16 जनवरी 2019

हिंसात्मक होते समाज का सच और आंखों देखा हाल..

अरुण साथी

सड़क हादसे में मौत के बाद जो मंजर आजकल विभिन्न जगहों पे देखने को मिलती है वह बहुत ही डरावना और भयावह है। किशोर और युवा इसमें बहुसंख्यक होते है। फिर रोड जाम से शुरू होकर गाड़ियों में आग लगाने, यात्रियों को पीटने, पुलिस और प्रसाशन को गाली गलौज और उससे मारपीट, स्थानीय दुकानों पे पथराव, आगजनी जैसे भयावह माहौल में सबकुछ बदल जाता है।

आंखों देखी डरावनी सच

इस मामले बीती शाम भी आंखों देखी बात है। कॉलेज के पास हुए हादसे के एक मिनट में मौके पे पहुंच गया। नो एंट्री में घुसे ट्रक में दो बाइक सवार को रौंद दिया। कई नौजवान आक्रोश में थे। नौजवानों ने घायल को जबरन वाहन को रोककर अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की, पर किसी ने मदद नहीं की। सभी निकल गए। एक कार वाले बंधु स्वेच्छा से आगे आये। बाहर के लोग थे। खैर वे अस्पताल ले गए। कईं लोग फोटो खींच वायरल करना ज्यादा जरूरी समझ तो किसी ने मृतक का मोबाइल भी चुरा लिया।

कुछ युवाओं ने खूब मदद की पर उस मंजर को देख अभी भी सिहर जाता हूँ।

दोनों युवक तड़प रहे थे और मैं विवश था। स्थानीय थाना ने मोबाइल नहीं उठाया। पुलीस अधीक्षक दयाशंकर जी ने तत्काल रिसीव की। उनके द्वारा पुलिस को भेजने की बात कहीं गयी पर आधा घंटा लगा पुलिस को आने में। तबतक एम्बुलेंस के लिए भी कॉल किया पर वह भी आधा घंटा में पहुंचा। हमसब वहां बेचैन थे। एक को जिसे ट्रक ने रौंद दिया था उसे मृत समझ लिया गया पर सांस चलने की बात पे अस्पताल पहुंचाने में लग गए। खैर फिर कोई तैयार नहीं हुए। कोई नहीं रुका।

जो महसूस किया या रोज देखता हूँ वह ज्यादा डरावना है

मौके पे जो महसूस किया वह बहुत डरावना है। पुलिस मौके पे पहुंचने से पहले चौकीदार को भेज वहाँ का माहौल पता किया। फिर बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ पदाधिकारी मौके पे पहुंचे। पहुंचते ही लाश को उठाया और पोस्टमार्टम के लिए ऐसे भागी जैसे लाश वहां रहेगी तो बिस्फोट हो जाएगी। पदाधिकारी मृत युवक के मृत होने को लेकर जांचने की कोशिश नहीं की। मैंने ध्यान दिलाया तो प्रयास हुआ। फिर बताया कि सदर अस्पताल में पोस्टमार्टम से पहले डॉक्टर जांचते है।

उधर नौजवान आक्रोशित हो रोड जाम लगा दिया। उसी में एम्बुलेंस भी पहुंची पर बेकार। और अस्पताल के भी यहीं होता। रेफर करना।

रेफर करना एक भय या जिम्मेवारी से भागना।

अस्पताल में घायल मरीज को सबसे पहले प्राथमिक उपचार नहीं करके रेफर करने की प्रक्रिया की जाती है। इसका एक कारण जिम्मेवारी से भागना है तो दूसरा मौत के बाद हंगामे का डर। फिर पटना रेफर कर दिया जाता है और 100 किलोमीटर जाते जाते ज्यादातर मरीज की मौत हो जाती है। डॉक्टर में यह धारना बन गयी है कि मौत के बाद हंगामा होगा और उनके जान को आफत हो सकता है, जो सच भी...!!

हादसे का जिम्मेवार कौन..?

कल के हादसे का जिम्मेदारी ट्रक चालक और पुलिस की ही है। निश्चित। नो एंट्री में पैसे और रसूख से ट्रक प्रवेश करा दिया जाता है और ट्रक जल्दी से भागने के चक्कर मे हादसे को अंजाम दिया। खैर, चालक सहित कल ट्रक पकड़ लिया गया। पुलिस द्वारा, पर यदि पब्लिक पकड़ती तो क्या हो जाता...? देखने वालों ने बताया कि हादसे के बाद ट्रक चालक भागने के चक्कर मे ट्रक को बैक किया जिससे ट्रक घायल होकर गिरे युवक पे चढ़ गई और नतीजा मौत..!

