04 सितंबर 2018

मौत से लड़कर रोहित का चला जाना गम दे गया...

मौत से लड़कर रोहित का चला जाना.. गम दे गया..
(अरुण साथी)

मुझे ऑक्सीजन की जरूरत है, कहाँ मिलेगा.…..तकलीफ हो रही है...रोहित का कॉल। एक लड़खड़ाती हुई टूटती आवाज में...

मैंने कहा डॉ मुरारी बाबू जे पास आईये...सर को कॉल किया तो उन्होंने कहा कि आ जाईये यहाँ व्यवस्था है...

रोहित पहुंचा पर ऑक्सीजन भी उसे नहीं बचा सका..एम्बुलेंस बुला ही रहा था कि मौत आ गयी...निर्दयी...

रोहित कौन था...

एक नौजवान। बरबीघा चौपाल व्हाट्सएप ग्रुप का एक हिस्सा। ग्रुप अब ग्रुप नहीं एक परिवार जैसा बन गया। सोशल मीडिया से संपर्क में आया । उसी परिवार का हिस्सा था रोहित। किडनी ट्रांसप्लांट होने के बाद भी कुछ साल बाद फिर खराब हो गया। चिकित्सा जगत फैल। दुबारा ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता। डायलिसिस के सहारे रहना होगा। डॉक्टर ने फाइनल कह दिया।

डायलिलिस

हर एक दिन बाद करानी है। सरकारी व्यवस्था देखिये की अनुदान के बाद भी लगभग पर्यवेट इतना खर्च। सो आमआदमी थोड़ा पैसे के अभाव में नीयत समय पे डायलिसिस नहीं कराता। रोहित भी यही किया। दो दिन चार दिन बाद कराता था। हालांकि सोशल मीडिया पे मदद की गुहार ने सकारात्मक असर दिखाया और डायलिसिस के लिए पैसे भी लोगों ने दिए फिर भी वह बचत करता। और आखिर कर सोमवार को उसने आंखों के सामने हो दम तोड़ दी।

अदम्य साहसी
किडनी पेशेंट होतो हुए भी रोहित हर सामाजिक कार्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज करता। अदम्य साहसी, परिश्रमी और तेज तर्रार था रोहित। मौत की आहट शायद सुन ली थी। दो दिन पुर फेसबुक पे लिख दिया। तबीयत ठीक नहीं लग रही। अंतिम समय मे भी खूब संघर्ष किया। खुद अकेले गाड़ी चला के जाना और डायलिसिस करा के आना। फिर काम मे जुट जाना। पंद्रह दिन  पहले ही ऑनलाइन प्रोडक्ट बेचने का काम शुरू किया। उसे परिश्रम करते देख हौसला मिलता। स्वतंत्रता दिवस पे खुद जलेबी बनाने की तस्वीर उसने साझा की। दुकान चलाना। सामना लाना।

सोशल मीडिया का परिवार

सोशल मीडिया भले ही नकारात्मक दिखता हो पर यह भी समाज जैसा ही है। समाज में अच्छे बुरे दोनों लोग है। हम अपना अपना समाज बना लेते है। अच्छे लोग अच्छों के साथ बुरे लोग बुरों के साथ। चौपाल एक परिवार जैसा बन गया। हर आदमी परिवार। नकारात्मक लोग दरकिनार हुए और आज भी गाली देते रहते है पर सकारात्मक लोग साथ खड़े है। कोई सदस्य बुरा करता है तो बहुत शर्मिंदगी होती है और लोग परिवार की तरह ही उलाहना देते है। चौपाली ने ऐसा किया। अच्छा करता है तब खुशी होती है और लोग सराहना करते है। समाज यही तो है।

समाज आदमी से बनता है। जैसा आदमी वैसा समाज। आईये अलविदा रोहित के साथ साथ हम सोशल मीडिया के समाज को सकारात्मक, रचनात्मक, सहयोगात्मक बनाए। बरबीघा चौपाल की तरह ही एक प्रतीक बने। रोहित के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

एक अभिभावक की तरह उसने अंतिम क्षण में भी मुझे याद किया। उसकी लड़खड़ाती, कांपती, टूटती पर मौत से नहीं डरती आवाज़ कानों को गूंज रही है..
परिवार का एक सदस्य चला गया।

अंत में अरविंद मानव सर द्वारा भेजी गई गीता के श्लोक ही शाश्वत है..

