28 अगस्त 2010

चुनाव लोकतन्त्र की सबसे बड़ी ताकत-हरिमोहन मिश्र (दैनिक भाष्कर के दिल्ली संस्करण संपादक )



चुनाव लोकतन्त्र की सबसे बड़ी ताकत है और यह आम आदमी को सत्ता के सिंहासन पर पहूंचाने का काम करती है, यह बात दिगर है कि सत्ता पर काबीज होने के बाद लोग उसका दुरपयोग करते है या उपयोग। उक्त बातें दैनिक भाष्कर के दिल्ली संस्करण संपादक हरिमोहन मिश्रा ने कही। श्री मिश्रा शेखपुरा में लोकतन्त्र और चुनाव विषयक गोष्ठी को संबोधित करते हुए कही। अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री मिश्रा ने कहा कि अमेरिका का लोेकतन्त्र पुंजीवादी लोकतन्त्र है और ओबामा उसका मुखौटा, बबाजूद इसके ओबामा के द्वारा इंस्योरेंस बिल पास करबाना पुंजीबादियों की हार है। उन्होंने कहा कि लोकतन्त्र में चुनाव जनता को सबसे बड़ी ताकत देती है जिसकी वजह से मायावती आज मुख्यमन्त्री बनी हुई है। चुनाव आम आदमी को संवाद का मौका देती है और चौक-चौराहे पर राजनीति की चर्चा होती है। श्री मिश्रा ने साफ कहा कि भारतीय लोकतन्त्र भी पुंजीवाद से प्रभावित है और इसी का परिणाम है कि 60 प्रतिशत सांसद कारोड़पति है जिन्हें यह बात पता है कि सत्ता पैसा पैदा करती है और वह पैसा उनकी जेब में जाता है। इसी का नजीता है कि  आपराधियों का एक बड़ा वर्ग राजनीति की शरण में आकर पैसा बना रहा है। अपने संबोधन में श्री मिश्रा ने कहा कि राजीतिज्ञों में वैचारिक रूप से एका है और सांसदों के वेतन के मामले मेंं सभी ने इसे सही ठहरा दिया। आज देश के पास पर्यावरण सहित अन्य महत्वपूर्ण मुददों पर कठोर कदम उठाने वाले राजनेता नहीं है। गोष्ठी को संबोधित करते हुए भाकपा के प्रदेश सचिव जितेन्द्र नाथ ने कहा कि पुंजीवादी लोकतन्त्र को मारना चाहता है और यह संधर्ष सालों से चलता आ रहा है। इस सन्दर्भ में उन्होनें भगवान बुद्ध को उदृत करते हुए कहा कि जब वैष्णववाद के खिलाफ बुद्ध ने हुंकार भरी तो इसी ताकत के बल पर चार पीठ बना कर बुद्ध को भी विष्णु का अवतार धोषित कर दिया गया। जितेन्द्र नाथ ने कहा कि आज आठ लाख इंजिनियर प्रति वर्ष पैदा हो रहा है और दस साल के बाद इंजिनियर तेल बेचने का काम करेगें और इसका उदाहरण बिहार सरकार की नियोजन नीति है। गोष्ठी में बोलते हुए आर. डी. कॉजेल के प्राचार्य  भगवती शरण सिंह ने उदारीकरण को विकास का प्रर्याय बताते हुए कहा कि आर्थिक उदारीकरण से ही आज देश का विकास हुआ है और बेरोजगारी की समस्य घटी है तथा युवा एमबीए कर विदेश में नौकरी कर रहें है। गोष्ठी में पत्रकार संजय मेहता, निरंजन कुमार, अरविन्द कुमार, रंजीत कुमार, मनोज कुमार मन्नू, दीपक कुमार, संजीत तिवारी सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।

27 अगस्त 2010

गुहार.......नीतीश जी पुलिसिया जुल्म को रोकिए... बेशकीमती जमीन पर कब्जा करने के लिए पैसे लेकर महिला की पिटाई और उल्टा मुकदमा कर गिरफ्तार किया। आज रात में बनाया जाएगा जमीन से दाबा छोड़ने का दबाब।



