27 February 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी-51


शाम को करीब तीन बजे गांव के कुछ साथी हाथ में एक कागज लहराते हुए जेल की तरफ आ रहे थे और वे खुश थे। मैं समझ गया कि रीना में मेरे पक्ष में ही गवाही दी। मैं आज दिन भर सुबह से ही भारी मन लिए छत के बरामदे पर टहलता रहा। गेट पर गया और गवाही का कागज मेरे हाथ में आ गया। उसने मुझसे शादी किये जाने और मेरे साथ ही रहने की बात कही और प्यार के अप्रत्यक्ष जंग में उसकी जीत हो गई। मेरे गांव का तीन चार साथी आज आया था और उसने भी खुशी जाहीर की। शादी, प्लेटफॉर्म पर और वह भी भादो के मलमास महीने में!
‘‘बहुत साहस बली लड़की है हो, सबके समझइला के बाद भी जज के सामने बोल्डली बोल देलकै।’’ राजीव ने कहा।
‘‘पर जैसे ही ओकर गवाही के बारे में परिवर के पता चललै, सब के सब वहां से भाग गेलै। ओकर बाबूजी तो कह देलखिन कि आज से हमर बेटी मर गेल।’’ 
‘‘सिंदूर कैले हलै की नै हो।’’ मैंने पूछ लिया शायद जोर जबरस्ती में उसे मिटा दिया गया हो।
‘‘हां हो सिंदूर तो टहापोर कैले हलै। एक ओकरे घर के आदमी कह रहलै हल गवाहिया से पहलै की जब लाख कोशीश और मारपीट करला के बाद भी ई छौंरी मांग से सिंदूर नै मेटैलक तब गवाही की पक्ष में देत?’’

चलो! जीवन तो अक्सर करवट लेती ही है और मेरा जीवन तो इस समय तेजी से करवट ले रहा था। नाटक के पात्रों की तरह। जैसे किसी ने पटकथा लिख कर रख दिया और हम सब पात्र अभिनय कर रहें हों। रीना ने मेरे पक्ष में वैसे समय में गवादी दी जब एक गांव की लड़की को न तो कानून की जानकारी थी न ही कोर्ट कचहरी को गयान पर उसने कई तरह के प्रलोभन और समझाने बुझाने के बाद भी कोर्ट में मुझसे प्रेम करने तथा शादी कर लेने की बात कबूल कर लिया। 

‘‘तब! अब की होतै?’’ मेरा मन प्रसन्न हो गया। लगा की सबकुछ ठीक हो गया। पर नहीं, ऐसा नहीं था।
‘‘अरे अभी बहुत मुश्किल है। रीना त अपन परिवार के साथ जायसे मना कर देलकै और तोरा साथ रहे के बात कहलकै पर जब तक बालिग होबे के प्रमाण न हो जा है तब तक कोर्ट ओकरो जेल मे रखतै।’’
‘‘जेल’’

भोला!
सुना तो था कि इश्क नहीं आसां पर आज देख भी लिया और आग के दरिया में डूब कर पार निकलने की परीक्षा हो रही थी। आग का दरिया! जिसमें प्रेम, मान-मर्यादा, स्वाभिमान, लज्जा और प्रेमी के अंदर के मैं को भी आग के दरिया में डुबा कर पार निकालता है बिल्कुल उसी तरह जैसे सोनार सोने को आग में तपा कर उसकी परख करता हो। एक पलड़े पर प्रेमी के परिवार की मर्यादा और उसका अपना मैं रख दिया जाता है और दूसरी तरफ प्रेम और तब उस पार निकला प्रेम साधु की तरह समाज के सामने आता है। बिल्कुल वैसा ही जैसा कि सालों साल तपस्या करते हुए, ध्यान धरते हुए ईश्वर के होने का ज्ञान होता है और आदमी दुनिया छोड़ कर साधु बन जाता है। प्रेम के होने का ज्ञान उसी तरह का होता है जैसे की ईश्वर के होने का ज्ञान बुद्व, महावीर, मीरा और कबीर को हुआ हो।

भोला!
एक धंटा बाद वह जेल के दरबाजे पर मुझसे मिलने आई। मेरा परिवार, छोटा भाई, चाचा और बाबूजी भी, उसके साथ थे। नजर मिलते ही उसका दिल लरज गया। जैसे यातना की आपार पीड़ा सहता हुआ मन फूट पड़ता हो। अविरल आंसू की धारा दोनों के आंखों से झरने लगा। कभी चंचल सी हिरणी की तरह फुदकने वाली रीना आज पत्थर की बेजान मूर्ति की तरह लग रही थी, जैसे की मरने के पुर्व आदमी को जीवन का मोह खत्म हो गया हो। एक बोल किसी के मुंह से नहीं फूटा पर खामोशी के एक संवाद ने दर्द को आंसूओं की जुबानी अपनी कहानी सुना दी। प्रेम में दोनों अडीग रहे पर बाजी उसने ही जीती। उसने जो कहा था कि कुछ नहीं होने देंगें, वही किया। 

