13 फ़रवरी 2017

आज अंतर्राष्ट्रीय रेडियो दिवस है, रेडियो की बहुत याद आ रही है..

(अरुण साथी)

आज फिर रेडियो को बहुत मिस कर रहा हूं । शारदा सिन्हा के गीत "पनिया के जहाज से पल्टनिया बन अईहा पीया" हो या कजरी, झूमर सरीखे लोकगीत। यह सब रेडियो की ही थाती है।

तकनीकी विकास के बावजूद आज आप सहजता से रेडियो को नहीं सुन सकते हैं।खासकर ग्रामीण इलाकों में मुझ जैसों को इसकी भारी कमी खलती है। महानगरों में एफएम सुनने की सुविधा है। हालाँकि उसमें भी ईयरफोन लगाने का पेंच लगा दिया गया है।

मोबाइल में एक भी एप्प्स नहीं है जिसके सहारे आप संगीत का आनंद रेडियो की तरह ले सकते हैं । खासकर विविध भारती को सुनना अच्छा लगता है पर यह संभव नहीं है। वहीं ग्रामीण इलाके में किसी भी एफएम रेडियो चैनल का एप्स लाइव प्रसारण नहीं देता है। ले दे की थोड़ा बहुत एफएम रेम्बो है। यह एक बड़ी कमी है तकनीकी विकास का, जबकि आप पुराने रेडियो के सहारे कई स्टेशनों से संगीत और समाचार सुन सकते थे। एक दूसरी कमी यह है कि रेडियो पर सरकारी समाचार माध्यम को छोड़कर कोई प्राइवेट समाचार माध्यम बहुत सक्रिय नहीं है।

समय को जब आज से बीस साल पूर्व लेकर जाता हूं तो आज जैसे स्मार्ट मोबाइल जीवन का एक हिस्सा बन गया है उसी तरह से रेडियो जीवन का एक हिस्सा हुआ करता था । हालाँकि स्मार्ट मोबाइल से जीवन में अवसाद, कड़वाहट और तनाव भी घुल रहा है पर रेडियो सुखद और आनंददायक था । आज भी याद है, विविध भारती का वह भूले बिसरे गीत या पटना के चौपाल कार्यक्रम पर मुखिया जी और मटुक भाई का विनोदपूर्ण संवाद, 7:30 के क्षेत्रीय रेडियो समाचार को सुनने के लिए कई लोगों को एक साथ इकट्ठा होना या विविध भारती के नए गानों को भी सुन कर आनंदित होना या बीबीसी के समाचार को लिए पहले से ही तैयार होकर के रहना या बिनाका गीतमाला और अमिन सयानी की वह दिलकश आवाज, बहुत सी यादें हैं । उस दौर में जब रेडियो पर संगीत सुना था वह आज भी मानस पटल पर छेनी और हथोड़ी से लिख दी गई इबारत की तरह है, एक एक शब्द स्वतः होंठों से निकल पड़ते हैं। जाने वे सुनहले पल लौटकर आएंगे भी या नहीं...

12 फ़रवरी 2017

डिजिटल इन्डिया की मार से बेहाल है बुजुर्ग

डिजिटल इंडिया की मार बुजुर्गों पे 

वृद्धा पेंशन बना जी का जंजाल,
बुजुर्गों को लगाना पड़ रहा है बलॉक और कर्मचारी का चक्कर ।
पेंशन की वजह से दिन भर भूखे रहते हैं बुजुर्ग


(बरबीघा। शेखपुरा/बिहार)

डिजिटल इंडिया की वजह से बुजुर्गोंकी स्थिति क्या है वह इस तस्वीर को देखकर समझा जा सकता है। वृद्धा पेंशन के लिए पिछले 6 माह से कागजी कार्रवाई हो रही है पर हर बार कुछ न कुछ गलती कर दी जाती है जिससे वृद्ध लोगों को काफी परेशान होना पड़ता है। इसी भूल को एक बार फिर सुधारने के लिए प्रखंड कार्यालय में कैंप लगाया गया है। शुक्रवार और शनिवार को लगे इस कैंप में 5 किलोमीटर और 7 किलोमीटर से पैदल चलकर बृद्धा ब्लॉक पहुंचे और अपने कागजात जमा किए । बड़ी संख्या में उपस्थित हुए वृद्धों को दिन भर भूखे रहकर अपनी पेंशन के लिए कागजात जमा देने पड़े।


क्या कहते हैं बुजुर्ग

सुरेश पंडित, सामस
"पिछले 6 माह से कई बार पासबुक और आधार कार्ड का फोटो स्टेट विकास मित्र को जमा किया है। पेंशन खाते में नहीं आई । हर बार कुछ न कुछ गलती कर दी जाती है।"
मोहन यादव,पिंजरी
"बहुत पैसा भी खर्च किया और कई बार कागज के लिए ब्लाक का चक्कर लगाया पर पेंशन आज तक नहीं मिला । आज भी सुबह से शाम हो गई है और भूखे प्यासे हम लोग बैठे हुए हैं । बुजुर्ग लोगों को इस तरह से काफी परेशानी हो रही है।"


मंजू देवी, भदरथी
"बूढ़ा-बूढ़ी को प्रशासन बहुत परेशान कर रहा है। हम लोग पेंशन लेने के लिए कितना दौड़े? 10 किलोमीटर तक पैदल चल कर कई बार ब्लॉक आई हूं । विकास मित्र भी कई बार कागज लिया पर कहीं सुधार नहीं हुआ , पेंशन नहीं आया।


रामदेव मांझी, काशीबीघा
"पेंशन क्या मिलेगा, उससे ज्यादा तो टेंशन मिल गया है। लाठी के सहारे रेंगते हुए कई बार ब्लॉक पहुंचा । कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक को कागज दिया पर पेंशन खाता पर नहीं आया बहुत परेशान हो रहे हैं हम लोग।


पप्पू कुमार, समाजसेवी, पिंजड़ी
"पेंशन के लिए कोई सहुलियत वाला रास्ता खोजना चाहिए था। कई किलोमीटर चलकर बुजुर्ग ब्लॉक पहुंचते हैं। उनको बहुत परेशानी होती है। बैंक के लोग गांव में कैंप लगाते तो बहुत सहूलियत होती । अब तो डिजिटल इंडिया हो गया है फिर भी वृद्ध लोगों को परेशान किया जा रहा है।


मिंटू सिंह, समाज सेवी, काशिबिघा
"वृद्धा पेंशन के लिए बुजुर्गों को परेशान करना उचित नहीं है। बैंक के लोग घर पर जाकर भी इस काम को कर सकते थे।"