इसी तरह के कई मामलों में कई जगहों पे तो चालक को पीट पीट कर मर दिया गया। आग के हवाले कर दिया जाता है। नतीजा। चालक हादसे के बाद भागने में ऐसा नर्भस होते है कि कई हादसे हो जाते है।

बाईकर्स की गलती

मैं तो बाइक चालक के हादसे में मौत के बात कई बार कह चुका हूं कि अब सहानुभूति नहीं रखता। जरा भी नहीं। कितने हादसे को नजदीक से देखा है। ज्यादातर में बाइक चालक की गलती होती है, अपवाद को छोड़कर। कल की घटना अपवाद है।

जैसे मैट्रिक परीक्षा के दौरान बाइक के पीछे उल्टा बैठकर कर सेल्फी लेने के दौरान चालक मित्र को भी पीछे देखने ले लिए कहने और संतुलन बिगड़ने के बाद गिरने और पीछे से ट्रक के चढ़ा देने में किसे दोष दीजियेगा?

उस मामले में भी जो बबाल हुआ वह आज भी डरावना है।

खैर, अब आईये आक्रोश पे। निश्चित रूप से हम एक भ्रष्टाचार युक्त समाज में रहते है। नतीजा सामने है। फिर भी जो मंजर कई बार देखा वह हमारे अंदर के हिंसा की ही प्रतिमूर्ति है।

कल भी परिवार के लोगों ने जाम को खत्म की बात कही। जैसा कि प्रवधान है बीस हजार तत्काल राहत और चार लाख मुआवजा की तो अधिकारी ने इसकी प्रक्रिया की। चार लाख तत्काल नहीं मिलना है। उसकी प्रक्रिया है। पेचीदा भी। फिर भी बहुत लोग को मिला है।

रोड जाम और हंगामा का मनोविज्ञान

रोड जाम और हंगामा ज्यादातर मामले में मुआवजे के लिए होती है। प्रक्रिया में अधिकारी के आश्वासन के बाद परिवार के लोग जाम खत्म करने के लिए आग्रह करते है पर कोई उनकी नहीं सुनता। कल शाम ऐसा ही मंजर था। जाम खत्म की घोषणा के बाद पुलिस गाड़ियों के बढ़ाने लगी। तभी कृष्ण चौक के उपद्रव करके लौटे युवाओं की टीम परिवार वालों से कहाँ मानने वाले। तोड़फोड़ शुरू ही रखा। और तभी एक स्विफ्ट कार में अपने छोटे बच्चों और महिलाओं से साथ जा रहे कार पे भीड़ ने हमला कर दिया। बड़े बड़े पत्थर फेंके जाने लगे, लाठी से हमला हुआ। मंजर अकल्पनीय। किसी की हिम्मत नहीं। फिर भी कुछ ने प्रयास किया। बच्चे और परिवार बस ईश्वर को याद करने लगे। ओह!

ओशो कहते है

खैर, यह आक्रोश हमारे अंदर की हिंसा का धोतक है। आचार्य ओशो एक प्रवचन में कहते है। हिंसा हमारे अंदर है। यदि किसी दिन अखबार में हत्या, बलात्कार की खबर न हो तो हम कहते है आज कोई खबर नहीं है अखबार में! हम हिंसक है। भाई भाई में झगड़ा करते है पर परोसी से हो तो एक हो जाते, फिर गांव गांव हो तो एक हो जाते और फिर देश देश से हो तो एक हो जाते। यह हमारी हिंसात्मक होने का प्रतीक है।

जो भी हो, इस आक्रोश से नुकसान तो समाज का ही होना है। डर से पुलिस नहीं आएगी, डॉक्टर इलाज नहीं करेंगे...और मरना हमे ही है..

बात तो बड़ी हो करेके पर की फायदा? लोग के उपदेश हो कि सोशल मीडिया पर जादे भचरभचर करे से कोई फायदा नै होतो। एकतो कोई पढतो पूरा बात नै और उपदेश पेल देतो, दोसर! नकारात्मक बात के भेलू बड़ी हो....तबहियो अप्पन हिस्सा के काम तो करे के चाही..हई कि नै..