खामोशी की इस विरान रेगिस्तान में चाचा ने दस्तक दी। 
‘‘घबराए के कौनो बात नै है। एक बीधा खेत बेच के पैसे के इंतजाम कर देलिए है। जहां तक होता, कोई कमी नै रहे ले देबै।’’ उन्होने डूबते को तिनके का सहारा देने की कोशिश की पर कहां? जो डूब चुका था उसे सहारे की क्या दरकार?
उन्होंने फिर कहा-
‘‘हम तो इनखर बाबूजी से भी मिलके कहलिए कि माफ कर दहो, बुतरू है। की करभो। अरे बाल बच्चा जब जांघ पर पैखाना कर दे है तब आदमी की अपन जांघ काट के फेंक देहै? वैसे ही जब इ तों दुनी के निर्णय है तब आगे भगवान जाने, पर नै मानलखिन। कहलखिन की हमर बेटी मर गेल। आज से । अब ओकर श्राद्धकर्म करके, माथा मुड़ा के पाक हो जाम।’’

फिर जानकारी मिली कि रिजर्व कार से इसको पटना के महिला सुधार गृह:ःजेलःः ले जाया जा रहा है। सब इंतजाम कर दिया गया है। मेरे परिवार के लोग भी साथ जाएगे। मेरे परिवार के हिस्से जो थोड़ी जमीन थी बिक गई।

भोला!
अपने बार्ड के सामने छत के बरामदे पर खामोशी से खड़ा था। शाम ढल चुली थी। लगा जैसे सूरज ने भी आज अपना सर छुपा लिया हो। उसको भी लाज आ रही हो, मेरे कुकर्मो पर या कि समाज के, पता नहीं पर आज सूरज लजा कर छुप गया था।

तीन-चार दिन बाद रीना के गांव से ही मेरा एक दोस्त आया मिलने और फिर जब उसने गांव की कहानी बताई तो कलेजा कांप गया। रीना के घर पर उसके बाबूजी ने उसका श्राद्धकर्म कर दिया है। बजाप्ते, कागज का एक पुतला बना कर उसे मुखाग्नि दी गई, और फिर उत्तरी पहन कर तीन दिनो तक श्राद्धकर्म किया गया। पूरे परिवार ने सर मुंडबाया! गंगा स्नान किया! दान पुण्या किया! तीसरे दिन पंडित और गरीबों को भोज देकर श्राद्धकर्म समाप्त हुआ।

भोला! 
लगा जैसे की घरती फटे और उसमें समा जायें। यह बात जब रीना को पता चलेगा तो वह उसी वेदना से तड़प उठेगी जिस वेदना की तड़प से घरती फटी थी और सीता उसमें समा गई थी। हर दिन, हर क्षण, जिंदगी यातना दे रही थी। बचपन की दहलीज से कदम बढ़ा कर किसी सुख की आशा में गलत-सही, कुछ भी किया पर इस तरह के परिणाम की कल्पना नहीं की थी। ज्यादा से ज्यादा प्राण देने की सोंच रखी थी। झंझट खतम। लगा था कि प्रेम में जान देकर उऋण हो लूंगा, पर जान पर भी भारी जीवन हो जाएगा, नहीं सोंचा था। चाचा जी ने ठीक ही कहा था कि जांध पर बच्चा जब पैखाना कर देता है तब आदमी पैखाना को साफ करता है न कि जांध को काटता है? पर कथित इज्जत को लेकर समाज के लोग अपनी जांध को भी काटने से गुरेज नहीं करते। क्या प्रेम इतना दुखद है। या कि इज्जत इतनी सस्ती है जो एक प्रेम का बोझ नहीं उठा सकती। समाज के पहरूआ कौन है। कौन है यह समाज जिसके डर से प्रेम को बलीबेदी पर चढ़ा दिया जाता है। या कि अपने पापों को छुपाने भर का नाम ही समाज है। जिस समाज में व्याभिचार की कोई सीमा नहीं, जिस समाज में धर्म-अधर्म का मर्म नहीं, जिस समाज की अपनी मर्यादा नहीं और झुठ-फरेब, छल-प्रपंच, त्रिया-चरित्र, बेइमानी रग रग में समाया हो वह प्रेम की मर्यादा क्या जाने? या कि उसके लिए ढकी हुई मर्यादा, मर्यादा है, छुपा हुआ इज्जत, इज्जत है और उघड़ा हो प्रेम कलंक। 

वितृष्णा और क्रोध से खून खौल उठा। कई तरह के विचार मन में आए पर उसी पिंजड़े में बंद पंछी की तरह जो सिर्फ अपना पंख फड़फड़ कर रह जाएगा या कि पंख को धायल करके...। बचपन से लेकर आज तक जीवन को रीना के प्रेम में जीवन बना दिया, इंद्रधनुषी और अमृत ही अमृत पर आज इस मोड़ पर लगा कि इससे  बेहतर तो था कि मौत ही मिल जाती। साथ मर तो जाते। आज इस समुंद्र मंथन में बिष पीने की बारी थी पर वह विष आज शिव के लिए नहीं सती के लिए निकाला गया था जो सुक्ष्म सांघातिक था और जीवन भर मौत देता रहेगा। तिल तिल कर मारता रहेगा।
भोला!

