27 February 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी-51


शाम को करीब तीन बजे गांव के कुछ साथी हाथ में एक कागज लहराते हुए जेल की तरफ आ रहे थे और वे खुश थे। मैं समझ गया कि रीना में मेरे पक्ष में ही गवाही दी। मैं आज दिन भर सुबह से ही भारी मन लिए छत के बरामदे पर टहलता रहा। गेट पर गया और गवाही का कागज मेरे हाथ में आ गया। उसने मुझसे शादी किये जाने और मेरे साथ ही रहने की बात कही और प्यार के अप्रत्यक्ष जंग में उसकी जीत हो गई। मेरे गांव का तीन चार साथी आज आया था और उसने भी खुशी जाहीर की। शादी, प्लेटफॉर्म पर और वह भी भादो के मलमास महीने में!
‘‘बहुत साहस बली लड़की है हो, सबके समझइला के बाद भी जज के सामने बोल्डली बोल देलकै।’’ राजीव ने कहा।
‘‘पर जैसे ही ओकर गवाही के बारे में परिवर के पता चललै, सब के सब वहां से भाग गेलै। ओकर बाबूजी तो कह देलखिन कि आज से हमर बेटी मर गेल।’’ 
‘‘सिंदूर कैले हलै की नै हो।’’ मैंने पूछ लिया शायद जोर जबरस्ती में उसे मिटा दिया गया हो।
‘‘हां हो सिंदूर तो टहापोर कैले हलै। एक ओकरे घर के आदमी कह रहलै हल गवाहिया से पहलै की जब लाख कोशीश और मारपीट करला के बाद भी ई छौंरी मांग से सिंदूर नै मेटैलक तब गवाही की पक्ष में देत?’’

चलो! जीवन तो अक्सर करवट लेती ही है और मेरा जीवन तो इस समय तेजी से करवट ले रहा था। नाटक के पात्रों की तरह। जैसे किसी ने पटकथा लिख कर रख दिया और हम सब पात्र अभिनय कर रहें हों। रीना ने मेरे पक्ष में वैसे समय में गवादी दी जब एक गांव की लड़की को न तो कानून की जानकारी थी न ही कोर्ट कचहरी को गयान पर उसने कई तरह के प्रलोभन और समझाने बुझाने के बाद भी कोर्ट में मुझसे प्रेम करने तथा शादी कर लेने की बात कबूल कर लिया। 

‘‘तब! अब की होतै?’’ मेरा मन प्रसन्न हो गया। लगा की सबकुछ ठीक हो गया। पर नहीं, ऐसा नहीं था।
‘‘अरे अभी बहुत मुश्किल है। रीना त अपन परिवार के साथ जायसे मना कर देलकै और तोरा साथ रहे के बात कहलकै पर जब तक बालिग होबे के प्रमाण न हो जा है तब तक कोर्ट ओकरो जेल मे रखतै।’’
‘‘जेल’’

भोला!
सुना तो था कि इश्क नहीं आसां पर आज देख भी लिया और आग के दरिया में डूब कर पार निकलने की परीक्षा हो रही थी। आग का दरिया! जिसमें प्रेम, मान-मर्यादा, स्वाभिमान, लज्जा और प्रेमी के अंदर के मैं को भी आग के दरिया में डुबा कर पार निकालता है बिल्कुल उसी तरह जैसे सोनार सोने को आग में तपा कर उसकी परख करता हो। एक पलड़े पर प्रेमी के परिवार की मर्यादा और उसका अपना मैं रख दिया जाता है और दूसरी तरफ प्रेम और तब उस पार निकला प्रेम साधु की तरह समाज के सामने आता है। बिल्कुल वैसा ही जैसा कि सालों साल तपस्या करते हुए, ध्यान धरते हुए ईश्वर के होने का ज्ञान होता है और आदमी दुनिया छोड़ कर साधु बन जाता है। प्रेम के होने का ज्ञान उसी तरह का होता है जैसे की ईश्वर के होने का ज्ञान बुद्व, महावीर, मीरा और कबीर को हुआ हो।

भोला!
एक धंटा बाद वह जेल के दरबाजे पर मुझसे मिलने आई। मेरा परिवार, छोटा भाई, चाचा और बाबूजी भी, उसके साथ थे। नजर मिलते ही उसका दिल लरज गया। जैसे यातना की आपार पीड़ा सहता हुआ मन फूट पड़ता हो। अविरल आंसू की धारा दोनों के आंखों से झरने लगा। कभी चंचल सी हिरणी की तरह फुदकने वाली रीना आज पत्थर की बेजान मूर्ति की तरह लग रही थी, जैसे की मरने के पुर्व आदमी को जीवन का मोह खत्म हो गया हो। एक बोल किसी के मुंह से नहीं फूटा पर खामोशी के एक संवाद ने दर्द को आंसूओं की जुबानी अपनी कहानी सुना दी। प्रेम में दोनों अडीग रहे पर बाजी उसने ही जीती। उसने जो कहा था कि कुछ नहीं होने देंगें, वही किया। 

खामोशी की इस विरान रेगिस्तान में चाचा ने दस्तक दी। 
‘‘घबराए के कौनो बात नै है। एक बीधा खेत बेच के पैसे के इंतजाम कर देलिए है। जहां तक होता, कोई कमी नै रहे ले देबै।’’ उन्होने डूबते को तिनके का सहारा देने की कोशिश की पर कहां? जो डूब चुका था उसे सहारे की क्या दरकार?
उन्होंने फिर कहा-
‘‘हम तो इनखर बाबूजी से भी मिलके कहलिए कि माफ कर दहो, बुतरू है। की करभो। अरे बाल बच्चा जब जांघ पर पैखाना कर दे है तब आदमी की अपन जांघ काट के फेंक देहै? वैसे ही जब इ तों दुनी के निर्णय है तब आगे भगवान जाने, पर नै मानलखिन। कहलखिन की हमर बेटी मर गेल। आज से । अब ओकर श्राद्धकर्म करके, माथा मुड़ा के पाक हो जाम।’’

फिर जानकारी मिली कि रिजर्व कार से इसको पटना के महिला सुधार गृह:ःजेलःः ले जाया जा रहा है। सब इंतजाम कर दिया गया है। मेरे परिवार के लोग भी साथ जाएगे। मेरे परिवार के हिस्से जो थोड़ी जमीन थी बिक गई।

भोला!
अपने बार्ड के सामने छत के बरामदे पर खामोशी से खड़ा था। शाम ढल चुली थी। लगा जैसे सूरज ने भी आज अपना सर छुपा लिया हो। उसको भी लाज आ रही हो, मेरे कुकर्मो पर या कि समाज के, पता नहीं पर आज सूरज लजा कर छुप गया था।

तीन-चार दिन बाद रीना के गांव से ही मेरा एक दोस्त आया मिलने और फिर जब उसने गांव की कहानी बताई तो कलेजा कांप गया। रीना के घर पर उसके बाबूजी ने उसका श्राद्धकर्म कर दिया है। बजाप्ते, कागज का एक पुतला बना कर उसे मुखाग्नि दी गई, और फिर उत्तरी पहन कर तीन दिनो तक श्राद्धकर्म किया गया। पूरे परिवार ने सर मुंडबाया! गंगा स्नान किया! दान पुण्या किया! तीसरे दिन पंडित और गरीबों को भोज देकर श्राद्धकर्म समाप्त हुआ।

