26 अक्तूबर 2018

धौंस

#धौंस

अरुण साथी

पटना के मौर्या लोक में कुल्हड़ की चाय बेचते है दाढ़ी वाले बाबा। चाय प्रेमी होने की वजह से चला गया। कुछ भी पूछिये, हिंदी कम, अंग्रेजी ज्यादा बोलते है।

खैर, चाय ली और जैसे ही होठों से लगाया उसकी कड़क सोंधी खुशबू और स्वाद मन में घुलता चला गया। आह। एक कप और लिया।

इसी बीच बातचीत जारी रही। आधा अंग्रेजी आधा हिंदी। आरा से प्रत्येक दिन आते है। बक्सर में एसपी से लड़ गया। अपने जमाने के ग्रेजुएट है, इत्यादि।

तभी एक कार से बर्दीधारी सिपाही उतरा और चाय का आर्डर दिया। कार से अंकल अंकल कहके एक बच्ची उसे परेशान कर रही थी। शायद बॉडीगार्ड है। मुझे क्या।

वह भी चाय पीने लगा। जब पैसे देने की बारी आयी तो वह पहले तो आनाकानी किया पर जब बाबाजी ने मांग लिया तो दस का नोट बढ़ा दिया। बाबाजी ने तीन रुपये लौटा दिया।

वह एक दम से भड़क गया।

"साला एक कप चाय का सात रुपया! पूरे पटना में यह रेट नहीं है। तुम्हीं लोग लूटते हो साले। जब सियाही को नहीं छोड़ रहे तो पब्लिक का क्या करोगे।"

"लूटने का काम तो आपका है बाबूजी, हम लोग तो मेहनत मजदूरी करके कमाते खाते है।" बाबाजी ने दो टूक जबाब दिया।

सिपाही कुछ बोलता की तभी चाय पीने वाले सभी सिपाही पे टूट पड़े। "फ्री में चाय खोजते है।" सिपाही चुपके से खिसक लिया।

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