21 जून 2018

योग यात्रा और जीवन

#Selfi on #Yoga #गाँव के #खेत से लाइव

साल, दो साल से #योग #ध्यान छूट गया। जीवन की आपाधापी में जब रोजी-रोटी, घर-परिवार, बाल-बच्चे की चिंता होने लगती है अपनी चिंता चूक ही जाती है। एन्ने देखो, ओनने अंधार, ओनने देखहो एन्ने अंधार। जीवन मे सबकुछ एक साथ कोई साधक ही साध सकता है या फिर सम्पन्नता प्राप्त व्यक्ति।

मुफ़लिसी के यात्री को हमेशा रोटी पहले दिखती है बाकी सब बाद में। खैर!!

योग से बस्ता स्कूल जीवन से ही रहा है। बभनबीघा हाई स्कूल में कामदेव सर करांची की छड़ी लेकर जबरदस्त योग करवाते थे। उस समय का सीखा योग जीवन भर याद है। बहुत दिन किया भी। बाद में आचार्य ओशो की पुस्तकों के सानिध्य से ध्यान का भी महत्व समझा। व्यक्तिगत अनुभव बहुत उत्साहित करने वाला रहा। योग और ध्यान नियमित रूप से कुछ दिन ही करने पे सकारात्मक परिणाम मिलने लगता है। कमर दर्द और सायनस की समस्या को योग से ही ठीक किया है। तनाव मुक्ति का रामबाण है योग।

योग वास्तव में अमृत है। बस हम नियमित करें। हालांकि अब योग राजनीतिक भी हो गया है। हिन्दू और मुसलमान हो गया है। सब राजनीतिक बातें है। योग सबके लिए है। इसे धर्म से बांधना मनुष्यता को कलंकित करना है।

खैर! विश्व योग दिवस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारत की गौरव और गरिमा में जोड़ा गया एक सितारा है। व्यवसायिक ही सही बाबा रामदेव ने भी जन जन तक पहुंचाया है। सबसे बढ़कर। मेरे पुराने जिले मुंगेर के बिहार योग विद्यालय का योगदान अतुलनीय है। बस इनका योग आम लोगों की पहुंच में नहीं है।

देखते है आज से शुरू किया गया योग कितने दिनों तक नियमित रख पाता हूँ...

04 जून 2018

रामखेलावन चच्चा का वायरल टेस्ट

(व्यंग्य:अरुण साथी)

चच्चा रामखेलावन परेशान होकर पूछने लगे।
"आंय हो मर्दे ई वायरल की होबो हई!आझकल बुतरू सब बरोबर बोलो है!"

रामखेलावन चच्चा गांव के आदमी हैं। पुराने जमाने वाले। उनको क्या पता बेचारे को वायरल होना क्या है।

वायरल होना दरअसल नेक्स्ट जनरेशन का शब्द है। पता नहीं डिक्शनरी बनाने वालों ने इसे डिक्शनरी में स्थान दिया है या नहीं। दिया भी है तो इसकी परिभाषा क्या गढ़ी है। देख कर बताइएगा।

खैर, चच्चा रामखेलावन जब पूछ लिए कि वायरल होना क्या है तब मेरा भी माथा घूम गया। आप किसी बात को समझ भले ही लीजिए पर जब उसकी व्याख्या करने की बात आएगी तो माथा घूम ही जाएगा।

जैसे मेरी समझ में आज तक जीएसटी थोड़ा बहुत ही आया है। कोई पूछ ले तो बता नहीं सकता। ठीक वैसे ही जैसे वर्तमान प्रजा वत्सल राजा साहब के विकास पुत्रों के बारे में यदि कोई पूछ लें तो भक्तों का माथा भी चक्करघिन्नी हो जाता है। बस जबाब मिलेगा। सत्तर साल में विकास पैदा नहीं हुआ तो चार साल का बच्चा कहाँ दिखेगा। अभी पैदा हुआ है। पिता के आंचल में छुपा हुआ है। चलने लगेगा तो दिखेगा। कम से कम दस पंद्रह साल का हो तो जाने दीजिए।

सो। बेचारा चाचा को वायरल के बारे में समझाना पैदल हरिद्वार जाना बात बराबर। फिर भी माथा लगाया।

कहा, चाचा पहले के जमाने में गांव में एक मुहावरा हुआ करता था "जंगल में आग की तरह फैलना" आपने कभी देखा है जंगल में आग! जंगल में आग की तरफ फैलना! इसी मुहावरे का नेक्स्ट जनरेशन है वायरल होना! अपडेट वर्जन!

