17 सितंबर 2016

शौच के विवाद में महिला सरपंच की बेरहम पिटाई

शौच के विवाद में महिला सरपंच की बेरहम पिटाई

(अरुण साथी)

जिस दिन सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल देश के प्रधान जी के जन्मोत्सव के जश्न में डूबा है ठीक उसी दिन न्याय देने वाली एक महिला सरपंच के साथ अन्याय की खबर अख़बारों के एक कॉलम की खबर बनकर दम तोड़ रही है।

मामला शेखपुरा जिले के कोसुम्भा थाना के जियनबीघा गांव का है। सरपंच सरिता देवी के साथ गांव के ही दबंगों ने महज इसलिए बेरहमी से मारपीट की क्योंकि उनकी बृद्ध और लाचार सास ने दबंग की जमीन पे शौच कर दी। बिडम्बना यह की जिस सरपंच को न्याय देने की जिम्मेवारी दी गयी है वही सरपंच न्याय के लिए थाने-थाने भटकती रही। थानेदार दुत्कारते रहे। मशक्कत के बाद अरुण महतो और मसुदन महतो को नामजद करते हुए प्राथमिकी दर्ज हो सकी।
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मामला सहज नहीं, संगीन है। जिनके कंधे पर न्याय की जिम्मेवारी लोकतंत्र ने दी है यदि छोटी सी बात पे उसकी दुर्गति हो सकती है तो समझा जा सकता है कि हमारी मानसिकता आज भी आदम युग की ही है।
खुले में शौच को लेकर कितना हाय तौबा मचाया जा रहा है यह किसी से छुपा नहीं है। करोड़ खर्च हो रहे है पर वास्तविक हकदारों को आज भी शौचालय बनाने के पैसे नहीं मिल रहे।

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शौचालय का पैसा गरीबों को मिलने के वजाय सम्पन्न लोग ले रहे है जिनके घर पहले से शौचालय बना हुआ है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरपंच को मार नहीं खानी पड़ती।

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करोड़ो का गोलमाल

शौचालय के नाम पे करोड़ों का गोलमाल हुआ है। स्कूल और कॉलेज में लाखों का शौचालय (फाइवर का) ला कर लगा दिया गया पर सब बेकार है। बस पैसे का बारा न्यारा हुआ है और सब दिल्ली से सेटिंग है। जाँच हो तो करोड़ों का गोलमाल पकड़ी जाये..।
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खैर, इस पोस्ट का जन्मोत्सव से बस इतना सरोकार है कि देश के अंतिम पंक्ति तक जबतक तथाकथित विकास न पहुंचे, जश्न जैसा मुझे कुछ नजर नहीं आता, जिनको आता है वे मगन रहे, झूमे, नाचें..बाकि गरीबों की सरकार है..कानून तो अपना काम करेगा ही..

08 सितंबर 2016

मेहतर मिशिर

मेहतर मिशिर (लघु कथा)