बरबीघा पुलिस की पुलिसीया जुल्म एक बार फिर से सामने आई है। पुलिसीया जुल्म से आहत महिला चित्कार कर कहती है ``बचाहो सरकार पुलिसवा पैसा खा कर जुल्म कर रहलै है। मरियो खैलिऐ और अब जेलो जैबै।´´ यह कहना है शान्ति देवी का। एक जमीन के मामले में पुलिस पर लोगों के द्वारा पैसा लेकर मदद करने का आरोप लगाया जा रहा है और पुलिस की कार्यवाही भी इस बात की पुष्टी करती है। बरबीधा के सामाचक त्रिमुहानी स्थित पुस्तैनी जमीन को शान्ति देवी के द्वारा अपना पैत्रिक जमीन बताया जा रहा है जबकि आनन्द मोहन नामक व्यावसाई कें द्वारा इसे खरीदे जाने का दाबा किया जा रहा है। इस मामले को लेकर पिछले तीन दिनों से तनाव बना हुआ है और पुलिस आनन्द मोहन की तरफ से जमीन पर दाबा दिलवाने के लिए हरसम्भव प्रयास कर रही है पर महिलाओं के दबाब की वजह से वह सफल नहीं हो पा रही है। आन्तत: आज जब फिर आनन्द मोहन के द्वारा विवादित जमीन पर दाबा दिया जाने लगा तो शान्ति देवी सहित कई महिलाऐं दावा देने से मना करती हुई दाबें में लेट गई। घटना की सूचना के बाद पुलिस घटना स्थल पर पहूंची पर पुलिस ने आनन्द मोहन का साथ लेती हुई महिलाओं को पिटने की बात कही और फिर क्या था आनन्द मोहन एवं उनके समर्थक छोटे स्वर्णकार, नगेन्द्र स्वर्णकार सहित अन्य लोगों ने महिलाओं को पुलिस के सामने पिटना शुरू कर दिया। इस घटना के बाद मां को पिटता देख जब महेश नामक युवक जब बचाने गया तो उसे भी पीटा गया। मामले में महिला शान्ति देवी धायल हो गई पर पुलिस ने महेश कुमार एवं शान्ति देवी को गिरफ्तार कर लिया और मारने वाला आराम से थाने में धूमता रहा है। पिड़ित लोगों की माने तो पुलिस उन पर जमीन पर से दाबा छोड़ देने का दबाब बना रही है।


मामले को लेकर विस्तृत जानकारी के अनुसार यह जमीन  राधा स्वामी नामक धार्मिक संगठन की बरबीघा शाखा की संचालिका एवं पेशे से शिक्षिका का है और आज से 35 साल पहले का कागजात आनन्द मोहन के द्वारा पेश कर बेशकीमती जमीन पर अपना दाबा ठोका जा रहा है पुलिस की मदद से उस पर कब्जा करना चाहता है।


मामले के सम्बंध में थानाध्यक्ष की माने तो महिला शान्ति देवी एवं महेश कुमार के द्वारा पुलिस पर हमला किया गया और इसको लेकर प्राथमिकी दर्ज करायी गई है इसलिए हिरासत में लिया गया है। 

डायन बता कर 70 साल की विधवा को सलाखों से दागा, तड़ीपार करने का पंचायत का फैसला।

अंधविश्वास आज भी गांव कें लोगों को अपने चंगुल में ले रखा है और इसकी भयावहता महिलाओं को प्रताड़ित कर सामने आती है। ऐसा ही एक मामला जिले के अरियरी थाना क्षेत्र के टाण्डापर गांव में सामने आया जहां महज एक भैंस के दूध नहीं लगने के आरोप में डायन बता कर 70 साल की विधवा महिला कपिला देवी को धर से खींच कर लाया गया और लोहे के सालाखों को गर्म कर उसे दागा गया। बेहरहम लोगों ने महिला का हाथ, पांव और पेट दाग दिया और उसे ज़िन्दा जलाने की धमकी भी दी। महिला के साथ इतनी बेरहमी की गई है की मारपीट में महिला कां दान्त टूट गया और वे सहमी हुई रह रही है। इतना ही नहीं गांव के तुगलकी पंचायत ने सामुहिक रूप से आवेदन लिख कर थानेदार को दिया जिसमें साफ साफ लिखा है कि महिला डायन है और इसे गांव में रहने नहीं दिया जाएगा। बेरहम लोगों ने न सिर्फ महिला के साथ मारपीट की बल्कि उसकी बेटी, बहू एवं दामाद महेन्द्र चौहान के साथ भी मारपीट की गई। गांव के लोग एक जुट होेकर महिला को तड़ीपार करने की योजना बना रहें है। गांव कें लोगों के द्वारा महिला को डायन बताने की खबर पर जब महेन्द्र चौहान इसकी सूचना स्थानीय थाना को दी तब भी थानेदार की संवेदना नहीं जगी और सूचना के बाद महिला को घर से पकड़ कर सलाखों से दाग दिया गया। मामले में पुलिस को भी आदमी पिड़िता की सहायता कें लिए नहीं गया है और पुलिस कें आलाधिकारी चुनावी बैठक में मशगुल रहे। 