क्या कहते हैं अधिकारी
प्रखंड विकास पदाधिकारी,राघवेंद्र कुमार
"सभी बुजुर्गों के खाते पर पेंशन की राशि समय पर नहीं जा सकी। इस का एकमात्र कारण किसी के नाम में गलती, तो किसी का आधार कार्ड सही नहीं होना था। इसी सब को सुधारने के लिए कैंप किया गया है ताकि वृद्धा पेंशन की राशि बुजुर्गों के खाते पर जा सके और उनको इसका लाभ मिल सके । और सहूलियत कैसे हो हम लोग इस पर विचार कर रहे हैं।

24 जनवरी 2017

देहाती लड़की का लव

देहाती लड़की का लव

(स्थान और सन्दर्भ -एक कसबे की सुनसान गली में प्रेमी युगल का संवाद है। देहाती सी लड़की साधारण भेष-भूषा में है और लड़का सम्पन्न परिवार का लगता है। संवाद स्थानीय मगही भाषा में और सच्ची घटना पे आधारित है।)

लड़का (उग्र होकर)- "छो महीना से कॉल नै करो हीं इहे तोर प्यार हाउ, केकरा से डर लगो हाउ..?"

लड़की (शांतचित) "डरे के कौनो बात नै हइ.. पर माय-बाप,समाज से लाज-बीज तो लगबे करतै ने..."

लड़का-" ई सब बहाना नै बनाउ। इतना डरपोक हीं त प्यार की करो हीं..?"

लड़की- "हमर प्यार के अग्निपरीक्षा मत ले....। अपन्न देख। बड़ी प्यार करो हीं त अभी फोन करके हमर सामने अपन्न बाबूजी के बताऊ...! बोलाऊ यहाँ..!"

लड़का- "ई कैसे होतय...? हमरा लाज-बीज नै है कि...?"

लड़की- "बताउ..!!! मर्दाना होके एतना डरो हीं त हमरा क
काहे ले डरपोक कहो हीं..!!!."

(तभी वहाँ से एक बुजुर्ग गुजर रहे थे। लड़का चुप होकर बगल हट गया।)

लड़की (तंज अंदाज में) "देख लेलीऔ तोर प्रेम औ हिम्मत..! अभी दोसर के देख डर गेलहीं त अपन्न से की हाल होतऊ..! दोसर के डरपोक कहे में जीभ नै कट गेलौ..?"

लड़का- तीन-चार साल पुराना है अपन्न प्यार और दर्शनों दुर्लभ...! कॉल भी नै..! लगो हैय भूल गेलहीं...?

लड़की- "प्यार करो हीं त दिल से करहीं देह से नै...!!! बड़ी देख लेलिऔ तोहर प्यार औ हिम्मत...जे साथ खड़ा नै रह सको हइ...जे दू डेग साथ नै चल सको हइ उ कौची प्यार करतै....!!! तों हमरा भूल जैमहिं पर हम जिनगी भर नै भूलबौ...जहिना जीवन भर ले साथ चले के हिम्मत होतऊ कह दिहें...!!!

मैं ठुकमुक सा सबकुछ सुन रहा था। वहीं बगल में ही खड़ा था। लड़की ने देख के अनदेखा कर दिया था। सबकुछ सुन मन ब्रह्मांड में कहीं खो सा गया..। प्रेम की यह ऊंचाई एक देहाती लड़की की है! शायद सच्चा प्रेम इसी ऊंचाई और गहराई को कहते है। यह गहराई भी तभी आती है जब कोई सच्चा प्रेम करता है...।

13 जनवरी 2017

जय बिहार..!!!!

नशा मुक्त बिहार होगा, अकल्पनीय था ! पर नीतीश जी ने अपने जिद्द से इसे सच कर दिया। अब 21 जनवरी को विश्व के मानचित्र पे नशा मुक्त बिहार की तस्वीर चमकेगी। सेटेलाइट मानव श्रृंखला की तस्वीर खींचेगी। मानव श्रृंखला की यह तस्वीर नशा मुक्त बिहार का होगा। अब इस तस्वीर में हमारी भी एक तस्वीर हो, हमें इसके लिए आगे आना चाहिए।

नशा और बिहार का अनुनाश्रय सम्बन्ध था। गली-गली शराब बिकती थी। शाम ढलते ही रास्ते और सड़कों पे शराबियों का कब्ज़ा होता था। गांव और मोहल्लों में भद्दी-भद्दी गालियों की आवाज हुंकारते थे। मार-कुटाई से पत्नियों की चीत्कार और बच्चों का कारुणिक क्रन्दन आदमी को आदमियत पे अफ़सोस जाहिर करने पे मजबूर करता था। गरीब और ख़ास कर दलित-मजदूर अपनी कमाई का सारा हिस्सा शराब खाने में दे आते थे। घर के चूल्हे रोटी और भात के बगैर उदास रहते थे। बच्चों का भविष्य शराब की मादक उन्माद में डूब कर दम तोड़ देता था। 

पर्व के मायने बदल गए। परंपरा और संस्कृति पे शराब ने कुठराघात किया। बात सरस्वती पूजनोत्सव से शुरू करें तो युवा वर्ग शराब में डूब कर विद्या की देवी का अपमानित और कलंकित करते जरा नहीं झिझकते। सरस्वती प्रतिमा बिसर्जन जुलूस में बेटियों की दुपट्टे खींच लिए जाते और माँ शारदे बेबस होकर देखती रहती। होली की संस्कृति बदल गयी। शराबियों का साम्राज्य सड़कों पे होता। गांव-गांव इसका कुठाराघात हुआ। शहर और गांव के लोग होली में घरों में दुबकने लगे। गांवों में ढोलक, झाल और मंजीरे की आवाज थाम गयी। मनभावन और चुटीले होली गीत की जगह भद्दी भद्दी गालियां गुंजित होने लगी। दशहरा, दिवाली सभी के मायने बदल गए। उत्सव का अर्थ शराब था।
बारात जैसे परम्परा विलुप्तावस्था में पहुँच गयी। लड़ाई-झगड़े के डर से दो दिन तक बाराती के रहने की परंपरा ख़त्म हुयी। सभ्य या कहे सीधे-साधे लोग बारात जाने से परहेज करने लगे। यह कुरीति गांव-गांव पहुंची तो दस और बारह साल के बच्चे शराब खाने में देखे जाने लगे। 

और सबसे अधिक शराब के नशे में सड़क हादसे आम हो गयी थी। शराबी या खुद मारते, या किसी और को मार देते। 