स्कूल के प्राचार्य अनुग्रह बाबु बहुत चिंतित थे। चिंता का कारण मेहतर की मनमानी थी। शौचालय की सफाई के लिए वे मुंह मांगी रकम देते थे पर लेमुआ डोम की मनमानी थमने का नाम नहीं ले। एक तो मनमानी रकम और ऊपर से उसके दारू पीकर आने से स्कूल पर पड़ता प्रतिकूल असर। लेमुआ शौचालय साफ़ करने आता तो देशी दारू से उसका मुँह डक-डक गमकता। बच्चे दूर भाग जाते।
आज फिर लेमुआ आया है। हमेशा की तरह डगमग करता हुआ कार्यालय में प्रवेश कर गया। बिना किसी पूर्व सूचना के। गार्ड ने रोकने की कोशिश की तो उसे ढकेल दिया। भद्दी गलियां दी। प्रचार्य के कक्ष में सभ्रांत अभिभावक बैठे थे। लेमुआ ने लगभग गरजते हुए कहा
"हेडमास्टर साहेब, आदमी होके गू-मैला साफ़ करो हियै तबहियो पैसा देबे में नखरा करो हो..! आझ से चार हजार महीना लगतो। मंजूर हो त ठीक, नै तो जय सियाराम।"
अनुग्रह बाबु को शर्मसार होना पड़ा। उन्होंने झट पैसा दे दिया। मामला शांत हुआ। ऑफिस से निकलते वक्त अनुग्रह बाबु बुदबुदाते हुए निकले। "क्या करें समझ में नहीं आता। एक तो स्कूल मैनेजमेंट का तनाव, ऊपर से ई लेमुआ..। पागल करके छोड़ेगा..!"
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गार्ड रामबालक मिश्र सबकुछ देख रहे थे।  चौबीस घंटे उनकी ड्यूटी थी। दिन में स्कूल गेट पे आने जाने वाले बच्चों को संभालो, अभिभावक को झेलो और कोई उचक्का आ गया तो उससे उलझो। रात में स्कूल से कुछ चोरी न हो जाये इस चिंता में रतजग्गा करो। कहीं खट-खुट हुआ नहीं की नींद खुल गयी। इतने पर भी वेतन पैंतीस सौ महीना। यह लेमुआ घंटा-आध घंटा का चार हजार। ऊपर से पर्वी अलग। मिश्रा जी रात भर सो न सके। घर में जवान बेटी कुँवारी बैठी है। ग्रेजुएट बेटा नौकरी के पीछे पागल है। उसके सब यार-दोस्त की नौकरी हो गयी, उसकी नहीं होती। एक दिन मिश्रा जी धिक्कारे- "पढ़ला लिखला से की फायदा। पोथी-पतरा बांचो तो सेर-आसेर अनाजो मिलत।"
वह भभक गया। "पोथिये-पतरा के तो सजा मिल रहल हें। सौ में नब्बे लाबो त नौकरी नै, औ चालीस लाबे बला के नौकरी। कौन जनम के पाप हल की पंडित के घर पैदा होलूं।"
दो रातों से मिश्रा जी को नींद नहीं आयी। अंत में निर्णय ले लिया।
बहुत दिनों से लेमुआ नहीं आ रहा था। अनुग्रह बाबु चिंतित थे कि एक दिन मिशिर जी आ धमके।
"हुजूर शौचालय साफ़ करे के पैसा चाही।"
"हाँ, ठीक है। पर लेमुआ तो आ नहीं रहा।"
"हुजूर, लेमुआ नहीं, हम साफ़ करो हियै।"
"अरे ई क्या? इतना बड़ा पाप मेरे माथा पर। हे भगवान।"
"हुजूर, पेट के आग सबसे बड़गो पाप होबो है। औ पेट के आग बुझाबे खातिर जे काम कैल जाय ऊ जदि पाप होत हल त भगवान् केकरो पेट नै देता हल..!!!"

(सच्ची घटना पे आधारित/*अरुण साथी/रिपोर्टर/बरबीघा/बिहार*)

04 सितंबर 2016

जोरू का गुलाम

जोरू का गुलाम
*अरुण साथी*
साथी ने पत्नी जी से पूछा
"बंदरी
जिसे पाकर तुम
अपने जीवन को
बेकार समझती हो,

नाकारा, नल्ला
नासपीटा, कालमुँहा
कहके जिससे
साल भर झगड़ती हो,

उसी मुंहझौंसे के लिए
तुम निर्जला व्रत क्यूँ करती हो..?

बंदरी
खिसियाई,
खिंखियाई
फिर लजाते हुए
फरमाई

"तुम मानों न मानो
पर मैं तुमको बहुत
प्यार करती हूँ,

और
जोरू की गुलामी करते रहो
बस इसीलिए तो व्रत करती हूँ...

02 सितंबर 2016

अब किसी केजरीवाल पे देश जाने कब और क्यों विश्वास करेगा..

अब किसी केजरीवाल पे देश जाने कब और क्यों विश्वास करेगा..

#अरुण #साथी

झुकी हुई आँखें, चेहरे पर शर्मिंदगी लिए आप पार्टी के प्रवक्ता दिलीप पांडेय एनडीटीवी के पत्रकार अभिज्ञान के सवालों को सुनकर तिलमिला गए। अभिज्ञान आक्रामक थे। आप पार्टी बचाव में है। बचाव का वही घटिया तरीका, विरोधी पे आरोप; काँग्रेस, बीजेपी के नेताओं ने भी सेक्स स्कैंडल किये...!

सबकुछ वही पुरानी और बकौल अरबिन्द केजरीवाल पापी पार्टियों की दलीलों जैसा। केजरीवाल जाने कितनी बार विपक्ष पे प्रेस के सवालों का जबाब नहीं देने का आरोप लगाएं, आज खुद वही किया। प्रेस से सामना के बजाय एक वीडियो जारी कर सफाई दी। सफाई भी ढिठाई जैसा। और हद तो यह कि केजरीवाल सफाई कम और विरोधियों पे आरोप अधिक लगाये।

यह सबकुछ उनके लिए ज्यादा तकलीफदेह है जिन्होंने (मैंने भी) भारत के परंपरागत राजनीति में एक बदलाव की उम्मीद देखी थी, एक चिंगारी देखी थी और वह चिंगरी राख की ढेर ही निकली!