26 अगस्त 2010

देश की राजनीति में बिचौलिया संस्कृति कायम - पत्रकार अनिल चमड़िया।





 माने पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि देश की राजनीति में दलाली और बिचौलिया संस्कृति कायम है, यह धंधा बन्द होना चाहिए। इसके लिए लोगों को जागरूक होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में देश की 75 प्रतिशत आबादी रोज 20 रूपये की आमदनी पर अपना जीवन-यापन कर रही है। गरीबों के लिए सरकार ने मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी तय करती है। जबकि उधोगपतियों के उत्पाद पर अधिकतम मूल्य अंकित होता है। यह टाउन हॉल में सीपीआई द्वारा आयोेजित दलित-महादलित अधिकार सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। सम्मेलन की अध्यक्षता सीताराम मांझी सुरेन्द्र दास तथा कृष्णनन्दन पासवान की तीन सदस्यीय अध्यक्ष मण्डली ने की। सम्मलेन को संबोधित करते हुए अनिल चमडिया ने कहा कि देश की आजादी के 64 वर्ष बाद भी दलितों तथा आम गरीबों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाया है। उन्होने कहा सकि मुठ्ठीभर लोग जहां दिन दूना तर क्की कर रहे हैं । वहीं दलितों एवं गरीबों के जीवन स्तर में कोई व्यापक बदलाव नहीं आ पाता सहै। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार और यह व्यवस्था दोषी है। चमड़िया ने वंचित समाज के बीच से लीडर पैदा सकरने का आह्वान किया ताकि सरकार की योजनाऐं और यह व्यवस्था दोशी है।चमड़िया ने बंचित समाज के बीच से लीडर पैदा करने का आहवान किया ताकि सरकार की योजनाओं लाभ निचले लोगों को मिल सके। सम्मेलन में सीपी आई के राज्य मण्डल के सदस्य जितेनद्र नाथ, महादेव मांझी, विपिन चौरसिया, सुरेन्द्र दास, कृसणनन्दन पासान, सीताराम मांझी सहित अन्य वक्ताओं ने संबोधित किया।

23 अगस्त 2010

पत्रकारों के आत्मदाह के लिए उकसाने से हुए युवक की मौत का जिम्मेवार कौन................



यह कोई आम खबर नहीं है। मीडिया के लोगों ने खबर के लिए आत्महत्या के लिए उकसाया, उसे वह बचाने नहीं गया और युवक की मौत हो गई । अखबरों नें न्यूज चैनल को नीचा दिखाने के लिए तो मिडिया को कोसने वाले पोर्टलों पर टिप्पणी बटोरने के लिए खबर दे मारी गई है। एक तो यह बात हजम होने वाली नहीं कि मीडिया वालों ने उसे आत्मदाह के लिए उकसाया और बचाने की कोशिश नहीं की, दूसरी यह की यादि ऐसा हुआ तो पुलिस क्या कर रही थी जिसके सामने यह हो रहा था और जिसकी वजह से हो रहा था। और इस घटना के पीछे मीडिया के महारथियों को भी अपने दामन पर खून के छींटे तलाशने होगें।



बात महज एक खबर भर की नहीं है बात उससे आगे की है। मैं मीडिया का पक्ष लेकर यह नहीं कहना चाहता कि यहां सब कुछ अच्छा-अच्छा है। गुजरात के उंझा पुलिस स्टेशन में धटी घटना जिसमें पुलिस जुल्म के खिलाफ कपलेश मिस्त्री ने आत्मदाह कर लिया और उसकी मौत हो गई। इस घटना का आरोप टीबी 9 के पत्रकार कमलेश रावल और स्थानीय चैनल रिपोर्टर मयुर रावल पर आया। आरोप है कि पत्रकारों ने आत्महत्या के लिए उकसाया और बचाने का प्रयास नहीं किया। इस मामले में बहुत सी बातें हैं जिसकी जांच होनी चाहिए। पत्रकारों पर पुलिसबाले वैसे भी खार खाये रहते है और जब वह चंगुल में फंसता है तो वे कोई कोर कसर नहीं रखना  चाहते। इस मामले में चाय दुकानदार की गवाही है जो की पुलिस से प्रभावित हो सकती है। दूसरी बात मोइबाल पर बातचीत है जो कि आत्मदाह करने वाला कोई भी पुलिस पर दबाब के लिए पत्रकार के साथ करेगा। 

इस घटना से कई बात एक साथ सामने आती है। एक तो यह कि समाचार के लिए पत्रकार इस हद तक जा सकते है कि किसी की मौत हो सकती है कल्पना कर ही कलेजा कांप जाता है। दूसरी यह कि अंधाधुंध मीडिया में हो रही पत्रकारों की फैज भर्ती प्रक्रिया में आज जो लोग आ रहें है उनसे इसी तरह की उम्मीद की जा सकती हैंं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि पुलिस के द्वारा पत्रकारों को फंसाने के लिए यह एक प्रायोजित प्रक्रिया भी हो सकती है। बहरहाल यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएगा पर अभी जो बात सामने है और वही सच है तब भी इस हत्या का आरोपी महज वह पत्रकार नहीं हो सकते जिन्होंने ऐसा किया है बल्कि वे सभी लोग इसमें शामिल है जो टीआरपी के दौर में रेस लगा रहें हैं और खबरों के लिए पागल हो रहे है। वे लोग भी इसके गुनाहगार है जो पत्रकारों की नियुक्ति में मापदण्ड को दरकिनार कर महज विज्ञापन देने वाले और सनसनी खेज खबर देने बाले चिरकुट को पत्रकार बना रहें है। कोई मापदण्ड नहीं कोई पैमाना नहीं। मैं यह खीज कर नहीं कह रहा हूं बल्कि ऐसा होता देख रहा हूं । आप सब मिडिया से जुड़े बंधू इससे बाकिफ हैं।

