13 जून 2017

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। उसके पीठ और सीने की हड्डी जाने कैसे, पर विचित्र तरीके से टेढ़ी मेढ़ी थी। असीम पीड़ा से जूझता एक आदमी। अष्टावक्र!

बहुत लोग उसे कुब्बड़ कहके चिढ़ाते थे। बस इसी बात पे उसे गुस्सा से जलजलाते देखा है, कई बार। और अंदर से घूँटते हुए भी...। मायूसी में कई बार कहता, "अल्लाह जाने कौन बात का सजा दिहिस है।"

सब कुछ के बाबजूद वह पढ़ाई करने में परिश्रमी था। किताबों से लगाव ही उसे मेरे करीब लगा। मेरे साथी बुक स्टॉल का कई सालों तक वही मालिक रहा। बिना किसी लोभ लाभ के।

आज अचानक उसकी याद आयी है। सुबह सुबह वह सपनों में आया। जाने कुछ कह रहा था। सुन न सका।

उससे जुड़ा एक प्रसंग है। पाक रमजान का ही महीना था और हम चार-पांच दोस्तों के साथ बाजार में टहल रहे थे।  तभी एक मित्र ने होटल के आगे उस को चिढ़ाते हुए कहा कि
"रसगुल्ला खाओगे मोनू!" वह जानता था कि मोनू रोजा में है और रसगुल्ला नहीं खायेगा!

मोनू ने भी तपाक से जवाब दिया!
"सभ्भे के भर पेट ख़िलइमहिं त खा लेबौ!"

सबको पता था कि मोनू रसगुल्ला नहीं खाएगा क्योंकि वह रोजा रखे हुए है। सभी लोग यह भी जानते थे कि जिस मित्र ने यह प्रस्ताव दिया है वह बेहद कंजूस है और वह रसगुल्ला नहीं खिलाएगा। दोनों तरफ से नकारात्मक स्थिति थी फिर भी हम दोस्तों को क्या, मजा लेने के लिए कंजूस मित्र को उकसा दिया।

"मख्खीचूस तेलिया कहाँ से रसगुल्ला खिला देतै, दम है!"

"चल सबके भर पेट खिला देबौ, मोनू खाईतो तब..।"

तब मोनू भी तैयार हो गया। सभी लोग होटल में बैठे तब तक किसी को विश्वास नहीं था कि मोनू रसगुल्ला खाएगा परंतु सभी के आगे रसगुल्ला रखा गया। हंसी-मजाक होती रही। सब ठहाके लगाते रहे। सबको पक्का विश्वास था कि कोई रसगुल्ला नहीं खाएगा क्योंकि मोनू नहीं खाने वाला है। मोनू ने सबसे पहले होटल के संचालक को एडवांस पैसा देने के लिए कहा क्योंकि उसे पता था कि वह भरपेट रसगुल्ला नहीं खिलाएगा। कंजूस बहुत है। खैर, इसी शर्त पर हहा-हिहहि चल रहा था और मोनू ने रसगुल्ला दबा दिया। हम सभी अवाक रह गए। फिर भी मित्रों का क्या, सब ने दबा, दबा कर रसगुल्ला दबा लिया। लंबा बिल बना। बेचारे मित्र का मुंह लटक गया। जब हम लोग खा पीकर निश्चिंत हो गए तब पूछने पर कि मोनू ऐसा क्यों किया? हम लोगों को तो उम्मीद नहीं थी। हम लोग तो मजाक कर रहे थे। कहीं गलती तो नहीं हो गई हम लोगों से। मोनू ने कहा कि

"ऐसन कोय बात नै। दोस्त के खुशी ही सबसे बड़का इबादत हई। एक दू दिन रोजा टूटे से खुदा नाराज नै होता। अउ दोस्त के खुशी से बढ़के कुछ नै होबो हैय। बाद में रोजा मेकअप करे के नियम हई।"

खैर, आर्थिक परिस्थिती ने मोनू के सारे परिवार को यहां से गया जाने पर विवश कर दिया। सभी लोग वही सेटल हो गए। कभी कभार मोनू आता, भेंट हो जाती। मिलकर भी और मोबाइल पर भी सूचित कर वह गया आने के लिए कई बार कहता पर जीवन की आपाधापी में कभी वहां नहीं जा सका। इसी बीच खबर आई कि नियोजन के माध्यम से वह शिक्षक हो गया। बाढ़ के आसपास किसी गांव में। एक दिन उसने सूचना दिया, वह शादी कर रहा है। मेरी खुशी का पारावार नहीं रहा। लगा कि ईश्वर दुख ही नहीं देते, कभी-कभी खुशी भी देते हैं। इसीलिए उनको परमपिता परमेश्वर कहा गया है। मैंने उससे कहा कि
"चल मोनू अब अल्लाह से शिकायत खत्म हो जयतौ। नयका जिनगी मुबारक।