मृत्यु जन्मवतां वीर जन्मना सह जायते।
अद्य वा अब्दशतान्तैर्वा प्राणिनां मरणं ध्रुवम् ।

      श्रीमद्भागवत महापुराण
        दशम स्कंध अ० १

जातस्य हि ध्रुवोरमृत्युं , ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मात् अपरिहार्थोयं ,न त्वं शोचितुमर्हसि।

गीता अध्याय २

26 अगस्त 2018

दलित एक्ट, आरक्षण, वोटबैंक और संवैधानिक शोषण

दलित एक्ट, आरक्षण, वोटबैंक और संवैधानिक शोषण

(अरुण साथी)

"आरक्षण को लेकर संविधान सभा में जब चर्चा चल रही थी डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपनी आशंका जताते हुए साफ चेतावनी दी थी कि यदि हमने गैरबराबरी को खत्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग इस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाई है।"

इस ढांचे से उनका आशय भारत और भारत का लोकतंत्र से था। आज यदि हम गंभीरता से आजादी के 70 साल बाद विचार करें तो बिल्कुल यही स्थिति विपरितार्थ रूप में सामने खड़ी नजर आती है। गैरबराबरी को लेकर शुरू किया गया आरक्षण और हरिजन एक्ट आज गैरबराबरी की एक बड़ी चौड़ी खाई उत्पन्न कर दी है। जिसमें बड़ी संख्या में सवर्ण समाज के लोग पीड़ित बन चुके हैं।

आज मामला उल्टा है। कुछ प्रसंग की चर्चा लाजिम है। पहला प्रसंग राजस्थान के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित का। बिहार के एक बड़े अधिकारी ने फर्जी रूप से रमेश पासवान के नाम एक प्राथमिकी कोर्ट में दर्ज कराई और अपने रसूख का इस्तेमाल कर तत्काल पत्रकार को राजस्थान से गिरफ्तार कर बिहार ले आए और जेल में ठूंस दिया। मीडिया ने जब छानबीन की तो रमेश पासवान नाम के युवक ने किसी प्रकार के केस करने की बात नहीं कही।

दूसरा मामला नोएडा के सेवानिवृत्त कर्नल बीरेंद्र सिंह चौहान का है। उनके साथ मारपीट की जाती है। दबंगई दिखाई जाती है और फिर दबंग व्यक्ति अपनी पत्नी से दलित एक्ट लगाकर प्राथमिकी दर्ज करा देता है। देश की सेवा में समर्पित रहने वाले कर्नल जेल चले जाते हैं।

मामला उठता है और सीसीटीवी कैमरे में सारी बात सामने आती है कि कर्नल के साथ मारपीट की गई परंतु उनके जेल जाने के बाद जांच होती है और जमानत होती है। दोनों मामले में निर्दोष जेल जाते हैं और जमानत पर छूटते हैं। भारतीय राजनीति और वोट बैंक की राजनीति का यह बानगी भर है। आम जीवन में कई लोग इस से पीड़ित हैं।

तो क्या अंबेडकर की आशंका के अनुसार यह गैरबराबरी भारतीय ढांचे को ध्वस्त कर देगा? भारत के लोकतंत्र को ध्वस्त कर देगा?

अब आइए गैरबराबरी पर एक नजर डालते हैं..

प्रसंग 1
एक निजी विद्यालय के डायरेक्टर बता रहे हैं कि सैनिक स्कूल के प्रवेश परीक्षा में 95% और 98% लाने वाले सामान्य वर्ग के बच्चों का एडमिशन नहीं हुआ जबकि 40% और 50% वालों का हो गया। पूछते हैं कि बताइए इस बच्चे की मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा? बच्चे पूछ रहे हैं कि सर मेरा एडमिशन क्यों नहीं हुआ?

प्रसंग 2

शेखपुरा जिले के कुटौत गांव में रमेश सिंह की भूख से मौत हो गई! सरकारी मदद लगभग शून्य रहा। स्थानीय अधिकारी वृद्धा पेंशन देने के लिए रमेश सिंह की मां को तीन-चार घंटे तक बीडीओ  सवालों की बौछार से टॉर्चर करते हैं और केंद्रीय मंत्री के कहने पर भी अभी तक कुछ नहीं दिया गया। खैर, सामाजिक स्तर पर पहल हुई और उसके बच्चे को आर्थिक तथा शैक्षणिक मदद की व्यवस्था कर दी गई।