 कल तक लफुआ की श्रेणी मे आते थे आज पत्रकार कहलाते है। कोई अब्बल दर्जे का फ्राड है तो कोई चैनल में काम करने से पहले पॉकेटमारी का काम करता था और आज चौथेखंभे का दंभ भरता है। वानगी देखिए- ताजा ताजा नम्बर 1 कहलाने वाले अखबार के रिर्पोटर बने एक परिचित का मुझसे इस बात के लिए बार बार आग्राह किया जाता था कि उन्हें भी पत्रकार बना दिया जाए पर उनके बारे में मैं जानता था और कई अवसर आने के बाद भी मैंने उनके लिए पहल नहीं की पर आज वे पत्रकार है और इसके लिए उन्हें एक बड़ी सी पार्टी देनी पड़ी जिसमें सभी ने छक कर शराब पी। दूसरे एक मित्र के अखबार में शिकायत जाने के बाद उसकी जांच के लिए रांची से जांच दल आई और जांच दल के ठहराने के लिए होटल का कमरा, जांच के लिए जाने के लिए एसी गाड़ी से लेकर भोजन तक की व्यवस्था आरोपी के द्वारा की गई और जिसने शिकायत की थी उनके यहां पत्रकार के साथ जांच दल के सदस्य गए और पूछा, वैसे तो मुझे अपने रिपोर्टर पर भरोसा है पर फिर भी आप से इसकी पुष्टी के लिए आये है। एक भोजपुुरिया न्यूूज चैनल के रिर्पोटर समाचार संकलन के बाद लौटते ही सुनाते है साला एक हजारा ही दिया बहुत कंजूस है चलिए बोहनी हो गया। क्या क्या कहें सब लोग सब कुछ जानते है तब दोषी कौन और निर्दोष कौन।

बस दूसरे की तरफ उंगली उठाकर हम खुद को बेगुनाह साबित करते रहें और लोकतन्त्र का चौथा खंभा शर्मशार होता रहे। जय हो.............................







क्या होगा, ऐसे लोग क्या करेगे। जहां नैतिकता नहीं, संवेदना नहीं और आत्मसम्मान नहीं वहां पत्रकारिता कहां बचेगी। तब बचेगा सिर्फ दूसरे को कोसने की वजह और अपने गिरेवां में नहीं झांकने का सुनहला तर्क जिसके सहारे हम बेगुनाह होगें और सामने वाला गुनहगार।

21 अगस्त 2010

भोपाल मामले पर भारत को अमरीका की चेतावनी -बीबीसी की खबर-

एक वरिष्ठ अमरीकी अधिकारी ने कथित रूप से एक पत्र लिखकर भारत से कहा है कि भोपाल गैस मामले में और हर्जाना वसूल करने के लिए अमरीकी कंपनी डाओ केमिकल्स पर दबाव डालने से निवेश का माहौल ख़राब हो सकता है.
टेलीविज़न चैनल टाईम्स नाउ का कहना है कि उनके हाथ एक ई-मेल लगी है जो अमरीका के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार फ्रोमन माइकल ने भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को लिखी है.
उन्होंने लिखा है, “डाओ केमिकल्स के मामले पर बहुत शोर सुन रहे हैं. मुझे इस मामले की बहुत ज़्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन बेहतर होगा कि हम ऐसी बातों से बचें जिसका निवेश के माहौल पर ख़राब असर पड़े.”
स्पष्ट है कि निवेश से उनका इशारा भारत में अमरीकी निवेश की ओर है.
डाओ केमिकल्स के मामले पर बहुत शोर सुन रहे हैं. मुझे इस मामले की बहुत ज़्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन बेहतर होगा कि हम ऐसी बातों से बचें जिसका निवेश के माहौल पर ख़राब असर पड़े
अमरीकी अधिकारी
विश्लेषक इस ईमेल को अमरीका की ओर से एक चेतावनी की तौर पर देख रहे हैं.
उनकी ये ईमेल मोंटेक सिंह अहलूवालिया के ईमेल के जवाब में आई है जिसमें उन्होंने फ्रोमन माइकल से विश्व बैंक से रियायती दर पर मदद जारी रखने के लिए अमरीकी मदद की गुज़ारिश की है.
जब मोंटेक सिंह अहलूवालिया से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो अमरीका के साथ ऐसे किसी मामले से जुड़े नहीं हैं जो अदालत में है (भोपाल गैस का मामला).
साथ ही उनका कहना था, “मैं इन दोनों ई-मेल के बीच कोई संबंध नहीं देखता हूं (यानि डाओ केमिकल्स और विश्व बैंक से रियायत के मामले में).”
डाओ केमिकल्स की भूमिका पर भारत सरकार कह चुकी है कि वो मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार कर रही है.
अदालत को ये तय करना है कि जवाबदेही किसकी बनती है—यूनियन कार्बाइड, डाओ या एवरेडी की.
गृहमंत्री पी चिदंबरम का कहना था, “एक बार ये तय हो जाए फिर हम किसी को भी नहीं छोड़ेंगे.”