शेष अगले किस्त में, बने रहिए।

25 February 2012

भरी सभा में पत्रकारिता का चीरहरण किया काटजू ने।


अरूण साथी।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्केंडय काटजू ने जब बिहार मंे मीडिया आजाद नहीं कहा तो पूरे देश में नीतीश कुमार को रॉबीन हुड की तरह प्रस्तुत करने वाले मीडिया हाउस, चारणी करने वाले पत्रकारों, संपादको, बुद्धिजीवियों और बिश्लेषकों को झटका लगा। लगा जैसे किसी ने उन्हें नंगा कर आइने के सामने ला कर खड़ा कर दिया। पटना विश्वविद्यालय के प्राचार्य ने तो बाजाप्त समारोह में ही इसका विरोध किया। पर जस्टिस काटजू तब भी चुप नहीं बैठे और कहा कि इससे बेहतर स्थिति पहले की सरकार में थी, कम से कम मीडिया आजाद थी। सच क्या है। जो काटजू साहब ने कही है वह या कि कुछ और? जब इसके धरातलिय सच्चाई जाननी चाही तो वह आज के अखबर के रूप में सामने आ गई। एक मात्र राष्ट्रीय सहारा को छोड़ कर किसी दूसरे अखबार ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित नहीं करके अपनी गुलामी की बेलज घोषणा कर दी। प्रभात खबर ने दूसरे पन्ने पर इसे जगह दी है। मुख्य अखबार कहे जाने वाले दैनिक जागरण एवं दैनिक हिन्दुस्तान ने इस खबर को इस रूप में प्रकाशित किया कि पाठक दिग्भ्रमित हो जाए। अखबारों ने प्राचार्य लालकेश्वर सिंह के विरोध को प्रमुखता से प्रकाशित किया जबकि महोदय जदयू विधायक उषा सिंह के पति होकर सरकार से उपकृत है और इसकी जानकारी मीडिया के महोदयों को भी है।

बिहार का यही सच है। देहात की एक कहावत है, बाहर से फिट फाट, अंदर से मोकामा घाट। मतलब बाहर से सबकुछ बढ़िया है और अंदर से जर्जर। अखबारों में प्रति दिन छपने वाली खबरें सरकार का गुणगान करते हुए होती है जैसे कि अखबार न होकर सरकार का मुख्यपत्र हो। बिहार में कस्बाई पत्रकारों को भी पता है कि सरकार के विरोध की खबर नहीं छपनी है और इसी वजह से विपक्ष भी मन मार कर बैठ गया है।
बिहार में नौकरशाही बेलगाम है। पक्ष-विपक्ष और मीडिया नौकरशाहों पर उंगली उठाने की हिमाकत नहीं करते। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जगह कहीं नहीं है। सत्ता के मंत्रियों को घुड़की दे कर चुप करा दिया जाता है और उनपर नकेल के लिए नकचढ़े सचिव को रखा गया है।
भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रखण्ड विकास पदाधिकारी और अंचलाधिकारी जैसे गरिमामई पद पर कर्मचारी स्तरिय भ्रष्ट्र और पांच पांच बसुलने वालों को अतिपिछड़ा राजनीति के तहत प्रमोट कर बैठा कर उपकृत कर दिया गया है और खमियाजा गरीबों को भुगतनी पड़ रही है। इंदिरा आवास से लेकर जाति आवास में खुले आम धूस लिया जाता है। सेवा का अधिकार का ढीढोरा पीट दिया गया है पर सच इतर है। जिस प्रमाण पत्र को बनाने के लिए पहले 10 रू. खर्चने पड़ते थे वह अब 500 मे बिकता है। 21 दिन में प्रमाण पत्र बनाने का प्रावधान कर दिया गया है पर बनाया नहीं जाता और एक दिन मे ंबनाने का चार्ज 500, दो दिन का 300 तथा पांच दिन का चार्ज 200 निर्धारित कर दिया गया। न तो इसकी खबर छपती है और न ही कोई फर्क ही पड़ता है।
बात शिक्षा का करें तो साईकिल राशि, पोशाक राशि का वितरण ही विद्यालयों को काम रह गया है। पढ़ाई प्राथमिक विद्यालयों से लेकर कॉलेज तक कहीं नहीं होती। हाजरी बनाने के लिए स्कूल को खोला जाता है फिर बंद कर दिया जाता है। मैट्रीक की परीक्षा अभी चल रही है और आलम यह कि जम कर नकल की छूट है।
गांव में गली गली बिकते शराब आने वाले दिनों में एक नए बिहार की नींब रख रही है। सड़क बन रही है पर उसपर शराब कें नशे में धुत्त चालक दर्जनों को रौंद रहा है। गांव की गलियों में फागुन की लोकप्रिय होली की जगह शराबियों का हुड़दंग दिखने को मिलता है।
सबसे बड़ा दाबा अपराध को लेकर किया जाता है पर इसका सच कुछ ईतर है और बिहार में सब काम बुद्धि से किया जा रहा है। मशलन, हत्या के केस को ओडी का केस बना कर दर्ज कर लिया जाता है। अपहरण, डकैती, बलात्कार तक का केस दर्ज करने के लिए नाको चने चबाना पड़ता है। केस ही दर्ज नहीं होगा आकड़ों का अपराध कमेगा ही।
मजदूरों का पलायान कहीं नहीं रूका है। पलायन करने वाले मजदूरों का गांव विरान नजर आएगा। दलितों के वस्तियों में इसे देखा जा सकता है। नरेगा मे लूट है। मजदूर बाहर और उनके नाम पर पैसा अंदर। विकास योजनाओ में 40 प्रतिशत कमिशन। कहां जा रहा है बिहार।
पर मीडिया में यह सब नहीं दिखता? करोड़ों के विज्ञापन का खेला है। मालिकों की तिजौरियां भरनी चाहिए। बस।

