07 दिसंबर 2019

जब मैंने उस पागल कुत्ता को मार डाला

बात तीन-चार साल पुरानी है। गांव में एक पागल कुत्ता आ गया। उस कुत्ता को गांव से भगाने में गांव के युवक जुट गए। कुत्ता ने पहले कई लोगों को काट लिया था। कुत्ता को गांव से भगाने के क्रम में मेरे घर का दरवाजा खुला देख कुत्ता घर में प्रवेश कर गया। हालांकि मेरी बेटी कुत्ता घर में प्रवेश नहीं करें इसके लिए घर के मुख्य दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया । परंतु उसे इस बात का अहसास नहीं था कि कुत्ता घर में प्रवेश कर चुका है।



घर में उस खतरनाक पागल कुत्ता के घुसने की सूचना पर कोहराम मच गया। घर में बच्चे भी थे और बुजुर्ग पिता जी घर के दरवाजे वाले हॉल में लेटे थे। कुत्ता उसी रास्ते से घर के अंदर प्रवेश किया और बाहर भी उसी रास्ते से निकलना था।

पिताजी की तबीयत खराब थी और वह सो रहे थे। मुख्य दरवाजे के बंद होने से गांव के युवा घर में नहीं आ सकते थे।

मैं लाठी लेकर कुत्ता को भगाने के लिए आगे बढ़ा। कुत्ता पर लाठी से प्रहार किया । मुझे आज भी वह मंजर याद है । जब मैंने कुत्ता पर लाठी चलाई तो कुत्ता ने अपने मुंह से लाठी को पकड़ लिया और अजूबा तरह से गुर्राने लगा।  सुनकर मैं सिहर गया।

लाठियों से प्रहार का उस पर  का कोई असर नहीं दिख रहा था। घर में बच्चे को कमरे में बंद कर दिया गया। परंतु जिस रास्ते से कुत्ता को निकलना था बाबूजी उसी रास्ते में सो रहे थे । कुत्ता उस कमरे में भी चला गया। दिक्कत यह हो गई कि उस मुख्य कमरे का दरवाजा अंदर से ही बंद था। कुत्ता एक कोने में जाकर बैठ गया।

 ख़ैर, बेटी ने साहस करके अंदर का दरवाजा खोला। अब वहां कुत्ते पर हमला भी हम लोग नहीं कर सकते थे । बाबूजी वही सो रहे थे। उनको किसी तरह से जगा कर कमरे से निकाला।

कुत्ता अचानक घर से भागने लगा। गांव के कई युवा बाहर उसका इंतजार कर रहे थे। सभी ने उस पर हमला कर दिया। कुछ दूर जाने पर कुत्ता सभी को खदेड़ने लगा। मैं भी लाठी लेकर निकल गया था। मेरा क्रोध पारावार पर था। घर में कोहराम मच गया था। सभी डरे हुए थे। मैं क्रोधित था। मैंने कुत्ता पर लाठी से प्रहार किया। लाठी उसके सर पर लगी पर उसे कोई असर नहीं हो रहा था। फिर मैंने पूरी ताकत समेट कर उस पर प्रहार किया। 

वह गिर पड़ा और मैं लाठियों से उस पर बेरहमी से प्रहार करने लगा। मेरी लाठी टूट गयी और मैं क्रोध से कांप रहा था। पता नहीं क्यों, पर मैंने उस कुत्ता को मार डाला था। इस घटना को एक कहानी ना समझे। यह एक सच्ची घटना है । हालांकि आप इसे हैदराबाद एनकाउंटर से नहीं जोड़ सकते। यह महज एक इत्तेफाक था कि मेरे साथ ऐसा हुआ।

11 सितंबर 2019

नून रोटी खाएंगे गोदी को ही लाएंगे..