भोला! 
लगा जैसे की घरती फटे और उसमें समा जायें। यह बात जब रीना को पता चलेगा तो वह उसी वेदना से तड़प उठेगी जिस वेदना की तड़प से घरती फटी थी और सीता उसमें समा गई थी। हर दिन, हर क्षण, जिंदगी यातना दे रही थी। बचपन की दहलीज से कदम बढ़ा कर किसी सुख की आशा में गलत-सही, कुछ भी किया पर इस तरह के परिणाम की कल्पना नहीं की थी। ज्यादा से ज्यादा प्राण देने की सोंच रखी थी। झंझट खतम। लगा था कि प्रेम में जान देकर उऋण हो लूंगा, पर जान पर भी भारी जीवन हो जाएगा, नहीं सोंचा था। चाचा जी ने ठीक ही कहा था कि जांध पर बच्चा जब पैखाना कर देता है तब आदमी पैखाना को साफ करता है न कि जांध को काटता है? पर कथित इज्जत को लेकर समाज के लोग अपनी जांध को भी काटने से गुरेज नहीं करते। क्या प्रेम इतना दुखद है। या कि इज्जत इतनी सस्ती है जो एक प्रेम का बोझ नहीं उठा सकती। समाज के पहरूआ कौन है। कौन है यह समाज जिसके डर से प्रेम को बलीबेदी पर चढ़ा दिया जाता है। या कि अपने पापों को छुपाने भर का नाम ही समाज है। जिस समाज में व्याभिचार की कोई सीमा नहीं, जिस समाज में धर्म-अधर्म का मर्म नहीं, जिस समाज की अपनी मर्यादा नहीं और झुठ-फरेब, छल-प्रपंच, त्रिया-चरित्र, बेइमानी रग रग में समाया हो वह प्रेम की मर्यादा क्या जाने? या कि उसके लिए ढकी हुई मर्यादा, मर्यादा है, छुपा हुआ इज्जत, इज्जत है और उघड़ा हो प्रेम कलंक। 

वितृष्णा और क्रोध से खून खौल उठा। कई तरह के विचार मन में आए पर उसी पिंजड़े में बंद पंछी की तरह जो सिर्फ अपना पंख फड़फड़ कर रह जाएगा या कि पंख को धायल करके...। बचपन से लेकर आज तक जीवन को रीना के प्रेम में जीवन बना दिया, इंद्रधनुषी और अमृत ही अमृत पर आज इस मोड़ पर लगा कि इससे  बेहतर तो था कि मौत ही मिल जाती। साथ मर तो जाते। आज इस समुंद्र मंथन में बिष पीने की बारी थी पर वह विष आज शिव के लिए नहीं सती के लिए निकाला गया था जो सुक्ष्म सांघातिक था और जीवन भर मौत देता रहेगा। तिल तिल कर मारता रहेगा।
भोला!

शेष अगले किस्त में, बने रहिए।

25 February 2012

भरी सभा में पत्रकारिता का चीरहरण किया काटजू ने।


अरूण साथी।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मार्केंडय काटजू ने जब बिहार मंे मीडिया आजाद नहीं कहा तो पूरे देश में नीतीश कुमार को रॉबीन हुड की तरह प्रस्तुत करने वाले मीडिया हाउस, चारणी करने वाले पत्रकारों, संपादको, बुद्धिजीवियों और बिश्लेषकों को झटका लगा। लगा जैसे किसी ने उन्हें नंगा कर आइने के सामने ला कर खड़ा कर दिया। पटना विश्वविद्यालय के प्राचार्य ने तो बाजाप्त समारोह में ही इसका विरोध किया। पर जस्टिस काटजू तब भी चुप नहीं बैठे और कहा कि इससे बेहतर स्थिति पहले की सरकार में थी, कम से कम मीडिया आजाद थी। सच क्या है। जो काटजू साहब ने कही है वह या कि कुछ और? जब इसके धरातलिय सच्चाई जाननी चाही तो वह आज के अखबर के रूप में सामने आ गई। एक मात्र राष्ट्रीय सहारा को छोड़ कर किसी दूसरे अखबार ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित नहीं करके अपनी गुलामी की बेलज घोषणा कर दी। प्रभात खबर ने दूसरे पन्ने पर इसे जगह दी है। मुख्य अखबार कहे जाने वाले दैनिक जागरण एवं दैनिक हिन्दुस्तान ने इस खबर को इस रूप में प्रकाशित किया कि पाठक दिग्भ्रमित हो जाए। अखबारों ने प्राचार्य लालकेश्वर सिंह के विरोध को प्रमुखता से प्रकाशित किया जबकि महोदय जदयू विधायक उषा सिंह के पति होकर सरकार से उपकृत है और इसकी जानकारी मीडिया के महोदयों को भी है।

बिहार का यही सच है। देहात की एक कहावत है, बाहर से फिट फाट, अंदर से मोकामा घाट। मतलब बाहर से सबकुछ बढ़िया है और अंदर से जर्जर। अखबारों में प्रति दिन छपने वाली खबरें सरकार का गुणगान करते हुए होती है जैसे कि अखबार न होकर सरकार का मुख्यपत्र हो। बिहार में कस्बाई पत्रकारों को भी पता है कि सरकार के विरोध की खबर नहीं छपनी है और इसी वजह से विपक्ष भी मन मार कर बैठ गया है।
बिहार में नौकरशाही बेलगाम है। पक्ष-विपक्ष और मीडिया नौकरशाहों पर उंगली उठाने की हिमाकत नहीं करते। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जगह कहीं नहीं है। सत्ता के मंत्रियों को घुड़की दे कर चुप करा दिया जाता है और उनपर नकेल के लिए नकचढ़े सचिव को रखा गया है।
भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रखण्ड विकास पदाधिकारी और अंचलाधिकारी जैसे गरिमामई पद पर कर्मचारी स्तरिय भ्रष्ट्र और पांच पांच बसुलने वालों को अतिपिछड़ा राजनीति के तहत प्रमोट कर बैठा कर उपकृत कर दिया गया है और खमियाजा गरीबों को भुगतनी पड़ रही है। इंदिरा आवास से लेकर जाति आवास में खुले आम धूस लिया जाता है। सेवा का अधिकार का ढीढोरा पीट दिया गया है पर सच इतर है। जिस प्रमाण पत्र को बनाने के लिए पहले 10 रू. खर्चने पड़ते थे वह अब 500 मे बिकता है। 21 दिन में प्रमाण पत्र बनाने का प्रावधान कर दिया गया है पर बनाया नहीं जाता और एक दिन मे ंबनाने का चार्ज 500, दो दिन का 300 तथा पांच दिन का चार्ज 200 निर्धारित कर दिया गया। न तो इसकी खबर छपती है और न ही कोई फर्क ही पड़ता है।
बात शिक्षा का करें तो साईकिल राशि, पोशाक राशि का वितरण ही विद्यालयों को काम रह गया है। पढ़ाई प्राथमिक विद्यालयों से लेकर कॉलेज तक कहीं नहीं होती। हाजरी बनाने के लिए स्कूल को खोला जाता है फिर बंद कर दिया जाता है। मैट्रीक की परीक्षा अभी चल रही है और आलम यह कि जम कर नकल की छूट है।
गांव में गली गली बिकते शराब आने वाले दिनों में एक नए बिहार की नींब रख रही है। सड़क बन रही है पर उसपर शराब कें नशे में धुत्त चालक दर्जनों को रौंद रहा है। गांव की गलियों में फागुन की लोकप्रिय होली की जगह शराबियों का हुड़दंग दिखने को मिलता है।
सबसे बड़ा दाबा अपराध को लेकर किया जाता है पर इसका सच कुछ ईतर है और बिहार में सब काम बुद्धि से किया जा रहा है। मशलन, हत्या के केस को ओडी का केस बना कर दर्ज कर लिया जाता है। अपहरण, डकैती, बलात्कार तक का केस दर्ज करने के लिए नाको चने चबाना पड़ता है। केस ही दर्ज नहीं होगा आकड़ों का अपराध कमेगा ही।
मजदूरों का पलायान कहीं नहीं रूका है। पलायन करने वाले मजदूरों का गांव विरान नजर आएगा। दलितों के वस्तियों में इसे देखा जा सकता है। नरेगा मे लूट है। मजदूर बाहर और उनके नाम पर पैसा अंदर। विकास योजनाओ में 40 प्रतिशत कमिशन। कहां जा रहा है बिहार।
पर मीडिया में यह सब नहीं दिखता? करोड़ों के विज्ञापन का खेला है। मालिकों की तिजौरियां भरनी चाहिए। बस।