अब यह सब बदल गया। पूर्णतः ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगी। जितना बदला यह ही अकल्पनीय था। सड़क हादसे थम गए। गालियों का शोर शराबा रुक गया। सड़कों पे उपद्रव थम गया। सबसे निचले तबके के मजदूर दो पैसा कमा कर घर लौटने लगे। खामोश चूल्हे मुस्कुराकर धुआँ उगलने लगे। बच्चे स्कूल देख लिए। बारात शांति पूर्वक दरबाजे लगने लगे। सम्पन्न हुए नवबर्ष पे शराबबंदी की पहली राहत भरी तस्वीर दिखी। कितना कुछ बदल गया। सबकुछ कैसे बदल सकता है। 

इन सब के साथ ही यह भी सच है कि कुछ युवा शहर और गांव तक में शराब की तस्करी करने लगे। जैसा की स्वाभाविक है। पुलिस और प्रशासन तक हिस्सा बंटता है। पैसे वालों को घर पे शराब पहुँच जाती है। कुछ पकड़े भी जाते है। जो भी हो पर शराब आज बिहार में जघन्य अपराध है। जैसे हत्या, बलात्कार, चोरी अपराध होने की वजह से नहीं रुका वैसे ही शराब भी नहीं रुकेगा। अपराधी अपराध करेंगे। पकडे जाने पे जेल जायेंगे। अब यह हमें तय करना है कि हम असामाजिक और अपराधी के साथ खड़ें होंगे या एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज निर्माण में गिलहरी की तरह सहभागी बनेंगे। जय बिहार।

12 जनवरी 2017

“विवेकानंद और वेश्‍या” – ओशो

ऐसा हुआ कि विवेकानंद अमरीका जाने से पहले और संसार-प्रसिद्ध व्‍यक्‍ति बनने से पहले, जयपुर के महाराजा के महल में ठहरे थे। वह महाराज भक्‍त था, विवेकानंद और रामकृष्‍ण का। जैसे कि महाराज करते है, जब विवेकानंद उसके महल में ठहरने आये,उसने इसी बात पर बड़ा उत्‍सव आयोजित कर दिया। उसने स्‍वागत उत्‍सव पर नाचने ओर गाने के लिए वेश्‍याओं को भी बुला लिया। अब जैसा महा राजाओं का चलन होता है; उनके अपने ढंग के मन होते है। वह बिलकुल भूल ही गया कि नाचने-गाने वाली वेश्‍याओं को लेकर संन्‍यासी का स्‍वागत करना उपयुक्‍त नहीं है। पर कोई और ढंग वह जानता ही नहीं था। उसने हमेशा यही जाना था कि जब तुम्‍हें किसी का स्‍वागत करना हो तो, शराब, नाच, गाना, यही सब चलता था।
विवेकानंद अभी परिपक्‍व नहीं हुए थे। वे अब तक पूरे संन्‍यासी न हुए थे। यदि वे पूरे संन्‍यासी होते, यदि तटस्‍थता बनी रहती तो, फिर कोई समस्‍या ही न रहती। लेकिन वे अभी भी तटस्‍थ नहीं थे। वे अब तक उतने गहरे नहीं उतरे थे पतंजलि में। युवा थे। और बहुत दमनात्‍मक व्‍यक्‍ति थे। अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो बस उन्‍होंने अपना कमरा बंद कर लिया। और बाहर आते ही न थे।
महाराजा आया और उसने क्षमा चाही उनसे। वे बोले, हम जानते ही न थे। इससे पहले हमने किसी संन्‍यासी के लिए उत्‍सव आयोजित नहीं किया था। हम हमेशा राजाओं का अतिथि-सत्‍कार करते है। इसलिए हमें राजाओं के ढंग ही मालूम है। हमें अफसोस है, पर अब तो यह बहुत अपमानजनक बात हो जायेगी। क्‍योंकि यह सबसे बड़ी वेश्‍या है इस देश की। और बहुत महंगी है। और हमने इसे इसको रूपया दे दिया है। उसे यहां से हटने को और चले जाने को कहना तो अपमानजनक होगा। और अगर आप नहीं आते तो वह बहुत ज्‍यादा चोट महसूस करेगी। इसलिए बाहर आयें।
किंतु विवेकानंद भयभीत थे बाहर आने में। इसीलिए मैं कहता हूं कि तब तक अप्रौढ़ थे। तब तक भी पक्‍के संन्‍यासी नहीं हुए थे। अभी भी तटस्‍थता मौजूद थी। मात्र निंदा थी। एक वेश्‍या? वे बहुत क्रोध में थे, और वे बोले,नहीं। फिर वेश्‍या ने गाना शुरू कर दिया। उनके आये बिना। और उसने गया एक संन्‍यासी का गीत। गीत बहुत सुंदर था। गीत कहता है: मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही; यह मालूम मैं मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?
कहते है, विवेकानंद ने अपने कमरे में सुना। वह वेश्‍या रो रही थी। और गा रही थी। और उन्‍होंने अनुभव किया-उस पूरी स्‍थिति का। उन्‍होंने तब अपनी और देखा कि वे क्‍या कर रहे है? बात अप्रौढ़ थी, बचकानी थी। क्‍यों हों वे भयभीत? यदि तुम आकर्षित होते हो तो ही भय होता है। तुम केवल तभी स्‍त्री से भयभीत होओगे। यदि तुम स्‍त्री के आकर्षण में बंधे हो। यदि तुम आकर्षित नहीं हो तो भय तिरोहित हो जाता है। भय है क्‍या? तटस्थता आती है बिना किसी विरोधात्‍मकता के।
वे स्‍वयं को रोक ने सके, इसलिए उन्‍होंने खोल दिये थे द्वार। वे पराजित हुए थे एक वेश्‍या से। वेश्‍या विजयी हुई थी; उन्‍हें बाहर आना ही पडा। वे आये और बैठ गये। बाद में उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ईश्‍वर द्वारा एक नया प्रकाश दिया गया है मुझे। भयभीत था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी। मेरे भीतर। इसीलिए भयभीत हुआ मैं। किंतु उस स्‍त्री ने मुझे पूरी तरह से पराजित कर दिया था। और मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा। वे अश्रु इतने निर्दोष थे। और वह नृत्‍य गान इतना पावन था कि मैं चूक गया होता। और उसके समीप बैठे हुए, पहली बार मैं सजग हो आया था। कि बात उसकी नहीं है जो बाहर होता है। महत्‍व इस बात का है जो हमारे भीतर होता है।
उस रात उन्‍होंने लखा अपनी डायरी मैं; “अब मैं उस स्‍त्री के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था। और कोई भय न होता।” वे उसके पार जा चूके थे। उस वेश्‍या ने उन्‍हें मदद दी पार जाने में। यह एक अद्भुत घटना थी। रामकृष्‍ण न कर सके मदद, लेकिन एक वेश्‍या ने कर दी मदद।
अत: कोई नहीं जानता कहां से आयेगी। कोई नहीं जानता क्‍या है बुरा? और क्‍या है अच्‍छा? कौन कर सकता है निश्‍चित? मन दुर्बल है और निस्‍सहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण तय मत कर लेना। यही है अर्थ तटस्‍थ होने का।

– ओशो

[पतंजलि: योग सूत्र भाग—1]

26 दिसंबर 2016

हाजमे की दवाई क्यों नहीं लेते...