उसने बारात में आने के लिए कहा। हम
तैयार भी हुए पर दुर्भाग्य ऐसा की बारात नहीं जा सका। जिस दिन बारात जानी थी उस दिन लगा जैसे ईश्वर अपनी नाराजगी को जाहिर करने लगे हो। इतनी मुसलाधार बारिश होने लगी, लगा कि हर जगह बादल फट पड़ेगा। धरती उसमें समा जाएगी। बादलों की गड़गड़ाहट से थर-थर धरती कांपने लगी हो। विचित्र सा माहौल था। मोबाइल पर मोनू को सूचित किया। उसने मजबूरी समझी और मायूस भी हुआ। निकाह के बाद उसने मोबाइल पर अपनी बीवी से बात भी कराया। बहुत खुशी हुई।

इसी तरह कभी-कभी मोनू से बातचीत करता रहता था। कुछ महीने बाद मैंने मोनू के मोबाइल पर कॉल किया। अचानक से उधर जिसने मोबाइल उठाई उसने मायूस होकर कहा कि मोनू का इंतकाल हो गया। शारीरिक लाचारी की वजह से उसके हृदय ने जवाब दे दी और वह चल बसा। एक मिनट के लिए सन्नाटा सा छा गया। लगा अल्लाह ने उसे थोड़ी सी खुशी बस इसलिए दी थी कि उसे ख़ुशी का एहसास हो जाए और फिर अलविदा कह कर चल दे...आह आह..

11 जून 2017

एक गोली मुझे भी मार दो...

एक गोली मुझे भी मार दो न..

(अरुण साथी, बरबीघा, बिहार)
हरिया। यही मेरा नाम है। किसान हूँ, अक्सर किसानों का यही नाम होता है । जब से सरकार ने गोली मारने के बाद एक करोड़ मुआवजा देने का ऐलान किया है तभी से सोच रहा हूं क्यों ना मैं भी मर ही जाऊं। परेशानी यह है कि गोली सरकारी होगी तभी तो एक करोड़ का मुआवजा मिलेगा क्योंकि आत्महत्या करने के बाद कर्ज माफी तक नहीं होती।

खैर, कोशिश करके देखता हूं। हां, इसके लिए कुछ आवश्यक चीजें जरूरी है। जैसे कि किसी विपक्ष के नेता का सहयोग और समर्थन, जो कुछ लोगों को जुटाकर उग्रता कराए और इसी बीच पुलिस गोली चला दे जिसमें मैं मारा जाऊं या फिर मीडिया का समर्थन जो मेरे दर्द को दिखाएं कम, चिल्लाये ज्यादा और पूरे देश में हाय तौबा मच जाए। क्योंकि मरता तो मैं रोज ही हूं पर तब हंगामा नहीं मचता। बिपक्षी नेता और सपक्षी मीडिया खामोश रहती है। सौ रुपये का अनाज उपजा कर अस्सी में बेचना मरने से कम है क्या? पानी, दवा के लिए तिल तिल कर मरना, मरने से कम है क्या? पर एक पैसे का मुआवजा कहां कभी मिलता है। और सोशल मीडिया की तो पूछो मत साहब। शास्त्रों, पुराणों में जिस स्वर्ग की बात कही गयी है वह यही तो है। एक से एक संत महात्मा, छोड़िये। भटके हुए के साथ फालतू में भटकना कैसा।

इसी बीच कभी कभी सोचता हूं कि एक सरकारी गोली खाकर मर भी जाऊं तो एक करोड़ कितना होता है मुझे कहां पता! तीन जीरो या चार जीरो से अधिक पैसे नहीं देखे है इसलिए कितना होगा क्या पता! शायद दो तीन बक्से में आ जाए। अरे, उसे रखूंगा कहाँ! यही परेशानी हो जाएगी। फिर अचानक यह भी सोचने लगा, चलो मान लिया कि सरकार की गोली लगी, तुरंत मर गया तो एक करोड़ मिल जाएगा। बाल-बच्चों के जीवन बन जाएंगे। शायद एक करोड़ में दो-तीन पीढ़ी आराम से काट ले पर इतने पैसे मिलने के बाद मेरे बच्चे किसान भी तो नहीं रहेंगे! वह खेती छोड़ देंगे! अनाज उपजायेगा कौन? लोगों को खिलाएगा कौन? अरे किसान रहकर तिल तिल क्यों मरना। बात खत्म करो। एक बार सरकारी गोली से मारो। सात पुस्तों को धनवान करो। चिंता छोड़ो, सुख से जिओ।

अरे सुना है सरकार हमारी मौत पे एक दिन का उपवास भी करेगी। आह! सुखद! सौभाग्य! यहां तो सालों उपवास करता हूँ तो कोई पूछता नहीं।