परिभाषा- जंगल में आग मुहावरे से खरबों गुना तेजी से जो फैले उसे ही  वायरल होना कहते है।

चाचा हमारा मुंह ताकने लगे। गजब! जंगल में आग की तरह फैल जाना और वायरल होना दोनों क्लोन हो गया। अच्छा दोनों सहोदर भाई जैसा। खैर एक ही बात में चाचा समझ गए और बोलने लगे

"मने कि गांव में जब कोय केकरो से फंसल रहो हल त उ बात जंगल में आग में तरह फैल जा हल! आ केकर माउग-बेटी केकरा से नैन मटक्का करो हो ई बात तो आऊ जल्दी लफुआ सब फैला दे हो। ई में जादे बात तो झुट्ठे सच्चे होबो हो। अउ एकरा में तो गंदे बात जादे फैलो हो..त ई मोबाइलबा वला वायरल भी गंदे गंदे वायरल होबो होतै!!"

चाचा एकदम्मे सही पकड़ लिए। उनको ई सब बात कभी अच्छा नहीं लगता। इसीलिए वे गांव के चौक चौराहा पे बैठना छोड़ दिए है। नेता मसुदन बाबू के दलान पर एकदम नहीं जाते। वहां भी बस सब गंदा गंदा झूठ सच उड़ाता रहता है। बोले " नेता के जे विरोधी होबो है ओकरा बदनाम करे ले एक से एक झूठ कथा कहो है!" आझ कल के बुतरू इस्मार्ट मोबाइल हाथ में ले के ही जलमो हे। टिपिर,टिपिर करो हे।

मैंने कहा चाचा "आपने सही पकड़ा है। जैसे कि अभी देखिए, जितने तेजी से निपाह वायरल नहीं हुआ उससे तेजी से उसके दुर्गुण, उसके फैलने के कारण और बचाव के फर्जी उपाय वायरल हो गया।

स्वाइन फ्लू हो या निपाह, यह सब कैसे वायरल होता है। सबके पीछे कभी कुत्ते, कभी मुर्गी, कभी सूअर तो कभी चमगादड़, मच्छर, कभी गधा, कभी बैल का हाथ होता है।

इसी तरह मोबाइल में जो वायरल होता है उसका भी संबंध इन्हीं प्रजाति के भाई-बंधुओं से है। अब ज्यादा क्या कहें। कम लिखना, ज्यादा समझना! यही तो समझदारी है अपने देश की! जे हिंन जे भारत..गन्हि महत्मा की जे..

01 जून 2018

आज भी है बंधुआ मजदूर

#बंधुआ_मजदूर #विदेसिया

विदेश गए मजदूर घर लौट रहे है। पलायन की कहानी यह तस्वीर कहती होगी। पढिये इसको को। यह पूरी की पूरी किताब है। कमाने के लिए पंजाब, गुजरात जाने वाले मजदूर विदेश अथवा देश जाना कहते है। सीजन ऑफ हो रहा है और मजदूर लौट रहे है।

आज भी मजदूर बिकते है। इसके कारोबार करने वाले मालामाल है। बोली लगती है। एडवांस देकर खरीद लिया जाता है। ज्यादातर मजदूरों की खरीद बिक्री करने वाले उनके अपने स्वजातीय है। करोड़ो का कारोबार है। मजदूर खून जला के कमाते है और कमीशन के रूप में उनके खून के सने कुछ पैसे इन कारोबारियों को मिलता है। इनको भी ठेकेदार कहते है या मेठ। मजदूर की बस्तियों में ये ठेकेदार अब फॉरच्यूनर गाड़ी से नजर आ जाएंगे..

खैर!
विकास बेटा तो झमाझम बुलेट ट्रेन पे चढ़ के स्मार्ट सिटी घूमिये रहिस है..अपुनका का है, मजे लीजिये हाइवे का। अउ राम राम जपिये..