दबाव की भाषा 

वाशिंगटन से विदेश मामलों की जानकार पत्रकार सीमा सिरोही का कहना है कि इस तरह की भाषा अक्सर दबाव डालने के लिए इस्तेमाल की जाती है.
उनका कहना था कि जब 1984 में भोपाल गैस त्रासदी हुई थी उस वक्त भी जॉर्ज बुश सीनियर ने भारत से कहा था कि मामले को ज़्यादा तूल नहीं दें क्योंकि इससे निवेश पर असर पड़ेगा.
ग़ौरतलब है कि हाल में ही ब्रिटिश पेट्रोलियम के तेल कुंओं से रिसाव के बाद अमरीका ने बिना किसी क़ानूनी मुकदमे के ही उनसे भारी हर्जाना वसूला है.
नवंबर में राष्ट्रपति ओबामा भी भारत के दौरे पर आ रहे हैं और माना जा रहा है कि यदि ये मामला बढ़ा तो दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ सकता है.

    नरेन्द्र मोदी को बिहार अवश्य आना चाहिए......

    नरेन्द्र मोदी के लिए सबसे पहले टुडे ग्रुप के संपादक प्रभु चावल की टिप्पणी को उदिृत करना चाहूंगा जिसके अनुसार नरेन्द्र मोदी से सभी नफरत करते है सिबाय जनता के। इण्डिया टुडे के हालिया सर्वे में मोदी के देश के नंबर 1 मुख्यमन्त्री है। अब बिहार में होने बाले चुनाव में अभी सबसे बड़ा मुददा यही है कि नरेन्द्र मोदी और बरूण गांधी को बिहार आना चाहिए या नहीं। मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी को बिहार अवश्य आना चाहिए, खास कर मोदी का बिहार दौरा देश की भावी राजनीति को तय करेगा।

    आज देश की राजनीति जिस करबट ले रही है बैसे समय में एक बार फिर बिहार देश को राजनीतिक दिशा दे सकता है। आज देश के लिए सबसे प्राणधातक पहल मुस्लिम तुस्टीकरण के नाम पर आतंकबादियों का तुष्टीकरण है। आने वाले दिनों में वोट की यह राजनीति देश को डुबोएगी। मेरा मानना है कि देश की राजनीति आज जहां खड़ी है वहां आतंकबाद से भी बड़ मुददा आतंकबाद के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के साथ साथ हिन्दू आतंकबाद जैसे शब्द को प्रयोजित करना है। अब जबकि सीबीआई ने मोदी को िक्लन चिट दे दी है तब नीतिश कुमार को भी एक मौका मिला है और वह भी तुष्टीकरण की इस नीति का परित्याग कर आगे बढ़े। धर्मनिरेपक्षता के आड़ में दोहरी नीति चलाने बाले राजनीतिज्ञों के दो चेहरे सामने आना ही चाहिए। जब बिहार में जामा मिस्जद के इमाम बुखारी बिहार में चुनावी गुहार लगा सकते है तब नरेन्द्र मोदी और बरूण गांधी क्यों नहीं। भाजपा को आगे आकर सत्ता की छोटी सी चाह को दरकिनार कर देश के भविष्य की सोचनी चाहिए।






