26 अगस्त 2018

दलित एक्ट, आरक्षण, वोटबैंक और संवैधानिक शोषण

दलित एक्ट, आरक्षण, वोटबैंक और संवैधानिक शोषण

(अरुण साथी)

"आरक्षण को लेकर संविधान सभा में जब चर्चा चल रही थी डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपनी आशंका जताते हुए साफ चेतावनी दी थी कि यदि हमने गैरबराबरी को खत्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग इस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाई है।"

इस ढांचे से उनका आशय भारत और भारत का लोकतंत्र से था। आज यदि हम गंभीरता से आजादी के 70 साल बाद विचार करें तो बिल्कुल यही स्थिति विपरितार्थ रूप में सामने खड़ी नजर आती है। गैरबराबरी को लेकर शुरू किया गया आरक्षण और हरिजन एक्ट आज गैरबराबरी की एक बड़ी चौड़ी खाई उत्पन्न कर दी है। जिसमें बड़ी संख्या में सवर्ण समाज के लोग पीड़ित बन चुके हैं।

आज मामला उल्टा है। कुछ प्रसंग की चर्चा लाजिम है। पहला प्रसंग राजस्थान के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित का। बिहार के एक बड़े अधिकारी ने फर्जी रूप से रमेश पासवान के नाम एक प्राथमिकी कोर्ट में दर्ज कराई और अपने रसूख का इस्तेमाल कर तत्काल पत्रकार को राजस्थान से गिरफ्तार कर बिहार ले आए और जेल में ठूंस दिया। मीडिया ने जब छानबीन की तो रमेश पासवान नाम के युवक ने किसी प्रकार के केस करने की बात नहीं कही।

दूसरा मामला नोएडा के सेवानिवृत्त कर्नल बीरेंद्र सिंह चौहान का है। उनके साथ मारपीट की जाती है। दबंगई दिखाई जाती है और फिर दबंग व्यक्ति अपनी पत्नी से दलित एक्ट लगाकर प्राथमिकी दर्ज करा देता है। देश की सेवा में समर्पित रहने वाले कर्नल जेल चले जाते हैं।

मामला उठता है और सीसीटीवी कैमरे में सारी बात सामने आती है कि कर्नल के साथ मारपीट की गई परंतु उनके जेल जाने के बाद जांच होती है और जमानत होती है। दोनों मामले में निर्दोष जेल जाते हैं और जमानत पर छूटते हैं। भारतीय राजनीति और वोट बैंक की राजनीति का यह बानगी भर है। आम जीवन में कई लोग इस से पीड़ित हैं।

तो क्या अंबेडकर की आशंका के अनुसार यह गैरबराबरी भारतीय ढांचे को ध्वस्त कर देगा? भारत के लोकतंत्र को ध्वस्त कर देगा?

अब आइए गैरबराबरी पर एक नजर डालते हैं..

प्रसंग 1
एक निजी विद्यालय के डायरेक्टर बता रहे हैं कि सैनिक स्कूल के प्रवेश परीक्षा में 95% और 98% लाने वाले सामान्य वर्ग के बच्चों का एडमिशन नहीं हुआ जबकि 40% और 50% वालों का हो गया। पूछते हैं कि बताइए इस बच्चे की मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा? बच्चे पूछ रहे हैं कि सर मेरा एडमिशन क्यों नहीं हुआ?

प्रसंग 2

शेखपुरा जिले के कुटौत गांव में रमेश सिंह की भूख से मौत हो गई! सरकारी मदद लगभग शून्य रहा। स्थानीय अधिकारी वृद्धा पेंशन देने के लिए रमेश सिंह की मां को तीन-चार घंटे तक बीडीओ  सवालों की बौछार से टॉर्चर करते हैं और केंद्रीय मंत्री के कहने पर भी अभी तक कुछ नहीं दिया गया। खैर, सामाजिक स्तर पर पहल हुई और उसके बच्चे को आर्थिक तथा शैक्षणिक मदद की व्यवस्था कर दी गई।