आज कल सोशल मीडिया पे अजीब-गजीब प्राणी विचरण करने लगे है। कुछ तो जैसे दूसरी दुनिया के एलियन हो! कुछ जूलियन असांजे और जग्गा जासूस! कुछ की तो प्रजाति का पता उनके मूँह खोलने से होता है और कुछ की प्रजाति तब सामने आती है जब उनका हाजमा खराब हो जाता है। हद तो यह कि खराब हाजमे की वजह से उनकी दुर्गन्ध सोशल मीडिया पे फ़ैल जाती है। दुर्गन्ध की वजह से कुछ तो आँख पे कपड़ा रख के निकल लेते है और कुछ तो वहीँ उल्टी कर देते है। 

खैर, जहाँ तक दुर्गन्ध फ़ैलाने की बात है तो यह भी एक बीमारी है। अब देखिये, आप कहीं महफ़िल में बैठे है और कोई गंध छोड़ देता है! परेशानी यह नहीं है कि वह दुर्गन्ध फैला रहा है। परेशानी यह है कि उनको कब्ज की बीमारी है और वे दवाई भी नहीं लेना पसंद करते है। या उनको कोई शुभचिंतक कब्ज हर, कायम चूर्ण, पेट सफा गिफ्ट नहीं करता। खैर, लोगों का क्या है, नाक पे रुमाल रखकर निकल लेंगे, भाई बाद में यह बीमारी गंभीर और लाइलाज हो जायेगी तब क्या करोगे...।

उधर देखिये, एक बीमारी और है। हाजमा ख़राब होने की। इसी धरती पे कुछ प्राणी है जिनको धी नहीं पचता! अब इसमें उनकी क्या गलती है, घी की गंध से भी वे दुर्गन्ध छोड़ने लगते है। यदि घी खा लें तो वे छेर के रख देते है। इससे दिक्कत कुछ भी नहीं है। बस यह दुर्गन्ध सोशल मीडिया पे फ़ैल जाती है और उल्टी हो जाता है।

अरे हाँ, कुछ प्रजाति ऐसे भी है जिनको उजाला पसंद नहीं है। उजाला मने नील टिनोपाल नहीं, रौशनी। मने की उनको अँधेरे में ही दिखता है। दीया जला नहीं कि वे अंधे हो जाते है। उनको तकलीफ होती है। स्वभाविक है वे दीया का विरोधी होंगे।

प्रजाति से याद आया, आस्तीन का सांप भी एक प्रजाति ही है। और असांजे से याद आया, भाई चेहरा छुपा के थूक काहे फेंकते हैं अपने शहर में अब कौन कोई दादा या छोटे सरदार है जो आपको डर लगता है। बहादुरी ही दिखानी है तो सामने से आईये...बाकी आपकी महानता, विद्वता आदि पे किसी को शक नहीं है...!

खैर, बीमारी है तो उसका ईलाज भी होगा ही। है ही। कब्ज, हाजमा ख़राब, रतौंधी..सबका ईलाज संभव है। भाई विज्ञान तरक्की भले कर गया हो पर आपके बीमारी का ईलाज तो केवल बाबा जी के पास ही है। देशी योगा। बाबा जी बता रहे थे, कुत्तसान, उलूकासन योग इसमें बहुत प्रभावी है।

हाँ, यदि नमोमोनिया या केजरिमोनिया नामक बीमारी है तो इसका इलाज अभी तक ईजाद नहीं हुआ है। बाबा राम देवता को इसमें बहुत स्कोप नजर आ रहा है, उनके चेले चपाटी इसके लिए शोध कर रहे है, कोई न कोई जड़ी-बूटी या आसान खोज ही लेंगे। इसके मरीज बहुत हैं, सो मुनाफा भी बहुत होगा। वैसे कुत्तभुकबा आसान इस तरह की बीमारी में कुछ फायदा करता है, ऐसा रामखेलाबन काका कह रहे थे। आजमा के देखिये, शायद असर हो जाये...तब तक दुर्गन्ध फैलाते रहिये...और बाकी लोग नाक पे रुमाल रखके निकल लेंगे...जय हो
(Twitter @arunsathi , facebook arun.sathi )

21 दिसंबर 2016

सौ में सौ बेईमान, फिर भी मैं महान!!

नोटबंदी के बाद पता नहीं क्यों अचानक कामरेड छोटन सिंह गांव के चौक चौराहे पे भाषण देते घूम रहे है "एक मच्छर, आदमी को हिजड़ा बना देता है, सौ में सौ बेईमान फिर भी मैं महान!! मेरा देश महान!!" अब इन बातों का अर्थ आपको समझ नहीं आती तो आप टीवी चैनल खोलकर देखिये, या संसद का शीतकालीन सत्र देखिये, या सोशल मीडिया पे आईये, मेरे जैसे इत्ते ईमानदार मिलेंगे की आपको सौ के आगे की गिनती का अविष्कार करना होगा।

खदेरन चाचा पूछ ही लिए "आयं हो सौ में सौ बेईमान तो ईमानदार के है?" सौ में सौ बेईमान, मने की जब हम इसे लिख रहे होते है या आप पढ़ रहे होते है तब हमें पता है कि हमने कहाँ बेईमानी की है पर उपदेश पेलना है,सो देखिये, पेल रहे हैं।

कहते है कि अबतक जितने नोटों ने जन्म लिया था लगभग सबके सब ने बेचारे बैंक पहुँच कर सरेंडर कर दिए है फिर भी बाहर अभी बहुत से नोट गिरफ्तार हो रहे है, क्या समझे, नहीं समझे न! समझियेगा कैसे, यही तो खेल है। जा के पूछिये गांव के पार्लियामेंट में भाषण देते रामखेलाबन काका से, कहेंगे "दुर मरदे, ई बैंकबा में सब नकली रुपैया जमा हो गेलई औ असली अभी बाहरे है।, नोटबंदी गरीब ले हल, लाइन लगा देलक! बड़का डकैत तो सब नया नोट ट्रक से ले जाके घर में रख लेलक।

नोटबंदी और कालाधन का आध्यात्मिक पहलु भी है। अध्यात्म में भक्त और भगवान् होते है, बाकि संसार तो माया है! माया मने वही बहनजी, दीदी, दादा, नेताजी, युवराज अदि इत्यादि..। इनके पेट में मरोड़ के बाद आम आदमी का करेजा चौड़ा हुआ था पर युवराज और प्रधान जी में मुलाकात के बाद राजनीतिक पार्टी को मिली हैवी डिकॉउंट ने सब पोल खोल दिया। खेलाबन काका कहते है " पब्लिक है सब जानती है, अब जाके भक्त और गैर भक्त सभी को समझ आया कि सदन क्यों नहीं चलाया गया या चलने नहीं दिया गया!"