26 मई 2018

सावधान! शनिवार और रविवार को 43 से 44 डिग्री रहेगा तापमान। दोपहर बाद दो बजे से पांच बजे तक सर्वाधिक तापमान।

सावधान होकर निकल लिए घर से

शेखपुरा। बिहार

24 मई से रोहणी नक्षत्र के प्रवेश करने के बाद से ही मौसम का पारा ऊपर चढ़ गया है। जहां शुक्रवार को पारा 40 डिग्री रहा वहीं शनिवार और रविवार को 43-44 डिग्री अधिकतम रहने की संभावना है। मौसम विभाग के द्वारा जारी किए गए इंटरनेट आंकड़े को अगर माने तो रविवार को और शनिवार को न्यूनतम तापमान 29 डिग्री रहेगा जब की अधिकतम तापमान 44 डिग्री रहेगा।

2:00 बजे से 5:00 बजे तक सबसे अधिकतम रहेगा तापमान

दोपहर बाद 2:00 बजे से लेकर 5:00 बजे तक सबसे अधिक कम तापमान रहने का अनुमान है। शनिवार और रविवार को 4:00 बजे तापमान 43-44 डिग्री पहुंचेगा। संध्या 7:00 बजे के बाद तापमान धीरे-धीरे क्रमबद्ध नीचे जाने का आकड़ा दिया गया है। 12:00 बजे दोपहर के बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ना शुरू करता है।

30 मई तक रहेगा सर्वाधिक तापमान
1 जून से होगा 36 डिग्री

मौसम का मिजाज मई माह तक सर्वाधिक रहेगा। 30 मई तक अधिकतम तापमान 42 डिग्री रहेगा। 31 मई को 39 डिग्री जबकि एक जून से अधिकतम तापमान 36 डिग्री रहेगा। इसके बाद क्रमशः कम होता जायेगा।

लू से बचने के लिए क्या कहते हैं चिकित्सक

लू से बचाव को लेकर बरबीघा रेफरल अस्पताल में तैनात चिकित्सक डॉ फैजल अरशद इशरी ने बताया कि ऐसे मौसम में जमकर पानी पीना चाहिए और खाली पेट कभी नहीं रहना चाहिए। जहां तक हो सके धूप से बचना चाहिए और अत्यधिक ठंडा पानी का सेवन भी नहीं करना चाहिए। साथ ही साथ धूप में निकलने पर सर और कान को ढक लेना चाहिए।

रसदार फल तरबूज वगैरह का भरपूर सेवन भी करना चाहिए। साथ ही साथ कच्चे आम का बनने वाला आमझोड़ और नींबू पानी का भी सेवन फायदेमंद होता है।

लू लगने का क्या है लक्षण

यदि खूब प्यास लगना, मुंह सूखने लगना,
आंख धंसने लगना, बुखार आना, पेशाब कम लगना, चक्कर आने लगना और उल्टी आना लू लगने के लक्षण है। ऐसे में तत्काल चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।



06 मई 2018

गजब! टिटहीं रोग हुआ वायरल, दुनिया भर में लोग बीमार..आप भी चेकअप करा लीजिये...

आजकल मेरे जैसे ही कई लोग टिटहीं रोग के शिकार हैं। इस रोग के बारे में नहीं पता, घोर आश्चर्य! चेकअप करवाइए, हो सकता है आप भी इस के मरीज हो! यह बहुत तेजी से वायरल हुआ है और इस को फैलाने में मार्क जोकरबर्ग का सबसे बड़ा योगदान है। हां, एक और व्यक्ति का भारत में सर्वाधिक योगदान है, वह है जियो जिंदाबाद के नारा देने वाले, कर लो दुनिया मुट्ठी में करके जेब भरने वाले अंबा(नी) का। अभी भी नहीं समझे, कौन से रोग की बात हो रही है।

टिटहीं रोग!

यह बहुत ही प्रसिद्ध और पौराणिक रोग है। पहले यह गांव-देहात में दस कोस, बीस कोस पर एक-आध लोगों को होता था। देश और दुनिया भर में कुछ ही लोग पाए जाते थे। वैसे लोग को आगरा अथवा कांके नामक धर्मस्थल पे पूण्य लाभ कराया जाता था। अब भी नहीं समझे तो बड़े बुजुर्गों से पूछ लीजिए। वह बताएंगे।

खुलासा

गांव में एक टिटहीं नामक पंछी पाया जाता है। यह जब सोता है तब दोनों पैर को ऊपर कर लेता है। उसको लगता है कि यदि सोते हुए आसमान गिर गया तब तो सभी दबकर मर जाएंगे। इसलिए वह दोनों पैर को ऊपर कर लेता है। सोंचता है, यदि आसमान गिरेगा तो वह उसे रोक लेगा।

उदाहरण
हम सब फेकबुक और व्हाट्सवक पर यही तो करते हैं। बाकी कम लिखना, ज्यादा समझना, समझदारों की समझदारी है। ढक्कप्लेट टाइप के लोगों के लिए ज्यादा भी लिखना कुछ नहीं समझना है।