प्रसंग 3

नालंदा जिले के सारे थाना के खेतलपूरा गांव में पंकज सिंह की मौत किडनी फेल होने से इलाज नहीं होने की वजह से हो जाती है। एक माह पहले पंकज सिंह की पत्नी की भी मौत पथरी जैसे साधारण बीमारी का इलाज पैसे के अभाव में नहीं होने की वजह से हो जाती है। पंकज सिंह के बच्चे अनाथ हो गए। उसके पास एक कट्ठा जमीन नहीं है। एक डिसमिल का घर जर्जर। लोग सोशल मीडिया पे मदद की अपील कर रहे। मदद मिल भी रही। पर यह समाज के लिए स्थायी विकल्प नहीं है।

आइए हम गैर-बराबरी पर विचार करते हैं। कथित तौर पर सवर्णों अथवा वैश्यों के दमन, शोषण और अत्याचार दलितों के गैरबराबरी का मूल कारण था। सामंतवादियों को इसके लिए दोषी माना माना जाता है। परंतु आज हम सभी इस गैरबराबरी को लेकर सामंतवाद को समाज के लिए कलंक मानते हैं।

तब अब सोचिए आज  सवर्णों में गैरबराबरी की स्थिति उत्पन्न कर दी गई है। सवर्ण का दमन और शोषण हो रहा है। इसी शोषण का नतीजा है कि गरीब सवर्ण भूख से मर रहे हैं। बीमारी के इलाज के अभाव में मर रहे हैं।

अब इस पर देखिए कि यह दमन और शोषण कर कौन रहा है! तो यह दमन और शोषण संवैधानिक स्तर पर किए गए प्रावधानों के अनुसार वोट बैंक के लोभी नेता कर रहें। मतलब साफ है कुछ मुठ्ठी भर सवर्णों अथवा सामंतवादियों के दमन और शोषण का बदला लेने के लिए एक लोकतंत्र में संवैधानिक व्यवस्था दी जाती है और 70 साल तक उसी दमन और शोषण के बदला लेने का परिणाम विपरीतार्थक रूप में सामने आता है जिसमे समूची जाति से बदला लिया जाता है। जबकि मुट्ठी भर लोग जो शोषण और दमन करते हैं वे जाति देख कर कभी नहीं करते। बल्कि अपनी जातियों का भी दमन और शोषण करते हैं।

अब थोड़ी चर्चा वामपंथ के वर्ग संघर्ष की। वामपंथ का वर्ग संघर्ष का मूल सिद्धांत समाज को गरीब और अमीर में बांट कर देखने की है। हालांकि अपने मूल सिद्धांत पर वामपंथी भी नहीं टिके और वह जातियों और धर्मों के आधार पर समाज को बांट कर देखने लगे, जिस की वजह से वे हाशिये पर चले गए। परंतु वर्ग संघर्ष का यही मूल सिद्धांत समाज को जोड़ने का सिद्धांत है। परंतु राजनीतिज्ञों के द्वारा समाज को जोड़कर राष्ट्र को सशक्त करने की बात कभी नहीं की जा सकती। क्योंकि समाज को विखंडित करने के बाद ही सत्ता को हासिल किया जा सकता है। और सभी दलों के राजनीतिज्ञों का एकमात्र उद्देश्य सत्ता को हासिल करना होता है। देश सेवा, समाज निर्माण उनका उद्देश्य कतई नहीं होता!

वोट बैंक की राजनीति देखिए कि जब सुप्रीम कोर्ट अपने अनुभव से कहता है कि दलित एक्ट का 95% दुरुपयोग हो रहा है और निर्दोष क्यों लोग सताए जा रहे हैं और इस में जांच कर गिरफ्तारी हो तो वोट के लिए सत्ताधीश विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदल देते हैं! अब जब सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि आखिर यह आरक्षण कब तक रहेगा और एक IAS के बेटे और पोते को आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए तब इस पर भी वोट बैंक की राजनीति शुरु हो गई है!

तब इस गैर बराबरी का परिणाम अंबेडकर की जताई आशंका के अनुरूप एक दिन क्यों उत्पन्न नहीं होगा? एक दिन ऐसा आएगा जब इस गैर बराबरी की वजह से भारत का लोकतंत्र खतरे में पड़ेगा...?

08 अगस्त 2018

एक भूमिहार ब्राह्मण रमेश सिंह भला भूख से कैसे मर सकता है...? सबका यही सवाल..