अच्छा, ऐसा हो सकता है, क्यों नहीं, हां क्यों नहीं होगा। सरकारी गोली खाओ आंदोलन पूरे देश में चले। हम सब किसान सरकार से कहें कि हमें गोली मार दो। गोली मारने के बाद एक करोड़ का मुआवजा तो मिल ही जाएगा! हाड़ तोड़ मेहनत, खून पसीना बहाकर, खेतों में हल चलाकर, मजदूरी करके हजार नहीं जुटा पाते तो एक गोली खाकर करोड़ों मिले तो
कौन नहीं मरना चाहेगा...चलो, चलो हमसब मरते है...हम सब किसान सरकारी गोली खाकर मरने के लिए तैयार है...आप मुआवजा देने के लिए तैयार रहो, सरकार बहादुर...एक गोली मुझे भी मार दो...



07 जून 2017

किसान हो, औकात में रहे..

किसान हो, औकात में रहो
देखते नहीं हो
तुम्हारी सरकार
तुम्हारे लिए कितना
कुछ कर रही है

योजनायों का पहाड़ है
फसल बीमा से लेकर
तुम्हारी आत्महत्या के लिए

बड़ी बड़ी कंपनियों का
बीज है
उर्वरक है
प्रचार पे अरबों खर्च है
भाषण है
मन की बात है
और क्या चाहिए..

तुम अन्न उपजाते हो
पराक्रम दिखाते हो
आधी रोटी खा सो जाते हो

फिर क्यों रोटी के लिए
सड़क पे आते हो
क्यों सरकार बहादुर के आगे
रोटी रोटी चिल्लाते हो..

आओ, फाइलों में देखो
और
सरकारी
योजनाओं का लाभ
उठाओ,

आत्महत्या कर आओ
एक लाख लेकर जाओ
या
प्रदर्शन में
सरकार की गोली खाकर
मारे जाओ
दस लाख नकद पाओ

बिकल्प तुम चुनो..
किसान हो
यथार्थवादी बनो
सपने मत बुनो
भगवान मत बनो

किसान हो, औकात में रहे...


15 मई 2017

एचएम और शिक्षक सरकारी स्कूल में पी रहे थे ताड़ी, शिक्षक ने मिलाया जहर

सरकारी स्कूल में नशीला पदार्थ आया ताड़ी, शिक्षक ने मिलाया जहर

शेखपुरा

बिहार में शिक्षा व्यवस्था का हाल बदहाल है। सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक ने नशीला पदार्थ ताड़ी मंगाई और शिक्षक के साथ मिलकर पीने लगे। जबकि एमडीएम छीने जाने से शिक्षक नाराज थे और चुपके से प्रधानाध्यापक के गिलास में जहर मिला दिया। हालांकि जहर मिलाते हुए रसोईया ने देख लिया और हल्ला हो गया जिससे प्रधानाध्यापक की जान बची। इस मुद्दे को लेकर आज ग्रामीणों ने काफी हंगामा किया। पहले अफवाह फैला दी गई कि एमडीएम में ज़हर मिलाया पर जांच में सारी सच्चाई सामने आ गई। एमडीएम की मोटी कमाई जानलेवा है। यह कभी बच्चों की जान लेता है तो कभी प्रधानाध्यापक का जान लेना चाहता है। यह हाल है शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड के काशीविघा मध्य विद्यालय का। होना तो कुछ है नहीं, जांच होगी और नीता पोती कर दी जाएगी!!! इति श्री..

14 मई 2017

विष्णु धाम तालाब खुदाई के दौरान निकली माता लक्ष्मी की प्रतिमा देखने के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ पाल कालीन प्रतिमा होने का अनुमान भगवान विष्णु की प्रतिमा भी तालाब के खुदाई में निकली थी

विष्णु धाम तालाब खुदाई के दौरान निकली माता लक्ष्मी की प्रतिमा

देखने के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

पाल कालीन प्रतिमा होने का अनुमान

भगवान विष्णु की प्रतिमा भी तालाब के खुदाई में निकली थी

बरबीघा (शेखपुरा)

शेखपुरा जिले के बरबीघा सामस विष्णु धाम मंदिर परिसर तालाब की खुदाई के दौरान शनिवार को माता लक्ष्मी की प्रतिमा निकली है। यह प्रतिमा भगवान विष्णु के मंदिर  के दौरान होने वाले तालाब की खुदाई के में निकली है।