23 दिसंबर 2018

छुट्टा सांढ़...

( व्यंग्यात्मक रचना है दिल पे न लें)

तीन विकेट उखड़ते ही दो बातें हुई। एक, हूआ हूआ कर रहे सियारों का शोर ऐसे थम गया जैसे रंगा सियार का राजफाश हो गया हो। दूसरा, बच्चा क्लास से लगातार दादा जी और दादी जी की पैरवी से ग्रेस मार्क्स लेकर चौथा क्लास में लगातार चौथी बार फैल कर रहा पप्पू पास हो गया।

दोनों बातों के होते ही, फिर दो बातें हुई। एक, जैसे गांव देहात में एक लबनी धान होते ही डमरू दारू पीकर नितराने लगता है वैसे ही पप्पू की टीम नितराने लगी। दूसरी, गप्पू की टीम ऐसे ओलहन देते हुए अरझि परझि मारने लगी जैसे रामपुरवाली चाची भर ट्रक दहेज लाने वाली नई नवेली दुल्हिनिया को बात बात एक चौका में पीढ़ा नहीं देने के लिए ताना देती हो।

दोनों बातों के होते ही, फिर दो बातें हुई। एक फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप से आम आदमी ऐसे भाग खड़ा हुआ जैसे खेत में छुट्टा सांढ़ के आते ही गाय-गोरु सब साईड धर लेता है, चरने दो मन भर! जो बचेगा उसी को चरेंगे! और सांढ़ चरता कम है, खेत की फसल को बर्बाद ज्यादा करता है। जितना चरता है, जाने कैसे उससे ज्यादा गोबर करता है। गंध मचा देता है। बदबू फैला देता है।

दूसरी बात, फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप पे विजेता टीम ऐसे जश्न रूपी उधम मचाने लगी जैसे राजा जी की भैंस बियाने पे गांव भर जोरदार पार्टी में उधम होता है।

डीजे के फूल वॉल्यूम फूल अश्लील ही नहीं उससे दो कदम दोअर्थी भोजपुरी गाना और नर्तकी नृत्य, बम पटाखा और दोनाली से धड़ाम धड़ाम! जाम पे जाम। सब कुछ।

खैर ई सब के बीच अपने रामखेलाबन काका गांव के चौखंडी पर बक रहे थे।

"देख बौआ, शक्ति के संतुलन जरूरी हउ...उहे होलो..एकरा में अनपच काहे हो...तो सब जे एत्ते एत्ते काम गिना रहली हें से कन्ने हउ। अरे कजगा पर तो सब दिन अच्छा दिन रहबे कैल हें! धरतिया पर ने उतार मर्दे त जनियो..भाषण से कत्ते दिन पेट भरत...!"

(छुट्टा सांढ़ का मतलब समझ नहीं आया हो तो किसी बिहारी से पूछ लीजिएगा..ठीक है..)







12 दिसंबर 2018

भक्त नाराज है..मन की बात कहिये नहीं, मन की बात सुनिए..

बीजेपी के विरोध में पोस्ट करते थे तो जो भक्त मित्र तर्क कुतर्क के साथ लड़ाई झगड़े पे आ जाते थे आज वे नाराज है। वे सवर्ण समाज के मित्र है। चाय चौकड़ी से लेकर गांव के दालान तक वे मोदी जी के लिए झगड़ते थे पर साढ़े चार साल बाद वे हताश है।

एससी एसटी मुद्दे पे कांग्रेसी सियासी शतरंजी चाल में फंसी बीजेपी शाहबानो की ही तरह अपने पैर पे कुल्हाड़ी मार ली। वोट बैंक बड़ा भले न हो पर भोकल वोट बैंक को खोना भारी पर गया। रही सही कसर आरक्षण के मुद्दे पे अंदर अंदर हवा देकर विपक्ष ने आग जलाए रखी।

पॉइंट एक प्रतिशत से हार हुई है जबकि नोटा को डेढ प्रतिशत वोट मिला।

हार का कारण कई होते है। एक कारक कभी नहीं होता। पर उसी में मुख्य कारक है सवर्णों की नाराजगी। उधर दलितों में पैदा की गई बीजेपी विरोध को अध्यादेश के माध्यम से कम नहीं किया जा सका। सोशल मीडिया से लेकर गांव चौपाल तक। सवर्ण और दलित दोनों खुश है। दोनों को लगता है बीजेपी को हरा दिया। कांग्रेस को जिता दिया ऐसा कम सवर्ण  सोंचते है।