आध्यात्मिक पक्ष समझिये, दो चक्की के बीच गरीब आदमी पीस रहा है। प्रधान जी की सिंहगर्जन है कि नोटबंदी गरीब की भलाई में है। विपक्ष एक जुट होकर हुआ हुआ करते हुए नोटबंदी को गरीब विरोधी बता रहे है। अब कबीर दास ने तो पहले ही कह दिया था "दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।" बाकई बैंक की लाइन में लगे गरीब आदमी से पूछिए तो कहेंगे "कष्ट है पर देश के लिए सह लेंगे।" बिलकुल उसी तरह जैसे बच्चे को जन्म देने से पूर्व महिला दर्द सहती है!! लो जी, आपको कुछ साबुत नहीं मिलेगा। सब पिस-पास के एक कर दिया गया है। होना भी एक ही था। आखिर जब भी कोई चीज बहुत बारीकी से पिस दी जाती है तो सब एक सा हो जाता है।

नोटबंदी को भी बहुत बारीक़ से पीस दिया गया है। आम आदमी के पास ऐसी चलनी नहीं की गेहूं और घास-फूस के पिसे हुए आटे से अलग कर सके! सो मजे लीजिये, बिहारी लिट्टी का। गर्मी बहुत है भाय। नोटबंदी की चटनी के साथ टेस्टी लगेगा।
बाकि कामरेड छोटन सिंह को बिना श्रोता के गाने दीजिये:-

चुनाव में  करतो नेता करोड़ हे खर्च,
नोट के बदले वोट, जनता के हे मर्ज,
पार्टी के पैसा के हिसाब देबे में हे दर्द,
जनता की अंटी से पैसा खींचना हे फर्ज,

कालाधन वाला ही सब अब बनल है राजा,
जनता बाजाहो कालाधन औ नोटबंदी वाला बाजा!!




18 दिसंबर 2016

मुंहझौंस पत्थरा से चूर देबौ, बम मार देबौ

मुंहझौंस पत्थरा से चूर देबौ, बम मार देबौ..

शराब बनाने वाली महिलाओं का यह गुस्सा पुलिस द्वारा आयोजित संवाद कार्यक्रम में देखने को मिला। शराब बनाने वाले लोगों को कड़े कानून के प्रति जागरूक करने और शराब नहीं बनाने के लिए प्रेरित करने के लिए पुलिस यह अभियान चला रही है। इसका आयोजन बरबीघा नगर के नारायणपुर मोहल्ले में किया गया था। इसमें पुलिस, प्रशासन, मीडिया और जागरूक लोग जुटे थे। बड़ी संख्या में चुलौआ शराब बनाने वाली जुटी थी। महिलाएं कुछ समझने को तैयार नहीं थी। वे समझाने गए लोगों से उलझ गयी। पुलिस को धमकी तक दे दी।
संवाद सुनिये..थानाध्यक्ष नवीन कुमार और महिलाओं की।

"किसी को बख्शा नहीं जायेगा, आज न कल सबको पकड़ना है। छापेमारी जारी रहेगी।"

" तो ईंट पत्थर से चूर देंगे!!"

"पुलिस भी बचाव में गोली चला सकती है।"

"हम भी बम मार देंगे।"

मैंने समझाते हुए कहा कि शराब की बजह से लोगों की मौत हो जाती है तो महिलाओं का जबाब था "जो शराब नहीं पीते उनकी मौत कैसे हो जाती है?

सबलोग हक्का बक्का रह गए...

19 नवंबर 2016

कालाधन का मीडिया अर्थशास्त्र और छुटभैय्या रिपोर्टर

नोटबंदी ने एक बार फिर पत्रकारिता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अंधभक्ति और अंधविरोध। चैनल पे यही दिखता है। मैं एक ग्रामीण रिपोर्टर हूँ। गांव-देहात का रहने वाला, छुटभैय्या रिपोर्टर। मेरी बात को स्पेस कहाँ मिलेगी। फिर भी अपना अनुभव लिख दे रहा हूँ, शायद कुछ नजरिया बदले।

आठ तारीख की रात जब नोट बंदी हुयी तो उसी रात 60 बर्षीय शम्भू स्वर्णकार (बरबीघा, बिहार) का निधन हो गया। सुबह मुझे भी जानकारी मिली। मैं छानबीन कर ही रहा था कि एक टीवी ने ब्रेक कर दिया, नोट बंदी से स्वर्ण व्यवसायी का दिल का दौरा पड़ने से निधन!! मैंने जानकारी जुटाने के लिए उसके एक पड़ोसी मित्र को कॉल किया तो वह भड़क कर कहा "भाई वह एक गरीब आदमी है, उसके पास 100/50 नहीं तो 500/1000 का नोट बंद होने से उसे कैसे दिल का दौरा पड़ेगा! तुम मीडिया वालों को तो अब जूते से पिटाई होगी।"

खैर, फिर मैंने एक स्वर्ण व्यवसायी से संपर्क साधा तो वह भी भड़का हुआ था। कहा कि वह सोना जोड़ने का काम करनेवाले कारीगर और मेरा 350 रुपये उधार सौ तकादा में नहीं दिया। उसके बेटे ने भी इसे खारिज कर दिया।अख़बार ने खबर दी "स्वर्ण व्यवसायी की मौत की नोट बंदी से होने की उडी अफ़वाह!!!"