बदला कुछ भी नहीं। हाँ राजनीति का वही घिनौना चेहरा सामने आया जिन्हें देखने की आदि भारतीय हो चुकें है। बल्कि स्थापित चेहरों से इतर केजरीवाल ने मासूम फरेब से जनता को छल लिया।

यह सबकुछ सहज नहीं है। तर्क से हर तर्क के काट दिया जा सकता है। केजरीवाल और उनके समर्थक यही कर रहे है। पर इन सब चीजों ने देश को बड़ा नुकसान किया है।

कई वैचारिक बहस के दौरान जब मंजे हुए सामाजिक और राजनीतिज्ञ लोग यह तर्क रखते थे कि देश के लोग मुर्दा है। उनकी प्रतिरोधक क्षमता मर गयी है। अन्ना आंदोलन से लगी आग के एक चिंगारी के रूप में केजरीवाल निकले तो यह मिथ टूटा। अब बहस में देश के जागरूक, आंदोलनकारी होने का तर्क जुड़ गया। यथास्थितिवाद को बदलने के लिए युवा आगे आये, युवा के माथे के कलंक मिटा कि वे भौतिकवादी युग में टीवी, मोबाइल, सिनेमा, इश्कबाजी और लफुआगिरी में मस्त रहते है। युवाओं ने हाथों में तिरंगा थाम भारत माँ का जयकार किया! वंदे मातरम के नारे लगाते हुए जाति धर्म के बंधन तोड़े।

यह सबकुछ सहज नहीं है। केजरीवाल की असफलता ने दशकों तक संभावित आंदोलनों की भ्रूण हत्या कर दी है। नेता कहते है जनता मरी हुई है और जनता कहती है नेता...यह खेल चलता रहेगा...तब तक , जबतक कोई अन्ना फिर से उम्मीद लेकर न आ जाये..

22 अगस्त 2016

व्यर्थ की बातें सुनता भारत

*यह देश व्यर्थ की बातें सुनने में बड़ा उत्सुक होता है।*
**
सार्थक कोई भी बात सुनने में इस देश को बड़ी पीड़ा होती है, क्योंकि इससे अहंकार को चोट लगती है। और सदियों-सदियों तक हम जिस तरह की बातें सुनते रहे हैं, उन्हीं को हम समझते हैं कि धर्म-चर्चा है!

मेरे पास पत्र आते हैं कि आप काम-शास्त्र पर क्यों बोले? ऋषि-मुनि तो सदा ब्रम्हचर्य पर बोलते हैं।

मैं उनको कहता हूँ कि मैं न कोई ऋषि हूँ, न कोई मुनि हूँ -- मैं एक वैज्ञानिक हूँ! तुम छोड़ो तुम्हारे ऋषि-मुनि की बात। तुम्हारे ऋषि-मुनि जानें और तुम जानो। मैं न किसी का मुनि हूँ, न किसी का ऋषि हूँ। मैं एक वैज्ञानिक हूँ। मैं एक चिकित्सक हूँ। मैं औषधि देना चाहता हूँ। मैं सच में ही इलाज करने को उत्सुक हूँ। बीमारी का दार्शनिक विश्लेषण करने में जरा भी मेरा रस नहीं है; लेकिन बीमारी कैसे काटी जा सके, बीमारी के पार कैसे जाया जा सके...

मैं तुम्हारे प्राणों में पड़ गई मवाद को निकाल देना चाहता हूँ। हालांकि जब मवाद निकलेगी तो पीड़ा होगी। तुम नाराज हो जाओ पीड़ा से, तो फिर मवाद नहीं निकल सकती। और मवाद निकलेगी तो बदबू भी फैलेगी। लेकिन तुम बदबू भी नहीं फैलना देना चाहते। तुम कहते हो: इत्र छिड़क दो ऊपर से और रहने दो मवाद भीतर, बाहर मत निकालो। अब जो छिपा है, उसे उघाड़ना क्यों?