उधर व्यपारियों को जीएसटी और नोटबन्दी से जो परेशानी हुई उसका भी व्यापक असर है। ये कैडर वोटर थे। आज कमोवेश नाराज है। इसका कारण भी है। जीएसटी और नोटबन्दी ने इनकी कमर तोड़ दी है। आजतक परेशान है।

और इधर उज्जवज योजना, फ्री बिजली योजनाओं का झूठ भी है। कहा जाता है कि फ्री रसोई गैस और बिजली दी जा रही। यह पूरी तरह झूठ है। रसोई गैस और बिजली कनेक्शन फ्री नहीं इंस्टॉलमेंट पे दिया जा रहा। जो राशि एक मुश्त लेनी थी उसे सब्सिडी से काट लिया जाता है। बिजली बिल में हर माह जोड़ कर बसूली होती है।

किसानों की कमर तोड़ दी गयी। बातें बड़ी-बड़ी भले हो पर लाभ नहीं मिल रहा। फसल बीमा फैल है। लाभ नहीं मिल रहा। समर्थन मूल्य की घोषणा हवा हवाई। ऊपर से दलहन और तेलहन की कीमत विदेश के अनाज आयात करने से नीचे चली गयी। किसान को लागत से आधे दाम पे फसल बेचनी पड़ी। किसान प्याज फेंक रहे है।

जनधन का फूटा ढोल

जनधन योजना में खाता खोलने को बड़ी उपलब्धि बताई जाती है। यह फूटा ढोल है। ज्यादातर खाते बेकार हो गयी। इसके माध्यम से मिलने वाला जीवन बीमा का लाभ भी पैसे के अभाव में नहीं मिलता। महज 12 रुपये खाता में नहीं होने से जीवन बीमा का लाभ नहीं मिल पाता। सरकार क्या 12 रुपये प्रति व्यक्ति नहीं दे सकती ताकि सभी को बीमा का लाभ मिले!

बड़े मुद्दे भी है

हर साल रोजगार नहीं मिलना और पकौड़ा को रोजगार बताना बेरोजगार नौजवान के मुँह पे एक तमाचा था। वे हताश हो गए। कालाधन की वापसी नहीं। लोकपाल जैसे मुद्दे गौण होना। राफेल घोटाला पे पारदर्शी स्पष्टीकरण नहीं देना। मन की बात कहना, और मन कि बात नहीं सुनना कारण है।

पेट्रोल, डीजल की मंहगाई से भारी मार पड़ी है और इसे सरकार मजाक में उड़ा देती है।

एक बड़ा कारण राम मंदिर बनाने जैसे मुद्दे पे बीजेपी को घेर कर यह बताया जा की वादा नहीं निभाया, एक बड़ा कारण है। भक्त राम मंदिर मुद्दे पे बीजेपी द्वारा छल करने की बात सरेआम कहने लगे है।

हार के कारण कई है इसपे आत्ममंथन की जरूरत है और आत्ममंथन इस बात पे भी हो कि हार का कारण कई लोग अहंकार क्यों बता रहे...?

कई कारण है। सबसे बड़ा कारण एन्टी इनकंबेंसी भी हो सकता है। फिर भी 2019 में बहुत कठिन है डगर पनघट की।

06 दिसंबर 2018

अरे साला रिक्शा

अरे साला रिक्शा

नगर के जाम में रिक्शा के आगे अपनी बाइक लगा कर जाम लगाने के अपराधबोध से मुक्त युवक ने सीधा सीधा रिक्शा चालक को गाली देनी शुरू कर दी।

"अरे साला रिक्शा नै जना हउ रे, ले पीछे। मार के फाड़ देबौ!"

वह नौजवान दबंग दिखने का भरपूर कोशिश कर रहा था। बाइक पे नए फैशन का महाकाल स्टिकर चिपका हुआ था। रिक्शा वाला जैसे तैसे रिक्शा पीछे लिया।

नौजवान ने बाइक आगे बढ़ा ली। सामने एक स्कार्पियो गाड़ी था। जैसे ही गलत साईड बाइक सवार नौजवान स्कार्पियो के सामने गया उसपे सवार दबंग जैसा व्यक्ति भड़क गया।

"अरे मादर..., साला, काट के गाड़ देंगे। साला तुम्हीं लोग जैसे लफुआ कि गलती से यह जाम है। जैसे तैसे गाड़ी घुसा देता है।"

नौजवान चुपचाप बाइक साईड करने लगा और मैं सोंच रहा था कि इसे ही कहते है हम पर तुम, तुम पर खुदा।

04 दिसंबर 2018

गौ हत्या के नाम पे इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या भीड़ ने नहीं की, विचारधारा ने की है..