( मैं हूँ ट्विटर पे @arunsathi )

घटना उद्वेलित भी करती है और उद्विग्न भी। मंगलवार की शाम जब यह खबर मिली की भूख और आर्थिक तंगी की वजह से शेखपुरा जिले के बरबीघा प्रखंड के कुटौत गांव निवासी 30 वर्ष के युवक रमेश कुमार सिंह की मौत हो गई। उसे कई दिनों से खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था तो एकबारगी सन्न रह गया। भला कोई भूमिहार ब्राह्मण इतना भी गरीब हो सकता है? मौके पे पहुंचा तो स्थिति बड़ी भयावह थी।

खाने का एक दाना नहीं..न राशन न पेंशन

रमेश के घर खाने का एक दाना नहीं था। उसके चूल्हे एक माह से खामोश थे। उसकी पत्नी आर्थिक तंगी की वजह से छोड़ कर चली गयी। साथ ही छोड़ गई एक आठ साल की बेटी और छह साल का बेटा। दुर्भाग्य देखिये की बेटा का नाम राजा है। चूंकि वह भूमिहार है इसलिए सरकार इसे गरीब नहीं मान सकती। सो इसका नाम बीपीएल सूची में नहीं है। न ही इसे सरकारी राशन-किरासन मिलता है और न इसकी अस्सी बर्षीय बूढ़ी माँ को पेंशन!!

मौके पे गांव के लोग आपस मे उलझ रहे थे।

"के साला होत जेकर ई मजदूरी नै कैलक और शायदे कोय एकरा मजदूरी के पैसा देलक। सीधा के सब दहनजो है। भगवान देखो हखुन..!!"

मतलब साफ हो गया। बीबी के चले जाने के बाद रमेश के पास को आसरा न था। वह गांव में मजदूरी करने लगा। गांव के लोग कितने निर्मम और क्रूर होते है इसे भी देखिये। लोग मजदूर कराने के बाद भी पैसा नहीं देते। रमेश इतना सीधा की किसी से तन के मांगता भी नहीं। और हालात खराब होते गए। वह अवसाद में चला गया। गुमसुम रहने लगा। किसी से कुछ बोलना बतियाना बंद। लोग उसे विक्षिप्त मानने लगे। वह खुद्दार भी था जिसकी वजह से वह किसी से मांग कर नहीं खाता। माँ मांग कर लाती तो खा लेता।

दस कट्ठा जमीन भी था जो पिता के श्राद्ध में बिक गया..

अपने ही समाज की क्रूरता की कहानी भी रमेश ही है!!

रमेश अपने ही समाज की क्रूरता, शोषण और गरीबी अमीरी के भेदभाव की कहानी है। रमेश के पास दस कट्ठा जमीन भी थी पर अपने पिता के निधन पे श्राद्ध कर्म में जमीन हाथ से निकल गयी। रमेश पे समाज के लोगों ने श्राद्ध ठाठ से करने का दबाब दिया और फिर उसने जमीन को अपने की समाज के एक व्यक्ति के पास बैबुलवफ़ा (गिरवी) रख श्राद्ध किया। हालात इतने खराब की वह तय समय पे गिरवी न छुड़ा सका और जमीन उसके हाथ से निकल गयी।

भूख से नहीं हुई मौत

भूख से मौत की खबर फैलते ही प्रसाशन आनन फानन में पहुँच कर बीडीओ पंकज कुमार के नेतृत्व में दो बोरा अनाज घर पहुंचा दिया। 20000 का पारिवारिक लाख और 3000 का कबीर अंत्येष्टि की राशि दे दी। भूख से मौत को स्थापित करना नामुमकिन है। इस जागो मांझी के प्रकरण में देख लिया था सो जानता था कि यह नहीं होने वाला। बिना पोस्टमार्टम के तो खैर और मुश्किल। खैर प्रसाशनिक बयान आ गया। भूख से नहीं हुई मौत।

बस पूरी कहानी यही है बाकी सब अफसाना

रमेश मर गया। वजह भूख है या गरीबी या समाज। तय करिये। पर देखिये समाज को। रमेश के शवदाह पे गए लोग गंगा किनारे जम के मिठाई उड़ाई होगी। उसे शर्म न आई होगी। और हाँ रमेश के श्राद्ध पे भी ब्रह्मभोज होगा। हो सकता उसका एक छोटा घर भी बिक जाए.. इससे क्या। समाज को तो भोज खाना है नहीं तो समाज जीने देगा। एक पत्तल भात नै जुटलो। समाज को इससे शर्म नहीं आती की एक गरीब का वह परवरिश न कर सका! उसके दो अनाथ बच्चे का पालन पोषण कैसे होगा?