मगर वह मवाद तुम्हारे भीतर बढ़ रही है, गहरी होती जा रही है। तुम सड़ते जा रहे हो।

*यह देश बुरी तरह सड़ गया है। इस देश में अब जिंदा आदमी कम हैं, लाशें ही लाशें हैं। और दार्शनिक चर्चा चल रही है। मुर्दे इकट्ठे हैं और सत्संग कर रहे हैं। और सत्संग में ऐसी-ऐसी बातें होती हैं कि जिनका किसी से कोई संबंध नहीं, कोई लेना-देना नहीं।*

दार्शनिक प्रश्नों का कोई मूल्य नहीं है। या तो उनका उत्तर है, वह बँधा-बँधाया है; उनका कोई मूल्य नहीं है। या फिर उनका उनका उत्तर ही नहीं है, तब भी कोई सार नहीं है।

पूछो जीवंत प्रश्न, पूछो जीवन की वास्तविकता से जुड़े प्रश्न! जीवन को सुलझाना है, आकाश की गुत्थियों में मत पड़ो। तुम्हारी छोटी-सी जिंदगी की जो गुत्थी है, तुम उसे सुलझा लो। उसके सुलझते ही सारा अस्तित्व सुलझ जाता है।

इसलिये मैं तो तुम्हें सलाह दूँगा मुकेश, कि भारतीय आदत छोड़ो। अच्छा हो मनोवैज्ञानिक प्रश्न पूछो, दार्शनिक प्रश्नों की बजाय, क्योंकि मनोविज्ञान तुम्हारी दशा है। वहाँ तुम हो। वहीं उलझन है। वही तुम्हारा रोग है। और जहाँ रोग है, वहीं इलाज किया जा सकता है!
#ओशो #Osho प्रस्तुति:- *अरुण साथी*

17 अगस्त 2016

वासना और प्रेम

वासना की आंख से देखा जाना किसी को भी पसंद नहीं। प्रेम की आंख से देखा जाना सभी को पसंद है।

*तो दोनों आंखों की परिभाषा समझ लो।*

वासना का अर्थ है, वासना की आंख का अर्थ है कि तुम्हारी देह कुछ ऐसी है कि मैं इसका उपयोग करना चाहूंगा। प्रेम की आंख का अर्थ है, तुम्हारा कोई उपयोग करने का सवाल नहीं, तुम हो, इससे मैं आनंदित हूं। तुम्हारा होना, अहोभाग्य है! बात खतम हो गयी। प्रेम को कुछ लेना-देना नहीं है। वासना कहती है, वासना की तृप्ति में और तृप्ति के बाद सुख होगा; प्रेम कहता है, प्रेम के होने में सुख हो गया। इसलिए प्रेमी की कोई मांग नहीं है।

तब तो तुम अजनबी के पास से भी प्रेम से भरे निकल सकते हो। कुछ करने का सवाल ही नहीं है।

हड्डियों को हड्डियों से लगा लेने से कैसे प्रेम हो जाएगा! प्रेम तो दो आत्माओं का निकट होना है। और कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि जिसके पास तुम वर्षों से रहे हो, बिलकुल पास रहे हो, पास न होओ; और कभी ऐसा भी हो सकता है कि राह चलते किसी अजनबी के साथ तत्क्षण संग हो जाए, मेल हो जाए, कोई भीतर का संगीत बज उठे, कोई वीणा कंपित हो उठे। बस काफी है। उस क्षण परमात्मा को धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना। पीछे लौटकर भी देखने की प्रेम को जरूरत नहीं है। पीछे लौट-लौटकर वासना देखती है। और वासना चाहती है कि दूसरा मेरे अनुकूल चले......
#Osho #ओशो
*प्रस्तुति-अरुण #साथी*

13 अगस्त 2016

स्वर्ग-नर्क

सदियों से तुम्हें झुठे विश्वास बेचे गए हैं ---ओशो

मुझे तुम्हारी आंतरिक सत्ता के विकास पर कार्य करना होता है। दोनों एक ही प्रक्रिया के अंग हैं: कैसे तुम्हें एक समग्र व्यक्ति बनाया जाए, उस सारी निस्सारता को, जो तुम्हें समग्र बनने से रोक रही है, कैसे नष्ट किया जाए। यह तो नकारात्मक पहलू है और सकारात्मक पहलू है कि कैसे तुम्हें प्रज्ज्वलित किया जाए ध्यान से, मौन से, प्रेम से, आनंद से, शांति से। मेरी देशना का यह सकारात्मक पहलू है।

लोगों को सकारात्मक पहलू से तो कोई झंझट नहीं है। मैं लोगों को ध्यान, शांति, प्रेम, मौन सिखाता हुआ पूरे विश्व में घूमता रह सकता था और किसी ने भी मेरा विरोध न किया होता।