पर ऐसी बात भी नहीं की बिहार में क्रान्तिकारी पत्रकारिता मर गई है बहुत लोग है जो बिहार में मीडिया पर लगे सेंसरशीप की आग में जलते हुए तिलमिला रहे है। पर वे एक अदद नौकर होकर वेवश हो इंतजार कर रहें है। काटजू ने पटना विश्वविद्यालय के आयोजित समारोह सभा में पत्रकारिता का चीरहरण किया और कहीं कोई कृष्ण नजर नहीं आता।

20 February 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी-50


थाना मोरा आना जाना
जेल ससुराल......
शाम को जेल में ही संगीत की महफिल सजी और पंकज ने यह गीत सुनाना प्रारंभ किया। थाली-गिलास वाध्य यंत्र बने और लोग झूमने लगे मैं भी वहीं बैठा रहा। वार्ड बदल दिया गया और यहां अपराध की दुनिया के सरताजों का ही बसेरा था। पंकज मेरे गांव का था इसलिए उसे जानता था तब भी उसने अपनी कहानी बतानी प्रारंभ कर दी। जैसे कि किसी हीरों की कहानी हो। उसके पिता की हत्या सिनेमा हॉल में बम मार कर कर दी गई थी और उसकी विधवा मां ने किसी तरह से उसे पाला पोसा था। अपराध की दुनिया मंे उसे गांव के ही कुछ लोगों ने लाया था। सिनेमा के किसी खलनायक के चरित्र की तरह ही पंकज का किरदार था। अपराध उसके मन में गहरे तक पैठ चुका था। वह समाज से नफरत करता था। थाना , पुलिस और जेल के प्रति उसने अपने गीत में ही प्रेम प्रकट कर चुका था। वह जेल में रहे की बाहर कुछ अंतर नहीं पड़ता।

इस कम उम्र में ही उसने हत्या तक को अंजाम दिया और उसकी बखान भी कर रहा था।
इसके बाद जो चर्चा चली तो कामरेड किशन सिंह और उसके बोडीगार्ड के हत्या की कहानी ऐसे बखानी जानी लगी जैसे वीरगाथा। कामरेड किशन सिंह की लाश को मैं अस्पताल में देखा था। उनके सीने में कई गोली लगी थी और साथ में बोडीगार्ड भी मारा गया था। मजदूरों के हक और मजदूरी बढ़ाने के लिए उन्हें एक जुट करने की सजा के रूप में उन्हें मौत दी गई थी। यह समांतवादी मानसिकता के अंतिम पड़ाव पर भी उसके कीड़े के कुलबुलाते रहने की धमक की तरह ही थी।

‘‘सुनलहीं न हो, साला के कहलिए हल की छोड़ इ शुदर मुदर के साथ, कुछ नै मिले बाला, पर नै मानलै और बोडीगार्ड रखलै, चल गेलै भित्तर...। सांढ़ा ने यह कहानी छेड़ी तो कई शुरू हो गए। कामरेड के हत्या के मामले में एक दर्जन से अधिक लोग बंदी थी। 

‘‘हां हो, साला के खतम करे ले कहां कहां से समान नै जुटावे पड़लै, सन्तालिस के आगे रिवॉल्वर की टिकतै। बगैचा में घेर के पहले त बोडीगडबा के कहबे कैलिए की तों भाग जो, पर साला पक्का सिपाही हलै कहलै हमरो मार दा पर भागबो नै।’’ बीपो सिंह ने बड़े ही शान से कहा।

‘‘साला रार सुदर के भड़काबो हलै, गेलै। चंदा कर के ऐतना रूपया जमा कर देलिए हें कि केस सलटा जइतै।’’
वीरगाथ की तरह बखान चलती रही और मेरा मन इस सब में अकुलाता रहा। सामान्तवाद की इस गाथा में मेरा मन नहीं रम रहा था पर अनमनसक हो कर सुनना भी मजबूरी थी। मेरा मन बाहर की घटनाओं को जानने के लिए मचलने लगा। फिर मुझसे भी मेरी कहानी लोगो ंने जाननी चाही। 
‘‘कैसे फंसइलहीं हो, त भागलीं काहे, छोड़ देथीं हल त जेल के हवा नै ने खाइले पड़तो हल।’’ कई तरह के सवाल। पर जबाब कौन देता, किसके पास जबाब था। मैं चुप चाप सुनता रहा।

अगले दिन गांव का विपिन राम मिलने आया। कई दोस्त थे पर किसी ने हिम्मत नहीं किया पर वह गरीब होकर भी आया था। मेरा नाम पुकारा गया। दरवाजे पर गया। मिलने का नजराना दस रूपया था।
‘‘की हाल विपिन।’’
‘‘बस, चलो अब जे होबै, साहस कैलहीं न हो इहे बहुत है। कल रीनमां के कोर्ट में बयान होतई और ओकर बहुत सीखाबल जा रहलै हें।’’
‘‘चलहिं, अब पीछे मुड़े के कोई जगह नै है। जे होतई से होतई।’’

फिर उसी ने बताया कि पूरा गांव एक है और उसकी शादी के लिए डाक्टर, इंजीनियर लड़का का फोटो दिखाया जा रहा है। किसी तरह से उसे मनाने की बात कहीं जा रही है और कोर्ट में वह कह दे की उसका अपहरण हुआ। यानि की सबकुछ अब उसके उपर ही था। वह कोर्ट में बदल भी सकती है। जो हो। पर मुझे कुछ अजीब तरह का अनुभूति होने लगी। लगा जैसे प्यार की बाजी को मैं जीतना चाहता हंू और जीतने के लिए रीना का मेरे विरूद्ध बयान देना ही सही है। मन ही मन यही सांेचता रहा।

शेष अगले किस्त में, बने रहिए...

13 February 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी-49


जिंदगी कभी कभी दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है और अनमना ढंग से चुना गया कोई एक रास्ता जब आगे चल कर बंद मिलता है और वहां से लौटने का उपाय नहीं होता तो फिर इसके लिए किसे देष दें समझ नहीं आता।

हाथ में हथकड़ी और कमर में रस्सा लगा कर अगले दिन कोर्ट ले जाया गया। कोर्ट से फिर जेल। जेल के बड़े से फाटक के पास जब खड़ा हुआ तो दुनिया छोटी लगने लगी। यह भी बदा था। जेल का गेट खुला और मैं अन्दर चला गया। अजीब दुनिया है। सबसे पहले मुझे बार्ड नंबर एक में ले जाया गया, आमद बार्ड। एक चादर जो अपने साथ लाया था उसे कहीं बिछाने की जगह खोजने लगा पर कहीं जगह नहीं मिली। मैं एक कोने में बैठकर सोंचने लगा। मन उदास हो गया। जेल की चाहरदीवारी से बाहर का हौसला टूटने लगा। प्यार के होने का दंभ और यह परिणति? 