और सरकार तो हमेशा से ही फाइलों पे ही विकास करती रही है। रमेश को राशन किरासन नहीं मिलना, बूढ़ी को बृद्धा पेंशन नहीं मिलना कोई मुद्दा नहीं है। हजारों लाखों है ऐसे। एक मर गया। लोग जान गए। कई गुमनाम भी मरते होंगे!!

और फिर सवर्ण भूमिहार गरीब तो होता नहीं..गरीब तो वोट होता है। जिस जाति का अधिक वोट लोकतंत्र में उसी का हित सधेगा.. हो सकता है अब चुनाव आने वाला है और रमेश के घर नेताओं का आना जाना शुरू हो जाये..घड़ियाली आंसूं बहाने..और हो सकता है कि वह वहां जाति समाज के हित की बात करे और यह भी हो सकता है कि कोई नौजवान उन नेताओं से समाज हित के लिए किए गए काम का जबाब मांगकर शर्मिंदा कर दे...हो तो यह भी सकता है कि दोनों बच्चे भी भूख से मर जाये और हम उसे बीमारी से मौत करार दे दें...

भूख से मौत
***
एक आदमी
भूख से मरा
या एक गांव
एक समाज
एक सरकार
एक सभ्यता
एक संस्कृति
भूख से मर गई
सोंच कर देखो..

03 अगस्त 2018

हरिजन एक्ट के बहाने मन की भड़ास..

मन की भड़ास
(अरुण साथी)
मन एकदम्मे कछमछा रहा है। कई बार लिखा और मिटा दिया। राजनीति और धर्म पे नहीं लिखने का सोंच रखा है। बेकार में तनाव हो जाता है।

खैर! दलित एक्ट, पूण्य प्रसून, मुज़्ज़फरपुर बालिका गृह, एनआरसी आसाम!! देश में अकबकाट जैसा लगता है। सोशल मीडिया गंभीर विषयों के विमर्श का मंच नहीं रहा। यहाँ बस "गाय का सिंग बैल में अउ बैल का सिंग गाय में" (गौ रक्षा दल के लिए माफी यह एक देहाती कहावत है, समझ न आये तो किसी बिहारी से पूछ लियो) किया जाता है। फिर भी मन नहीं मान रहा। चुप रहना ग्लानि जैसी लग रही।

सो भड़ास निकाल रहा हूँ।

पहले दलित कानून एक्ट की बात। मेरे हिसाब से सुप्रीम कोर्ट ने झूठे हरिजन एक्ट लगाकर निर्दोष को फंसाने के सर्वाधिक मामले सामने आने पे हरिजन एक्ट में महज एक संशोधन किया कि डीएसपी रैंक के अधिकारी केस में पहले जांच करे फिर गिरफ्तारी हो। यह न्यायसंगत बात है। हरिजनों को प्रताड़ित करने की बात सौ फीसदी सच है पर यह भी सच है कि हरिजन एक्ट से प्रताड़ित गैर दलित लाखों लाख लोग मिल जाएंगे।

हमारी न्याय व्यवस्था का मूलाधार है कि किसी निर्दोष को सजा न मिले, भले सौ दोषी छूट जाए। फिर!

अब गंभीरता से देखिये। सुप्रीमकोर्ट के इस न्याय संगत फैसले को राहुल गैंग, जिग्नेश, हार्दिक, भीम आर्मी जैसे सत्ता और कुर्सी के लिए खून के प्यासे लोग नरेंद्र मोदी को घेर लिया। ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित भारत बंद (जिसका प्रमाण भारत बंद के समय के मेरे पोस्ट में मिल जाएगा) इस आग में बारूद डाल दिया। माहौल बना, केंद्र सरकार दलित विरोधी।

अब नरेंद्र मोदी के सामने साँप छुछुन्दर का हाल। "निंगले तो अंधा उगले तो कोढ़ी।" एक बड़े वोट बैंक के खिसकने का डर। मामला पलटा और सुप्रीमकोर्ट के फैसले को शाहबानों केस की तरह ही पलटने का निर्णय लिया गया। यानी निगल लिए और अंधा होना स्वीकार किया। कोढ़ी होने से बच गए।

अब जोर का झटका उनको लगा जो अंधभक्ति ने लीन यह मान बैठे थे कि नरेंद्र मोदी वोटबैंक की परवाह नहीं करते! जो लोग सोशल मीडिया पे भोकल थे वे अब भोकार पार के रो रहे। चुनौत दे रहे। हरा देने की बात कह रहे! उधर राजसत्ता को पता है कि इनके पास विकल्प नहीं है। चुनाव आते आते मंदिर मस्जिद ऐसा होगा कि सब भूल जाइए!!