    17 अगस्त 2010

    सोल ऑफ काशी-पेंटिग्स में किया जिले का नाम रौशन अंनत ने



    शेखपुरा जिले के हथियावॉं गॉव निवासी युवक अनन्त कुमार ने पेटिंZस विद्या मे महारत हासिल कर अपना नाम पूरे देश में रौशन कर रखा है। 11 मार्च 1982 को जन्में अंन्त कुमार की पेटिंग्स की प्रदशनी दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में 14 अगस्त से 19 अगस्त तक लगायी गई है। जिसका शीर्षक है सोल ऑफ काशी। भगवान शिव के विभिन्न रूपों को अंनन्त कुमार ने अपनी पेंटिग्स के माध्यम से जीवन्त बनाया है। बर्ष 2004 से विभिन्न शहरों के डेढ दर्जन स्थानों पर वे अपनी पेटिंग्स प्रर्दशनी लगा चुके है। इनमें बर्ष 2004 में वी एच यू वाराणसी के कला संकाय के स्केचिंग एक्जीविशन, बोकारे स्टील सिटी आर्ट एक्जीविशन इलाहाबाद के कला मेला में बर्ष 2006 में अपनी प्रतिभा दिखाने के बाद फिर मुड़कर पीछे नहीं देखा। इनकी प्रतिभा को देखते हुए बर्ष 2004 में वोकारो स्टील सीटी आर्ट एक्जीविशन, 2004से 2007 वॉ एच यू वाराणसी के स्केचिंग कम्पीटिशन में विजूएल संकाय से अर्वाड मिलने के साथ ही बर्ष 2008 में इमेज आक वीमेन का प्रथम पूरस्कार से सम्मारित हो चुके है। अनन्त कुमार ने पेटिंग्स विद्या में वीएचयू वाराणसी शिक्षा भी हासिल की है।

    मृत जानवर नहीं फेंकने पर महादलित परिवार का हुक्का पानी बन्द। पंचायत बुला का लिया फैसला। मृत जानवर को महादलित के घर में फेंका।



    दलितों के उत्थान के लिए सरकार के सारे दाबों की पोल खोल रही है जिले के चान्दी गांव में घटी घटना। कसार थाना के चान्दी गांव गवाह है सामन्तवाद और दलितों के उत्पीड़न की। यह सामन्तवाद ही है कि चान्दी गांव के दलित समुदाय के लोगों ने जब मृत जानवर को उठाने से मना कर दिया तो सामन्तों ने मृत जानवर को न सिर्फ दलित के घर के आगे फेंक दिया बल्कि पंचायत बुला कर दलित समुदाय का हुक्का पानी बन्द कर दिया। मृत जानवरों को ठिकाने लगाने वाले जाति विषेश के साथ ऐसा किया गया तो गांव में तनाव फैल गई और इसका विरोध किया जाने लगा। पुलिस को जब तक इस घटना की भनक लगती जब तक एक जाति के लोगों को अपमान और जिल्लत झेलनी पड़ी तथा उसे उत्पीड़न का दंश झेन पड़ा।
    घटना की बुनियाद उस समय पड़ी जब परंपरागत रूप से इस काम को करने वालों के द्वारा बैठक कर इस काम को करने से इंकार करने का निर्णय लिया। अपने इस निर्णय को लागू किए जाने की सूचना भी गांव के लोगों को दे दिया गया। दलितों का यह फैसला सामन्तों को नागवार लगी और फिर गांव में मरे दो गायों को फेंकने का दबाब महादलित परिवारों पर बनाया जाने लगा। जब लोगों ने सामन्तो की बात नहीं मानी तो पंाचायत बुला कर महादलित परिवारों का हुक्का पानी बन्द करने का तुगलकी फैसला सुनाया जिसके अनुसार गांव के किसी भी लोगों के द्वारा इस जाति के लोगों को रोजगार नहीं दिया जाएगा। इस जाति कें लोगों को ईलाज नहीं किया जाएगा। सार्वजनिक चापकल तथा कुंआ से पानी लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा खेतों में गुजरने एवं मवेशी ले जाने से भी रोक लगा दी गई। इस घटना के बाद पप्पु रविदास के साथ मारपीट की गई तथा अमानवियता का परिचय देते हुए लोगों ने मरा हुआ जानवर अनिल रविदास के घर में फेंक दिया। इस घटना की सूचना जब अनिल रविदास के  द्वारा दी गई तो पुलिस ने पहले तो आना काना की और जब गांव में तनाव फैला तो आनन फाानन में पुलिस ने सात लोगों को नामजद अभियुक्त बना कर प्राथमिकी दर्ज की तथा गांव में पुलिस कैंप करते हुए दोनों पक्षो को समझाने का काम कर रही है।

    .सूखे के गम को भुलाने का गालीब ख्याल अच्छा है.

    सुखाड है तो क्या हुआ... शराब है ना. झमाझम बारिस में जहां किसान खेतों में देने उर्वरक ले जाते... वहीं सूखे ने इसपर पानी फ़ेर दिया है... पर हाय रे नीतीश कुमार की सरकार .....उर्वरक की जगह बरसात में बोरे में भर कर शराब जा रही...........सूखे के गम को भुलाने का गालीब ख्याल अच्छा है. के गम को भुलाने का गालीब ख्याल अच्छा है.................जय हो..... सुशासन की........

    सूखे के गम को भुलाने का गालीब ख्याल अच्छा है.

    सुखाड है तो क्या हुआ... शराब है ना. झमाझम बारिस में जहां किसान खेतों में देने उर्वरक ले जाते... वहीं सूखे ने इसपर पानी फ़ेर दिया है... पर हाय रे नीतीश कुमार की सरकार .....उर्वरक की जगह बरसात में बोरे में भर कर शराब जा रही...........सूखे के गम को भुलाने का गालीब ख्याल अच्छा है.................जय हो..... सुशासन की........