विष्‍णुधाम सामस, क्या है खास।

शेखपुरा बिहार के शेखपुरा जिले में बरबीघा- वारसलीगंज सड़क पे बरबीघा से 5 किमी दक्षिण की ओर बिहार शरीफ से 25 किमी दूर सामस गांव स्थित विष्‍णुधाम मंदिर प्रसिद्व धार्मिक स्‍थल है। मंदिर में भगवान विष्‍णु की 7.5 फीट ऊंची व 3.5 फीट भव्‍य मूर्ति स्‍थापित है। विष्‍णु भगवान की यह मूर्ति स्‍वरूप में है और चार हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्मम स्थित है।
मूर्ति की वेदी पर प्राचीन देवनागरी में अभिलेख 'ऊं उत्‍कीर्ण सूत्रधारसितदेव:' उत्‍कीर्ण है। इस लिपि में आकार, इकार और ईकार की मात्रा विकसित हो गई है। ब्राह्मी लिपि में छोटी खड़ी लकीर के स्‍थान पर यह पूरी लकीर बन गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार की लिपि उत्‍तर भारत में नौवीं सदी के बाद मिलती है। प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (891-907 ई.) के दिघवा-दुली दानपात्र में इस शैली की लिपि का प्रयोग पुराने समय में किया जाता था। इस अभिलेख में मूर्तिकार 'सितदेव' का नाम भी लिखा हुआ है।
विष्‍णुमूर्ति के दांए व बांए दो और छोटी मूर्तियां हैं। यह स्‍पष्‍ट रूप से पता नहीं चल पाया है‍ कि ये मूर्तियां शिव-पार्वती की हैं या शेषनाग और उनकी पत्‍नी हैं। यह दुर्लभ मूर्ति 5 जुलाई 1992 में तालाब में खुदाई के दौरान मि‍ली थी। सामस गांव व उसके पास गांवों में खुदाई के दौरान बड़ी संख्‍या में मूर्तियां मिलीं। इनमें से कई सामस गांव के जगदंबा मंदिर में ही रखी गई हैं।

ढाई फीट ऊंची है लक्ष्मी की प्रतिमा

सामस विष्णु धाम मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉक्टर कृष्ण मुरारी सिंह तथा सचिव अरविंद मानव ने बताया कि खुदाई के दौरान निकली प्रतिमा लगभग ढाई फीट ऊंची और चतुर्भुजी प्रतिमा है। साथ ही साथ यह प्रतिमा भी भगवान विष्णु की प्रतिमा की तरह ही स्थानिक मुद्रा में है जिसकी वजह से इसे माता लक्ष्मी की प्रतिमा कहा  जा रहा है। हालांकि प्रतिमा खंडित अवस्था में है।

माता लक्ष्मी की एक प्रतिमा पूर्व में हो चुकी है चोरी

मंदिर समिति के सचिव सह ग्रामीण कवि अरविंद मानव की माने तो 50 साल पहले तालाव में भगवान विष्णु और लक्ष्मी की प्रतिमा गांव वाले देखते थे। इसी दौरान लक्ष्मी की प्रतिमा चोरी कर ली गई और बाद में फिर खुदाई कर भगवान विष्णु की प्रतिमा निकाली गई।

सामस गढ़ में है कई पौराणिक प्रतिमा

सामस में खुदाई के दौरान गांव में कई प्रतिमा निकली है। गांव के जगदंबा स्थान में ऐसे ही कितनी प्रतिमाएं रखी हुई है जिसकी पूजा ग्रामीण करते हैं। जगदंबा स्थान में माता जगदंबा की एक प्राचीन प्रतिमा को लोग कुल देवी के रूप में भी पूजा अर्चना करते हैं।

खुदाई हो तो उजागर होंगे रहस्य

सामस गढ को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर ग्रामीण देखते हैं। ग्रामीणों की अगर मानें तो यहां राजा का किला होने तथा उनके द्वारा मंदिर निर्माण की बात ग्रामीण कहते हैं। जबकि मुगलों के आक्रमण के दौरान इन प्रतिमाओं को खंडित कर तलाव में फेंक दिए जाने की बात भी ग्रामीण कह रहे हैं। ग्रामीणों की अगर मानें तो सरकारी स्तर पर इस गढ़ की खुदाई किए जाने पर यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े कई रहस्यों का पता हो सकता है।

09 मई 2017

मेरा गांव मेरा देश (फोटोग्राफर- अरुण साथी)