पर ऐसी बात भी नहीं की बिहार में क्रान्तिकारी पत्रकारिता मर गई है बहुत लोग है जो बिहार में मीडिया पर लगे सेंसरशीप की आग में जलते हुए तिलमिला रहे है। पर वे एक अदद नौकर होकर वेवश हो इंतजार कर रहें है। काटजू ने पटना विश्वविद्यालय के आयोजित समारोह सभा में पत्रकारिता का चीरहरण किया और कहीं कोई कृष्ण नजर नहीं आता।

20 February 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी-50


थाना मोरा आना जाना
जेल ससुराल......
शाम को जेल में ही संगीत की महफिल सजी और पंकज ने यह गीत सुनाना प्रारंभ किया। थाली-गिलास वाध्य यंत्र बने और लोग झूमने लगे मैं भी वहीं बैठा रहा। वार्ड बदल दिया गया और यहां अपराध की दुनिया के सरताजों का ही बसेरा था। पंकज मेरे गांव का था इसलिए उसे जानता था तब भी उसने अपनी कहानी बतानी प्रारंभ कर दी। जैसे कि किसी हीरों की कहानी हो। उसके पिता की हत्या सिनेमा हॉल में बम मार कर कर दी गई थी और उसकी विधवा मां ने किसी तरह से उसे पाला पोसा था। अपराध की दुनिया मंे उसे गांव के ही कुछ लोगों ने लाया था। सिनेमा के किसी खलनायक के चरित्र की तरह ही पंकज का किरदार था। अपराध उसके मन में गहरे तक पैठ चुका था। वह समाज से नफरत करता था। थाना , पुलिस और जेल के प्रति उसने अपने गीत में ही प्रेम प्रकट कर चुका था। वह जेल में रहे की बाहर कुछ अंतर नहीं पड़ता।

इस कम उम्र में ही उसने हत्या तक को अंजाम दिया और उसकी बखान भी कर रहा था।
इसके बाद जो चर्चा चली तो कामरेड किशन सिंह और उसके बोडीगार्ड के हत्या की कहानी ऐसे बखानी जानी लगी जैसे वीरगाथा। कामरेड किशन सिंह की लाश को मैं अस्पताल में देखा था। उनके सीने में कई गोली लगी थी और साथ में बोडीगार्ड भी मारा गया था। मजदूरों के हक और मजदूरी बढ़ाने के लिए उन्हें एक जुट करने की सजा के रूप में उन्हें मौत दी गई थी। यह समांतवादी मानसिकता के अंतिम पड़ाव पर भी उसके कीड़े के कुलबुलाते रहने की धमक की तरह ही थी।

‘‘सुनलहीं न हो, साला के कहलिए हल की छोड़ इ शुदर मुदर के साथ, कुछ नै मिले बाला, पर नै मानलै और बोडीगार्ड रखलै, चल गेलै भित्तर...। सांढ़ा ने यह कहानी छेड़ी तो कई शुरू हो गए। कामरेड के हत्या के मामले में एक दर्जन से अधिक लोग बंदी थी। 

‘‘हां हो, साला के खतम करे ले कहां कहां से समान नै जुटावे पड़लै, सन्तालिस के आगे रिवॉल्वर की टिकतै। बगैचा में घेर के पहले त बोडीगडबा के कहबे कैलिए की तों भाग जो, पर साला पक्का सिपाही हलै कहलै हमरो मार दा पर भागबो नै।’’ बीपो सिंह ने बड़े ही शान से कहा।

‘‘साला रार सुदर के भड़काबो हलै, गेलै। चंदा कर के ऐतना रूपया जमा कर देलिए हें कि केस सलटा जइतै।’’
वीरगाथ की तरह बखान चलती रही और मेरा मन इस सब में अकुलाता रहा। सामान्तवाद की इस गाथा में मेरा मन नहीं रम रहा था पर अनमनसक हो कर सुनना भी मजबूरी थी। मेरा मन बाहर की घटनाओं को जानने के लिए मचलने लगा। फिर मुझसे भी मेरी कहानी लोगो ंने जाननी चाही। 
‘‘कैसे फंसइलहीं हो, त भागलीं काहे, छोड़ देथीं हल त जेल के हवा नै ने खाइले पड़तो हल।’’ कई तरह के सवाल। पर जबाब कौन देता, किसके पास जबाब था। मैं चुप चाप सुनता रहा।