परंतु इस तरह से मैं किसी की कोई मदद नहीं कर सकता था, क्योंकि फिर उस व्यर्थ को कौन नष्ट करता? और व्यर्थ को पहले नष्ट किया जाना है, यही तो रुकावट है। यही तुम्हारा पूरा का पूरा संस्कार है। बचपन से ही झूठों के साथ तुम्हारा पालन-पोषण किया गया है, और उन्हें इतनी बार दोहराया गया है कि तुम भूल ही गए हो कि वे झूठ हैं।

विज्ञापन का कुल रहस्य इतना ही है बस दोहराए जाओ। रेडियो पर, टेलीविजन पर, फिल्मों में, समाचार-पत्रों में, दीवारों पर, हर जगह बस दोहराए जाओ।

पुराने समय में ऐसा सोचा जाता था कि जहाँ कहीं भी माँग होगी, पूर्ति अपने से हो जाएगी। अब, नियम यह नहीं है। अब नियम यह है कि यदि पूर्ति करने के लिए तुम्हारे पास कोई चीज है, माँग निर्मित करो। लोगों के मनों में कुछ शब्द बार-बार दोहराते चले जाओ ताकि वे भूल ही जाएँ कि वे इसे रेडियो पर, टेलीविजन पर, फिल्मों में, समाचार पत्रों में देख-सुन रहे हैं, और वे इस पर भरोसा प्रारंभ कर दें।

लगातार किसी वस्तु के बारे में सुनते-सुनते वे इसे खरीदना प्रारंभ कर देते हैं- साबुन, टूथपेस्ट, सिगरेट। इस तरह से तुम कोई भी चीज बेच सकते हो।

मैंने एक व्यक्ति के बारे में सुना है जिसे एक बड़ा सेल्समैन माना जाता था। उसकी कंपनी को उस पर बहुत गर्व था। कंपनी जमीन-जायदाद का व्यवसाय करती थी। जमीन का एक बड़ा-सा टुकड़ा उनके पास कई वर्षों से था। कंपनी ने बेचने की बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी उस जमीन को खरीदने में उत्सुक न था।

आखिरकार जमीन के मालिक ने उस सेल्समैन को बुलवाया और उससे वह जमीन बेचने के लिए कहा। सेल्समैन ने कहा, 'आप चिंता न करें,' और उसने वह जमीन बेच दी।

बेचने के पंद्रह दिन बाद ही बारिश प्रारंभ हुई और वह जमीन पंद्रह फीट पानी में डूब गई। इसी कारण से उस जमीन को खरीदने में कोई उत्सुक न था। सड़क से देखकर कोई भी समझ सकता था कि बारिश में उसका क्या हाल होगा। क्योंकि चारों ओर से जमीन इतनी नीची थी।

जिस आदमी ने उस जमीन को खरीदा था, वह बहुत गुस्से और क्रोध में आया और मालिक के ऑफिस में घुस गया और बोला, 'यह व्यापार है या लूट? कहाँ है तुम्हारा सेल्समैन?'

मालिक ने उससे पूछा, 'बात क्या है? हुआ क्या है?'

उसने कहा, हुआ क्या?' सेल्समैन ने जो जमीन मुझे बेची है वह अब पंद्रह फीट पानी में डूबी हुई है। वह तो एक बड़ी सारी झील-सी बन गई है। अब मैं उस जमीन का क्या करूँगा। या तो मैं उस आदमी को जान से मार डालूँगा, या फिर मेरा पैसा वापस करो।'

मालिक ने कहा, 'चिंता न करें। आप बैठ तो जाएँ।'
मालिक ने सेल्समैन को बुलवाया। सेल्समैन ने कहा, 'यह कोई समस्या नहीं। आप मेरे साथ आएँ। मैं इस समस्या को अभी सुलझा देता हूँ। आपको अपना पैसा चाहिए? आप अपना पैसा पंद्रह दिन में सूद सहित वापस ले लें। क्योंकि मेरे पास और भी अधिक दाम देने वाला खरीददार मौजूद है।'

उस आदमी ने कहा, 'क्या?'
सेल्समैन बोला, 'अब आप अपना मन न बदलें। आप सूद सहित अपना पैसा वापस ले लें और उस जमीन को भूल जाएँ। वह इतनी सुंदर जमीन है...आप बारिश के बाद उस जमीन में एक सुंदर मकान बना सकते हैं और जब बारिश दुबारा आए, आप ऐसा इंतजाम कर सकते हैं कि पानी वहाँ से बाहर न जाए। पूरे शहर में आपका अपनी ही तरह का अलग मकान होगा, झील महल। और जहाँ तक अभी की बात है, मैं आपको नावें दे देता हूँ। हम उन्हें ऐसे ही किसी मौके के लिए बचाए हुए थे।'