बारिश, आसमान , धूल और जीवन

बारिश के बाद आसमान कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। कुछ-कुछ नया जैसा दिखता है। ऐसा लगता है जैसे धूल की एक परत जम गई थी और आसमान धुंधला-धुंधला सा हो गया था पर हल्की सी बारिश ने आसमान पर छाए धूलकणों को साफ कर दिया। पेड़-पौधे नए-नए से लगने लगे। पुरवइया हवा कुछ-कुछ नया सा लग रहा है। जैसे कुछ मादकता इसमें भूल गई हो। पंछियों की चहचहाहट नई सी हो गई है। घरों की दीवारें धुल गई। अजीब सा लग रहा है। यह बारिश जीवन में भी कभी-कभी होनी चाहिए। कुछ-कुछ बदल ही जाए शायद! आसमान पर भी धूलकण छा जाते हैं और आसमान धुंधला धुंधला सा हो जाता है। जीवन का दुख बारिश ही है क्या..जाने यह कैसा चिंतन है जो अभी अभी इस आसमान को देखकर हिलोरे मारने लगा है। जीवन! वैसा जीवन जिसे बड़ी मुश्किल से शून्य से शुरू कर पहले या दूसरे पायदान तक ही ला सका हूँ और अचानक से सांप-सीढ़ी के खेल जैसा सांप आकर फुँफकार रहा है। ललकार रहा है। दुत्कार रहा है...धिक्कार रहा है! धिक्कार! पर नहीं, जीवन जिसने शून्य से शुरू की है उसे पता होता है कि जीवन क्या है! गिरकर उठाना। फिर से चलना। फिर से गिरना, और कुछ है क्या..

शब्द
***
शब्दों में मत बांधो
शब्द तो समुद्र है
शब्द ही तो रूद्र है
शब्द ही तो शुद्र है
शब्द ही तो क्षुद्र है

शब्द ही दरिद्र है
शब्द ही निःशब्द है
शब्द ही शब्द-शब्द है..

06 मई 2017

हंगामा है क्यों बरपा, चूहों ने जो पी ली है!

हंगामा है क्यों बरपा, चूहों ने जो पी ली है!

(अरुण साथी, बरबीघा, बिहार/ व्यंग्य)

अजीब अहमक लोग है। कहाँ तो शास्त्रों और धर्मग्रंथों में आत्मस्वीकृति को सबसे बड़ा धर्म और महानतम कार्य बताया गया है और कहाँ बिहार में शराबबंदी के बाद जप्त किये गए नौ लाख लीटर शराब को चूहों के पीने की आत्मस्वीकृति के बाद बिहार पुलिस की आलोचना हो रही है।  हद है भाई। कन्फेस करने के बाद तो पाप खत्म हो जाता है। इस बात के लिए तो बिहार पुलिस को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। बिहार पुलिस ने तो पहली तथा आखरी बार यह स्वीकार कर लिया कि उसकी प्रजाति क्या है!

खैर, अपुन का क्या जाता है। फिर भी भैया रामखेलाबन बहुत नाराज है। पूछने पे कहता है कि हम लोग भी बहुत खत्म आदमी हैं। पहले तो बिहार पुलिस की तुलना चूहे से करते थे और अब बिहार पुलिस ने यह स्वीकार कर ली है, तब भी लोग गरिया रहें हैं। 

अब कोई इसका अनुसंधान करे तब तो यह बात सामने आएगी कि चूहे दोपाये और वर्दीधारी हैं । भाई जो शराब जप्त हुई है आखिर उसे बर्बाद ही तो करना था। अब यदि दोपाये चूहों ने ही उसे बर्बाद कर दी है तब आपको क्यों आपत्ति हो रही है! बकलोल आदमी।।

हालांकि इसकी जांच एफबीआई से कराने पर ही इस बात का खुलासा हो सकेगा की दोपाये वर्दीधारी चूहों ने इस कारनामों को कैसे अंजाम दिया।
"माले मुफ्त दिले बेरहम" या "मंगनी के चंदन, घस मेरे नंदन"। अब जब थाने का मालखाना ही शराब का गोदाम हो तो भला बताइए कितना बर्दाश्त करेगा कोई। पहले तो सौ कार्टून बरामद की और पच्चास काटून का ही जप्ती सूची बना। आधा गटक नारायण। कौन सा शराब माफिया इसकी शिकायत उच्चाधिकारियों से कराने जाएगा! उस पर भी जप्ती सूची वाले शराब को नीचे से फोड़ कर शराब निकाल लिया और ढक्कन खोल कर आधी शराब निकाली और आधी में पानी भरकर रख दिया। इस तरह के नायाब कारनामों को केवल एफबीआई वाले ही पता लगा सकते हैं। भारतीय जांच एजेंसी की अनुसंधान क्षमता पर शक भला किसको होगा! बच्चा-बच्चा जानता है कि पैसा फेंको तमाशा देखो।

सीआईडी या सीबीआई से जांच कराने पर तो यह रिपोर्ट भी आ सकती है कि चौपाये चूहे ने ही ऐसा कारनामा किया है। रिपोर्ट में यह भी होगा कि जब आदमी चारा खा सकता है तो चूहे शराब क्यों नहीं पी सकते? चूहों को गिरफ्तार कर उसका मेडिकल रिपोर्ट भी बनाया जा सकता है जिसमें यह साबित हो जाएगा कि एक चूहे प्रत्येक दिन कई लीटर शराब पी सकते हैं और शीशे की बोतल फोड़ भी सकते हैं, ढक्कन को खोलकर शराब पीने के बाद ढक्कन लगा भी सकते हैं! भाई चूहे गणेश जी की सवारी है, खेल है का...!