    16 अगस्त 2010

    कर्नाटक में बंधक बनाए गए मजदूरों को छुड़ाने की अपील की।

    कार्नाटक के धाड़बाड जिले में गुजरात  की कंपनी एन आर ई के लिमिटेड में कार्यरत 7 मजदूरों को झूइे मुकदमें में फंसाकर जेल भेजे जाने  पर यहां पीडित मजदूरों के परिजनों ने सोमवार को समाहराालय पहूंच कर डीए से छड़बाने की गूहार लगायी। पीड़ित परिवार के लोगों ने जिलाधिकारी से मुलाकात कर कहा कि अपनी मजदूरी मांगने पर उन लोगों झूटे मुकदमों फंसा कर जेल भेज दिया गया और किसी तरह से बचे हुए मजदूर अपने परिजनों को इसकी सूचना दे रहें है। गुहार करने आई महिलाओं ने रोते हुए बताया कि उनके परिजनो के साथ मार पीट भी की जा रही है तथा कभी बंधक बना कर कई दिनों तक गुप्त स्थान पर रखा जाता है। झूठे मुकदमें में फसाने की बात तब सामने आई जब मार्च माह में कंपनी के साथ हुए एग्रीमेंट के बाद मजदूर अपना हक मांगने गए तथा एकाएकी मजदूरों पर मुकदमा किया जा रहा है और उन्हें जेल भेजा जा रहा है। जेल जाने वालों में भूपेन्द्र राम मुरारपुर, दीलीप राम सहरा, कपिल राम बेलौनी, अशोक राम इसुआ, रामाश्रय राम पुरैना, इन्द्रदेव राम सरौरा तथा रामबालक राम मिसिंया का नाम सामिल है।  इस संबध्ंा में जिलाधिकारी ने बताया कि मजदूरों को सुविधाजनक तरीके से बिहार लाने की पहल की जा रही है और मामले मे सरकार की ओर से कोशिश हो रही है।

    09 अगस्त 2010

    पानी को लेकर दो गांवों कें बीच मारपीट, एक दर्जन जख्मी, पांच लोगों को बंधक बना कर पिटाई।



    पानी के लिए युद्व की बात सुनी जाती थी पर पानी के लिए आज युद्व जैसा माहौल देखने को मिला और कल तक एक दूसरे के साथ रहने वाले लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। बरबीघा थाना के मालदह और सर्वा गांव के लोग पानी के लिए आपस में लड़ बैठे और मामला इतना संवेदनशील हो गया कि सर्वा गांव के लोगों ने मालहद गांव के दो तथा मालदह गांव के लोगों ने सर्वा के तीन लोगों को बंधक बना कर जमकर पिटाई की तथा इस मामले में गोलीबारी किए जाने की भी अपुष्ट खबर बताई जाती है। घटना मालदह गांव के एक मात्र तलाब में पानी होने को लेकर घटी। बताया जाता है कि मालदह गांव ही सर्वा कें लोग जानवरों को पानी पिलाने तथा नहलाने के लिए लाते थे जिसका विरोध मालदह गांव के लोगों ने यह कहते हुए करना प्रारंभ कर दिया कि एक मात्र तलाब में पानी है और यह भी सूख जाएगा तो क्या करेगें। उधर सर्वा के लोगों के सामने में भी विकट समस्या यह थी कि भैंस को पानी पिलाना और उसे नहलाना आवश्यक है पर गांव के किसी भी तलाब में पानी नहीं है और मजबूरन लोग मालदह गांव ही जाकर जानवर को पानी पिलाते है और इसकी वजह से दोनों गांव के बीच मारपीट हो गई जिसमें एक दर्जन से अधिक लोगों जख्मी हो गए। 


    जख्मी लोगों का इलाज बरबीघा रेफरल अस्पताल में किया जा रहा है। मामले को शान्त कराने में सर्वा कें बिनोद कुमार, मालदह के गोपाल कुमार एवं चुनचुन मुखीया लगे रहे।
    मामले को लेकर देर शाम तक हंगामा होता रहा और पुलिस को मामला सुलझाने में काफी परेशानी उठानी पड़ी। मामले में जहां सर्वा कें लोगों ने मालदह के कारू सिंह एवं गोपाल कुमार को बंधक बना लिया वहीं मालदह के लोेगों ने जितेन्द्र कुमार, गिरधारी कुमार एवं भांसो यादव को बंधक बना कर बुरी तरह पिटाई कर दी। बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद मामले को शान्त कराया गया। बाद में सर्वा कें लोगों ने दोनों बंधक को छोड़ दिया मगर मालदह गांव कें अमरकान्त सिंह जैसे ही गांव वालों कें कब्जे से तीन की जगह दो बंधक को ही मोटरसाईकिल पर बैठा कर लाए लोगों का गुस्सा उनके उपर फूट पड़ा और उनकी पिटाई करने लगे पर थानाध्यक्ष ने मामले का सम्भाला। बाद लापता भांसो यादव के मिलने के बाद मामले को सम्भाला गया। हलांकि मालदह गांव कें लोगों ने बताया कि सर्वा के लोगों के द्वारा बराबर राहगीरो के साथ मारपीट की जाती है पर मालदह का रास्ता होने की वजह से लोग चुप रह जाते है।

    05 अगस्त 2010

    माओवाद पर सरकार और मिडिया दोनों गम्भीर नहीं....