#नून_रोटी_खाएंगे #गोदी_को_ही_लाएंगे.....
अरुण साथी ( व्यंग्यात्मक चुटकी है। ज्यादा खुश या नाराज होने की जरूरत नहीं।)
मूर्खों की कमी नहीं ग़ालिब एक ढूंढो लाख मिलते हैं। जब से पुराने मंत्री जी को तिहाड़ भेजा गया है तब से तिहाड़ जाने वालों की लिस्ट जारी करते हुए दूसरों को बैतरणी में डुबकी लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
यह प्रमाणिक है। जैसे एन डी तितकारी, नोट के तोशक पे सोने वाले दुख राम,  घोटालों में लतिया दिए गए यदु यदु हाय रब्बा आदि-इत्यादि जैसे महान लोगों ने डुबकी लगाकर अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित किया और पुण्य फल के भागी बने। ठीक उसी तरह करने के लिए लिस्ट भी जारी कर दिया गया है। सुना था कि कीचड़ में कमल खिलते हैं। देखा, आजकल सभी जगह कमल ही कमल खिले हुए है।
भला बताइए आज के समय में मूर्खता करने से क्या फायदा । अरे जब तोता को पालतू बना कर उसके मुंह में खून आपने लगा ही दिया फिर वह वर्तमान मालिक की गुलामी क्यों न करें!
अब बताईये, तोता के साथ एक मैना को भी खूंखार बनाकर पीछे लगा दिया जाएगा तो अच्छे अच्छों की पेंट पीली हो जाएगी या नहीं। हुआ है। माया की बत्ती गुल। समाजवादी पुत्र भी मुलायम हो गए। उधर राज की बात यह कि बात बात पे ठोकने पीटने वाले फाकरे की पेंट भी पीली हो गयी है।
राज की बात तो यह भी है की के राज में राज ही राज है। राज यह कि सिंगर जैसे विधायक अपनी मर्दानगी की ठसक दिखाते हुए खुल्लम खुल्ला कहता रहा जब जोगी भए कोतवाल तो डर काहे का।
राज को बात यह भी है। मूर्ख कैसे कैसे होते हैं । एक पत्रकार महाराज स्कूल में जाकर बच्चों को नून रोटी खाने की खबर बना डाली। इन मूर्खाधिराज को किसी ने यह नहीं बताया कि नून रोटी खाएंगे गोदी को ही लाएंगे गाना गा, गा कर गांव वाले झूम झूम कर वोट दिए हैं। अरे गोदी मीडिया के जमाने में चरण पादुका पूजन करके चौधरी, अग्निश, ओम ओम इत्यादि जौसे मलाई खाओ बीस कुमार बनके मेगा-सेसे पुरस्कार पाने का घोर लालच क्यों हो जाता है। लालची।
बने तो अब जेल में चक्की पीसिंग, चक्की पिसिंग, एंड पिसिंग करिए। ठीक है!!

08 सितंबर 2019

लड़ने वाले हारते नहीं..

लड़ने वाले हारते नहीं...

24 ग्रैंड स्लैम जीतने से थोड़ी दूर सरीना। जी हाँ। सारी दुनिया मान रही थी। 24वें ग्रैंड स्लैम भी सरीना ही जीतेगी। वैसे माहौल में लड़ने का हौसला ही बहुत है और कोई जीत जाए तो यह हर किसी को हौसला देता है। प्रेरणा है। लड़ने वाले हारते नहीं।
सोंच कर देखिये। 15वीं वरीयता वालीं बियांका पहली बार यूएस ओपन खेल रही थीं और उसने सरीना को हरा दिया। पिछले साल वह क्वॉलिफ़ाइंग के पहले दौर में ही बाहर हो गई थीं।
कनाडाई खिलाड़ी बियांका वैनेसा एंड्रीस्कू ने यूएस ओपन के फ़ाइनल में सरीना विलियम्स को हरा दिया है।
यह 19 साल की बियांका का पहला ग्रैंड स्लैम टाइटल है। फ़ाइनल में उन्होंने अमरीका की 37 वर्षीया सरीना को 6-3, 7-5 से हराकर यह उपलब्धि हासिल की।
मैच जीतने के बाद बियांका ने कहा, "यह साल ऐसा रहा है मानो कोई सपना पूरा हो गया हो."
"मैं बहुत ख़ुश हूं. इस पल के लिए मैंने बहुत मेहनत की है. इस स्तर पर आकर महान खिलाड़ी सरीना के ख़िलाफ़ खेलना ग़ज़ब की बात है."


04 सितंबर 2019

हम मौत के कुआँ में वाहन चलाने के आदी है, सुधारने के लिए कठोरता जरूरी।

अरुण साथी

नए ट्रॉफिक नियम को लेकर हंगामा बरपा है। सोशल मीडिया में जोक्स और पटना की सड़क पे ऑटो का सड़क जाम। सभी का गुस्सा है कि जुर्माना दस गुणा बढ़ा दिया।

खैर, चर्चा होनी चाहिए। सबसे पहले । एक प्रसंग। अपने बिहार के सबसे छोटे से जिले शेखपुरा से। पत्थर हब होने की वजह से यहां ट्रकों की संख्या पर्याप्त से कई गुणा अधिक है। हर दिन कई ट्रक खरीद कर आते है। इसी क्षेत्र से जुड़े एक मित्र ने पूछा। कभी सोंचा है कि नए नए ट्रकों के चालक कहाँ से आ जाते है। उन्होंने बताया। ट्रॉकों के खलासी ( सहचालक) ही कुछ माह बाद नए ट्रॉकों पे चालक होते है! नाबालिग। बगैर सीखे। बगैर लाइसेंस के। परिणामस्वरूप वे सड़कों पे हत्यारे है। यह बसों, स्कार्पियो, बलोरो सब के लिए भी समान है।