अगले दिन गांव का विपिन राम मिलने आया। कई दोस्त थे पर किसी ने हिम्मत नहीं किया पर वह गरीब होकर भी आया था। मेरा नाम पुकारा गया। दरवाजे पर गया। मिलने का नजराना दस रूपया था।
‘‘की हाल विपिन।’’
‘‘बस, चलो अब जे होबै, साहस कैलहीं न हो इहे बहुत है। कल रीनमां के कोर्ट में बयान होतई और ओकर बहुत सीखाबल जा रहलै हें।’’
‘‘चलहिं, अब पीछे मुड़े के कोई जगह नै है। जे होतई से होतई।’’

फिर उसी ने बताया कि पूरा गांव एक है और उसकी शादी के लिए डाक्टर, इंजीनियर लड़का का फोटो दिखाया जा रहा है। किसी तरह से उसे मनाने की बात कहीं जा रही है और कोर्ट में वह कह दे की उसका अपहरण हुआ। यानि की सबकुछ अब उसके उपर ही था। वह कोर्ट में बदल भी सकती है। जो हो। पर मुझे कुछ अजीब तरह का अनुभूति होने लगी। लगा जैसे प्यार की बाजी को मैं जीतना चाहता हंू और जीतने के लिए रीना का मेरे विरूद्ध बयान देना ही सही है। मन ही मन यही सांेचता रहा।

शेष अगले किस्त में, बने रहिए...

13 February 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी-49


जिंदगी कभी कभी दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है और अनमना ढंग से चुना गया कोई एक रास्ता जब आगे चल कर बंद मिलता है और वहां से लौटने का उपाय नहीं होता तो फिर इसके लिए किसे देष दें समझ नहीं आता।

हाथ में हथकड़ी और कमर में रस्सा लगा कर अगले दिन कोर्ट ले जाया गया। कोर्ट से फिर जेल। जेल के बड़े से फाटक के पास जब खड़ा हुआ तो दुनिया छोटी लगने लगी। यह भी बदा था। जेल का गेट खुला और मैं अन्दर चला गया। अजीब दुनिया है। सबसे पहले मुझे बार्ड नंबर एक में ले जाया गया, आमद बार्ड। एक चादर जो अपने साथ लाया था उसे कहीं बिछाने की जगह खोजने लगा पर कहीं जगह नहीं मिली। मैं एक कोने में बैठकर सोंचने लगा। मन उदास हो गया। जेल की चाहरदीवारी से बाहर का हौसला टूटने लगा। प्यार के होने का दंभ और यह परिणति? 

कई तरह के सवाल मन में उमड़ धुमड़ रहे थे। पहला यही, की पता नहीं अब कितने दिनों तक जेल में रहना पड़े और दूसरा यह कि रीना को उसके परिजन अपने साथ लेकर गए है और वह सुरक्षित है कि नहीं। मेरे केस पर आने वाला खर्च कहां से आएगा? घर में एक भी पैसा नहीं है पर बेटे को कोई जेल में छोड़ तो नहीं देगा? कोई अभिभावक भी नहीं था जो आगे बढ़ कर पैरवी करे। और रीना का हाल जानने का कोई उपाय नहीं था।
फिर कुछ देर में साधु बेशधारी, लंबी दाढ़ी, गेरूआ वस्त्र पहले लंबा चौड़ा सा एक आदमी आया। उसे सब बाबा बाबा कहकर बुलाने लगे और कुछ के चेहरे पर उसे देखते हुए वितृष्णा और भय का मिलाजुला भाव भी आने लगा। मेरे पास आकर उसने कहा-
‘‘चल रे बउआ निकाल कमानी।’’
‘‘क्या’’?
‘‘कमानी, माने तीन सौ रूपया जेल में रहे के टेक्स।’’
इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता बगल में लेटा हुआ एक मोटा सा एक आदमी ने कहा-
‘कमानी के रूपया देबे पड़तो बौआ, यहां इनकरे सब के कानून चलो है। बाहर भी बभने सब के राज है यहां भी ? नै कमानी देभो त यहां पैखाना घर के आगे सुता देतो और खाना बनाना, झाडू लगाना सब काम करे पड़तो’’
‘‘पर हमरा हीं रूपैया है कहां? कोई उपाय भी नै है।’’
‘‘तब कोई उपाय नै हो, ठीके है यहैं सुतहो, पर बभान के बच्चा लगो हो पर यहां कोई नै देखतो, सब रूपया देखो है, रूपैया। रूपैया हो तो बाभन नै हो तो शुदर।
मैं उसी तरह बैठा रचा, चुकोमुको-चुपचाप। जो जगह मेरे सोने की थी वहां नहीं सोया जा सकता, पैखाना घर के ठीक आगे। जेल में क्षमता से अधिक कैदी थे इसलिए सबके लिए समुचित व्यवस्था नहीं हो सकता और जेल का भ्रष्टाचार भी इसमे मदद कर रहा था और धनी लोगों के लिए अलग अलग व्यवस्था थी, अलग अलग बार्ड था। बगल के लोगों ने सब बता दिया। जिस बार्ड में मैं था उसका नाम ही हरिजन बार्ड था। विभेद की एक बड़ी रेखा यहां भी खिंची हुई थी और समाज के इस विभेद का सच जाति नहीं पैसा के रूप में सामने आया। पैसा है तो बाभन बार्ड नहीं ंतो हरिजन बार्ड। इस बार्ड को आमद बार्ड के रूप में भी जाना जाता था। सबसे पहले सबको यहीं आना था फिर जिस तरह का जो पैसाबाला होता, उस तरह उसकी व्यवस्था की जाती।