    स्वामी अग्निवेश की इस स्वीकारोक्ती के बाद कि ` सरकार ने उनके साथ धोखा किया ´ माओवाद पर सरकार की गम्भीरता दशाZती है और इस खबर पर मिडिया की चुप्पी उसकी गम्भीरता पर प्रश्नचिन्ह लगाते है। एक तरफ जहां माओवादी पूरे देश को लाल कोरीडोर में तब्दील करने के लिए लाल सलाम का नारा बुलन्द कर रहें है तो दूसरी तरफ  माओवादी नेता आजाद और पत्रकार हेमचन्द्र की वैसे समय में एनकांउटर जब स्वामी अग्निवेश की अगुआई में शान्ति वार्ता की पहल हो रही थी कई सवाल खड़े कर रहें है। पहला सवाल तो सरकार की गम्भीरता पर ही उठ रहें हैं। माओवाद और माओवादी जिस बुनियाद पर लाल फसल बोते और काटते है यह उसी बुनियाद को मजबूत करने वाला कदम है। केन्द्र सरकार में बैठे गृहमन्त्री चिदंबरम की घुरकी को माओवादी भी समझ गए और सेना भी। 
    एक बात से तो कई सहमत है कि हथियार के बल पर माओवाद का सफाया नहीं किया जा सकता क्योंकि माओवादियों का चाहे जितना भी पतन हुआ हो और दिल्ली में बैठे विश्लेषक चाहे जो विश्लेषण करे पर सच्चाई यही है कि माओवादी बैंपायर की तरह अपनी संख्या को बढ़ाते जा रहें है और इसकी सबसे बड़ी बजह अशिक्षा, जागरूकता का अभाव और गरीबी है। सरकार की योजनाऐं आज भी ढोल का पोल बनी हुई है। 

    माओवाद ठीक उस बुखार के मरीज की तरह है जो किसी बिमारी की सूचना है न की स्वंय एक बिमारी और बुखार के मरीज को यदि बर्फ से नहला कर ठंढ़ा कर दिया जाए तो वह मर जाएगा, ठीक नहीं होगा। हमारी सरकार और हमारे विश्लेषक भी यही करने पर तुले है और उनके साथ खड़ी है हमारी मिडिया।
    मिडिया हाउस में काम करने के अनुभव से यह कह सकता हूं कि कहीं भी हुए नक्सली हमले पर चैनल चिल्लाने लगते है और अखबारों का पन्ना भी लाल हो जातें है। रिपोर्टरों को पहले से ही हिदायत रहती है कि कुछ भी हो नक्सली घटना का कवरेज छूटना नहीं चाहिए। परिणामत: समाचार की आपाधापी में गम्भीर नक्सली समस्या पर उथली खबर चल कर खत्म हो जाती है और इस सब में दबकर रह जाती है नक्सलियों की आवाज। मैं यहां साफ कर दूं कि नक्सली से मेरा मतलब उन नक्सली नेताओं से नहीं जिनका मकसद माओवाद से भटक कर पूंजीवाद की ओर चला गया है। मेरा मतलब उस आदमी से है जो किसी न किसी मजबूरी में या फिर बहकाबे में हथियार उठा कर अपने ही देश का लहू बहा रहा है।

     सवाल है कि हमारे मिडिया के पण्डित आखिर क्यों नहीं स्वामी अग्निवेश के सवाल का जबाब तलाशते है। क्यों नहीं राहुल महाजन की जगह नक्सली बने भूखे आदमी के दर्द को जगह मिलती है। सवाल यह भी है कि आखिर क्यों मिडिया नक्सलवाद पर पुलिस और सरकार की हां में हां मिलती है और अपनी तहकीकात को खत्म कर देती है। सवाल यह भी है कि नक्सलबाद पर सरकार और समाज के पैरोकार गम्भीर नहीं हुए तब जबाब नक्सलवादी दे ही रहें है और देते रहेगें................

    रातो रात अरबपति हुआ बासुदेव

    रातों-रात अरबपति हुआ बासुदेव यादव शेखपुरा (अरुण साथी) जी हां शेखपुरा जिले के घाटकुसुंबा निवासी वासुदेव यादव रातों-रात अरबपति हो गया। यह को...