पूण्य की बात

पूण्य प्रसून बाजपेयी जी को एबीपी से हटाए जाने पे जो लोग रो रहे उनके लिए एक बात, क्या आपको नहीं पता कि मीडिया हाउस पूंजीपति मीडिया मर्डोक का व्यवसाय है! जब व्यवसाय है तो अपना हित सर्वोपरि! सभी का अपना एजेंडा है। देश हित की बात बेमानी।

अब ब्रजेश ठाकुर

ब्रजेश ठाकुर नर पिशाच है। सब यही कह रहे! पर क्या कानून व्यवस्था के वे अधिकारी जिनके जिम्मे इनपे लगाम लगाने की जिम्मेदारी थी वे ज्यादा गुनाहगार नहीं! और तेजस्वी यादव जैसे विरोधी जो सरकार को घेरते हुए ठाकुर के जाति पे सवाल खड़ा कर अपना आधार वोट मजबूत करते है वे कैसे इसे नजरअंदाज कर जाते है कि इसे उद्भेदन करने में ठाकुर के जाति के भी पत्रकार शामिल है, फिर..

एनआरसी असम

आप चाहे जितनी राजनीति करें पर यह सच है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेश से घुसपैठ कर लोग आसाम, बंगाल, बिहार में वोटर बन हमारी हकमारी कर रहे। वे भी आज वोटबैंक है। अब राहुल और दीदी सरीखे लोग देश हित को ताक पे रख वोट हित साधने में जुट गए है। जो हमारी सभ्यता, संस्कृति और समाज के दुश्मन हो उन्हें हम कैसे अपने घर रहने दें!! हाँ अगर भारतीय है तो अभी मौका है। सुधार का। प्रमाण दीजिये। अन्याय नहीं होना चाहिए।

बस!! भड़ास निकल गया। उल्टी करने से हल्का हो जाता है। गडमड है। होगा ही। भड़ास है। किसी पार्टी की विचारधारा नहीं... बाकी तो जो हे सो हइये हे..😢😢

25 जुलाई 2018

मॉब लिंचिंग

मॉब लिंचिंग
(अरुण साथी)

हत्यारा वही नहीं
जिसने पत्थरों से
कूच कूच कर
मार दिया
आदमी को

हत्यारा वह भी है
जिसने बहते लहू
को चंदन बनाया
माथे पे लाल
टीका लगाया

हत्यारा वह भी है
जिसने रक्त सज्जित
महिषासुर को
फूल-माला पहनाई
गले लगाया

हत्यारा वह भी है
जिसने काफिरों की
हत्या पे मुस्कुरा कर
खामोशी ओढ़ ली
और स्वधर्मी हत्या पे
चीखा-चिल्लाया
आंसू बहाया
मानवता की हत्या बताया

तथाकथित छद्म
सभ्य समाज में
हम सब हत्यारे
मिल जुल कर रहते है
अपने अपने धर्म के
हत्यारे को सही कहते है

आओ आओ
हमसब हत्यारे
मानवता की
हत्या का
जश्न करते है

हम तुम्हारी
तुम हमारी
हत्याओं को
गलत कहते है

24 जुलाई 2018

दलित और गरीबी

भूख की तस्वीर

(शादी समारोह से बचा हुआ खाना लेकर आते बच्चे..)

जय भीम का नारा देकर दलितों की राजनीति करने वाले वैसे लोग जो मर्सिडीज-बेंज का मेंटेन करते हैं और करोड़ों-अरबों में खेलते हैं उनके लिए यह तस्वीर चुल्लू भर पानी में डूब मरने की है। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण का प्रावधान इनके लिए किया था। यह बच्चे शादी समारोह में बचे हुए खाने के लिए लेकर अपने घर जा रहे हैं।

सभ्य समाज के माथे पर भी यह एक कलंक है परंतु सबसे अधिक बड़ा कलंक उनके माथे पर है जो बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के दिए आरक्षण के आधार पर आज बुलंदी पर हैं परंतु इनका हकमारी कर रहे हैं।

आरक्षण का असली हकदार यही लोग हैं। सबसे अधिक दलितों में गरीबी मुसहर जाति में ही है परंतु आरक्षण की मलाई खाने वाले बड़े बड़े करोड़पति दलित नेता, दलित अफसर और अन्य तरह के लोग आरक्षण को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। आरक्षण की बात हुई नहीं कि उनकी तलवारें निकल जाती है। सब अपने स्वार्थ की लड़ाई लड़ रहे हैं। गरीब की भलाई की लड़ाई कोई नहीं लड़ने के लिए तैयार हैं।