खैर। बाइक की बात। खबरों से जुड़े रहने के नाते और हाल में हादसे का शिकार होने के बाद यह कह सकता हूँ कि बगैर हेलमेट बाइक चलाना मौत के कुआँ में चलना है। हमारी आदत ही नहीं है। न हेलमेट। न लाइसेंस। न नियम की जानकारी। नब्बे प्रतिशत बाइकर हेलमेट नहीं लगते। जो लगाते है उनमें आधे हेलमेट बेल्ट नहीं लगाते। परिणामतः रोज हादसे में मौत की खबरों से अखबार रंगे होते है। अभी बाइक से गिर कर महिलाओं की सर्वाधिक मौतें हो रही है। कारण। बाइक पे उल्टा बैठना। कहीं कुछ नहीं पकड़ना। और निश्चिंत होकर आराम कुर्सी जैसा बैठना। हेलमेट नहीं लगाना। फिर थोड़े से झटके में मौत के मुंह में। सीट बेल्ट भी नहीं बांधना हम अपनी शान समझते है। जो लगा ले उसके बुद्धू। नई पीढ़ी तो खैर। बाइक नहीं चलाते। मौत से खेलते है।

मतलब। हम सड़कों पे चलते है तब या तो आत्महत्या करते है। या फिर किसी की हत्या। बहुत कुछ है। जैसे चार पहिये वाहनों में एयर बैग के बिना गाड़ी विदेशों में बेचने की इजाजत नहीं। यहां है। कम पैसे के लालच में हम खरीद लेते है। हमारी सरकार ही हमे मौत के कुआँ में धकेल देती है।

एक आशंका। पुलिस बसूली करेगी। यह सच है। यह खत्म होने वाला नहीं। तब भी। सजा तो हमे मिलनी है। हम लगातार घूस देने से अच्छा नियम पालन को समझने लगेंगे।

लब्बोलुआब। हम बैगर कठोरता के नहीं सुधार सकते। नए नियम हमें मौत के कुआँ में जाने से रोकने के लिए है। हमारी जान बचाने के लिए। हाँ, कठोर है। पर हमारे लिए। हमें इसका स्वागत करना चाहिए।

28 अगस्त 2019

अशांन्ति की तलाश

अशांन्ति की तलाश

अरुण साथी

370  और 35 ए में तीन की प्राथमिकता है। ठीक वैसे ही इसे हटाये जाने से तीन को जलन हो रही है। एक पड़ोसी पाक। दूसरा अपने देश के नापाक। तीसरा युवराज गैंग।

जार जार घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। दुख का कारण कश्मीर है। 70 सालों तक कश्मीर से उनकी राजनीति चलती थी । आज एक झटके से राजनीति को खत्म कर दिया गया। बावजूद वे निराश नहीं है ।

राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यह संभावनाओं का खेल है। बाबू लोग कश्मीर में अपनी इन्हीं संभावनाओं के तहत अशांति की तलाश में जाना चाहते हैं परंतु जाने नहीं दिया जा रहा, घोर कलयुग आ गया।

इंटरनेट बंद है।फोन बंद है। इससे भी काफी परेशानी हो रही है। पाकिस्तान प्रायोजित जितना झूठा वीडियो वायरल हो रहा है उसका कोई फायदा तो नहीं मिल रहा। अब इंटरनेट चालू होता है तो कश्मीर को लहकाने में मदद मिलती।

अब बारूद के ढेर पर कश्मीर बैठा है और बाबू लोग को आग लगाने नहीं दिया जा रहा । वाकई में यह घोर असंवैधानिक बात है।

इसीलिए बाबू लोग काफी नाराज हैं और इस कदम को असंवैधानिक इमरजेंसी का हालात और ना जाने क्या क्या कह रहे हैं। संविधान की हत्या कहना तो आम बात हो गई है। भला बताइए कि जिस कश्मीर में पहले पत्थरबाजों के गिरोह का आतंक था। अब ऐसी खबर नहीं आ रही तो बाबू लोगों को परेशानी तो होगी। अब इनकी राजनीति कैसे चलेगी। भाई लोकतंत्र में विपक्ष को भी जिंदा रहने का अधिकार है कि नहीं।

माना कि आप बहुत कुछ अच्छा कर रहे हैं परंतु सब कुछ अच्छा कर दीजिएगा तो विपक्षी क्या चुल्लू भर पानी मे डूब कर आत्महत्या कर ले।

इसी बीच एक मघ्घड़ काका ने पूछ लिया। अच्छा बताइए आज से पहले कश्मीर क्या बुद्धम शरणम गच्छामि का माहौल था? क्या कश्मीर में पत्थरबाजी नहीं होती थी? क्या कश्मीर में आतंकवादियों और सेना के बीच मुठभेड़ नहीं होता था? आए दिन लोग नहीं मारे जाते थे? सब टुकुर टुकुर उनका मुंह ताकने लगा...