प्रसंग 3

नालंदा जिले के सारे थाना के खेतलपूरा गांव में पंकज सिंह की मौत किडनी फेल होने से इलाज नहीं होने की वजह से हो जाती है। एक माह पहले पंकज सिंह की पत्नी की भी मौत पथरी जैसे साधारण बीमारी का इलाज पैसे के अभाव में नहीं होने की वजह से हो जाती है। पंकज सिंह के बच्चे अनाथ हो गए। उसके पास एक कट्ठा जमीन नहीं है। एक डिसमिल का घर जर्जर। लोग सोशल मीडिया पे मदद की अपील कर रहे। मदद मिल भी रही। पर यह समाज के लिए स्थायी विकल्प नहीं है।

आइए हम गैर-बराबरी पर विचार करते हैं। कथित तौर पर सवर्णों अथवा वैश्यों के दमन, शोषण और अत्याचार दलितों के गैरबराबरी का मूल कारण था। सामंतवादियों को इसके लिए दोषी माना माना जाता है। परंतु आज हम सभी इस गैरबराबरी को लेकर सामंतवाद को समाज के लिए कलंक मानते हैं।

तब अब सोचिए आज  सवर्णों में गैरबराबरी की स्थिति उत्पन्न कर दी गई है। सवर्ण का दमन और शोषण हो रहा है। इसी शोषण का नतीजा है कि गरीब सवर्ण भूख से मर रहे हैं। बीमारी के इलाज के अभाव में मर रहे हैं।

अब इस पर देखिए कि यह दमन और शोषण कर कौन रहा है! तो यह दमन और शोषण संवैधानिक स्तर पर किए गए प्रावधानों के अनुसार वोट बैंक के लोभी नेता कर रहें। मतलब साफ है कुछ मुठ्ठी भर सवर्णों अथवा सामंतवादियों के दमन और शोषण का बदला लेने के लिए एक लोकतंत्र में संवैधानिक व्यवस्था दी जाती है और 70 साल तक उसी दमन और शोषण के बदला लेने का परिणाम विपरीतार्थक रूप में सामने आता है जिसमे समूची जाति से बदला लिया जाता है। जबकि मुट्ठी भर लोग जो शोषण और दमन करते हैं वे जाति देख कर कभी नहीं करते। बल्कि अपनी जातियों का भी दमन और शोषण करते हैं।

अब थोड़ी चर्चा वामपंथ के वर्ग संघर्ष की। वामपंथ का वर्ग संघर्ष का मूल सिद्धांत समाज को गरीब और अमीर में बांट कर देखने की है। हालांकि अपने मूल सिद्धांत पर वामपंथी भी नहीं टिके और वह जातियों और धर्मों के आधार पर समाज को बांट कर देखने लगे, जिस की वजह से वे हाशिये पर चले गए। परंतु वर्ग संघर्ष का यही मूल सिद्धांत समाज को जोड़ने का सिद्धांत है। परंतु राजनीतिज्ञों के द्वारा समाज को जोड़कर राष्ट्र को सशक्त करने की बात कभी नहीं की जा सकती। क्योंकि समाज को विखंडित करने के बाद ही सत्ता को हासिल किया जा सकता है। और सभी दलों के राजनीतिज्ञों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता को हासिल करना होता है। देश सेवा, समाज निर्माण उनका उद्देश्य कतई नहीं होता!

वोट बैंक की राजनीति देखिए कि जब सुप्रीम कोर्ट अपने अनुभव से कहता है कि दलित एक्ट का 95% दुरुपयोग हो रहा है और निर्दोष क्यों लोग सताए जा रहे हैं और इस में जांच कर गिरफ्तारी हो तो वोट के लिए सत्ताधीश विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल देते हैं! अब जब सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि आखिर यह आरक्षण कब तक रहेगा और एक IAS के बेटे और पोते को आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए तब इस पर भी वोट बैंक की राजनीति शुरु हो गई है!