और उस सेल्समैन ने उस आदमी को दो नावें भी बेच दीं। मालिक वहीं खड़ा यह सारा दृश्य देख रहा था। वे नावें एकदम बेकार थीं- सालों वे वहीं पड़ी सड़ रही थीं।

जिस समय भी उनको पानी में उतारा जाता, उसी समय वे डूब जातीं। मालिक ने अपने सेल्समैन से कहा, 'तुम तो और अधिक मुसीबत खड़ी कर रहे हो।'

सेल्समैन बोला, 'आप चिंता न करें। यदि मैं उतनी बड़ी मुसीबत झेल सकता हूँ, तो मैं इन दो नावों से भी निपट सकता हूँ। तुम्हें तो बस आकांक्षा जगा देनी है- 'झील महल'। वह आदमी तो केवल एक मकान बनाने की सोच रहा था। तुमने उसकी इच्छा को, आकांक्षा को 'झील महल' में बदल दिया।

सेल्समैन ने कहा, 'जरा सोचिए, यदि आप 'झील महल' बनाना चाहें, पहले तो आपको एक झील बनानी पड़ेगी। और हम आपको बनी-बनाई तैयार झील दे रहे हैं, और उसका एक पैसा भी नहीं ले रहे हैं।'

सदियों से आदमी को विश्वास, सिद्धांत, मत बेचे गए हैं जोकि एकदम मिथ्‍या हैं, झूठे हैं, जो केवल तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं, तुम्हारे आलस्य का प्रमाण हैं। तुम करना कुछ चाहते नहीं, और पहुँचना स्वर्ग चाहते हो।

और ऐसे लोग हैं जो तुम्हें नक्शे, सरल विधियाँ देने को तैयार हैं, जितनी चाहो उतनी सरल विधि। बस परमात्मा का नाम लेते, दो-तीन मिनट उसे स्मरण करते सुबह उठ जाओ, इतना पर्याप्त है। कभी-कभी गंगा चले जाओ, वहाँ जाकर डुबकी लगा आओ ताकि तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँ, तुम पवित्र हो जाओ। और सभी धर्मों ने ऐसी तरकीबें बना रखी हैं। काबा चले जाओ और सभी कुछ माफ कर दिया जाएगा।

मुसलमान गरीब लोग हैं और वे गरीब हैं अपने विश्वासों के कारण। वे धन को सूद पर लेने या देने के खिलाफ हैं। अब सारा व्यवसाय सूद पर ही निर्भर है, उन्हें गरीब रहना ही होगा। और उन्हें बताया गया है कि जीवन में कम से कम तुम्हें एक बार काबा अवश्य जाना चाहिए। काबा के पत्थर के चारों ओर सात चक्कर लगा लो, तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो जाएँगे और सभी पुण्य बरस जाएँगे। इतना कर लेना पर्याप्त है। इतनी सरल और आसान विधियाँ!

पंडित-पुरोहित तुम्हें सरल विधियाँ बताते हैं क्योंकि तुम आलसी हो। सच तो यह है कि तुम अपने अंतस की खोज के लिए कुछ करना ही नहीं चाहते हो।

स्वर्ग कोई कहीं ऊपर बादलों में नहीं है। यह तुम्हारे भीतर है और इसके लिए तुम्हें गंगा या काबा या गिरनार जाने की जरूरत नहीं है। तुम्हें केवल 'स्वयं' तक पहुँचने की आवश्यकता है। परंतु कोई पंडित-पुरोहित या तथाकथित धर्म नहीं चाहते कि तुम स्वयं तक पहुँचो, क्योंकि जैसे ही तुम स्वयं की खोज पर निकलते हो, तुम सभी तथाकथित धर्मों- हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के बंधनों से बाहर आ जाते हो। उस सभी के बाहर आ जाते हो, जो मूढ़तापूर्ण और निरर्थक है। क्योंकि तुमने स्वयं का सत्य पा लिया होता है।

साभार : ओशो उपनिषद
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

04 जुलाई 2016

गांव में भी गुम हुआ हीरा-मोती बैल

गांवों में अब हीरा-मोती बैलों का जोड़ा एक आध नजर आते हैं। खेती करने के पुराने तरीके बदल गए हैं। अब ट्रेक्टर से खेती होती है।

साथ ही, घान के पुराने बीज भी अब विलुप्त हो गए हैं।लकड़ी का हल, पालो अब नहीं बनते। खेत की पूजा के लिए होने वाला पर्व (हर्मोतर) अब नहीं होता।

पहिरोपा में किसान के घर खीर, पूरी और आलूदम अब नहीं बनता। और धान रोपती रोपनी अब गीत भी नहीं गाती...