आंखों में नीद नहीं थी और शुन्यता का गहरा समुंद्र मन में उतर कर ज्वारभाटे की तरह प्रेम की दीवार से टकरा कर उसके गरूर को चूर चूर कर देने का प्रयास कर रही थी पर मन में यह भी भरोसा होता कि बिना आग में तपाये सोना की परख जब नहीं होती तो हम कौन है? और फिर तपने पर देह तो जलेगा ही।
यूं ही बैठे बैठे, या उंधते हुए सुबह हो गई। वार्ड का ताला खुला। फिर नित्यकर्म की बारी। बाहर लंबी कतार के बीच वहां भी मारा मारी और विभेद की लंबी लकीर। बाभन का शौचालय, शुदर का शौचालय। भोला। जेल की यह उंची दिवार सिर्फ आदमी को कैद करने के लिए नहीं बनते बल्कि इसमें आदमियत भी कैद हो जाती है, यह बात मेरी समझ में आ गई थी। 

खैर जहां, जिस हाल में मैं था वहां संपन्नता और सुख अस्पृह हो गई थी, वैसे ही जैसे मुर्दे के लिए हो। कोई भी चाह जिंदों के लिए होती है और मैं प्राण से बिछड़ कर मुर्दा था और मुर्दों के लिए स्पृह क्या ? चंदन से जलाओं की आम की लकड़ी से! 

न तो सुबह का एक मुठठी मिलने वाला चना और गुड़ लिया और न ही दोपहर का जली हुई रोटी और दाल खाया। देखने से ही उकाई आती थी। न तो किसी ने खाने के लिए कहा न ही भूख लगी। चाहरदीवारी से लग टूकूर टूकूर बाहर देखता रहा। दोपहर के खाने के पाली में किसी ने मुझे टोक दिया।

‘‘अरे बब्लू दा, तों यहां?’’
देखा तो मेरे गांव का ही एक लड़का था, पंकज। हत्या के आरोप में बंदी। उम्र पन्द्रह से अठारह साल। कई मर्डर कर चुका है और अपने यहां इसकी धाक है। रंगदार की उपाधी है। हत्या या अपहरण करने वालों को लोग इसी नाम से जानते है-रंगदार।
         ‘‘हां’’
‘‘कौन बार्ड?’’
‘‘एक’’
‘‘हाय महराज, हमरा रहते हरिजन बार्ड में, बोलथो हल ने हमरा बारे में, साल दस लाश तो अब तक बिछा देलिए हें ग्यारहवां में कि देरी है।’’
फिर उसने वहीं से हांक लगाई, 
‘‘कि हो बाबा, महराज हमर गांव के आदमी के साथ तों ऐसन काहे कैलहो, हरिजन बार्ड ?’’
‘‘हमरा की पता, इस कहबो नै कैलको और हम की करतिओ हल, बॉस नै कहलखुन तब।’’
‘‘अच्छा चलो हम बॉस से बात करबै, तोरा घबड़ाए के बात नै है, हम ऐजइ ही।’’ उसने मुझे कहा।
‘‘कौन केस मे आइलाहों हे।’’
‘‘घर से भाग के शादी कर लेलिए।’’
‘‘दूर महराज, कौन केस में आइला, यहां मर्डर, रेप और किडनेप करके आबो हई तब कोई बात है, चलो....।’’ उसने ऐसे कहा जैसे यहां के लिए यह सबसे निकृष्ठ काम करके आना हुआ।

दो एक घंटे में समझ गया कि जेल का अपना कानून है और यहां नरसंहार करने वालों की धाक होती है और मर्डरर, रेपिस्ट और किडनैपर का ज्यादा सम्मान दिया जाता हैं। यह देखने को भी मिला। और इसकी शेखी बधारते भी कई मिल गए। भोला। 

पंकज, मेरे गांव का ही लड़का था। एक नरसंहार में आठ, नौ लोग मारे गए थे और उसके बाद उसके उपर दो और हत्या करने का आरोप है। गोरा चिटठा, सितुआ नाक और दुबला पतला किशोर। हंसमुख। अपने क्षेत्र का खुंखार अपराधी है पर हमेशा हंसता मुस्कुराता मिलता। गांव में भी जब मिल जाता तो प्रणाम बब्लू दा जरूर करता। आज जेल में मिला।