वैसे ही जैसे भैंस के आगे बीन बजाए, बैठे भैंस पगुराय। न तो मुझे बीन बजानी आती है और न ही आप भैंस हैं।

अच्छा! नहीं देखे हैं तो मेरे सहित बहुत से लोगों के प्रोफाइल खोल कर देख लीजिए। दिन-रात वे आसमान को रोकने में लगे हुए है। बहुत लोग है। भरे पड़े।

बहुत है जिनके प्रोफ़ाइल देखके आपके आँख में पानी आ जाएगा। गंधी महत्मा, भगथ सिह, बोस बाबा, बाबा साहेब,  सबकी आत्मा खिचड़ी की तरह इनमें समायी हुई दिखेगी।

कोई धर्म बचा रहा है। कोई शरीयत। कोई जाति बचाने को चिंतित है तो कोई धर्म स्थल! कोई गाय! कोई गीत! कोई राष्ट्रवाद! टटका तो और भी गजब है। जिन्ना को बचाने वाले कि प्रोफ़ाइल देख आपका दिल भर आएगा।

जय श्री राम के नारे लगाने वालों से प्रोफ़ाइल अटी पड़ी मिलेगी। जी हाँ! मर्यादापुरुषोत्तम की!

प्रोफ़ाइल देख के लगेगा स्वर्ग तो यहीं है। अलौकिक! अद्भुत! साधुओं से पटी हुई। संतों की दुनिया! दानियों की दुनिया! राम राज।

चेतावनी

चेतावनी है कि फेकबुक की दुनिया में ही रहियेगा, बाहर निकलना खतरनाक सिद्ध हो सकता है। मर्यादापुरुषोत्तम की मर्यादा तभी बचेगी। भूल से भी गांव-शहर के कोचिंग वाली गली में मत जाईयेगा वरना आपको आत्महत्या करनी पड़ सकती है। एक जैसे चेहरे दिखने के बाद आपके पास उपाय भी कुछ नहीं बचेगा...

डिस्क्लेमर

नालियों में कहीं आपको बजबजाती, बदबूदार सड़ी हुई लाश मिले तो कुछ मत पूछियेगा वरना वह अपना नाम मानवता बता के आपको शर्मसार कर सकता है!

जे टिटहीं, जे हिन.. जे भारत...गन्हि महत्मा की जे..

जनहित में जारी

(यह एक टिटहीं का बकलोल वचन है। मजाक में लिखा गया। इसे सीरियसली लेना मना है। सीरियसली लेने से पूर्व सूचित करें वरना किसी घटना-दुर्घटना की जिम्मेवारी आपकी अपनी होगी।)

कार्टून गूगल देवता से साभार

02 मई 2018

कलयुगी विद्या: चने की झाड़ पे चढ़ाने की कला और कलाकार

आजकल चने की झाड़ पे चढ़ाने का जमाना है। इसके कई फायदे है। पहला तो यही की, चने के झाड़ पे चढ़ाने के लिए बहुत कुछ तामझाम नहीं करना पड़ता है। मेहनत एक फायदे अनेक। वैसे तो चने की झाड़ पे किसी को भी चढ़ाया जा सकता है पर नेताओं को इसका सर्वाधिक शिकार बनाया जाता है।

दूसरा फायदा यह कि जो चने की झाड़ पे चढ़ते है उनको कभी भी गिरने पे चोट ही नहीं लगती। कैसे लगेगा! जब कोई ऊंचाई ही नहीं तो चोट कैसा! हाँ ब्रेन चाहिए तगड़ा। खास कर नेताओं को चने की झाड़ पे चढ़ाना मने कुत्ते को बुर्ज खलीफा पे चढ़ाना हो जाता है। अब दुनिया जानती है कि ऊंचाई बुर्ज खलीफा की है पर कुत्ते को लगता है कि यह उसकी ऊंचाई है। खैर! लगने दीजिये इसमें किसका क्या जाता है। अपना काम बनता भांड में जाय जनता।

रुकिए, बात चने की झाड़ पे चढ़ाने की हो रही थी। वहीं रहते है। नेताओं की तरह दल बदल नहीं। सो चने की झाड़ पे चढ़ाना एक कला है। यह किसी किसी दिगंबरी आदमी में ही होता है। दिगंबरी आदमी तो बस मधु मिश्रित वचन से ही किसी को चने की झाड़ पे चढ़ा देता है।