बदलते ज़माने के साथ बहुत कुछ बदल गया है..

15 जून 2016

कैराना और कन्फ्यूजन

कैराना, कन्फ्यूजन, पॉलटिक्स और अविश्वास

यूपी के शामली जिले के कैराना से बड़ी संख्या में हिंदुओं के पलायन को लेकर बबाल मचा हुआ है। बीजेपी के स्थानीय सांसद ने इस मुद्दे को उठाया है। पलायन का कारण मुसलमानों के द्वारा प्रताड़ित किया जाना बताया जा रहा है। पर कैराना पे बहुत कन्फ्यूजन है।

पहली बात तो यह कि यूपी में चुनाव है और बीजेपी हिन्दू वोट बैंक के पोलराइज़्ड करने के लिए यह सब करेगी ही। दूसरी बात यह कि कैराना का सच क्या है इसे जानने का कोई साधन, चेहरा, मीडिया उन लोगों को  नजर नहीं आता जो सच में आम आदमी है, निरपेक्ष।

कैराना को लेकर ज़ी न्यूज़ जैसे भक्तिभाव से भरे न्यूज़ चैनल चिल्ला रहे है, इनपे तो कतई विश्वास नहीं किया जा सकता। इनके सहकर्मी भी मीडिया ग्रुप यही कर रहे है।

दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के आविर्भाव से व्यथित NDTV जैसे बाकि चैनल और मीडिया ग्रुप खामोश है या इस पलायन को अपराध और रोजगार से जोड़ कर इसकी हवा निकाल रहे है। 

सोशल मीडिया पे भी यही हाल है। एक तरफ भक्त, दूसरी तरफ अन्धविरोधी...!

रही बात तथाकथित सामाजिक और बुद्धिजीवी वर्गों की, तो दादरी और कन्हैया प्रकरण पर उनके अन्धविरोधी चरित्र ने दुनिया में देश का मान डुबाया।

अब कैराना का सच कैसे जान पायेगा आम आदमी...एक आम आदमी पार्टी भी भ्रष्टाचार का विरोध करते करते केवल मोदी विरोध का पर्याय बन गई....

देश में एक भी मीडिया ग्रुप, सामाजिक कार्यकर्त्ता ऐसा है क्या जिससे निरपेक्षता की उम्मीद की जा सके...? देश के लिए यह भयावह स्थिति है...भयानक डरावना...

04 जून 2016

उन्मादी और हिंसक है हम

उन्मादी और हिंसक है हम

हम उन्मादी है। मथुरा में यही दिखा। एक सनकी और उन्मादी के पीछे हम भी उन्मादी होकर खड़े हो गए। कभी कोई आशाराम, कभी कोई नित्यानद, कभी कोई रामपाल, कभी कोई रामदेव, कभी कोई केजरीवाल, कभी कोई मोदी...के पीछे हम उन्मादित होकर चल देते है।

अपनी आँख, कान बंद रखते है। हमारे उन्माद को वे हवा देते है। कभी राष्ट्रबाद के नाम पे, कभी सेकुलरिज्म के नाम पे, कभी धर्म के नाम पे...और मथुरा में एक सनकी सुभाष चंद्र बोस के नाम पे हमें अफीम दी और हम जान ले लिए और जान दे दिए...

यह हमारे अंदर की हिंसा की मुखरता है। हिंसा हमारे अंदर है और वह किसी भी बहाने से बाहर आता है।

15 मई 2016

रक्तबीज, जो मार देने पर भी नहीं डरता..

रक्तबीज, जो मार देने पर भी नहीं डरता..

(पत्रकारों की हत्या पे एक पत्रकार "अरुण साथी" की आवाज़ और शहीद साथी को विनम्र श्रद्धांजली)
🔥🔥🔥🔥🔥
नश्वर देह से अनासक्त हो
कलम थामी
और लिया संकल्प
निडरता का...
🖋📖🖋
संकल्प लिया
जनता-जनार्दन की सेवा
और जनतंत्र की
अमरता का...