कई तरह के सवाल मन में उमड़ धुमड़ रहे थे। पहला यही, की पता नहीं अब कितने दिनों तक जेल में रहना पड़े और दूसरा यह कि रीना को उसके परिजन अपने साथ लेकर गए है और वह सुरक्षित है कि नहीं। मेरे केस पर आने वाला खर्च कहां से आएगा? घर में एक भी पैसा नहीं है पर बेटे को कोई जेल में छोड़ तो नहीं देगा? कोई अभिभावक भी नहीं था जो आगे बढ़ कर पैरवी करे। और रीना का हाल जानने का कोई उपाय नहीं था।
फिर कुछ देर में साधु बेशधारी, लंबी दाढ़ी, गेरूआ वस्त्र पहले लंबा चौड़ा सा एक आदमी आया। उसे सब बाबा बाबा कहकर बुलाने लगे और कुछ के चेहरे पर उसे देखते हुए वितृष्णा और भय का मिलाजुला भाव भी आने लगा। मेरे पास आकर उसने कहा-
‘‘चल रे बउआ निकाल कमानी।’’
‘‘क्या’’?
‘‘कमानी, माने तीन सौ रूपया जेल में रहे के टेक्स।’’
इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता बगल में लेटा हुआ एक मोटा सा एक आदमी ने कहा-
‘कमानी के रूपया देबे पड़तो बौआ, यहां इनकरे सब के कानून चलो है। बाहर भी बभने सब के राज है यहां भी ? नै कमानी देभो त यहां पैखाना घर के आगे सुता देतो और खाना बनाना, झाडू लगाना सब काम करे पड़तो’’
‘‘पर हमरा हीं रूपैया है कहां? कोई उपाय भी नै है।’’
‘‘तब कोई उपाय नै हो, ठीके है यहैं सुतहो, पर बभान के बच्चा लगो हो पर यहां कोई नै देखतो, सब रूपया देखो है, रूपैया। रूपैया हो तो बाभन नै हो तो शुदर।
मैं उसी तरह बैठा रचा, चुकोमुको-चुपचाप। जो जगह मेरे सोने की थी वहां नहीं सोया जा सकता, पैखाना घर के ठीक आगे। जेल में क्षमता से अधिक कैदी थे इसलिए सबके लिए समुचित व्यवस्था नहीं हो सकता और जेल का भ्रष्टाचार भी इसमे मदद कर रहा था और धनी लोगों के लिए अलग अलग व्यवस्था थी, अलग अलग बार्ड था। बगल के लोगों ने सब बता दिया। जिस बार्ड में मैं था उसका नाम ही हरिजन बार्ड था। विभेद की एक बड़ी रेखा यहां भी खिंची हुई थी और समाज के इस विभेद का सच जाति नहीं पैसा के रूप में सामने आया। पैसा है तो बाभन बार्ड नहीं ंतो हरिजन बार्ड। इस बार्ड को आमद बार्ड के रूप में भी जाना जाता था। सबसे पहले सबको यहीं आना था फिर जिस तरह का जो पैसाबाला होता, उस तरह उसकी व्यवस्था की जाती।

आंखों में नीद नहीं थी और शुन्यता का गहरा समुंद्र मन में उतर कर ज्वारभाटे की तरह प्रेम की दीवार से टकरा कर उसके गरूर को चूर चूर कर देने का प्रयास कर रही थी पर मन में यह भी भरोसा होता कि बिना आग में तपाये सोना की परख जब नहीं होती तो हम कौन है? और फिर तपने पर देह तो जलेगा ही।
यूं ही बैठे बैठे, या उंधते हुए सुबह हो गई। वार्ड का ताला खुला। फिर नित्यकर्म की बारी। बाहर लंबी कतार के बीच वहां भी मारा मारी और विभेद की लंबी लकीर। बाभन का शौचालय, शुदर का शौचालय। भोला। जेल की यह उंची दिवार सिर्फ आदमी को कैद करने के लिए नहीं बनते बल्कि इसमें आदमियत भी कैद हो जाती है, यह बात मेरी समझ में आ गई थी। 

खैर जहां, जिस हाल में मैं था वहां संपन्नता और सुख अस्पृह हो गई थी, वैसे ही जैसे मुर्दे के लिए हो। कोई भी चाह जिंदों के लिए होती है और मैं प्राण से बिछड़ कर मुर्दा था और मुर्दों के लिए स्पृह क्या ? चंदन से जलाओं की आम की लकड़ी से! 

न तो सुबह का एक मुठठी मिलने वाला चना और गुड़ लिया और न ही दोपहर का जली हुई रोटी और दाल खाया। देखने से ही उकाई आती थी। न तो किसी ने खाने के लिए कहा न ही भूख लगी। चाहरदीवारी से लग टूकूर टूकूर बाहर देखता रहा। दोपहर के खाने के पाली में किसी ने मुझे टोक दिया।

‘‘अरे बब्लू दा, तों यहां?’’
देखा तो मेरे गांव का ही एक लड़का था, पंकज। हत्या के आरोप में बंदी। उम्र पन्द्रह से अठारह साल। कई मर्डर कर चुका है और अपने यहां इसकी धाक है। रंगदार की उपाधी है। हत्या या अपहरण करने वालों को लोग इसी नाम से जानते है-रंगदार।
         ‘‘हां’’
‘‘कौन बार्ड?’’
‘‘एक’’
‘‘हाय महराज, हमरा रहते हरिजन बार्ड में, बोलथो हल ने हमरा बारे में, साल दस लाश तो अब तक बिछा देलिए हें ग्यारहवां में कि देरी है।’’
फिर उसने वहीं से हांक लगाई, 
‘‘कि हो बाबा, महराज हमर गांव के आदमी के साथ तों ऐसन काहे कैलहो, हरिजन बार्ड ?’’
‘‘हमरा की पता, इस कहबो नै कैलको और हम की करतिओ हल, बॉस नै कहलखुन तब।’’
‘‘अच्छा चलो हम बॉस से बात करबै, तोरा घबड़ाए के बात नै है, हम ऐजइ ही।’’ उसने मुझे कहा।
‘‘कौन केस मे आइलाहों हे।’’
‘‘घर से भाग के शादी कर लेलिए।’’
‘‘दूर महराज, कौन केस में आइला, यहां मर्डर, रेप और किडनेप करके आबो हई तब कोई बात है, चलो....।’’ उसने ऐसे कहा जैसे यहां के लिए यह सबसे निकृष्ठ काम करके आना हुआ।

दो एक घंटे में समझ गया कि जेल का अपना कानून है और यहां नरसंहार करने वालों की धाक होती है और मर्डरर, रेपिस्ट और किडनैपर का ज्यादा सम्मान दिया जाता हैं। यह देखने को भी मिला। और इसकी शेखी बधारते भी कई मिल गए। भोला। 

पंकज, मेरे गांव का ही लड़का था। एक नरसंहार में आठ, नौ लोग मारे गए थे और उसके बाद उसके उपर दो और हत्या करने का आरोप है। गोरा चिटठा, सितुआ नाक और दुबला पतला किशोर। हंसमुख। अपने क्षेत्र का खुंखार अपराधी है पर हमेशा हंसता मुस्कुराता मिलता। गांव में भी जब मिल जाता तो प्रणाम बब्लू दा जरूर करता। आज जेल में मिला।

फिर वह वहीं कुछ लोगों से मिलबाने लगा।
‘‘मिलहो, इ बब्लू दा हखीन, डाक्टरी पढ़े के जगह भाग के शादी कर लेलखिन।’’
और फिर दूसरों के बारे में मुझे बताने लगा।
‘‘मिलहो इनखा से-प्यारेबीघा गांव है, कॉमनिस्टबा नेता नै मरैलो हल अपन बोडीगडबा के साथ, इहे सब मिलके मारलखीन हल। साला मजदूर के भड़काबो हलै। इ मिललहो, रंका सिंह, मोहनपुर नरसंहार।

देवा, 
कैसी हे तेरी दुनिया। आज जिससे मिल रहा हूं सभी के सभी यमराज! कहां ले जाओगी जिंदगी।

शेष अलगे किस्त में, बने रहिए।

05 February 2012

एक छोटी सी लवस्टोरी-48


जब आंख खुली तो खुद को पुलिस थाने में पाया। रेल थाना था। पुलिस के पास मुझे लोगों ने रेलवे पटरी  से उठा कर इलाज के लिए अस्पताल ले जाने के लिए पहंुचाया था। पुलिस ने रीना के परिजनों को भी पकड़ लिया था। मेरे उपर से एक पूरी रेल गुजर गई थी और मैं जिंदा था। मैं पटरी के बीचो बीच गिरा था और पटरी से चिपका रहा था, फिर बेसुध हो गया था।

फिर एक पुलिस वाले ने आकर मेरा हाल चाल पूछ और मुझे ठीक पाया। फिर वह चला गया और स्थानीय लोग आ आ कर मुझे देखने लगेे। बच गया बेचारा। सब के मुंह से यही भाषा निकल रही थी। फिर मैं उठ कर खड़ा हुआ और फिर रीना के बारे में पूछा तो किसी ने बताया कि वह बगल में है। उधर बढ़ गया, जैसे ही दरवाजे पर पहूंचा रीना पर नजर पड़ी वह रो रही थी। मुझे पर नजर पड़ी तो वह दौड़ गई और फिर कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया और दो तीन झपड़ लगा दिया। फिर कुछ पुलिस वाले पहूंचे और मुझे पकड़ कर हाजत में डाल दिया। बात बदल गई। पता चला कि मेरे उपर अपहरण का मुकदमा दर्ज किया गया है और इस सब के लिए पुलिस को मोटी रकम दे दी गई है। मैं बेपरवाह हाजत में बैठा रहा। चुपचाप। मेरा अंग अंग दुख रहा। इस घटना मे बच जाना करिश्मा था। लोगों से सुना की रेल मेरे उपर से गुरती रही और मैं वहीं बेहोश पड़ा रहा है। और जब इस घटना में बच गया तो फिर अब डरना किस से थे। पहले ही:ःजो तुध भावे नानका सोई भली तू करःः के साथ घर से निकला था। सो अब यहां से आगे होने वाले सभी घटनाओं का मानचित्र माथा में घूमने लगा।