कुछ माहिर लोग इसके लिए जिस नेता को चने की झाड़ पे चढ़ाना है उसके कान में कुर्सी कुर्सी नामक मंत्र फूंकते है। फिर कोई समारोह करके कुर्सी भरनी होती है। समारोह कुछ भी हो सकता है। शौचालय का शिलान्यास, (उद्घाटन का टेंशन नहीं)! गुल्ली-दंडा टूर्नामेंट! बाबा बकलोलानंद महाराज माहजग खरमंडल! कुछ भी! नहीं कुछ तो बकरी के बच्चे का जन्मोत्सव का आयोजन सर्वाधिक प्रचलन में है। आशीर्वाद देने ढेर लोग आ जाते है। बस फेसबुक, व्हाट्सएप्प पे धड़ाधड़ भेजते रहिये। प्रत्येक दिन। फिर कॉल भी करिये। बन गया काम। हाँ भोज में मटन शटन होना अनिवार्य शर्त है।

समारोह में भले ही कुर्सी खाली रह जाये पर फर्क नहीं। चने की झाड़ पे चढ़े नेता की खाली कुर्सी भी भड़ी दिखती है।

फिर कुछ लंपट, लफ्फड़ लोगों को दारू, मुर्गा, बाइक के पेट्रोल आदि इत्यादि का जोगाड़ कर दीजिए। हो गया काम। हाँ! चने के झाड़ पे चढ़ाने के लिए फूलों की माला सर्वाधिक उपयोगी यंत्र है। जितना अधिक फूलों की माला उतना अधिक काम आसान। मने समझिये की फूल की माला ही चने की झाड़ की सीढ़ी है। यदि बड़ा माला बना दिये जिसमे आठ दस आदमी आ जाएंगे तो समझ लीजिए काम चांदी।

क्या कहे उदाहरण! दुर्र महराज! अपने पप्पू भैया को देखिए न! इधर उधर काहे देखते है जी। हमेशा अपने आस पास के घटनाक्रम से जोड़ लेते सभी मैटर को। कभी तो ऊंचा उठिये। नेशनलिस्ट बनके के सोंचिये। या इंटरनेशनली सोंच रखिये। बाकी बात जीतो दा के बिलायती चाचा का फोन जाएगा तब न पता लगेगा। इंतजार करिये...तब तक कोई उपदेश, कोई शेरो शायरी, कोई प्रेरक कहानी जो किसी ने आपको भेजा हो और आपके स्वभाव, आचरण से वह विपरीत हो दूसरे को व्हाट्सअप करते रहिये..जय बकलोला नंद जी महाराज की जय..

30 अप्रैल 2018

बिहार: जहानाबाद में सरेआम गैंगरेप का प्रयास, वीडियो बनाकर किया वायरल

एक तरफ जहां अभी रेप की घटनाओं से देश शर्मसार है वही इन्हीं घटनाओं में बिहार के जहानाबाद में एक और कड़ी जुड़ गई। जहानाबाद की घटनाओं ने ना सिर्फ मानवता को शर्मसार किया है बल्कि नई पीढ़ी के क्रूरतम व्यवहार कि जिंदा तस्वीर भी पेश कर दी है। दरअसल जहानाबाद में कुछ युवक एक युवती को सरेआम नंगा कर रेप करने का प्रयास करते हैं और उसका वीडियो भी बनाया जाता है। वीडियो बनाने के बाद उन्हीं लोगों के द्वारा उस वीडियो को वायरल भी कर दिया जाता है।

फांसी  की सजा का भी भय नहीं

यह दुस्साहस इस बात का भी परिचायक है कि कानून में चाहे फांसी की सजा का प्रावधान कर दिया जाए परंतु मानसिकता पर इसका असर नहीं पड़ रहा। पूरे वीडियो को देखकर कोई भी संवेदनशील इंसान शर्मसार हो जाएगा। युवती चिल्लाती रही और वे लोग उसका मानमर्दन करते रहे। वीडियो में साफ सुनाई दे रहा है कि एक युवक कहता है कि नंगा कर दो, नंगा कर दो!