26 अगस्त 2019

वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं

अरुण साथी
जम्मू कश्मीर सचिवालय पर तिरंगा झंडा लहराया। इस तस्वीर को देख मां भारती के पुत्रों का कलेजा चौड़ा हो गया। परंतु अफसोस यह की इसी मां भारती के कई कुपुत्र के सीने में अचानक से दर्द होने लगे हैं। वे काफी आहत दिखते हैं। उनके आहत होने का कोई ठोस वजह सामने नहीं आता। धर्म के नाम पे समर्थन एक वजह है। कश्मीर से 370 हटाए जाने के बाद कुछ लोग अंध विरोधी हो गए हैं। और उन्हें अपनी माटी, अपने देश और अपने देशभक्ति को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। या यह भी कहें कि इसी बहाने उनका देशद्रोह खुलकर सामने आ गया।
महा कवि मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं "जो भरा नहीं भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं। वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।
आज कितने पत्थर हृदय वाले लोग भारत मां के आंचल को कलंकित कर रहे हैं। दुनिया भर में भारत की बदनामी हो रही है। इसमें अरुंधति राय, शहला रशीद, कॉंग्रेस पार्टी से लेकर कई बड़े बड़े नाम हैं तो आम लोगों में मुख्य रूप से कई मुस्लिम समुदाय के लोग इसमें खुलकर सामने आए।
यह बेहद ही अफसोस जनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब मां भारती की बात आती है वहां भी लोग राजनीतिक विरोध के रूप में अपने ही देश का विरोध करते हैं। वैसे में छद्म सेकुलरिज्म का जो दाग देश में कई लोगों पर लगा है वह सच होकर सामने आता है।
दरअसल कोई भी सेकुलर उस समय चुप हो जाता है जब उससे इन बिंदुओं पर सवाल पूछा जाता है कि आखिर अपने ही देश का विरोध क्यों ? वैसे ही एक बहस के दौरान जब एक मित्र ने पूछ लिया कि बांग्लादेश को आजाद करा कर जब भारतीय सेना लौट रही थी तो बिहार के किशनगंज पूर्णिया इत्यादि  मुस्लिम बहुल क्षेत्र में ट्रेन  पर पथराव किया गया था। ऐसा क्यों ? इसका जवाब मैं नहीं दे सका।
आज ही कई लोग 370 को लेकर छाती पीट रहे हैं । परंतु मां भारती के पुत्रों का छाती चौड़ा हो रहा है। जो कश्मीर आज तक मेरे देश का हिस्सा नहीं था उसे देश का हिस्सा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश का मान बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर सवर्ण आरक्षण और तीन तलाक पर उनके पहल को लेकर ही लगातार उनके समर्थन में रहा हूं। परंतु अंध विरोधी मैं कभी नहीं हो सकता।
हां आलोचना होनी चाहिए। लोकतंत्र की यही मजबूती है। परंतु स्वस्थ आलोचना ही लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। अस्वस्थ, बीमार, कुंठित और हीन भावना से ग्रसित आलोचना देश को दुनिया भर में बदनाम करेगा। कर रहा है। आज अफगानिस्तान, सऊदी अरब, बहरीन, मालदीप, अफगानिस्तान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुस्लिम बहुल देश होते हुए भी देश का सर्वोच्च सम्मान दिया जा रहा है। इससे भी देशभक्तों का सीना चौड़ा होता है। परंतु देश में वह लोग जो कहते हैं कि देश में बोलने की आजादी नहीं है। प्रधानमंत्री के मौत की दुआ खुलेआम सोशल मीडिया पर मांग रहे। गाली दे रहे । वैसे में उन पर यह देशद्रोही होने का आरोप लगता है तो इसको झूठ कैसे कहा जा सकता।