दोपहर से अधिक बीत गए थे। फिर एक पुलिस वाले ने मुझे वहां से निकाल कर  अधिकारी के पास ले गया। पूछताछ होने लगी। रीना भी वहीं थी। मैंने प्रेम करने की बात कही और साथ ही साथ शादी भी कर लिये जाने की जानकारी दी। अधिकारी के माथे पर नजराने की रकम बोल रही थी उसने मुझसे पूछा- 
‘‘घर जाना चाहते हो या जेल।’’
मैंने कहा-‘‘घर।’’
‘‘फिर इसके लिए तुम अभी चुपचाप यहां से उठो और चले जाओ।’’
‘‘रीना?’’
‘‘वह तुम्हारे साथ नहीं जाएगी।’’
‘‘मैं साथ ही घर जाउंगा।’’
‘‘फिर तुम्हें जेल जाना होगा।’’
‘‘तो जेल ही जाउगा।’’
टका सा जबाब सुनने पर वह पुलिसवाला उठा और सटाक सटाक सटाक। मोटी बंेट की लाठी देह पर पड़ने लगी। मैं जोर जोर से चिल्लाने लगा। तभी बगल से दौड़ कर रीना आई और लाठी को अपने देह पर रोक लिया और फिर दरोगा से भीड़ गयी।
‘‘काहे मार रहलो हो, कोई चोर उचक्का है की। शादी कैलके हें हमरा से, तोरा की दिक्कत हो।’’
फिर उसके परिजन वहां से आए और उसे घसीट कर ले गए।
शाम हो गई और फिर रात भी। मेरी सुध लेने वाला कोई नहीं था पर रीना के बेलने की आवाज बीच बीच मे आ रही थी। शायद वह इसलिए ही जोर से बोल रही थी कि मैं सुन सकू। 

मैं चुपचाप बैठा रहा। सोंचता रहा। पर अब सोंच सीमित हो गई थी। अब जीवन की आशा नहीं रही थी और मौत का डर चला गया प्यार में पागल होना इसी को तो कहतें है। एक अजीब सा जुनून सवार हो गया, सब से लड़ कर प्रेम को जीत लेने का। दांव पर लगा दी अपनी जिंदगी। जानता था मेरे घर में किसी को इसबारे में अभी पता नहीं होगा और हो भी तो कौन देखने आएगा? अब मन में एक ही बात चल रही है जीवन चुक जाए और प्यार जीत जाए। जीवन रहे न रहे प्यार रहना चाहिए।

रात भर निंद नहीं आई पर थाने मे हलचल चलती रही। किसी से पूछने पर भी वह कुछ नहीं बताता था। सुबह पता चला कि अपने थाना ले जाएगें और फिर जेल। सुबह रीना के परिजनों के साथ साथ मैं भी रेलगाड़ी पर एक दो पुलिस वाले के साथ बैठ गया और फिर बिहारशरीफ होते हुए अपने शहर। थाने में पहूंचा तो जंगली आग की तरह छोटे से शहर से लोग दौड़ दौड़ कर थाना देखने आने लगे। भीड़ मेले की तरह उमड़ पड़ी। शायद इस तरह का यह पहला मामला था।
यहां आकर कुछ अकड़ ढीली होने लगी। मन में अपने इस कृत्य के लिए शर्मिंदा हो रहा था, नजर झुकी रहती और आंखें नम। फिर घर से छोटा भाई, चाचा इत्यादी भी आ गए। आंखो से अविरल आंसू निकलने लगा। इसलिए नहीं कि ऐसा क्यों किया बल्कि इसलिए कि घर परिवार के बारे में नहीं सोंचा। फिर बाबू जी आए तो मैं और फूटफूट कर रोने लगा। जिस पर उनको गर्व था उसी ने उसे चूर चूर कर दिया।

पुलिस यहां भी मैनेज किया जा रहा था और अब रूपये के दम पर वह घर जाएगी और मैं जेल। बगल के कमरे रीना भी बैठी थी और मेरे रोने की आवाज सुन कर चली आई। हाजत में आकर मेरा हाथ थाम लिया और बोली।
‘‘काहे ले रोबो हीं, चुप रहीं नें, जे करना हैं करेले दहीं, हमरा अलग अब भगवाने करथी।’’
‘‘सब तोरे पर अब निर्भर है, तांे जे बयान देमहीं ओकरे पर इस बचतै, नै तो ऐकर जिंदगी बर्बाद।’’ चाचा बाले।
‘‘चिंता काहे करों हखिन, इस सब जेतना करे के है कर लै, पर हमरा झुका नै सकतै।’’

और फिर थाने मे उसके गांव के बहुत सारे लोग जुट गए। गांव से बेटी का भागना पूरी गांव के ईज्जत की बात थी सो गांव के दबंग मुखीया नरेश सिंह भी पहूंच गए। उसके बड़े चाचा, बाबू जी सब।
आते ही नरेश सिंह ने कहा-
''आंय गे छौंरी, लाज नै लगलै, घर से भाग के समूचे गांव के नाक कटा देलहीं, ईज्जत मिट्टी में मिला देलही।’’
इतना सुनना की रीना तिलमिला गई।''
‘‘ हां नाक तो कटबे कैलै, जब तोर बेटी गोबरबा के साथ सुत्तो हलो और तीन बार पेट गिरैलहो तब नाक बचलै हल ने। केकर घर में की होबो है हमरा से छुपल है। ऐजा पंडित बनो हा। हम कौनो पाप नै कैलिए हें, प्यार जेकरा से कैलिए ओकरा से शादी कैलिए, जीबै मरबै एकरे साथ।’’
गुस्से से उसका चेहरा लाल था जैसे किसी ने नागीन को छेड़ दिया हो, उसने टका सा जबाब देकर सबको चुप कराने की कोशिश की या अपने कृत को सही ठहराने की, पर जो हो उसने सच सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया। 
समाज में पवित्रता का पैमाना ही अलग होता है, छुपा हुआ पाप, पाप नहीं होता और दिखने वाला प्यार पवित्र नहीं होता।
इतने पर जब उसके बड़े चाचा ने कहा
-‘‘केतना छिनार है इ छौंड़ी, चल ले चल ऐकरा। काट के फेंक देबै। कुल पर कलंक लगा देलक, बच के कि करतै।’’
लगा जैसे रीना के देह पर किसी ने जलता हुआ तेल छिट दिया हो। 
‘‘हां तों जे अपन भबहू:छोटे भाई की बीबीः से दबर्दस्ती मुंह काला करके और हल्ला करे के डर से जला के मार देलहो इ सब कलंक नै ने लगलो। बड़की साधू बनो हा, हमरे से बेटी लिखाबो हलो लेटर और रात रात भर मिलो हलो मन्टूआ से और जान के भी चुप रहला।’’
चटाक। रीना के चेहरे पर तमाचा लगा। ‘‘चल लेकर ऐकर घर, बचके की करतै।’’
शेष अगले किस्त में, बने रहिए।