यह तस्वीर कलंक तो हमारे समाज के माथे पर भी है जो शादी-समारोह और अन्य समारोह में लाखों खर्च कर देते हैं और अनाज को बर्बाद करते हैं।

कहीं भूख की बेहिसाब जिल्लत है तो कहीं शान ओ शौकत की बेहिसाब दौलत है। असमानता की खाई बहुत बड़ी है परंतु अपने देश में आज समानता की बातें कहां होती है। बातें तो गाय, मंदिर-मस्जिद की हो रही है। भूख और रोटी हाशिए पर है! दोषी हम हैं दूसरा कोई नहीं...

आरक्षण गरीब को मिलना चाहिए जाति को नहीं। बाबा साहब ने शायद यही सपना देखा होगा परंतु वोट बैंक की राजनीति में आज गरीबी का कोई महत्व नहीं, महत्वपूर्ण वोट बैंक है।

इन सब परिस्थितियों के लिए हम किसी एक नेता को जिम्मेवार तो नहीं ठहरा सकते परंतु वर्तमान में जो केंद्र की सरकार है उनके लिए एक शब्द विरोध में लिखना भी जहमत मोल लेना है। इसलिए कौन आफत मोल लेगा, पता नहीं कौन पीट-पाट देगा!! देशद्रोही कहके!!

जय भीम!! जय भारत!!

18 जुलाई 2018

हलाला बनाम बलात्कार

हलाला बनाम बलात्कार
(अरुण साथी)

पिता समान ससुर से
सेक्स की बात को
मजहब के आड़ में
हलाला बता
सही ठहराते हो

हो शैतान
और तुम
मुल्ले-मौलवी
कहलाते हो

और
हलाला रूपी बलात्कार
का विरोध करने
वाली एक महिला से
भी डर जाते हो

हद तो यह कि उसे
शरीया का हवाला देकर
सड़े हुए अपने
धर्म से निकालने का
फतवा सुनाते हो

और तो और
इन शैतानों के साथ
देने वाले
खामोश रहकर जो
मुस्कुराते हो
तुम भी क्यों
जरा नहीं लजाते हो..

17 जुलाई 2018

अग्निवेश

#अग्निवेश
(अरुण साथी)







सत्तर साल के बूढ़े
प्रजातंत्र की
पगड़ी छीनी
भगवा कुर्ता फाड़ा
धोती फाड़ी
नंगा किया
और जमीन पे पटक
बूटों तले रौंद दिया

खून से सने
हिटलरी बूट का रंग
भी भगवा ही है
टहटह भगवा..

और उधर
उसी हिटलरी बूट
को पहन कर
कई लोग
अपने अपने घरों से
निकल कर
अट्टहास करने लगे..

हा हा हा...
हा हा हा...




03 जुलाई 2018

आधा दर्जन से अधिक किशोर कैदी शेखपुरा के ऑब्जरवेशन होम से फरार! बिहार का पहला किशोर कैदी गृह है शेखपुरा में..

शेखपुरा।

शेखपुरा के मटोखर दह में बिहार राज्य का एकमात्र और पहला ऑब्जरवेशन होम (पैलेस ऑफ सेफ्टी) से आधा दर्जन से अधिक किशोर  कैदी के फरार होने की सूचना है। इस सूचना के मिलते ही जिला प्रशासन सकते में आ गई है। प्रशासन से जुड़े एसडीपीओ अमित रंजन, अनुमंडलाधिकारी राकेश कुमार, बाल सुधार पदाधिकारी सहित बड़ी संख्या में पदाधिकारी ऑब्जरवेशन होम पहुंच गए हैं।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस ऑब्जरवेशन होम से रात्रि में आधा दर्जन से अधिक बच्चे फरार हो गए हैं। सूत्र बताते हैं कि फरार होने वाले बच्चों की संख्या 9 है परंतु इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो रही। मौके पर पहुंचे अधिकारी बच्चे किस तरह फरार हो गए इसकी छानबीन कर रहे हैं। इस ऑब्जरवेशन होम में बिहार राज्य के कई जिलों से कोर्ट के द्वारा चिन्हित कर आपराधिक किशोर युवकों को भेजा जाता है।

18 वर्ष से कम के किशोर कैदी को इस ऑब्जरवेशन में रखा जाता है जिनके ऊपर आपराधिक मुकदमे चल रहे होते है। किशोर कैदियों के फरार होने पर जिला प्रशासन काफी सकते में है और हलचल मच गई है। अधिकारी मामले की छानबीन में जुटे हुए हैं अभी तक फरार होने से संबंधित साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं।

02 जुलाई 2018

डरना होगा!! जमीन के नीचे पानी नहीं है। आम आदमी, किसान परेशान है..डेंजरस जोन में है हम..