इसी तरह यह मानवीय घटनाओं से देश आज फिर शर्मसार हुआ है और उसमें बिहार का भी नाम जुड़ गया है। हालांकि वीडियो के वायरल होने के बाद बिहार पुलिस जागी है और कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यह गिरफ्तारी घटनास्थल पर मौजूद बाइक के नंबर से पहचान कर की गई है परंतु सभी आरोपियों को पकड़कर जब तक पुलिस स्पीड ट्रायल कर अंतिम मुकाम तक सजावार नहीं पहुंचाती तब तक ऐसे खूंखार दरिंदों के हौसले नहीं टूटने वाले। जरूरत सख्त कदम की है और वह कानून के हिसाब से तत्काल सजा दिलवाना।

मीडिया माया: राई से पहाड़ और तिल से तार बना रही मीडिया

मध्य प्रदेश धार में सिपाही भर्ती के दौरान दलित वर्ग, सामान्य वर्ग और पिछड़े वर्ग के युवाओं के सीने और ऊंचाई की नाप आरक्षण के हिसाब से लेने के लिए उनके सीने पर SC, जनरल और ओबीसी लिख दिया गया। मीडिया की माया देखिए, आज यह मामला तूल पकड़ चुका है। ऐसा करने वाले पदाधिकारियों पर कार्रवाई की जा रही है। बीजेपी को इसी वजह से दलित विरोधी बताया जा रहा।  यह सब मीडिया की माया है।

जनरल और ओबीसी वर्ग वालों के सीने पर लिखे हुए शब्दों को छुपाकर केवल दलित युवाओं के शब्दों को उभार, देश में वर्तमान समय में दलित दलित खेलने के मुद्दे को हवा दी जा रही है। इसी तरह से हाल ही में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के कई बयानों को तिल का ताड़ बनाया गया। मीडिया की ही माया है मुख्यमंत्री विप्लव देव ने जब कहा कि युवाओं को गाय पालनी चाहिए, नौकरी के पीछे नहीं भागना चाहिए तो इसे एक सकारात्मक संदेश के रूप में ना देख कर नकारात्मक बना दिया गया। जो लोग नहीं जानते हैं कि गाय पालना वास्तव रोजगार का बेहतर विकल्प है उन्हें इतनी समझ भला कैसे होगी। गांव अथवा छोटे शहरों में जाकर गंभीरता से देखिए तो जो लोग 5 या 10 गाय पाल रहे हैं उनके सामने छोटी नौकरी वाले कुछ भी नहीं है। एक बेहतर रोजगार का माध्यम है गाय पालना परंतु इस मुद्दे को भी तिल का ताड़ बना दिया गया। यह भी एक मीडियम माया ही है।

यह मीडिया माया न्यूज़ चैनल के माध्यम से फैलते हुए सोशल मीडिया पर वायरल खबर बन जाती है अथवा सोशल मीडिया पर वायरल होते हुए न्यूज चैनलों और अखबारों, न्यूज पोर्टल तक वायरल खबर के रूप में पहुंच जाती है।

ऐसे कई उदाहरण प्रत्येक दिन सामने आते हैं जिसमें किसी के द्वारा कहे गए वाक्यों के छोटे से अंश को काटकर भड़काऊ बना दिया जाता है और देश में एक अलग तरह का माहौल बना दिया जाता है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट के दलित आरक्षण के मामले में भी कहा गया। तीन तलाक प्रकरण पर भी इसी तरह का प्रबंधन देखने को मिला। कई एक उदाहरण भरे पड़े हैं। वर्तमान समय में जरूरत इस बात की है कि किसी भी खबर को हमें अपने बुद्धि-विवेक से जांचना-परखना होगा। आज के समय में जब सभी तरह गंदगी ही गंदगी फैल गई हो तो हमें हंस की तरह बनना पड़ेगा जो दूध में ढेर सारा पानी मिला देने के बाद भी दूध को अलग कर देती है..और कोई उपाय भी नहीं है...मीडिया महा ठगनी सों जान..

26 अप्रैल 2018

बलात्कार को बलात्कार रहने दो, हिंदू मुस्लिम मत बनाओ

बलात्कार को बलात्कार रहने दो, हिंदू मुस्लिम मत बनाओ

कठुआ के मासूम बच्ची से बलात्कार की खबर जब जंगल में आग की तरह फैली तो एकबारगी फिर से लगा की निर्भया कांड से भी भयानक, बीभत्स, क्रूर, आदिम युग में हम लोग आज भी जी रहे हैं। इस घटना की निंदा से बढ़कर जो भी कुछ किया जाना चाहिए वह समाज के प्रबुद्ध लोगों ने किया।

देश में उबाल भी आया, परंतु अचानक से कठुआ की घटना को धर्म से जोड़ दिया गया। धर्म से जोड़ कर एक धर्म को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के कार्टून भी बनाएंगे। बाद में घटनास्थल से धीरे-धीरे जब सच सामने आने लगा तो कई बातें सामने आ गई। जो फैलाए गए झूठ से बिल्कुल इतर थे।