तब इस गैर बराबरी का परिणाम अंबेडकर की जताई आशंका के अनुरूप एक दिन क्यों उत्पन्न नहीं होगा? एक दिन ऐसा आएगा जब इस गैर बराबरी की वजह से भारत का लोकतंत्र खतरे में पड़ेगा...?

08 अगस्त 2018

एक भूमिहार ब्राह्मण रमेश सिंह भला भूख से कैसे मर सकता है...? सबका यही सवाल..

( मैं हूँ ट्विटर पे @arunsathi )

घटना उद्वेलित भी करती है और उद्विग्न भी। मंगलवार की शाम जब यह खबर मिली की भूख और आर्थिक तंगी की वजह से शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड के कुटौत गांव निवासी 30 वर्ष के युवक रमेश कुमार सिंह की मौत हो गई। उसे कई दिनों से खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था तो एकबारगी सन्न रह गया। भला कोई भूमिहार ब्राह्मण इतना भी गरीब हो सकता है? मौके पे पहुंचा तो स्थिति बड़ी भयावह थी।

खाने का एक दाना नहीं..न राशन न पेंशन

रमेश के घर खाने का एक दाना नहीं था। उसके चूल्हे एक माह से खामोश थे। उसकी पत्नी आर्थिक तंगी की वजह से छोड़ कर चली गयी। साथ ही छोड़ गई एक आठ साल की बेटी और छह साल का बेटा। दुर्भाग्य देखिये की बेटा का नाम राजा है। चूंकि वह भूमिहार है इसलिए सरकार इसे गरीब नहीं मान सकती। सो इसका नाम बीपीएल सूची में नहीं है। न ही इसे सरकारी राशन-किरासन मिलता है और न इसकी अस्सी बर्षीय बूढ़ी माँ को पेंशन!!

मौके पे गांव के लोग आपस मे उलझ रहे थे।

"के साला होत जेकर ई मजदूरी नै कैलक और शायदे कोय एकरा मजदूरी के पैसा देलक। सीधा के सब दहनजो है। भगवान देखो हखुन..!!"

मतलब साफ हो गया। बीबी के चले जाने के बाद रमेश के पास को आसरा न था। वह गांव में मजदूरी करने लगा। गांव के लोग कितने निर्मम और क्रूर होते है इसे भी देखिये। लोग मजदूर कराने के बाद भी पैसा नहीं देते। रमेश इतना सीधा की किसी से तन के मांगता भी नहीं। और हालात खराब होते गए। वह अवसाद में चला गया। गुमसुम रहने लगा। किसी से कुछ बोलना बतियाना बंद। लोग उसे विक्षिप्त मानने लगे। वह खुद्दार भी था जिसकी वजह से वह किसी से मांग कर नहीं खाता। माँ मांग कर लाती तो खा लेता।

दस कट्ठा जमीन भी था जो पिता के श्राद्ध में बिक गया..

अपने ही समाज की क्रूरता की कहानी भी रमेश ही है!!

रमेश अपने ही समाज की क्रूरता, शोषण और गरीबी अमीरी के भेदभाव की कहानी है। रमेश के पास दस कट्ठा जमीन भी थी पर अपने पिता के निधन पे श्राद्ध कर्म में जमीन हाथ से निकल गयी। रमेश पे समाज के लोगों ने श्राद्ध ठाठ से करने का दबाब दिया और फिर उसने जमीन को अपने की समाज के एक व्यक्ति के पास बैबुलवफ़ा (गिरवी) रख श्राद्ध किया। हालात इतने खराब की वह तय समय पे गिरवी न छुड़ा सका और जमीन उसके हाथ से निकल गयी।

भूख से नहीं हुई मौत

भूख से मौत की खबर फैलते ही प्रसाशन आनन फानन में पहुँच कर बीडीओ पंकज कुमार के नेतृत्व में दो बोरा अनाज घर पहुंचा दिया। 20000 का पारिवारिक लाख और 3000 का कबीर अंत्येष्टि की राशि दे दी। भूख से मौत को स्थापित करना नामुमकिन है। इस जागो मांझी के प्रकरण में देख लिया था सो जानता था कि यह नहीं होने वाला। बिना पोस्टमार्टम के तो खैर और मुश्किल। खैर प्रसाशनिक बयान आ गया। भूख से नहीं हुई मौत।