अरुण साथी

शहीद सुबोध सिंह इंस्पेक्टर के पुत्र ने हम सब से पूछा है कि "आज हिंदू मुस्लिम विवाद में मेरे पिता की मौत हुई है? कल किसकी होगी? यह भी बता दो यार.. क्या इसका जवाब है हम सब के पास?"

बुलंदशहर में गौ हत्या ने नाराज लोगों ने सुबोध सिंह इंस्पेक्टर सहित दो लोगों की हत्या कर दी। यह हत्या भीड़ का इंसाफ है परंतु इस हत्या से खून के छींटे उन सब के दामन पर हैं जो धर्म और भावनाओं की राजनीति करके ऐन केन प्रकारेण इस तरह की कोशिशों को तर्क वितर्क करके सही ठहराते हैं।

यह आग जो आग लगी है यह एक दिन की नहीं है। बरसों से इसे हवा दी जा रही है। जब भीड़ की हत्या में शामिल हत्यारों को हम फूल-माला देकर सम्मानित करते हैं। सोशल मीडिया पर उनके कसीदे गढ़े जाते हैं और धर्म का जिंदाबाद कहा जाता है तब यह उसी समय तय हो जाता है कि एक हत्यारे के साथ खड़ा होकर कहीं ना कहीं हम भी उस हत्या में शामिल है।

उत्तर प्रदेश में जो हत्या हुई है उसमें कम से कम उन लोगों को शोक व्यक्त करने का जरा भी अधिकार नहीं है जो धर्म की राजनीति को हवा देते हैं। ऐसा जब मैं कह रहा हूं तो इसका मतलब मेरा एक पक्ष से कतई नहीं है। जो लोग शरीयत के नाम पर चीजों को सही ठहराते हुए आंख मूंदकर किसी का विरोध करते हैं वैसे लोग भी इसी में शामिल हैं जो गौ हत्या के नाम पे आदमी की हत्या जैसे मामले में खामोश होकर या तर्क से सही ठहरा कर छाती चौड़ी करते हैं।

आज देश में बिलकुल ही खतरनाक स्थिति है और यह खतरनाक स्थिति केवल इसलिए नहीं है कि एक पक्ष के कट्टरपंथी हावी हैं और उनकी सरकार है। बल्कि इसलिए भी है कि दूसरे पक्ष के लोग केवल एक पक्ष को ही तुष्टीकरण करते रहे जिससे नाराजगी की वजह से दूसरा पक्ष आज भारतीय जनता पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है।

भारत के सेकुलरिज्म को दक्षिणपंथी से उतना खतरा नहीं है जितना सेकुलरिज्म के नाम पर एक पक्ष को समर्थन करने की राजनीत से है।

वोट बैंक के लिए जब हम एक पक्ष का समर्थन करते हैं तो दूसरा पक्ष भी ध्रुवीकरण होता है। आज इस वैश्वीकरण के युग में जब दुनिया मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे रही हो

मेरा देश अमानवीयता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भले ही हम युवा पीढ़ी के डंके बजाते हो परंतु आज युवा पीढ़ी के मन में प्रगतिशीलता, विकासवाद और पोंगापंथी के खंडन की बात नहीं है बल्कि उनके माथे में धर्म का नशा है! उन्माद है! गुस्सा है! जहर है! विस्फोट है! विध्वंस है! सर्वनाश है!

इस आग को वोट के लिए जो भी हवा दे रहे हैं आज नहीं तो कल उनका भी घर चलेगा और जल भी गया है! उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में शहीद इंस्पेक्टर इसी के उदाहरण है। आगे और भी भयावह स्थिति होने वाली है।

सुबोध सिंह को मेरा नमन! सुबोध सिंह की हत्या केवल उस भीड़ ने नहीं की जो उस समय वहां थी बल्कि उसने की है जो उस भीड़ के साथ हमेशा से खड़ी है! हत्यारा होते समाज को मेरा धिक्कार है...