समझिये, नोटबंदी का असर मकान बनाने वाले दिहाड़ी मजदूरों पे कितना पड़ा इस खबर को बनाने  लिए मैं अपने यहाँ मजदूर मंडी गया। लगा की यहाँ तो विपत्ति होगी, वैसा कुछ नहीं मिला। ज्यादातर मजदूर काम पे चले गए, कुछ बचे तो लगा की इनसे ही खबर बना लेता हूँ, पर देखिये, एक बुजुर्ग बयान देने लगे की नोट बंदी की मार पड़ी है और काम नहीं मिल रहा तभी बगल से एक मजदूर भुनभुनाया "ई रिटायर्ड माल हैं सर, कौन काम देगा।" मैं लौट आया। हालाँकि थोड़ा असर मजदूरों पे हुआ ही है, जैसा की लाजिम है पर बकौल मजदूर सब एडजस्ट हो गया है। 500 का नोट 400 में साहूकार ले लेता है।

मैंने पहले भी कहा है "नोटबंदी का अर्थशास्त्र मैं नहीं समझ पाता। तात्कालिक परेशानी थोड़ी है पर लोगों के माथे में यह बात बैठ गयी है कि यह देशहितार्थ है, सो तकलीफ झेल लेंगे। गरीब भी खुश है कि यह अमीरों को मार है।

हाँ, यह भी निश्चित है कि कुछ लोग है ही जो वास्तव में परेशान है। वो बोलते है। उनकी आवाज भी उठती है पर नोटबंदी पे एकबार फिर मीडिया (चैनल) कठघरे में है। इसे आमलोगों में वायरल इस जुमले से समझा जा सकता है कि "नोटबंदी से ndtv पे लोग मर रहे है! आजतक पे थोड़े परेशान है! जी न्यूज़ पे लोग खुश है!!

मेरे जैसा छुटभैय्या रिपोर्टर सबकुछ समझ भी नहीं सकता! मीडिया हॉउस का अपना अर्थशास्त्र है। कालाधन का। निश्चित ही यह उसपे भी प्रहार है। कई न्यूज़ चैनल तो बिल्डरों और माफिया के पैसे से चमक रहा है सो उनको क्यों ख़ुशी होगी? बाकि राजनीति है, मीडिया हॉउस का अपना अपना। कुछ मीडिया मर्डोक भी है। पर देश आम आदमी की ताकत के चलता है, चलता रहेगा..नोटबंदी भला है या बुरा यह भविष्य की गर्त में है..पर नेताओं की बौखलाहट आम आदमी की ख़ुशी बन गयी है..बाकि एकरा से जादे माथा हमरा नै हो..राम राम जी।

15 नवंबर 2016

मोदी डाल-डाल तो कालाधनी पात-पात, देखें कौन किसको देता है मात! "कालाधनी" ने खोजा चोर दरवाजा, आम आदमी को लाइन में लगाया!

मोदी डाल डाल तो कालाधनी पात पात, देखें कौन किसको देता है मात!

"कालाधनी" ने खोजा चोर दरवाजा, आम आदमी को लाइन में लगाया!

"अरुण साथी"

विपक्ष का यह तर्क की कालाधन वाले कहीं लाइन में नहीं है? आम आदमी ही लाइन में है। विपक्ष यही आम आदमी से मिलकर यह बयान देता तो शायद बात उलटी होती। आम आदमी कष्ट के बाद भी खुश है, अपवाद छोड़कर। ऐसा है क्यों..?

बैंक के लाइन में लगे गरीब-गुरबा लोग गुस्सा दिखाते है पर अंत के यह कहके खुश हो जाते है कि कालाधन वापस आएगा..तो देश मजबूत होगा! हालांकि आम आदमी मेरी ही तरह अर्थशास्त्री नहीं है पर उनको लगता है इससे कालाधन निकलेगा..। और उसी लाइन में वह वे दिहाड़ी मजदूर भी है जिनको कालाधनी लोग दिहाड़ी देकर नोट बदलने के लिए लाइन में लगा दी है। बैंकों में कोलाहल हल्का हुआ..! लोग स्वीकार कर चुके है।

खैर
कालाधन के बड़े बड़े मगरमच्छ कालाधन को खपाने का चोर दरवाजा खोज लिया गया है। हो सकता है इसी बहाने कालाधन सफ़ेद हो जाये। बड़े बड़े मगरमच्छ टैक्स सलाहकार से चोरी का उपाय पूछ रहे है। इसी उपाय के तहत अब बड़े बड़े कंपनी, कारखानों के मालिक अब अपने मजदूरों को एक साल या छः माह की सैलरी कैश में दे रहे है। बिहार के कई मजदूरों के परिजन गांव में खुश है। कुछ "कालाधनी" मजदूरों को दिहाड़ी देकर पैसे को बदलने के लिए भेज रहे है।

बृद्धाश्रम छोड़ आए माँ का आदर बढ़ गया और उनके खाते में नोट जमा हो गए, यह आश्चर्य नहीं तो क्या है?

बड़े बड़े कालाधनी नेता-मंत्री भी चोर दरवाजे से कालाधन खपा रहे है। रिश्तेदार, व्यवसायी, और विश्वसनीय कार्यकर्ताओं को पैसे का बंडल थमाया जा रहा! इसका अर्थशास्त्र पर क्या असर होगा और कालाधन वापस आयेगा या सफ़ेद होगा, मेरा माथा काम नहीं करता।

मेरे यहाँ भी कालाधनी नेता कालाधन खपाने के लिए निरीह जनता को मोहरा बना लिया है। उनको दिनभर की मजदूरी दी जाती है और बेचारा आम आदमी लाइन में लगकर 4000 का कालाधन सफ़ेद कर आ जाता है। कुछ अपने खाते में लाख भी जमा कर रहा है, बाद में निकाल कर देने के भरोसे..।

आम आदमी को इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह पैसा उनके ही चूसे खून का है, सो श्री मान बड़े बड़े नेता जी जिस भीड़ का आप हवाला दे रहे है वह आपका ही लगाया हुआ भीड़ है। जो आम आदमी भीड़ में दिख रहा है वह आपने भी जमा किये है..!

कुछ मगरमच्छ खुलेआम 20 से 40 प्रतिशत पे कालाधन खपाने में जुट कर मोटी कमाई कर रहे है। उधर एक विश्वस्त व्यपारी की माने तो चना दाल की कीमत पर लगाम लगाने के लिए जब मोदी जी विदेश से दाल निर्यात किया तो भाव तो गिरे पर कालाबाजारी फिर उस दाल को कालाधन से कालाबाजार में जमा कर लिया, मोदी जी को उसी समय कालेधन की माया समझ में आ गयी।

फिर भी, कालाधन का यह अर्थशास्त्र आम आदमी नहीं समझ पा रहा। आम आदमी ने मोदी जी की बात पे भरोसा किया है। यह भरोसा टूटेगा या रहेगा, भविष्य की गर्त में है।

14 नवंबर 2016

जय की स्टाइल में बीरू की टांग खिंचाई

एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में अपने मित्र को जोड़ने के बाद उनका परिचय जय के अंदाज में कराया..एक स्वस्फूर्त व्यंग्य.. पढ़िए..
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नए साथी का परिचय पत्र साथी की तरफ से।
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श्रीमान अभय कुमार, सकलदेव नगर, बरबीघा निवासी। हाल-मुकाम कटिहार।