बस पूरी कहानी यही है बाकी सब अफसाना

रमेश मर गया। वजह भूख है या गरीबी या समाज। तय करिये। पर देखिये समाज को। रमेश के शवदाह पे गए लोग गंगा किनारे जम के मिठाई उड़ाई होगी। उसे शर्म न आई होगी। और हाँ रमेश के श्राद्ध पे भी ब्रह्मभोज होगा। हो सकता उसका एक छोटा घर भी बिक जाए.. इससे क्या। समाज को तो भोज खाना है नहीं तो समाज जीने देगा। एक पत्तल भात नै जुटलो। समाज को इससे शर्म नहीं आती की एक गरीब का वह परवरिश न कर सका! उसके दो अनाथ बच्चे का पालन पोषण कैसे होगा?

और सरकार तो हमेशा से ही फाइलों पे ही विकास करती रही है। रमेश को राशन किरासन नहीं मिलना, बूढ़ी को बृद्धा पेंशन नहीं मिलना कोई मुद्दा नहीं है। हजारों लाखों है ऐसे। एक मर गया। लोग जान गए। कई गुमनाम भी मरते होंगे!!

और फिर सवर्ण भूमिहार गरीब तो होता नहीं..गरीब तो वोट होता है। जिस जाति का अधिक वोट लोकतंत्र में उसी का हित सधेगा.. हो सकता है अब चुनाव आने वाला है और रमेश के घर नेताओं का आना जाना शुरू हो जाये..घड़ियाली आंसूं बहाने..और हो सकता है कि वह वहां जाति समाज के हित की बात करे और यह भी हो सकता है कि कोई नौजवान उन नेताओं से समाज हित के लिए किए गए काम का जबाब मांगकर शर्मिंदा कर दे...हो तो यह भी सकता है कि दोनों बच्चे भी भूख से मर जाये और हम उसे बीमारी से मौत करार दे दें...

भूख से मौत
***
एक आदमी
भूख से मरा
या एक गांव
एक समाज
एक सरकार
एक सभ्यता
एक संस्कृति
भूख से मर गई
सोंच कर देखो..

03 अगस्त 2018

हरिजन एक्ट के बहाने मन की भड़ास..

मन की भड़ास
(अरुण साथी)
मन एकदम्मे कछमछा रहा है। कई बार लिखा और मिटा दिया। राजनीति और धर्म पे नहीं लिखने का सोंच रखा है। बेकार में तनाव हो जाता है।

खैर! दलित एक्ट, पूण्य प्रसून, मुज़्ज़फरपुर बालिका गृह, एनआरसी आसाम!! देश में अकबकाट जैसा लगता है। सोशल मीडिया गंभीर विषयों के विमर्श का मंच नहीं रहा। यहाँ बस "गाय का सिंग बैल में अउ बैल का सिंग गाय में" (गौ रक्षा दल के लिए माफी यह एक देहाती कहावत है, समझ न आये तो किसी बिहारी से पूछ लियो) किया जाता है। फिर भी मन नहीं मान रहा। चुप रहना ग्लानि जैसी लग रही।

सो भड़ास निकाल रहा हूँ।

पहले दलित कानून एक्ट की बात। मेरे हिसाब से सुप्रीम कोर्ट ने झूठे हरिजन एक्ट लगाकर निर्दोष को फंसाने के सर्वाधिक मामले सामने आने पे हरिजन एक्ट में महज एक संशोधन किया कि डीएसपी रैंक के अधिकारी केस में पहले जांच करे फिर गिरफ्तारी हो। यह न्यायसंगत बात है। हरिजनों को प्रताड़ित करने की बात सौ फीसदी सच है पर यह भी सच है कि हरिजन एक्ट से प्रताड़ित गैर दलित लाखों लाख लोग मिल जाएंगे।

हमारी न्याय व्यवस्था का मूलाधार है कि किसी निर्दोष को सजा न मिले, भले सौ दोषी छूट जाए। फिर!