01 दिसंबर 2018

किसान आंदोलन! चोंचलेबाजी या होगा किसानों का भला

किसान आंदोलन सिर्फ चोंचलेबाजी या किसानों का होगा भला.

अरुण साथी

किसानों का मुद्दा फिर आज बीच बहस में है। दिल्ली की सड़कों पर रैलियां हैं और सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी विरोधी किसानों की रैली की तस्वीर के साथ साथ मीडिया को भी कोस रहे। बिकाऊ मीडिया पर रैली को नहीं दिखाने का आरोप है।

इसी क्रम में आज तक जैसे न्यूज़ चैनलों पर किसानों की रैली का कवरेज मैंने देखा। एक झलक यह भी देखा कि जब मीडिया के लोग वाइट लेने के लिए कैमरा आगे किया तो सूट-बूट में एक व्यक्ति पूरी तरह से अंग्रेजी झाड़ते हुए किसानों की समस्या पर बात कर रहे थे। तभी यह बात समझ गया की यह रैली पूरी तरह से प्रायोजित है।

दरअसल किसानों की स्थिति इसीलिए नहीं सुधरती क्योंकि किसान खुद अपनी समस्या को लेकर आगे नहीं आ रहे हैं।

कर्ज माफी समाधान नहीं

इसी तरह के प्रायोजित आंदोलनों की वजह से किसान को उनका हक नहीं मिल रहा। राजनीतिक लोग केवल किसानों की समस्याओं का समाधान किसानों की कर्ज माफी में देखते हैं। हालांकि कुछ लोग स्वामीनाथन रिपोर्ट को भी लागू करने की बात कह रहे हैं जिसमें यह कहा गया है कि लागत से डेढ़ गुना किसानों को मिलना चाहिए। किसानों की मूलभूत समस्या बहुत गंभीर है और गांव में किसान मजबूरी में ही खेती कर रहे।

बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाकों में जो स्थिति है वह ज्यादा भयावह है। यदि किसी घर का लड़का हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, सूरत में जाकर कमाई नहीं करें तो उसे नोन रोटी पर भी आफत हो जाए।

कहने का मतलब यह कि किसान अब मजबूरी में ही खेती कर रहे हैं। किसानों की समस्या का समाधान कर्ज माफी मुझे दिखाई नहीं देता। कर्जमाफी केवल राजनीति का स्टंट है।

क्या है समाधान

किसानों की समस्याओं का समाधान सबसे सहज रूप में इस तरह से देखा जा सकता है कि किसानों के खेतों को सिंचाई के लिए मुफ्त में बिजली और पानी मिले। किसानों को खेतों में देने के लिए उर्वरक सस्ते दामों पर मिले। बिचौलिए उसको नहीं हड़प न ले।

किसानों को बीज के जंजाल में आज फंसा दिया गया है। खेती करना आज एक महंगा सौदा हो गया है। बीज की कीमत इतनी अधिक हो गई है कि कर्ज लेकर किसान बीज खरीदते हैं और खेतों में लगाते हैं और यदि मौसम ठीक नहीं रहा तो वह कर्ज में डूब जाते हैं।

पहले ऐसा नहीं होता था। पहले किसान अपने ही बीज से खेती करते थे कुछ इसी तरह के प्रयोग की जरूरत है।

दूसरी समस्या किसानों को फसल बेचने में होती है। सरकार सब्सिडी तो कुछ फसल पर देती है और सहकारिता वाले किसानों से धान भी खरीदते हैं परंतु यहां राजनीति का पंगा जबरदस्त है। किसानों से पैक्स वाले धान खरीदते हैं पर भ्रष्टाचार का आलम यह है कि 2 साल से कई किसानों को उसकी फसल का पैसा नहीं मिला।

आलम यह है कि किसान को पता भी नहीं होता और उनके नाम पर फसल बिक जाती है और पैसा पैक्स अध्यक्ष उठाकर मौज उड़ाता है।

एक और गंभीर समस्या किसानों के साथ यह भी देखने को मिलती है कि मजदूर नहीं होने से खेती एक बड़ी गंभीर विषय हो गई है। इसलिए भी लोग इस से मुंह मोड़ रहे। मजदूर अधिक पैसे की मांग करते हैं और किसान उतना देने में सक्षम नहीं होता।