29 January 2012

एक छोटी सी लवस्टोरी-47


बस जाकर पटना के हार्डिंग पार्क बस अड्डे पर रूकी और फिर वहां से एक रिक्सा लेकर उसे स्टेशन रोड में स्थित होटल में ले जाने को कहा। कई होटलों में गया पर किसी ने कमरा नहीं दिया। इसका कारण शायद यही था कि लड़का-लड़की देख कर सभी समझ जाते थे कि घर से भागे हुए है। खास कर दोनों के चेहरे के भाव ही ऐसे थे जैसे कहा जा सकता है कि चेहरे हवाईयां उडी हुई हो। रिक्सावाला के कहने पर धर्मशाला में शरण मांगी पर वहां भी नहीं मिला और फिर अन्त में हार रेलवे स्टेशन का रूख किया। यह सब करते-कराते दस से उपर बज गए। रेलवे गेस्ट रूम में बिना टिकट कटाए ही जाकर बैठ गया। इस सब के बीच भी वह चुप ही रहती और मैं भी खामोश। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। यहां से आगे मैं जाना नहीं चाहता था और इसके कई प्रमुख कारण भी थे। एक तो यह कि यहां से आगे कभी गया नहीं और जाने पर कोई अपना था भी नहीं और दूसरा यह कि महानगरों के बारे मे कई तरह की बुरी खबरें सुन रखी थी या सिनेमा में देख रखा था, सो यहां बैठ कर ही सोंच रहा था कि क्या करना है। फिर एक टी स्टॉल से जाकर दो कप चाय, एक पैकेट बिस्कुट लेकर आया, बहुत कहने सुनने पर भी रीना ने केवल एक कप चाय ली। फिर क्या हुआ कि रीना ने थैले से आइना कंधी निकाला और अपने बाल संवरने लगी।
कुछ भी नहीं समझ आ रहा था और एक कशमकश मंे जिंदगी फंसी लग रही थी। फिर अब क्या करू? सवाल ही बार-बार मन में उठ रहे थे। मैंने भी हाथ मुंह धो लिया और फिर बगल के हनुमान मंदिर में जाकर पूजा कर लेने का प्रस्ताव रखा। वह मान गई। हनुमान मंदिर में नीचे हनुमान जी की प्रतिमा थी और वहीं लोग पूजा करते थे हम दोनों भी वहां जाकर खड़े हो गए। फिर वहां प्रसाद इत्यादी चढ़ा का मंदिर के उपरी भाग में बने मंदिर में गया जहां भगवान शिव की प्रतिमा लगी थी।
दोनो जाकर शिवजी की प्रतिमा के आगे खड़े हो गए। गांव में रहते हुए भी पूजा पाखण्ड को कम ही मानता था पर शिव जी के प्रति आशक्ति अपार थी। कुछ अपनापा सा था मन में। जैसे किसी अपने के पास हूं। सो हाथ जोड़े मन ही मन उनसे रास्ता दिखाने का बाल हठ करने लगा। कई मिनट तक वहां अविचल मौन खड़ा रह गया, एक हठी बच्चे की तरह, जैसे मांग रहा हो जो उसे लेकर ही जाएगा और अन्त में दोनो ंके आंखों से अविरल आंसू बहने लगे। यह आंसू पछतावा के थे या आगे राह नहीं मिलने के, कुछ पता नहीं, बस आंख से आंसू अविरल बह रहे थे...।
मंदिर से निकल उसी रेलवे स्टेशन की ओर चल दिया। तय नहीं कर पा रहा था कि कहां जाना है। कई रेल गाड़ी आ जा रही थी और उसके आने-जाने के बीच बजते पों पों के हॉर्न जैसे मेरे लरजते हुए दिल की आवाज हो, उसका ही चित्कार। हे भोला। यूं कभी बेराह होकर चौराहे पर ठिठका रहना जिंदगी की एक सबसे बड़ी बिडम्बना है। 

     प्रेम को शब्दों से लिख कर परिभाषित नहीं किया जा सकता और कर्म की राह थी नहीं, सो चुपचाप मौन ईश्वर को याद कर रहा था। अपने इस कार्य के लिए मन में मलीनता नहीं थी बस था तो एक समर्पण, जिससे कहीं अंदर यह शकून मिलता कि मैंने प्रेम के राह पर सर्वस्व नेव्छावर कर दिया है।

इसी द्वंद में ईश्वर से राह दिखाने की प्रार्थन करता बढ़ा जा रहा था कि किसी ने रीना का हाथ आकर पकड़ लिया। यह उसका बड़ा भाई था। हे भोला। आठ दस लोग और थोड़ी दूरी पर खड़े थे। सबकुछ इतना अचानक और अप्रत्याशित था कि दोनों ठकमका कर रह गए। किसी के मंुह से आवाज नहीं निकली और किसी ने प्रतिरोध भी नहीं किया। वह रीना को हाथ पकड़ कर ले जा रहे थे और मैं तन्हा, खामोश, अवाक देख रहा था। रीना मेरी ओर देखते हुए जा रही थी, एक बुत की तरह, जिसके प्राण को निकाल कर वही ंप्लेटफार्म पर ही रख दिया गया हो और प्राण भी निस्तेज देख रहा था जैसे बिना शरीर उसके होने का औचित्य भी कुछ नहीं था।
वह लगभग स्टेशन के निकास द्वार पर पहूंच ही गए थे कि अन्तस से किसी ने जोर से हिलकोर दिया। जागो, जागो, जहां प्राण को दांब पर लगा दिया वहां इस तरह से माटी का माधो बनने से क्या फायदा।

अचानक अन्तस की आवाज का एक हिलोर जो उठा उसी के बस में हो मैंने अपनी दोनों बांहे रीना की ओर करके फैला दिया। एक दम फिल्मी अंदाज था। आंखों से आंसू के अविरल बहती धारा के बीच बिछड़ कर अब जीना नहीं चाहता था सो अंदर से मन चित्कार उठा। अब क्या बचेगा। इतना भी साहस नहीं कर सकोगे तो प्यार क्यूं किया? 

      प्रेम के होने के कारण को ढूढ़ता समाज शायद इस बात को नहीं समझ पाऐगा कि जीवन के प्रति आशक्ति को खत्म कर प्रेम के प्रति आशक्त होना ही प्रेम की प्रकाष्ठा है और  उसकी परिभाषा भी।

     इधर मैंने बांहें फैलाई उधर रीना ने चुम्बकीय शक्ति की तरह भाई के हाथ को झटक कर छुड़ाया और क्षण मात्र मे ंमेरे बांहों में समा गई। फिर जेब में रखा सिंदूर का पुड़िया मैंने निकाला और उसकी मांग को सिंदूरी कर दिया। वह मेरी बांहों में उसी तरह समा गई जिस तरह सिंदूरी शाम रात भर सूरज को अपनी आगोश में छुपा लेता है और फिर होने वाली सुबह को सूरज नई उर्जा से भरा हुआ जग को रौशन करता है।

यह सब इतना अचानक हुआ कि किसी को कुछ समझ में नहीं आया। बस हो गया। किसी के बस में कुछ नहीं था। मेरे भी बस में नहीं। रीना के बस में भी नहीं। 

प्रेम के इस चरम बिंदू पर ही प्रेम के होने का मतलब सिर्फ उसे ही समझ आ सकता है जिसने प्रेम किया। बाद बाकि दुनिया इसी तरह से प्रेम के होने के कारण को ढुंढ़ती फिरती रहेगी और सवाल भी उठाती रहेगी।

और फिर दनादन कई घूंसे मेरे चेहरे पर पड़ने लगे। अंधाधुन। कुछ ने मुझे पकड़ा, कुछ ने रीना को पकड़ कर खींच लिया। कितने ही लोगों के लात धूंसे शरीर पर पड़ रहे थे। और फिर किसी ने पैर पकड़ा और किसी ने हाथ और इसी प्लेटफार्म पर आ रही रेलगाड़ी के आगे सीधे फेंक दिया। सर पर टन्न की आवाज आई और आंखों के आगे लाल लाल बत्ती जलने लगी। रेल की आवाज चित्कार कर रही थी, बस उसे ही सुन रहा था। शायद मेरे हृदय की आवाज को उसने भी आत्मसात कर लिया हो और पों... पों...पों.... पों... पों...पों....
इसके आगे मेरा अवचेतन सुन्न हो गया....

शेष अगले किस्त में, बने रहने के निवेदन के साथ साथ यह निवेदन भी कि अपने अमुल्य टिप्पणी देने में थोड़ी सी उदारता बरतें ताकि साहस पा सकूं....