अब देखिए, चूहों की इन प्रजातियों के द्वारा आजादी से अब तक देश का खून पिया जा रहा है तब तो हम हंगामा नहीं करते अब शराब पी है तो हंगामा क्यों बरपा हो रहा है!! भाई शराब है ही पीने के लिए, पी गए!

एक बात यह भी कहना है कि शराबबंदी भले बिहार में हो पर हर गांव और हर गली में बिकने वाली शराब में सबसे बड़ा  योगदान दोपाये चूहों का ही है। अब बिहार के मुखिया भले इस बात को नहीं माने पर शराबबंदी यदि उनको करवानी है तो सबसे पहले दोपाये वर्दीधारी वाले चूहों पर ही अंकुश लगाने की जरूरत है पर ऐसा तो वे करते नहीं हैं फिर भी फाइलों पर शराबबंदी तो चल ही रही है, चलती ही रहेगी! आखिर इंटरनेशनल लेवल पर अपने चेहरे को चमकाने का फेरनलवली तरीका जो यही है...!!! बोल हरि...

04 मई 2017

फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ( व्यंग्य)

फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा
(Twitter @arunsathi)

चाची ऑनलाइन कंपनियों पर बहुत गुस्से में थी। पांच हजार की जींस उनके बेटे ने खरीदी और फटा हुआ जींस भेज दिया। चाची कह रही थी "देखोहो बउआ, की जमाना आ गेलइ, रुपैया नगद लेलकै अउ फटल जींस भेज देलकै!" उधर मेरी बंदरी भी गुस्से में है। कई दिनों से दूध फट जा रहा है। बंदरी कहती है कि जरूर यह दुश्मन का काम है। इधर मेरा भी मोबाइल हैंग करने लगा है। मुझको भी शक है कि यह विरोधियों की साजिश है। और तो और भैय्या रामखेलाबन नाराज है कि जेठ के महीने में इतनी गर्मी क्यों है। ई भगवान भी उम्ताहा है..!

भाई जमाना फैशन का है सो आरोप लगा के गाली देने में क्या जाता है। कुछ प्राणी कमेन्ट के रूप में भुकने ही लगेंगे। गारंटी है। तो फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा पूरी हुई न...!

फैशन का सबसे बड़ा नजारा हम चुनाव में देखते हैं। चुनाव आते ही नोट का खेल वोट के लिए शुरू हो जाता है। लाखों - करोड़ों खर्च करते हैं नेताजी और यह पैसे हम पर ही खर्च होते हैं। चुनाव के दिन पार्टियों के कार्यालय में रुपए लेने के लिए नाराज होते, गुस्सा करते हुए नेताओं-कार्यकर्ताओं और वोटरों को देखा जा सकता है। जिनका जितना कद उनकी उतनी माँग!

नेता जी से हम पैसा ऐसे मांगते हैं जैसे उनको रखने के लिए दिया हो और नेताजी भी पैसा इसी तरह से खर्च करते हैं जैसे "एक लगाओ, लाख पाओ" के लिए खर्च कर रहे हो। एक-एक वोट के हिसाब से हम जोड़कर पैसा लेते हैं। यह फैशन है और बावजूद इसके हम नेता जी की ईमानदारी, जनसेवा, विकास की गारंटी की इच्छा करते हैं, यह भी फैशन है!

चलिए, बात महज नेताओं की क्यों हो गारंटी की इच्छा आजकल इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पर कुछ अधिक ही देखने को मिल रही है। बहुत आसान सा फैशन है, फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा करते हुए लोग मां बहन एक कर रहे हैं और उनकी गारंटी की इच्छा कॉमेंट देने वाले पूरा कर देते हैं वह पॉपुलर भी हो जाते हैं, बहुत आसान सा फंडा है।

फैशन का दौर है, अब हम अपने घर में गौमाता तो रखते नहीं, सड़क पर खुले छोड़ दी गयी भटकती हुई बेचारी और लाचार गाय को एक-दो डंडे भी मार देते हैं। यही आज कल का फैशन है। पर देखिए, हमारी गारंटी की इच्छा। गौरक्षा के नाम पर हम कितने क्रांतिकारी हो जाते हैं। आदमियों को भी मार दे रहे हैं!