अब गंभीरता से देखिये। सुप्रीमकोर्ट के इस न्याय संगत फैसले को राहुल गैंग, जिग्नेश, हार्दिक, भीम आर्मी जैसे सत्ता और कुर्सी के लिए खून के प्यासे लोग नरेंद्र मोदी को घेर लिया। ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित भारत बंद (जिसका प्रमाण भारत बंद के समय के मेरे पोस्ट में मिल जाएगा) इस आग में बारूद डाल दिया। माहौल बना, केंद्र सरकार दलित विरोधी।

अब नरेंद्र मोदी के सामने साँप छुछुन्दर का हाल। "निंगले तो अंधा उगले तो कोढ़ी।" एक बड़े वोट बैंक के खिसकने का डर। मामला पलटा और सुप्रीमकोर्ट के फैसले को शाहबानों केस की तरह ही पलटने का निर्णय लिया गया। यानी निगल लिए और अंधा होना स्वीकार किया। कोढ़ी होने से बच गए।

अब जोर का झटका उनको लगा जो अंधभक्ति ने लीन यह मान बैठे थे कि नरेंद्र मोदी वोटबैंक की परवाह नहीं करते! जो लोग सोशल मीडिया पे भोकल थे वे अब भोकार पार के रो रहे। चुनौत दे रहे। हरा देने की बात कह रहे! उधर राजसत्ता को पता है कि इनके पास विकल्प नहीं है। चुनाव आते आते मंदिर मस्जिद ऐसा होगा कि सब भूल जाइए!!

पूण्य की बात

पूण्य प्रसून बाजपेयी जी को एबीपी से हटाए जाने पे जो लोग रो रहे उनके लिए एक बात, क्या आपको नहीं पता कि मीडिया हाउस पूंजीपति मीडिया मर्डोक का व्यवसाय है! जब व्यवसाय है तो अपना हित सर्वोपरि! सभी का अपना एजेंडा है। देश हित की बात बेमानी।

अब ब्रजेश ठाकुर

ब्रजेश ठाकुर नर पिशाच है। सब यही कह रहे! पर क्या कानून व्यवस्था के वे अधिकारी जिनके जिम्मे इनपे लगाम लगाने की जिम्मेदारी थी वे ज्यादा गुनाहगार नहीं! और तेजस्वी यादव जैसे विरोधी जो सरकार को घेरते हुए ठाकुर के जाति पे सवाल खड़ा कर अपना आधार वोट मजबूत करते है वे कैसे इसे नजरअंदाज कर जाते है कि इसे उद्भेदन करने में ठाकुर के जाति के भी पत्रकार शामिल है, फिर..

एनआरसी असम

आप चाहे जितनी राजनीति करें पर यह सच है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेश से घुसपैठ कर लोग आसाम, बंगाल, बिहार में वोटर बन हमारी हकमारी कर रहे। वे भी आज वोटबैंक है। अब राहुल और दीदी सरीखे लोग देश हित को ताक पे रख वोट हित साधने में जुट गए है। जो हमारी सभ्यता, संस्कृति और समाज के दुश्मन हो उन्हें हम कैसे अपने घर रहने दें!! हाँ अगर भारतीय है तो अभी मौका है। सुधार का। प्रमाण दीजिये। अन्याय नहीं होना चाहिए।

बस!! भड़ास निकल गया। उल्टी करने से हल्का हो जाता है। गडमड है। होगा ही। भड़ास है। किसी पार्टी की विचारधारा नहीं... बाकी तो जो हे सो हइये हे..😢😢

जो लोग अपने मां—बाप को प्रेम दे पाते हैं, उन्हें ही मैं मनुष्य कहता हूं..

ओशो को पढ़िए आपने कल माता और पिता के बारे में जो भी कहा , वह बहुत प्रिय था। माता—पिता बच्चों को प्रेम देते हैं, लेकिन बच्चे माता—पिता को प्र...