शेखपुरा।

डरना होगा! वाटर लेवल 15 से 30 फीट तक नीचे चला गया है। चापाकल 90% तक फैल हो गया है। खेती के लिए बोरिंग से पानी नहीं निकल रहा। किसान 10 फीट 20 फीट गड्ढा करके भी मोटर लगा रहे हैं पर बोरिंग से पानी निकलने का नाम नहीं ले रहा। यह डरावनी तस्वीर बिहार के शेखपुरा जिला की है। इसके आसपास के पूरे इलाके की यही स्थिति है। पिछले चार-छह वर्षों से जम के बारिश नहीं हुई है। एक सप्ताह का झपसा देखना युग होगा।

तालाब भर कर बन गया पार्क

गांव से लेकर नगर तक के तालाब को भरकर कहीं पार्क बना दिया गया है तो कहीं उसे भरकर उसका नामों निशान मिटा दिया गया है। नहरों पर नगर में नाला बना दिया गया है। वृक्षों का नामो निशान मिट गया है। पहाड़ भी ध्वस्त हो गया है। पर्यावरण का असंतुलन सबसे पहले पानी की मार लेकर ही आया है। पानी का जलस्तर बहुत नीचे चला गया है।

नहीं गिर रहा धान का बिचड़ा

किसान त्राहिमाम कर रहे हैं। धान का बिचड़ा मृगशिरा नक्षत्र में ही गिराया जाता था। आद्रा नक्षत्र खत्म होने वाला है पर अभी तक धान का बिचड़ा किसान गिराने में असमर्थ है। थोड़ी बहुत बारिश हुई है जिससे खेतों में बस नमी मात्र है। बिना बोरिंग से पानी निकले धानका बिचड़ा नहीं गिर सकता। किसान माथा ठोक रहे हैं पर यह गंभीर स्थिति यह आने वाले विकट स्थिति को दर्शा रहा है।

जन चेतना सबसे जरूरी

इसके लिए जन चेतना सबसे जरूरी है। परंतु हम आम आदमी तब तक सतर्क नहीं होते जब तक हमें भय पैदा नहीं होता और भय पैदा करने के लिए सबसे पहले सरकार को आगे आना होगा। कानून का डंडा चलाना होगा। जैसे भी हो इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए कुछ ना कुछ तो करना होगा। यह डरावनी स्थिति बहुत डरावनी है।

बूंद-बूंद पानी बचाने की बात

कुछ लोग पानी बर्बाद नहीं करने की बात करते हैं। बूंद-बूंद पानी बचाने की बात करते हैं परंतु हमारी चेतना इतनी गहरी नहीं है कि हम बूंद-बूंद पानी बचा सके। सरकारी वाटर सप्लाई का पानी हम सड़कों पर खुलेआम बहते हुए देखते हैं। सबसे गहरी बात यह है कि वाटर हारवेस्टिंग अभी तक हमने नहीं सीखी है। वाटर हारवेस्टिंग से ही पानी का जलस्तर बढ़ सकता था परंतु ना तो गांव घर में गड्ढे हैं जहां पानी अटके ना ही शहरों में क्या होगा पता नहीं।

पुरखे ही हमसे ज्यादा आधुनिक, दूरदर्शी और वैज्ञानिक थे।

भले ही हम बात करते हो आज आधुनिक और वैज्ञानिक युग की परंतु हमारे पुरखे ही हमसे ज्यादा आधुनिक, दूरदर्शी और वैज्ञानिक थे। गांव में बड़े बड़े तालाब, खेत खन्धों में बड़े-बड़े अहरे पहले प्राथमिकता में थी अब वे खत्म हो गए। सरकारी अमले इसको गंभीरता से नहीं लेते। जिनका दायित्व है वैसे अधिकारी सूचना मिलने पर भी आंखें मूंद कर रखते हैं। भयावह स्थिति बहुत ही खतरनाक!!

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मौत से लड़कर रोहित का चला जाना.. गम दे गया.. (अरुण साथी) मुझे ऑक्सीजन की जरूरत है, कहाँ मिलेगा.…..तकलीफ हो रही है...रोहित का कॉल। एक लड़खड़ात...