और देखिए, भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलने वाले नेताओं को हम सर आंखों पर बिठा लेते हैं! जय जयकार करने लगते हैं! यही फैशन है! और हम गारंटी की इच्छा क्या करते हैं, यही ना कि बॉर्डर पर हमारे सैनिक शहीद ना हो, आतंकवाद के नाम पर हम और आप मारे नहीं जाएं! चरण वंदन आपको महाराज!!

फैशन का दौर है, हम अपने बेटे को बोर्डिंग स्कूल में तब से ही भेज देते हैं जब वह ठीक से पोट्टी करना भी नहीं जानता! कौन जहमत मोल ले। पैदा होते ही इंजीनियर, डॉक्टर देते हैं और गारंटी की इच्छा यह करते हैं कि बड़ा होकर हमारा बेटा आदमी बने, मां-बाप की सेवा करें, सामाजिक बन जाए! चलिए इच्छा करने में क्या जाता है, फैशन का दौर है, बृद्धा आश्रम में ठौर है!!

और देखिए, लड़कियों को छेड़ने वाले,  उचक्के, लफुये, लूटरे-ठग सोशल मीडिया पर तथाकथित अपने-अपने धर्मों के लिए ऐसे-ऐसे पोस्ट देते हैं जैसे वे धार्मिक पुस्तकों के प्रकांड विद्वान हो और तप-तपस्या करके ही दिव्य ज्ञान प्राप्त किए हो! उनके धार्मिक (अधार्मिक) पोस्ट को हम ऐसे शेयर और कमेंट करते हैं जैसे यह दिव्यज्ञान से ही प्राप्त किया गया हो और हमारी गारंटी की इच्छा है कि समाज और देश में आपसी भाईचारा बढ़े, प्रेम बढ़े!! लोग धार्मिक बने!

खैर, फैशन का दौर है गारंटी की इच्छा तो रखनी भी चाहिए। ठीक उसी तरह , जैसे हमने केजरीबवाल से गारंटी की इच्छा रखी थी और उनके जलसे में जय जय करने लगे थे। आलम यह है कि एक-एक कर बिछड़े सभी बारी बारी हो गए और एक मैं ही  सही, सारे लोग भ्रष्टाचारी हो गए। अन्ना तक को गाली देने लग गए!

या यूं कहें कि ठीक वैसे ही जैसे, अच्छे दिन लागे, भ्रष्टाचार मिटाने, एक सर के बदले दस सर काटकर लाने की गारंटी देने वाले का जयकार हम करने लगे थे!
फैशन का दौर है गारंटी की इच्छा करने में क्या जाता है। जैसे बिहार में शराबबंदी के बाद पूरी तरह से शराब नहीं बिकने की गारंटी दी गई थी। या की ठीक वैसे ही जैसे, नोटबंदी के बाद भ्रष्टाचार, काला धन खत्म हो जाने की गारंटी दी गई थी! अब आप देखिए और समझिए कि आपके गारंटी की इच्छा पूर्ण हुई या नहीं! फैसला आपका है, क्योंकि वोट आप देते हैं! मैं कौन होता हूं तीन  में तेरह बनने वाला!!



02 मई 2017

सोशल मीडिया से जुड़े युवाओं ने शुरू की पनशाला व्हाट्सऐप ग्रुप का पॉजिटिव वर्क

सोशल मीडिया से जुड़े युवाओं ने शुरू की पनशाला

व्हाट्सऐप ग्रुप का पॉजिटिव वर्क

दूसरे साल की गई है पनशाला की शुरुआत

बरबीघा (शेखपुरा)

सोशल मीडिया पर बढ़ रहे नकारात्मकता से जहां लोग परेशान हैं वहीं कुछ युवाओं के सकारात्मक प्रयास से सोशल मीडिया का रचनात्मक चेहरा भी सामने आ रहा है। इसी तरह का एक प्रयास सोशल मीडिया ग्रुप "बरबीघा चौपाल" से जुड़े युवाओं ने पेश किया। बरबीघा के युवाओं ने अस्पताल के सामने भीषण गर्मी से परेशान लोगों की प्यास बुझाने के लिए निशुल्क पनशाला की शरुआत की। सोमवार को शुरु की गई इस पनशाला का शुभारंभ समाजसेवी सुदामा प्रसाद ने किया। इस मौके पर ग्रुप से जुड़े युवा पुरुषोत्तम कुमार, रोहित, अमित, बिट्टू, प्रदीप, नागेंद्र, आचार्य गोपाल, मोहन, धर्मवीर इत्यादि ने बताया कि सोशल मीडिया का समाज सेवा के प्रति उपयोग करने का उनके ग्रुप का प्रयास है और पिछले तीन साल से उनका ग्रुप इस तरह का कार्य कर रहा है। अस्पताल के सामने दूसरे साल भी पनशाला खोला गया है जहां प्यासे लोगों को निशुल्क पेयजल उपलब्ध कराई जाती है। साथ ही साथ बिस्कुट और शरबत की भी व्यवस्था होती है। इस अवसर पर समाज सेवी सुदामा प्रसाद ने कहा कि युवाओं का उत्साह समाज के लिए प्रेरणा दाई है और युवक नकारात्मकता छोड़ इसी तरह छोटे-छोटे पहल कर समाज के लिए प्रेरणा बने। मौके पर राजेश कुमार राजू, गौरव कुमार चिंटू, रवि शंकर इत्यादि मौजूद थे।