फिर वह वहीं कुछ लोगों से मिलबाने लगा।
‘‘मिलहो, इ बब्लू दा हखीन, डाक्टरी पढ़े के जगह भाग के शादी कर लेलखिन।’’
और फिर दूसरों के बारे में मुझे बताने लगा।
‘‘मिलहो इनखा से-प्यारेबीघा गांव है, कॉमनिस्टबा नेता नै मरैलो हल अपन बोडीगडबा के साथ, इहे सब मिलके मारलखीन हल। साला मजदूर के भड़काबो हलै। इ मिललहो, रंका सिंह, मोहनपुर नरसंहार।

देवा, 
कैसी हे तेरी दुनिया। आज जिससे मिल रहा हूं सभी के सभी यमराज! कहां ले जाओगी जिंदगी।

शेष अलगे किस्त में, बने रहिए।

05 February 2012

एक छोटी सी लवस्टोरी-48


जब आंख खुली तो खुद को पुलिस थाने में पाया। रेल थाना था। पुलिस के पास मुझे लोगों ने रेलवे पटरी  से उठा कर इलाज के लिए अस्पताल ले जाने के लिए पहंुचाया था। पुलिस ने रीना के परिजनों को भी पकड़ लिया था। मेरे उपर से एक पूरी रेल गुजर गई थी और मैं जिंदा था। मैं पटरी के बीचो बीच गिरा था और पटरी से चिपका रहा था, फिर बेसुध हो गया था।

फिर एक पुलिस वाले ने आकर मेरा हाल चाल पूछ और मुझे ठीक पाया। फिर वह चला गया और स्थानीय लोग आ आ कर मुझे देखने लगेे। बच गया बेचारा। सब के मुंह से यही भाषा निकल रही थी। फिर मैं उठ कर खड़ा हुआ और फिर रीना के बारे में पूछा तो किसी ने बताया कि वह बगल में है। उधर बढ़ गया, जैसे ही दरवाजे पर पहूंचा रीना पर नजर पड़ी वह रो रही थी। मुझे पर नजर पड़ी तो वह दौड़ गई और फिर कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया और दो तीन झपड़ लगा दिया। फिर कुछ पुलिस वाले पहूंचे और मुझे पकड़ कर हाजत में डाल दिया। बात बदल गई। पता चला कि मेरे उपर अपहरण का मुकदमा दर्ज किया गया है और इस सब के लिए पुलिस को मोटी रकम दे दी गई है। मैं बेपरवाह हाजत में बैठा रहा। चुपचाप। मेरा अंग अंग दुख रहा। इस घटना मे बच जाना करिश्मा था। लोगों से सुना की रेल मेरे उपर से गुरती रही और मैं वहीं बेहोश पड़ा रहा है। और जब इस घटना में बच गया तो फिर अब डरना किस से थे। पहले ही:ःजो तुध भावे नानका सोई भली तू करःः के साथ घर से निकला था। सो अब यहां से आगे होने वाले सभी घटनाओं का मानचित्र माथा में घूमने लगा।

दोपहर से अधिक बीत गए थे। फिर एक पुलिस वाले ने मुझे वहां से निकाल कर  अधिकारी के पास ले गया। पूछताछ होने लगी। रीना भी वहीं थी। मैंने प्रेम करने की बात कही और साथ ही साथ शादी भी कर लिये जाने की जानकारी दी। अधिकारी के माथे पर नजराने की रकम बोल रही थी उसने मुझसे पूछा- 
‘‘घर जाना चाहते हो या जेल।’’
मैंने कहा-‘‘घर।’’
‘‘फिर इसके लिए तुम अभी चुपचाप यहां से उठो और चले जाओ।’’
‘‘रीना?’’
‘‘वह तुम्हारे साथ नहीं जाएगी।’’
‘‘मैं साथ ही घर जाउंगा।’’
‘‘फिर तुम्हें जेल जाना होगा।’’
‘‘तो जेल ही जाउगा।’’
टका सा जबाब सुनने पर वह पुलिसवाला उठा और सटाक सटाक सटाक। मोटी बंेट की लाठी देह पर पड़ने लगी। मैं जोर जोर से चिल्लाने लगा। तभी बगल से दौड़ कर रीना आई और लाठी को अपने देह पर रोक लिया और फिर दरोगा से भीड़ गयी।
‘‘काहे मार रहलो हो, कोई चोर उचक्का है की। शादी कैलके हें हमरा से, तोरा की दिक्कत हो।’’
फिर उसके परिजन वहां से आए और उसे घसीट कर ले गए।
शाम हो गई और फिर रात भी। मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं था पर रीना के बेलने की आवाज बीच बीच मे आ रही थी। शायद वह इसलिए ही जोर से बोल रही थी कि मैं सुन सकू। 