मशीन अभी सब बेकार है

मजबूरन मशीन पर आश्रित होना पड़ता है परंतु इस वैज्ञानिक युग में जहां हम मंगल ग्रह पर जा रहे हैं और तरह तरह की तकनीक है परंतु खेती के सटीक उपयोग के लायक तकनीक आज भी नहीं है। जैसे धान अथवा गेहूं के फसल की कटाई का जो यंत्र है हार्वेस्टर वह पूरी तरह से बेकार और बकवास है।

हार्वेस्टर मशीन से धान की कटाई तो होती है परंतु उसका परली छोड़ दिया जाता है जो जलाने पे किसान मजबूर होते हैं और उनके मवेशी को चारा भी नहीं मिल पाता।

होना यह चाहिए था कि मवेशी का चारा भी बन जाता और धान भी निकल जाता। गेहूं में भी यही स्थिति है। फसल का बीज तो निकलता है परंतु उसके चारा बनाने का प्रक्रिया बहुत ही परेशानी वाला है।

इस यंत्र को ट्रैक्टर के साथ ऐसा बनाया जाना चाहिए था कि फसल से बीज भी निकल जाए और पशु का चारा भी बन जाए तो किसानों में खुशहाली होती।

सब्सिडी घोटाला

किसानों के यंत्र खरीदने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी अधिकारियों के जेल में चला जाता है। जो सामान बाजार में ₹100 में उपलब्ध है वहीं सब्सिडी पर ₹200 मूल्य का मिलता है और सरकार इस पर ₹100 की सब्सिडी देती है। यह सब्सिडी अधिकारियों के जेब में चला जाता है इसलिए किसान का इसमें कोई भला नहीं।

कहने का मतलब यह है कि राजनीतिक से किसान का कभी भला नहीं होगा और सब से बड़ी बात यह है कि किसान अपनी समस्या खुद है । चुनाव में कभी भी किसान किसान नहीं होते। किसान हिंदू-मुस्लिम में बांटते हैं। किसान जातियों में बांट दिए जाते हैं। जब तक किसान अपनी समस्या को लेकर खुद आगे नहीं बढ़ेगा तब तक किसानों का भला यह राजनीतिक दल कभी नहीं कर सकते।

जो रैलियों के माध्यम से अपनी रोटी सेकना चाहते हैं। आप भले ही नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए बहुत सारा भीड़ जुटा लीजिए पर इस भीड़ से ना तो किसान का कल्याण होगा और ना ही किसान के घर में खुशहाली आएगी धन्यवाद।

31 अक्तूबर 2018

मंदिर मस्जिद साथ साथ एकता दिवस पे बिशेष

#एकता_दिवस #मंदिर_मस्जिद साथ साथ

आज एकता दिवस है। मंदिर मस्जिद का मुद्दा फिर चुनाव आते ही चरम पे है। विकास, रोजगार, रोटी का मुद्दा गौण। इसके लिए केवल नेताओं को दोषी मानना गलत है। नेता तो व्यपारी है। जो माल सबसे अधिक बिकेगा वही माल दुकान में सजायेंगे।

पर पता नहीं गांव के लोगों को मंदिर मस्जिद मुद्दे के बारे में पता भी है या नहीं। यह तस्वीर बहुत कुछ कहती है। यह तस्वीर है शेखपुरा जिला के बरबीघा प्रखंड के डीह निजामत गांव की।

मंदिर और मजार दोनों साथ साथ हैं। मंदिर में भी पूजा होती है और मजार पर भी चादर चढ़ाई जाता है। मुसलमान अपने इबादत में रहते हैं और हिंदू अपनी पूजा में।

आज तक कभी किसी विवाद की बात सामने नहीं आयी।

यह अलग बात है कि सोशल मीडिया, न्यूज़ चैनल और राजनीतिज्ञों के द्वारा देश की एकता खतरे में बताई जाती है परंतु गांव के लोग देश की एकता की डोर मजबूती से थामे हुए है।

बाकी तो जो है से हैइये है।

खुदा एक है घर अलग अलग बसा लिए हमने!
कहीं मस्जिद, कहीं गिरजा, कहीं मंदिर बना लिए हमने!!

हिंसात्मक होते समाज का सच और आंखों देखा हाल..

अरुण साथी सड़क हादसे में मौत के बाद जो मंजर आजकल विभिन्न जगहों पे देखने को मिलती है वह बहुत ही डरावना और भयावह है। किशोर और युवा इसमें बहुसं...