सीबीआई जांच क्यों नहीं

कठुआ की घटना में परिजनों के द्वारा सीबीआई जांच की मांग की गई परंतु सामाजिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी दलों, यहां तक कि भाजपा के गठबंधन वाली सरकार ने भी वोट के लिए सीबीआई जांच की मांग को दरकिनार कर दिया। उसे दबा दिया। यह इस बात को सिद्ध करता है कि यह केवल राजनीतिक प्रोपगंडा के लिए किया गया।

एक सम्प्रदाय की कुंठा भी निकली

दरअसल एक संप्रदाय जो पूरी दुनिया में आतंक का पर्याय बन गई उसकी कुंठा भी इसी बहाने निकली। आमतौर पर बड़ी-बड़ी घटनाओं पर चुप रहने वाले एक सम्प्रदाय के तथाकथित लिटरेट, इलीट वर्ग भी कठुआ की घटना पर अपने सोशल मीडिया की डीपी को बदल लिया। सहानुभूति दर्शाए। यह मानवीय गुण था। परंतु धर्म विशेष के लिए ऐसा करना एक अमानवीयता का ही प्रमाण देता है। कहीं न कहीं दबी हुई कुंठा निकालने का माध्यम भी।

धर्म स्थल का सच
खैर इसी सच में से यह बात भी सामने आई कि घटना किसी धार्मिक स्थल में नहीं घटी। घट भी नहीं सकती थी। क्योंकि उस धार्मिक स्थल में एक छोटे से कमरे में दो तीन खिड़कियां और दो दरवाजे थे और प्रत्येक दिन गांव के लोग पूजा करते थे और एक सप्ताह वहां किसी को भी कैद रखना संभव नहीं था। खैर, यह सब अनुसंधान की बातें थी। परंतु किसी मासूम के साथ घटी इस क्रूरतम घटना ने सबको मर्माहत किया। साथ ही साथ इसे एक धर्म और दूसरे धर्म से जोड़ कर जब धार्मिक रंग दिया गया तब भी समाज के प्रबुद्ध लोग मर्माहत हुए।

अर्थला पे खामोशी क्यों..

इसी तरह फिर से दो दिनों से अर्थला (कश्मीर) में एक मदरसे में मौलवी के द्वारा दुष्कर्म की बात सामने आई परंतु यह घटना कठुआ जैसी जंगल में आग की तरह नहीं फैल रही। यह सोशल मीडिया पर धीरे-धीरे सामने आ रही है। गंभीरता पूर्वक विचार करने से यह समझ आती है कि मेनस्ट्रीम मीडिया ऐसी घटनाओं को दबा देती है। ऐसा क्यों होता है इस सवाल का जवाब आपको सोशल मीडिया पर सेकुलर को मिल रहे गालियों को देखकर समझ आ जाएगी। कई बार यह सच भी लगता है, सच होता भी है। अर्थला की घटना एक बार फिर से सेकुलर शब्द को शर्मसार कर दिया और मेनस्ट्रीम मीडिया का नंगा सच भी सामने ला दिया। साथ ही साथ देश को गुमराह करने वाले शहला रशीद जैसे एक्टिविस्ट का सच भी सामने लाया। वहीं विपक्ष की भूमिका निभाने वाले मुख्य विपक्षी दल भी धर्म के आधार पर देश को फिर से अलग-थलग करने की कोशिश का सच भी सामने आया और पूरी दुनिया में भारत को बदनाम करने वाले विपक्षी दल आज फिर से खामोश हो गए पर अब सोशल मीडिया में किसी प्रकार का सच नहीं छुपता और इस तरह का प्रोपगंडा करने वाले एक ना एक दिन नंगा हो ही जाते हैं अर्थला की घटना में सब नंगे हो गए सभी नंगे हैं... बलात्कारी को धर्म से मत जोड़िए! खामोश मत रहिए! धर्म हो अथवा जाति की बात, गलत का विरोध करिए! नहीं तो दुनिया ही नहीं बचेगी तो धर्म और जाति क्या बचेगा..

11 अप्रैल 2018

भारत बंद! आग ही आग! सोशल मीडिया का बड़ा खेल कैसे...