मैं चुपचाप बैठा रहा। सोंचता रहा। पर अब सोंच सीमित हो गई थी। अब जीवन की आशा नहीं रही थी और मौत का डर चला गया प्यार में पागल होना इसी को तो कहतें है। एक अजीब सा जुनून सवार हो गया, सब से लड़ कर प्रेम को जीत लेने का। दांव पर लगा दी अपनी जिंदगी। जानता था मेरे घर में किसी को इसबारे में अभी पता नहीं होगा और हो भी तो कौन देखने आएगा? अब मन में एक ही बात चल रही है जीवन चुक जाए और प्यार जीत जाए। जीवन रहे न रहे प्यार रहना चाहिए।

रात भर निंद नहीं आई पर थाने मे हलचल चलती रही। किसी से पूछने पर भी वह कुछ नहीं बताता था। सुबह पता चला कि अपने थाना ले जाएगें और फिर जेल। सुबह रीना के परिजनों के साथ साथ मैं भी रेलगाड़ी पर एक दो पुलिस वाले के साथ बैठ गया और फिर बिहारशरीफ होते हुए अपने शहर। थाने में पहूंचा तो जंगली आग की तरह छोटे से शहर से लोग दौड़ दौड़ कर थाना देखने आने लगे। भीड़ मेले की तरह उमड़ पड़ी। शायद इस तरह का यह पहला मामला था।
यहां आकर कुछ अकड़ ढीली होने लगी। मन में अपने इस कृत्य के लिए शर्मिंदा हो रहा था, नजर झुकी रहती और आंखें नम। फिर घर से छोटा भाई, चाचा इत्यादी भी आ गए। आंखो से अविरल आंसू निकलने लगा। इसलिए नहीं कि ऐसा क्यों किया बल्कि इसलिए कि घर परिवार के बारे में नहीं सोंचा। फिर बाबू जी आए तो मैं और फूटफूट कर रोने लगा। जिस पर उनको गर्व था उसी ने उसे चूर चूर कर दिया।

पुलिस यहां भी मैनेज किया जा रहा था और अब रूपये के दम पर वह घर जाएगी और मैं जेल। बगल के कमरे रीना भी बैठी थी और मेरे रोने की आवाज सुन कर चली आई। हाजत में आकर मेरा हाथ थाम लिया और बोली।
‘‘काहे ले रोबो हीं, चुप रहीं नें, जे करना हैं करेले दहीं, हमरा अलग अब भगवाने करथी।’’
‘‘सब तोरे पर अब निर्भर है, तांे जे बयान देमहीं ओकरे पर इस बचतै, नै तो ऐकर जिंदगी बर्बाद।’’ चाचा बाले।
‘‘चिंता काहे करों हखिन, इस सब जेतना करे के है कर लै, पर हमरा झुका नै सकतै।’’

और फिर थाने मे उसके गांव के बहुत सारे लोग जुट गए। गांव से बेटी का भागना पूरी गांव के ईज्जत की बात थी सो गांव के दबंग मुखीया नरेश सिंह भी पहूंच गए। उसके बड़े चाचा, बाबू जी सब।
आते ही नरेश सिंह ने कहा-
''आंय गे छौंरी, लाज नै लगलै, घर से भाग के समूचे गांव के नाक कटा देलहीं, ईज्जत मिट्टी में मिला देलही।’’
इतना सुनना की रीना तिलमिला गई।''
‘‘ हां नाक तो कटबे कैलै, जब तोर बेटी गोबरबा के साथ सुत्तो हलो और तीन बार पेट गिरैलहो तब नाक बचलै हल ने। केकर घर में की होबो है हमरा से छुपल है। ऐजा पंडित बनो हा। हम कौनो पाप नै कैलिए हें, प्यार जेकरा से कैलिए ओकरा से शादी कैलिए, जीबै मरबै एकरे साथ।’’
गुस्से से उसका चेहरा लाल था जैसे किसी ने नागीन को छेड़ दिया हो, उसने टका सा जबाब देकर सबको चुप कराने की कोशिश की या अपने कृत को सही ठहराने की, पर जो हो उसने सच सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया। 
समाज में पवित्रता का पैमाना ही अलग होता है, छुपा हुआ पाप, पाप नहीं होता और दिखने वाला प्यार पवित्र नहीं होता।
इतने पर जब उसके बड़े चाचा ने कहा
-‘‘केतना छिनार है इ छौंड़ी, चल ले चल ऐकरा। काट के फेंक देबै। कुल पर कलंक लगा देलक, बच के कि करतै।’’
लगा जैसे रीना के देह पर किसी ने जलता हुआ तेल छिट दिया हो। 
‘‘हां तों जे अपन भबहू:छोटे भाई की बीबीः से दबर्दस्ती मुंह काला करके और हल्ला करे के डर से जला के मार देलहो इ सब कलंक नै ने लगलो। बड़की साधू बनो हा, हमरे से बेटी लिखाबो हलो लेटर और रात रात भर मिलो हलो मन्टूआ से और जान के भी चुप रहला।’’
चटाक। रीना के चेहरे पर तमाचा लगा। ‘‘चल लेकर ऐकर घर, बचके की करतै।’’
शेष अगले किस्त में, बने रहिए।