पेशा- दूसरे की मौत का भयादोहन करने वाले वाले गिरोह का सरदार*

लक्षण- आदमी के बहुत कम लक्षण है पर आदमी का सबसे बड़ा गुण, पैसे का पीछा शौचालय से लेकर शयनकक्ष तक करने का गुण विद्यमान।

श्री गदर्भ जी महाराज के सभी लक्षण प्रचुरता से विद्यमान। जैसे की ढेंचू ढेंचू भाषा का प्रकांड विद्वान होना। दुलत्ती मारने का प्रशिक्षण जारी है पर अभी तक दुलत्ती मारना सीखे नहीं है।

दांत निपोड़ने के गदर्भ कला में पारंगत। और हाँ लीद करने की कला भी आती है इसलिए आसान नसमझें... और यह कि इनकी भी श्रीमती ( श्री देवी नहीं ) से फटती है..यानि यह दूसरा गुण भी गदर्भ और आदमी के सामान्य रूप से समान है। 

और यह की (दीन) दुनिया से निश्चिन्त है। अपने "काम" को सर्वाधिक प्राथमिकता देते है। पठन कला में माहिर है पर गदर्भ योनी की वजह से यह कला भी बिलुप्त हो गयी।

और हाँ, मेरे मित्र है, फेसबुक फ्रेंड नहीं , सो संभल के कमेंट करिएगा..

और अंत में ये कहीं भी कभी भी सु सु कर सकते है...और श्री मान एसबीआई लाइफ नमक धोबी के गधे है सो आगे आप समझ ही जाईयेगा..

कम लिखना अधिक समझना आपकी परंपरा रही है। बाकी गुण से मैं अभी तक अपरिचित हूँ सो आप लोग खोज ही लीजियेगा..

*(sbi life बीमा कंपनी में मैनेजर)

अरुण साथी का शोले वाली मैसी के सामने जय वाली स्टाइल में अपने मित्र का एक परिचय..अब आपकी बारी है..

08 नवंबर 2016

पत्रकारिता मरी तो लोकतंत्र भी मर जायेगा...

Ndtv पे प्रतिबंध हटाये जाने से कुछ लोग खुश है और कुछ दुखी।  ndtv पे एक दिन का प्रतिबंध लगाए जाने से बहुत लोग बहुत खुश भी थे।

स्वाभाविक है, कुछ लोग गुजरात दंगे पे आज भी खुश होते है। खैर सबकी अपनी-अपनी मानसिकता है। हाँ थोड़ा दुःख है कि कुछ पत्रकार मित्र भी ndtv पे बैन से खुश थे। (सरदाना को पत्रकार नहीं कहा जा सकता..)
कुछ बातें कहने से पहले यह साफ़ कर दूँ की मैंने बैन का विरोध किया, इसका मतलब यह नहीं कि एनडीटीवी के पूर्वाग्रही पत्रकारिता का समर्थन करता हूँ। मैंने कई बार ndtv और रविश कुमार की पत्रकारिता की आलोचना की है।

खैर, कुछ लोग कहते है कि यह एक सहज प्रतिबंध था, मीडिया का आपातकाल नहीं! सही कहते है। यह मीडिया का आपातकाल नहीं था, यह आपातकाल का एक छोटा सा प्रयोग था। राष्ट्रवाद की चाशनी में लिपटी हुयी। यह प्रयोग जन  दबाब में असफल हुआ। भारत यही है। विश्व में भारत का मान इसी से है। भारत सेकुलर राष्ट्र इसलिए है कि भारतीय (बहुसंख्य) सेकुलर है।

खैर, आज ndtv को पूर्ण बैन करने की मांग करने वाले भी बहुत है, होंगे ही। वही लोग बैन के खिलाफ लिखने पे ट्रोल कर रहे थे। स्वाभाविक है उनको ये बाते अच्छी नहीं ही लगेगी। उनके लिए जी न्यूज़ सर्बश्रेष्ठ है पर यही यदि काँग्रेस की सरकार उस समय जी न्यूज़ पे बैन करती तो शायद प्रतिक्रिया यही होती, जो मेरी थी।

एक बात और साफ कर दूँ कि बहुत लोग पत्रकारिता पे प्रश्नचिन्ह लगा रहे है, लगनी भी चाहिए। यह हमारी उदारता है कि हम समाज तो गन्दा रखेंगे और दूसरे से इसे साफ़ रखने की उम्मीद! फिर भी मैं इस राय का हूँ कि लाख पतन के बाद भी पत्रकारिता अभी जिन्दा है। जिस दिन पत्रकारिता मरी, उसी दिन देश में लोकतंत्र मारेगा।।

दूसरी बात यह की बैन के बहाने न्यूज़ चैनलों को आत्ममंथन का अवसर मिला है। ndtv बिलाशक पूर्वाग्रही पत्रकारिता करती है। रविश कुमार को नरेंद्र मोदी से नफरत है, यह कैमरे के सामने दिखता है। ठीक उसी तरह जैसे जी न्यूज़ वाले प्रवक्ता पत्रकारिता करते है। सरदाना का मोदी भक्ति कैमरे से सामने मुखर होता है। आज हम कह सकते है कोई मीडिया हॉउस विश्वसनीय नहीं है। कोई इसके तो कोई उसके सापेक्ष है। निरपेक्ष कोई नहीं।

रामनाथ गोयनका अवार्ड देते हुए प्रधानमंत्री ने एक तीखी बात कही थी। उन्होंने कहा कि आज भारतीय मीडिया विश्वसनीय नहीं है। इसके लिए लोग विदेशी मीडिया हॉउस की तरफ देखते है, हमें विश्वसनीय बनना होगा। आज के सन्दर्भ में शायद ही यह हो।

और अंत में
आखिर ऐसा क्यों है कि आज पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने पे वह लोग हंगामा नहीं करते जो मनमोहन के समय में करते थे! सर्जिकल स्ट्राइक पे तो सभी लोग सीना छपन्न कर लिया पर आज भी रोज जवान शहीद हो रहे तो छाती पिचुक क्यूँ नहीं जाती...! आज भी तो दाल मंहगी है...फिर ॐ शांति क्यूँ? मतलब साफ है, आप भगवा पार्टी के प्रवक्ता है...आम आदमी नहीं...!