14 अगस्त 2019

मौत से साक्षात्कार

मौत से साक्षात्कार

अरुण साथी

यह दूसरी बार घटना घटी। मौत मुलाकात करके लौट गयी। गुरुवार के दिन दोपहर दैनिक जागरण कार्यालय बाइक से जा रहा था। आपाधापी और जद्दोजहद, जिंदगी का एक हिस्सा बन गया हो जैसे। प्रोफेशनल, व्यवसायिक और पारिवारिक। इन तनावों के उथलपुथल के बीच दस किलोमीटर बाइक का सफर। बीच में कई फोन कॉल्स। सभी को रुक कर तो एक को चलते चलते रिसीव कर लिया। अमूमन ऐसा नहीं करता। बाइक सड़क पे थी और मन जिंदगी की जद्दोजहद में। स्पीड चालीस के नीचे।

आमतौर पे अपनी बाइक से ही जाता था पर माइलेज नहीं देने की वजह से भाई का बाइक ले गया। संकेत साफ था। बाइक स्टार्ट नहीं हो रही थी। रास्ते मे दो बार बंद हुई।
खैर, फिसिर फिसिर मेघ के बीच चल रहा था। आजकल मन के कोने से आवाज उठा रही थी। रुक जाओ। बहुत भागमभाग है। ठहरो। फिर लगता। यही परिश्रम तो अपनी पूंजी है। शेष क्या! न पुरखों का धन। न सहारा। चलो रे मन। चलते रहो।
इसी सब के बीच सड़क किनारे खड़ा एक बाइक सवार अचानक सामने आ गया। पीछे से ट्रक। एक दम से ब्रेक लिया और धड़ाम। फिर होश नहीं। लगा कि मर ही गया। फिर होश आने लगा तो कई परिचित चेहरे संभाल रहे थे। मदद के हाथ कई लोगों के बढ़े। कोई मेरे मित्रों को सूचना दे रहे थे तो कोई मुझे सांत्वना। तब मैंने अपने सर से हेलमेट खोला।
सभी ने डॉ कृष्ण मुरारी बाबू के पास पहुंचाया। प्राथमिक उपचार शुरू हुआ। हाथ में फ्रेक्चर। पैर में चोट। हेलमेट ने बचा लिया।
फिर तो इस नाचीज की खैर खबर लेने दोस्तों और हितचिंतकों का हुजूम उमड़ पड़ा। सभी ने राहत की सांस ली।
फिर केहुनी के नीचे की हट्टी टूटने की वजह से ऑपरेशन की बात हुई। मुरारी बाबू ने बिहारशरीफ के डॉ अमरदीप नारायण को रिकमेंड किया। डॉ फैसल अरसद सर ने भी सही कहा। सो चला गया। ऑपरेशन हुआ।
ऑपरेशन थियेटर के अंदर जब मुझे बेहोश किया गया अथवा होश में आने से पहले। अवचेतन मन फिर मृत्यु से साक्षात्कार कराता रहा। संवाद भी हुआ। जीवनचक्र चल पड़ा। उल्टा। पुराने दिन याद आ गए। घर के खामोश चूल्हे। माँ की मौन आंखें। पिता का अधर्म। बचपन का अभाव। विवाह। तिरस्कार। अपमान। अपनों का परायापन। परायों का अपनत्व।
किशोर होते ही घर का बोझ। अपनी इच्छाओं की हत्या। भाई का लक्ष्मण होना। पत्नी का प्रेम। रेंगते हुए चलना। फिर उठ बैठना। फिर अपने का पराया होना। पैर खींचना। दोस्तों का प्रेम। और नफरत भी। भरोसे के लिए जीना। भरोसे का टूट जाना। फिर अपने बच्चों का बड़ा हो जाना। पिता के प्रति उसका समर्पण। बच्चों में अभाव का अहसास।
फिर किसी का कहना,
मौत तो सुनिश्चित है। फिर। डर कैसा। सुनों। लड़ता रहूंगा। चलता रहूंगा। गिरता रहूंगा।
इन्हीं संवादों के बीच। अवचेतन मन कराह भी उठा। जैसे सामने से कोई कह रहा था। सुनो। दुनिया गोल है। सपाट नहीं। रिश्ते, नाते, अपना, पराया। कोई किसी के साथ नहीं मरता। किसी के जाने के बाद भी जिंदगी चलते रहती है। वैसे ही जौसे। रेलगाड़ी का सफर। जिसको जहां उतारना है, उतरे। चढ़ना है, चढ़े। जिंदगी और मौत। उतारना। चढ़ना। छुक छुक। छुक छुक।

जब मैंने उस पागल कुत्ता को मार डाला

बात तीन-चार साल पुरानी है। गांव में एक पागल कुत्ता आ गया। उस कुत्ता को गांव से भगाने में गांव के युवक जुट गए। कुत्ता ने पहले कई लोगों को काट...