते हुए भी मैं उसे देख रहा था और वह मुझे महसूस कर रही थी।
आज सावन की पुर्णिमा थी। आज के दिन बिना किसी के कहे दोनांे को पता था कि मिलना था। मैं चुपचाप बूढ़ा बरगद की गोद मे जाकर बैठ गया। हल्कि बूंदा बांदी शाम में हो चुकी थी और रात में झिंगुर की आवाज आज एक बार फिर से चिर परिचित सी अपना लगने लगा। कोई और हो तो शायद ही इस रात में यहां बैठे पर मैं, एक अजीब सा शकुन। लगे जैसे कोई साथ हो मेरे हमेशा। एक अदृश्य। मुझे हौसला देता हुआ। डरो मत। जो होना है होगा। रात के ग्यारह बजे के बाद मैं घर से निकला। ग्यारह बजे तक रेडियो पर विविध भारती पर पुराने गीतों का कार्यक्रम सुन रहा था। भुले बिसरे गीत। जान बुझ कर डांट सुन कर भी रेडीयों की आवाज मैं तेज रखता था ताकि वह समझ सके। ग्यारह बजे जब विविध भारती पर गूंज की आज का कार्यक्रम अब यहीं समाप्त होता है तो उसे बंद कर थोड़ी देरे सोने का नाटक किया और फिर निकल गया। घर का दरबाजा बाहर से बद कर दिया। बरगद के पेंड़ के नीचे बैठे हुए करीब तीन से चार धंटा हो चुका होगा। सुबह के होने का एहसास भी होने लगा। वह नहीं आई। जब मैं वहां से उठ कर जाने ही वाला था कि एक छाया सी हिलती हुई दिखाई दी। वह आ रही थी। चांदनी रात थी। टहापोर अंजोरिया। पर उस चांद की चांदनी ने मेरे प्रियतम का जैसे श्रृंगार कर दिया हो। सफेद सलबार सूट में आज वह चमक रही थी। मैंने बांहें फैला दी और वह आकर उसी तरह समा गई जैसे....गाय के बछरे को गहीरबाल खरीद कर ले गया हो और वह खुंटा तोड़ कर भागी और मां से मिल रही हो।
शिकबे शिकायत। रोना धोना। सब हुआ। पर हां आज रोना मेरा अधिक हुआ, रीना का कम। मैं फफक फफक कर रोने लगा। ओह-जैसे जान जाते जाते बची हो। वह मुझे बच्चे की तरह दुलार रही थी। आंसू पोंछ रही थी। ‘‘चुप रहीं न तो। हमरा रहते तों कोई परबाह काहे करो ही। हमरा कुछ होतै तब तोरा कुछ होतै। इहे कठीन घड़ी में तो प्रेम के परीक्षा होबो हई औ हमरा दुनु के पास करे के है अग्निपरीक्षा।’’
ढेर देर तक संवेदनाओं का ज्वार उठता गिरता रहा। दोनों ने इस विपरीत घड़ी में एक दूसरे का हाथ नहीं छोड़ने का निर्णय लिया। चाहे जो हो। साथ देखेगे।
अब अंतिम निर्णय करना ही होगा। तय हो गया। परसों घर से भाग जाना है। उसने कल रात अपना सामान मुझे लाकर देने की बात कही। ले जाने वाला सब सरिया लेना है।
शेष अलगे किस्त में, बने रहिए।