रे असुर, रुको
रक्तरंजित हाथों को साफ
करने से पहले
देखो तो,
दिखेगें तुम्हें
हजारों, लाखों
राजदेव
इंद्रदेव
निडर
अमर
अजर
और वह बोलेगा-

"तुम मार देना मुझे फिर से
और मैं फिर से
जिन्दा करता रहूँगा
मुर्दा कौमों को..."

और तब
तुम सोंचने लगोगे
आखिर यह कैसा
रक्तबीज है...

जो मार देने पर भी नहीं मरता...
जो मार देने पर भी नहीं डरता....
🙏🏿🙏🏿🙏🏿💐🙏🏿🙏🏿
(अरुण साथी, बरबीघा, बिहार)

25 अप्रैल 2016

शराबबंदी का असर, बिहार में शांतिपूर्ण पंचायत चुनाव सम्पन्न

शराबबंदी का सार्थक असर,पंचायत चुनाव शांतिपूर्ण सम्पन्न।

रविवार को बरबीघा में पंचायत चुनाव शांति पूर्ण सम्पन्न हो गया। चिलचिलाती धूप में ख़बरों के लिए घूमना महज औपचारिकता रही, सभी जगह कतार में लगे वोटरों की तस्वीर...।

निश्चित ही यह लोकतंत्र के मजबूती की निशानी है। जनता जनार्दन की जय है। दबंग से दबंग भी वोट के लिए आम आदमी की चिरौरी करते रहे। गरीब से गरीब भी शान से वोट देकर घर आये।

कुछ जगहों पे शांतिपूर्ण मतहरण भी हुआ। बोगस वोटिंग हुयी, पर आपसी सहमति से ही।

यह सब हुआ और यह प्रशासन की सफलता है पर इसमें सबसे अहम् रोल शराब बंदी का रहा। झगडे की जड़ शराब होती है, जड़ ही काट दिया गया तो झगड़ा कहाँ?

मोरल:- अब जरी मनि तो कुछ न कुछ होब्बे करतै भाय जी, लप्पड़ थप्पड़, नुकछुप के दारूबाजी...ई सब होलै ही...तब कि कहो हो..राम राज है...औ राम राज में भी सीता के बनवास तो होल है कि नै...

01 अप्रैल 2016

मरने से पहले आवाज़ सुनो...!

बृद्धापेंशन ही लाचार बुजुर्गों का आसरा है। आठ माह बाद यह मिल रहा है पर जिनके पास आधार कार्ड या बैंक खाता नहीं उनको नहीं दिया जा रहा है। कर्मी दुत्कार कर भगा दे रहे हैं। जबकि यह नकद दिया जा रहा है।
सरकारी ऑफिस की व्यवस्था से सभी वाकिफ है। आधार कार्ड बनाने या बैंक खाता खुलबाने में कई बार दौड़ाया जाता है। जो एक कदम चल नहीं सकते वे कितनी बार दौड़ेंगे! पर लालफीताशाही है, जो फरमान सुना दिया सो सुना दिया... देखिये बेचारी टुन्नी महारानी को, आँख का रेटिना शायद ख़राब है सो आधार नहीं बनाया गया पर पेंशन के लिए तो आधार जरुरी है...? और देखिये, बंगाली मांझी को..बेचारे इतनी गर्मी में भी स्वेटर पहन कर आये...शिकायत करने कि पेंशन नहीं दिया जा रहा...स्वेटर के बारे में पूछा तो सहजता से कहा... "इहे एगो बस्तर है त की पहनियै!" यह आवाज़ किसी गरीब के मर जाने से पहले उठाई है...शायद सरकार तक आवाज पहुँच जाये...बहुत लोगों को शिकायत है कि मरने के बाद आवाज़ उठाई जाती है, जिन्दा रहते नहीं...बंधू , मर जाने के बाद आवाज़ सरकारें थोड़ी सी सुन लिया करती है...जीते जी तो...नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बन जाती है..

22 मार्च 2016

जी लूँ जरा

जी लूँ जरा
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मन भर दुःख
दिए
और छटांक भर
ख़ुशी

पहाड़ सी
परेशानी दी
और
मुठ्ठी में रेत सी
हंसी...

अमावस की
रात सी
नफरत दी
और
जुगनू सा
टिमिर-टिमिर
प्रेम

परमपिता
टनों से राख तौलते है
और
रत्ती से सोना

रत्ती भर जो मिला
उस अमृत रस को
पी लूँ जरा
छटांक भर
ख़ुशी को
जी लूँ जरा
जी लूँ जरा

(अपने जीवन और अनुभव पे #साथी के दो शब्द)
22/03/2016