(ख़बरदार जो किसी ने आम आदमी के नाम से केजरीवाल का नाम जोड़ा, खून पी जाऊंगा।।। श्रीमान अभी करोड़ों से खेल रहे है)

(नोट:- पोस्ट पे अपनी राय दें, ट्रोल न करें। वैसे ट्रोल वालों को रविश ने कहा था "ओ आप ट्रोल है। नेताजी का लठैत।")

06 नवंबर 2016

छठ की जिम्मेवारी का स्थान्तरण


माँ की जिम्मेवारी बंदरी ने ले ली है। बड़ी जिम्मेवारी है छठ व्रत करना। इस साल पहली बार अर्धांगनी रीना ने यह जिम्मेवारी ली है और छठ कर रही है। माँ दमा की मरीज थी सो तीन साल पहले से ही छठ करना बंद करा दिया। इस साल रीना स्वयं छठ कर रही है।

हमारे लिए छठ अभी तक ग्लैमराइज़्ड नहीं हुआ है। हमारे लिए यह एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है। माँ जब तक छठ की, उसकी कई यादें है। चूल्हे की मिट्टी, गोइठा के लिए गोबर इत्यादि आना। प्रसाद से लेकर अन्य कार्य में हाथ बंटाना। खैर अब यह जिम्मेवारी बंदरी के जिम्मे है। बच्चे माँ के साथ उसी तरह है।
ऐसा लग रहा है जैसे सबकुछ पूर्व निर्धारित हो..।

आध्यात्मिक अनुष्ठान के इस अनुभूति के बीच मालती पोखर तालाब में सेल्फी ली और स्नान करने के बहाने दूर तक तैर लिया। प्रत्येक साल इसी तालाब में तैर लेता हूँ। लगता है कहीं भूल न जायूँ....जय छठ मईया।।

बागों में बहार है, प्रजातंत्र बेकार है..

बागों में बहार है, प्रजातंत्र बेकार है
(अरुण साथी)

गजबे बात हो, खेलाबन काका आज भारी गरम हका!! कहे..कि गांव के चंदू चाचा के दालान पर जे चौकड़ी लगल हे, ओकरा में नायका लड़का सब गर्गदह मचईले हल। सब नमो नमो के जय जय करो हल। खेलाबन काका धान काट के आ रहला हल। हाथ में हँसुआ अ माथा पर हरियर धान। फुदकना टोक देलक-

"का हो काका, नाइकी बहुरिया के नाईका चूड़ा खिलाबे के जोगाड़ कर देल्हो..?"

सब के पता हल काका भड़क जईता "तोहर बाप के की लगो हाउ।" ऊ बोझा पटक के भांजे लगला।।

खैर, इहे बीच हाथ में टीवी वाला मोबाइल लेले, पॉकेटमार काट बाल कटइले। (जिसे विराट कट आज कहा जाता है वह पहले पॉकेटमार के पकड़े जाने पे इसी तरह आधा माथ मुड़ा दिया जाता था) मसुदना के लफुआ बेटा गरजे लगल।

"ठीक होलो, ई पाकिस्तानिया चैनल पर इमरजेंसी लगा देलक। जब खोलहो त विरोधे में बोल रहल हें। भला बोलहो! ई कउनो बात होल। विरोधे करे के हो त राजनीति करहो, न्यूज़ चैनल काहे..!!

इतनै में झपुआ टोक देलक "हम तो कहो हियो ई इमरजेंसी ठीके हइ। ई सब ऐसे सुधरे वाला नै हो। चौहत्तर में जे इमरजेंसी लगल हल सुनो हूँ बड़ी अच्छा हल। भ्रष्टाचार बंद। अपराध बंद। केकर मजाल जे खोंख दे, तुरंत अंदर...।"

खदेड़ना बोल बैठल "एनकाउंटर सही हो तब सलाम, फर्जी हो तब लाखों सलाम। ई देश में एसहि कर दहो सबके काम तमाम।"

"हाँ हो, से तो ठीके कहलहीं, ई देश में बड़ी उमताहा सब बैठल हई। कोई पाकिस्तान जिंदाबाद करो हई, कोई भारत के टुकड़ा करो हई। मने जेकर जे मर्जी करे लगो हई। भला बोलहो ई कौन बात होल। ई देश के सुधार करे ले हिटलर के जरुरत है, फाइनल।।"खेसारी भी बोल देलक।

इतनै में काका टोक देलका
"चार दिन के लौंडा ससुर, इमरजेंसी के बात करे हें। तोरा की पता की आज़ादी की होबो हई। गुलामी देखलहिन हैं नै तब? अरे प्रजातंत्र हई तब सब के आज़ादी हई। जेकर मन जे करे। अब कोई बाल बच्चा ख़राब हे त ओकरा कोई बाप मार देहै!"

"हाँ काका, बगैर हिटलर ई देश नै सुधरतो। एकदम ठीक हो रहलो हें। ई विरोधिया सब अनाप-शनाप बोलते रहो हई।" कई लोग सुर में सुर मिला देलक।

काका में माथा जोर-जोर से घूमे लगल। सांय सांय के आवाज आबे लगल, हिटलर, हिटलर, हिटलर....काका के माथा में इमरजेंसी के दिन घूमे लगल। घर से उठा के पुलिस थाना ले गेल और उल्टा लटका के धो देलक हल, एक साल जेल में बंद रहला। आज तक पता नै चलल की उनका गलती की हल। पुलिस भी तब हिटलर बोलो हल अपना के..बाप रे..!

" ई प्रजातंत्र हई बउआ, एकरा में विरोधी के जगह देल जाहै। सब तोरे नियर "मन के बात" कहे करतौ। भाटगिरी औ चारणी सब नै करो हई। कोय कोय होबो हई जे सच बोले के, सच लिखे के बीमारी के मरीज होबो हाइ.. ओकरो रहे दहो...हाँ, बाकि ई देश में अब पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, हिन्दू-मुसलमान इहे सब मुद्दा हो...हमर घर में अबरी छठ पर्व में मँहगा रहे से बूंट के दाल नै बनलो !! एकर कोय चिंता हो, इहो धर्म हई। उपजा देलियो औ धान खरीदे वाला कोई नै, बेटा बेरोजगार घर बैठल हई। रेलवे में नौकरी ले दस लाख मांग रहल हें..मने के ई कैसन अच्छा दिन आल समझे में नै आबे हे..बाकि हिटलर हो की औरंगजेब सब के भक्त होबे करो हइ, दुनिया एसहि चलो हई, चले दहो..!!! गाते रहो #बागों_में_बहार _है। हमको कट्टरता से प्यार हे। प्रजातंत्र बेकार है। नमो नमो जयकार है। मन की बात ही समाचार है। बाकी सब न्यूज़ बेकार है। डर के रहो, राजा सरदार है। राष्ट्रवाद सा नाजी हथियार है। आपातकाल आने को तैयार है।