22 January 2012

एक छोटी सी लवस्टोरी-46


आज सूरज उगा तो है पर उसे एक उम्मीद भरी नजर से मैं देख रहा था और सोंच रहा था कल फिर सूरज तो उगेगा पर अपनी जिंदगी के सूरज का उगना और अस्त होना ईश्वर के हाथों ही तय होना है। वह तो चली गई आहिस्ते से दामन छुड़ा कर पर मैं उसी बुढ़ा बरगद की गोद में बैठा रहा। एक अलबेलापन, एक अलमस्तपन सा छा गया था, जैसे जिन्दगी देने वाले के हवाले ही जिंदगी कर दी हो। फैसला तो कर लिया पर उस राह पर चलना उतना भी दुभर था जितना एक नवजात के लिए संसार। रीना को जाते जाते रूपया और जेवर तो लौटा दिया पर अपने हाथ में एक रूपया नहीं था और सबसे पहले उसकी व्यवस्था ही करनी थी। इस विपरीत परिस्थितियों में भी हमेशा प्राकृति का सान्ध्यि मुझे संबल देता था सो बरगद की गोद में बैठे बैठे जब समाधान नहीं सूझा तो निकल गया खेत की ओर। मीलों दूर चला गया चुपचाप और विचारता हुआ की कल क्या होगा। हर बार मन के अंदर से यही आवाज आई कि यह गलत है पर फिर दिल की आवाज प्रतिकार की स्वर में गरज उठती। प्रेम करने और विछड़ने के भय ने मन की बात नहीं मानी। प्रतिकार का एक तेज स्वर अंदर से उठता और मन को खामोश कर देता। 

यूं ही विचारता हुआ चलता जा रहा था जैसे कोई साधु-सन्यासी बेरहम जिन्दगी से लड़ता हुआ खुद उसके ही प्रति बेरहम हो गया हो। संधर्ष और विरोधाभाष आज भी मन के अंदर चल रहा है पर इस सब पर दिल की आवाज ही भारी पड़ रही है। इस सबके बीच जो निर्णय के रूप में बात सामने आती वह जो तुध भावे नानका, सोई भली तू कर। छोड़ दिया ईश्वर के हवाले और लौट आया घर। 

सबसे पहले पैसे का जुगाड़ जरूरी था सो इसके लिए फूफा का जेब ही साफ करने का मन बनाया। कल ही खेत में खाद देने के लिए चावल बेचा गया था और मैंने उसी पर हाथ साफ कर दिया। कुल चौदह सौ रूपये थे। मैं जानता था यह अतिमहत्वपूर्ण पैसा है पर प्रेम से महत्वपूर्ण कुछ और नजर ही नहीं आ रहा रहा था। इससे पहले मैं अपने प्रेम के किसी भी गतिविधी को दोस्तों से सांझा कर लेता था पर इस बार किसी का भरोसा नहीं कर रहा था। शाम के करीब छः बजे होगें। हल्की हल्की बूंदा-बंदी हो रही थी और भादो महीने का अंधेरिया रात अपने पूरे शबाब पर थी। 

यह मलमास का महीना था और हिंदू धर्म के अनुसार अपवित्र। शादी व्याह इस माहिने में नहीं होती थी और ऐसे में दोनों ने घर से भागने का निर्णय किया था।

मैंने घर से छाता और टार्च लिया और चुपचाप घर से निकल गया। फूआ ने पूछा भी कि छाता लेके कहां जाहीं तो कह दिया कि सिनेमा देखे ले। और हां घर से निकलते वक्त पता नहीं क्या सुझा और कहां से आवाज आई दरवाजे से लौट कर फूआ के सिंदूर के डिबीया से एक चुटकी सिंदूर निकाल कर कागज के टुकडे का पुड़िया बनाया और जेब में रख लिया।
नै से बारह सिनेमा का टिकट कटाया और फिर साहिबां सिनेमा देखने लगा। प्रेम में डूबी एक कहानी। अक्सर सिनेमा प्रेम में डूबी हुई कहानी लेकर ही बनती है पर शायद सिनेमा प्रेम की धरातली सच्चाई से परे ही होती है। हॉल मे बैठा बैठा मैं सोंच रहा था। सिनेमा करीब बारह बजे खत्म हुआ और अंधेरी रात में घर की ओर मैं निकल पड़ा। रास्ते में थाना चौक पर एक मिठाई का ठेला लगा हुआ था उससे सौ ग्राम चिनिया बेदाम लिया।दो रूपया। जेब में मात्र सवा रूपया ही खुदरा था जिसे दुकानदार को दिया और फिर खुदरा नहीं होने की जब बात कही तो उसने फटाक सा कहा कि जाइए न कल दे दिजिएगा। बड़ा नेक बंदा था।  मैं चल दिया पर कल की बात कानों में गुंजती रही। पता नहीं कल क्या हो। बहुत भारी डर था कहीं कोने में, पर प्रेम का साहस उसपर भी भारी पड़ रह था। करीब एक बजे रात्री को फिर उसी बुढ़े बरगद की गोद ने शरण दी। वहां बैठे हुए आधा एक धंटा हो गया और बीच बीच में सिगनल के लिए टार्च की हल्की सी एक रौशनी जला देता। उसका कुछ अता पता नहीं था। फिर जोर से बिजली चमकी और बारिस होने लगी। तेज। छाता वहां काम आया और चुक्को-मुक्को बैठ कर छाता लगा लिया। कुछ, एक धंटा तक मुसलाधार बारिस हुई और माहौल डरावना हो गया। आम रात होती तो बिना किसी के साथ लिए घर के बाहर कदम नहीं रखता, पर आज की रात जैसे कयामत की रात थी और जब सबकुछ खत्म ही होने वाला था तो मैं किस की परवाह करता। किसके लिए डरता! जिया तो भी न जिया तो भी। रात खत्म होती जा रही थी और उसका कहीं अता-पता नहीं था। घर से इस तरह भागने का अब भी मन नहीं कर रहा था बस यहीं सोंच रहा था कि सब कुछ सब जान जाए और दोनों को भागते हुए पकड़ ले। जो बात भीतर भीतर चल रही थी वह सर्वजनिक हो जाए, बस। ऐसा इसलिए कि जिस समाज में पला बढ़ा था वह कथित रूप से अगड़ा कहलाता था और उसमें समाज की बुराई को छुपाने का अजीब चलन थी। सब कुछ सब कोई जान रहा है पर जैसे सब अनजान हो। सभ्य होने का एक अजीब फैशन। कर्म कुकर्म की परिभाष भी अपनी गढ़ी हुई। ढंका हुआ आदमी सदकर्मी और उघड़ गया तो कुकर्मी।
इसी बीच फिर एकाएक वह मेरे सामने खड़ी थी। उसी तरह जैसे जिंदगी सामने आकर रास्ते का पता बता रही हो। जैसे जिंदगी ने मंजील का पता बता दिया हो पर मैं अब भी अनजान बना बैठा हूं।
‘‘केतना देर इंतजारा करा देलहीं।’’
‘‘इंतजार में भी तो मजा है और प्यार के परीक्षा भी।’’ 
उसने टका सा जबाब दिया। वह कुछ गंभीर थी। आम दिनो की चंचलता उसने कहीं रख दिया था शायद। उसने कोई श्रृंगार नहीं किया किया था। वहीं टू पीस और फ्राक। गांव की एक लड़की। सबकुछ के बावजूद उसका चेहरा अंधेरे में भी साहस से चमक रहा था। कुछ देर तक खामोशी छाई रही। तीन बजने को है। चल दिया। थैला बरगद की खोंधड़ से निकाला और निकल पड़ रास्ते पर, शायद कोई मंजिल मिल जाए। अजीब से जूनून के हवाले था सब कुछ। चला तो जा रहा था पर कहां जाना है नहीं सोंचा था। रास्तें भर सांेचता आ रहा था कि पीछे से कोई आए और हाथ पकड़ ले-कहां जा रहे हो। पर कोई नहीं आया। चलते चलते बस स्टेंड पहूंच गया पर गाड़ियों के चलने की अभी कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही थी। शायद ज्यादा पहले आ गया था। पर बिना कुछ सोंचे समझे पटना की ओर जाने वाली सड़क पर पैदल ही चल दिया। जैसे प्रेम के साहस में पटना की दूरी भी कम ही हो। चलता रहा, चलता रहा। एक धंटा चलने के बाद किसी गांव से गुजरते हुए एक-आध बूढ़ा-बुजुर्ग मिल जाते। 
‘‘कहां जा हो बउआ।’’
 जबाब मैं देता- ‘‘बस टहल रहलिए हें बाबा।’’
अब करीब चार बजे थे और इतनी देर में पांच छः किलोमिटर की यात्रा कर चुका था। बहादुरपुर गांव के पास सांई मंदिर थी। वहां से गुजरते हुए बरबस ही सांई भगवान को नमन कर लिया। दोनों ने वहां शीश नवाया और मौन रह कर एक दूसरे को मांग लिया। दस मिनट बस के आने का इंतजार किया पर बस नहीं आई। फिर चल पड़ा। करीब तीन चार किलोमिटर चलने के बाद जब सारे गांव पार कर गया तो देखा कि एक मीनी बस चली आ रही है। दोनों रूक गये। हाथ दिया। गाड़ी रूक गई। चालक, खलासी से लेकर यात्रियों तक ने विचित्र से भाव से देखा। जैसे कुछ सवाल हो उनकी आंखो में। पर जबाब कौन देगा? बिहारशरीफ हॉस्पीटल मोड़ पहूंच गया। वहां से पटना के लिए बस पकड़नी थी। वहीं चाय की एक स्टॉल पर चाय का ऑडर दिया और जब रीना को चाय देने लगा तो उसने मना कर दिया। वह कुछ ज्यादा उदास थी। मैं भी घवड़ा गया। असमंजस की स्थिति में ही घर से निकल गए और अब सोंच रहें हो जैसे। पता नहीं क्या हो, पर जो हो, सो हो।
पटना, पटना, पटना चिल्लाने की आवाज गूंजी और फिर दोनों ने पटना की बस पकड़ ली। खामोशी की एक चादर दोनो ने ओढ़ ली। उदास चेहरा लोगों को शसंकित कर रहे थे पर परवाह कौन कर रहा था।