01 मई 2017

ट्रेन से कटकर मरनेवालों के परिजनों को नहीं मिलेगा मुआवजा, मृतकों की संख्या पहुंची 9

शेखपुरा। जिले के सिरारी स्टेशन के पास मालगाड़ी से कटकर मरने वालों की संख्या 9 हो गई है। जबकि रेलवे का कहना है कि इस मामले में मृतकों के परिजनों को मुआवजा नहीं मिलेगा क्योंकि इसमें रेलवे की कोई लापरवाही नहीं है।

घायल किशोरी राम की बेटी झुना कुमारी (12) की मौत भी देर रात हो गई। उसे गंभीर हालत में शेखपुरा सदर अस्पताल से पीएमसीएच  भेजा गया था। रास्ते मे ही उसने दम तोड़ दिया।
दरअसल किऊल-गया रेलखंड पर सिरारी स्टेशन के पास रविवार की देर शाम एक थ्रू लाइन मालगाड़ी की चपेट में आकर आठ से अधिक लोगों के मौत हो गयी थी। कई लोगों की स्थिति गंभीर बनी हुई थी। तेज़ आंधी - बारिश कारण पूरा अधेरा फ़ैल जाने कारण घटना स्थल पर बचाव दल को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जानकारी के अनुसार रामपुरहाट-गया पैसेंजर ट्रेन से कई यात्री शेखपुरा जिले के सिरारी स्टेशन पर उतरे। स्टेशन पर उतरने के बाद यात्री रेलवे ट्रैक होकर ही अपने-अपने गांव की तरफ जा रहे थे। रामपुर हाट-गया पैसेंजर ट्रेन स्टेशन पर खड़ी ही थी, उधर शेखपुरा की तरफ से आ रही एक मालगाड़ी को थ्रू लाइन से पास करा दिया गया। रेलखंड पर एक पुलिया पर फुटपाथ नहीं है। इस कारण यात्री बीच ट्रैक से गुजर रहे थे। इसी दौरान मालगाड़ी की चपेट में पैदल जा रहे करीब दर्जन भर यात्री आ गए। जिसमे अब तक नौ लोगो की मौत हो गयी है। तथा कई को इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। प्रारंभिक जानकारी में रामगढ़ चौक के महसौड़ा निवासी सुरेश यादव, सिसमा के अर्जुन ठाकुर की बेटी सरोजनी देवी एवं उसकी दस साल की बेटी, भंवरिया के रामोतार यादव की पत्नी आशा देवी एवं बेटा पुरूषोत्तम, इसी गांव के मंगल यादव, सिसमा के हरवल्लभ सिंह की पत्नी मुन्नी देवी, सिसमा के महेश ठाकुर के बेटा की मौत हो चुकी है। तत्पश्च्ताप इलाज के दौरान किशोरी राम की बेटी झुना कुमारी (12) की मौत भी देर रात हो गई। उसे गंभीर हालत में शेखपुरा सदर अस्पताल से पीएमसीएच  भेजा गया था। रास्ते मे ही उसने दम तोड़ दिया। जबकि सरोजनी देवी की एक पुत्री एवं एक पुत्र सहित पांच की संख्या में लोग गंभीर हैं। घटना की सुचना पाकर मौके पर लखीसराय के एसपी अशोक कुमार पुलिस बल के साथ पहुंचे गये थे।
सिरारी स्टेशन प्रबंधक अनिल कुमार ने कहा की यह घटना लापरवाही के कारण घटी है ,यदि रेलवे की गलती होती तो मुआबजा दिया जाता। जिस पूल पर घटना घटी है वो आम रास्ता नहीं था। लेकिन शॉर्टकट के चक्कर में यह हादसा हुआ है। 
घटना के बाद से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। इस घटना में कई अपनों की मौत गम भी लोगो को सता रहा है। मृतक सुरेश यादव के दामाद गुड्डू सिंह ने 28 अप्रैल को उसकी शादी हुई था और तीन दिन बाद यह घटना घटी।

सिरारी ओपी थाना के एएसआई सुरेन्द्र प्रसाद यादव ने बताया की घटना की सुचना मिलते ही तुरंत घटनास्थल पर पहुंचकर राहत कार्य में जुट गये और जिला के आला अधिकारी को सुचना भी दिये।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...