सोशल मीडिया की ये आग कब बुझेगी! आरक्षण, दलित, सवर्ण, मुस्लिम, हिन्दू.. आग ही आग

जिस समय सोशल मीडिया कॉल पे भारत बंद में नंगई हो रही थी ठीक समय फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग से उनकी सरकार पूछताछ कर रही थी और वे माफी मांग रहे थे। बाद में जुकरबर्ग ने प्रेस में कहा कि कैंब्रिज एनालिटिका में लीक हुए डाटा का असर भारत के चुनाव में नहीं पड़ने देगा और उसी समय भारत जल रहा था।

फेसबुक और व्हाट्सअप पर भारत बंद के बेनामी आह्वान को हाथों में स्मार्ट मोबाइल रखने वाले कम उम्र के नौजवानों ने हाथों हाथ लिया। इस बेनामी आह्वान पर कम उम्र के नौजवान सड़क पर उतरे और मेरे यहां बिहार के बरबीघा में जम कर आतंक मचाया। युवाओं में इतना आक्रोश था कि वह मरने-मारने पर उतारू थे। यहां तक की जब पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े तो बंद समर्थकों की भीड़ की तरफ से गोलीबारी की गई! खैर!

सोशल मीडिया इम्पैक्ट

दस अप्रैल को भारत बंद ने साबित कर दिया कि भारत में सोशल मीडिया का गहरा इम्पैक्ट है। चुनाव को प्रभावित करने से कहीं ज्यादा। समाज को प्रभावित करने का। दो अप्रैल को हुए भारत बंद पर भी सोशल मीडिया इंपैक्ट रहा। सुप्रीम कोर्ट के एससी एसटी एक्ट में कोई बदलाव किए बिना पुलिस के अधिकारों के दुरुपयोग में हस्तक्षेप करने की बात को सोशल मीडिया पर एससी एसटी एक्ट में बदलाव करके प्रचारित किया गया। इस बदलाव को वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं ने हवा दे दी और फिर देश में नंगा नाच हुआ। दस लोगों की जानें गई। करोड़ों का नुकसान हुआ। ठीक उसी दिन फेसबुक और व्हाट्सएप पर दस अप्रैल को भारत बंद लिखकर एक पोस्ट को वायरल किया गया और फिर दस अप्रैल को भी नंगई सामने आए।

देश नहीं बचेगा

वर्तमान परिस्थिति में यदि किसी से भी बात किया जाए जो सोशल मीडिया पर हैं तो अपने अपने पक्ष को अतार्किक रुप से सही बताते हैं। हाल ही में एक पोस्ट वायरल नजर आया जिसमें कहा गया है कि मुसलमानों को लगता है कि आरएसएस आईएसआईएस जैसा बन जायेगा। हिंदुओं को लगता है कि मुसलमान इतनी जनसंख्या में आएंगे कि भारत पर उनका कब्जा हो जाएगा औरंगजेब का शासन होगा। दलितों को लगता है कि मनुस्मृति लागू की जा रही है। सवर्णों को लगता है कि आरक्षण नहीं तो जीवन का अंत हो जाएगा। यह सब बहुत हद तक सोशल मीडिया इंपैक्ट है और यह सच भी है। यही लगता है। और इसी लगने का नजीता है भारत बंद। दंगा। उन्माद।

कांग्रेसी सहित बिपक्ष को लगता है हिन्दू को तोड़कर ही मोदी को मात दे सकते है इसलिए दलित मुद्दा भड़का रहे। सवर्णो को लगता है बीजेपी उनके आरक्षण के लिए कुछ नहीं कर रही। बीजेपी के नेता चुप है। जान रहे है दलित वोट बैंक बड़ा। खिसका की खेल खत्म। मुस्लिम तो खैर आजतक मोदीजी को अपना प्रधानमंत्री तक नहीं मानते। नफरत इतना कि पाकिस्तान जिंदाबाद कर देते है। सब शतरंजी खेल है। पोलटिक्स। कौन सा घोड़ा कब लंघी मरेगा यह सिर्फ माहिर खिलाड़ी ही भांप सकता है। आम आदमी तो प्यादे है। प्यादे की तरह चलते है। एक घर। सीधा। सपाट।

बाकी मंत्री और राजा का जलवा जमा हुआ है। नेताजी अपनी अपनी रोटी सेंक लेंगे। सबका फायदा। दोनों तरफ ध्रुविकरण है। आम आदमी को हमेशा की तरह मिलेगा शक्करकंद...घरिघण्ट

योग यात्रा और जीवन

#Selfi on #Yoga #गाँव के #खेत से लाइव साल, दो साल से #योग #ध्यान छूट गया। जीवन की आपाधापी में जब रोजी-रोटी, घर-परिवार, बाल-बच्चे की च...