शेष अगले किस्त में, बने रहिए।

21 January 2012

सोशल साइट्स पर प्रतिबंध के बहाने- कुछ गंदगी भी आने दो.. कब तक धर्म की आड़ में सच से मुंह छुपाते रहोगे?


(अरूण साथी)
आज सुबह ही गांव में रहने वाला एक किशोर रामशंकर साई सिंह ने अपने दोस्तों को निधि से बचने की सलाह दी है, निधि एक फेक एकाउंट है जिसपर पोर्न तस्वीरें रहती है, यह रामाशंकर के विचारों की सकारात्मक अभिव्यक्ति थी। निधि यदा कदा मेरे वाल पर भी चस्पा हो जाती है और पहले मैं उसे खोल कर देखता हूं फिर कहीं कोई मेरे वाल पर इस तरह की नंगी तस्वीर देख न ले उसे डीलीट कर देता हुं। 
सन्नी लियोन जब बिग बॉस के घर आई तो मैं भी उत्सुक हुआ और गूगल देवता की मदद से उसे ढूंढ निकाला। बाद में पता चला कि सन्नी को ढूंढना सब रिकार्ड तोड़ दिया, मैं ही नहीं कई दिवाने है, और फिर यह बहस चल रही है नैतिक की....

जब से सोशल साइटस पर प्रतिबंध की बात सुन रहा हूं तब से कुछ न कुछ पढ़ने को मिल रहा है। अभी अखबारों में प्रवचन तो कभी चैनलों पर। विचित्र दुनिया है, प्रतिबंध लगा कर सुधारने की प्रवृति अभी तक बची हुई है? भला कैद खाने में भी कोई सुधार होता है? जब से होश संभाला है तब से ही यह सुनता आ रहा हूं, यह न करा,े वह न करो, यह भला है यह बुरा? किसी ने तय ही नहीं करने दिया मुझे, भला क्या और बुरा क्या? उपदेशकों का बोल-वचन भी बड़ा ही प्यारा होता है, अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं की हम बहक जाए और धार्मिक भावनाओं का लिहाज न करें अथवा धर्म को बिगाड़ने का प्रयास करें। कुछ लोगों को राजनेताओं के उपर बने कार्टून और फेक तस्वीरों से भी आपत्ति है और फिर मामला न्यायालय में गया और आदेश आ गए प्रतिबंध लगा दो।

सबसे पहला तर्क धर्म को लेकर है। धर्म के विरूद्ध है सोशल साइट्स। तब मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है जब सोशल साइटस पर किशोर, युवा और बुजुर्ग तीन पीढ़ी एक साथ विचारों को अभिव्यक्त करतें हैं। कोई धर्म के खिलाफ लिखता है तो कोई फोटो चिपका देता है। कोई उसके उपर कॉमेंट करता है। मतलब कि यह एक ऐसा मंच जहां खुले मन से हम अपने विचार रखते है। कोई रोकने टोकने वाला नहीं। तब क्या धर्म को इन विचारों से खतरा है और वह नष्ट हो जाएगा? कैसा है यह धर्म जो इतनी छोटी सी बात से भी डर जाता है। जो कुछ पोस्ट और कार्टून से खराब हो जाएगा। हजारों सालों से हमनें जिस धर्म की आड़ में आजादी को कैद कर रखा है उस धर्म ने हमें यही सिखाया है। बड़ी लंबी चर्चा होगी यदि इस में फंसे की धर्म क्या है? बस इसी में रहते है कि क्या धर्म का आधार इतना कमजोर है कि वह नेट पर कुछ पोस्टों से खराब हो जाएगा? धर्म शाश्वत और ईश्वरीय है, तब फिर यह इतना कमजोर कैसे हो सकता है? और जिस धर्म का आधार ईश्वर है उस धर्म की चिंता हम क्यों कर रहें है? निरा बुद्धू हैं हम या फिर खुद को ईश्वर से उपर मान रहें है? छोड़ दो भाई धर्म यदि वास्तविक धर्म है तो उसे कुछ नहीं होने वाला। कहा भी जाता है कि सोने की परीक्षा आग में तपा कर ही होती है, तो तपने दो धर्म को इस आग में।

एक बात तो हमे सोंचनी ही होगी कि हजारों सालों से हम कह रहें हैं कि जमाना खराब है, हम पापी है, हमे सुधरना होगा। इसके लिए तरह तरह के प्रतिबंध लगाए, नियम बनाए, यज्ञ-प्रवचन से लेकर बुर्का तक पहना दिया और आप ही कहतें है कि वर्तमान समय सबसे बुरा है। तब धर्म और धार्मिक ग्रंथों के औचित्य के उपर ही सवाल नहीं उठाता? यदि वे सही होते तो जमाना खराब कैसे होता? और अगर जमाना खराब है तोे फिर वे सही कैसे? 

सलमान रस्दी का मामला बड़ा ही हस्यास्पद है और कई बौद्धिक मठाधीश महोदय उनके आने का विरोध कर रहें है इनमें से कुछ वही है जिन्होनें ही एम एफ हुसैन के विरोध किए जाने का विरोध किया था? कुछ मां सरस्वती की पेंटिंग मंे अश्लीलता देख लेते है तो कुछ मीड नाइट चिल्डेन के सच का सामना नहीं करना चाहते।

और अन्त में मैं उन माननीय नेताओं से कहना चाहूंगा जिन्होंने नेताओं प्रति यहां पर गुस्सा देखा है उन्हें इससे सबक लेना चाहिए न कि वहीं राजनीति की वही उलटबंसी यहां भी बजाऐं और देश का बंटाधार कर दें।
यह दोहरी जिंदगी कब तक। तय करने दिजिए सारे रास्ते इस नई पीढ़ी को, जिसे हजारों सालों से आपका धर्मिक प्रवचन, तत्वज्ञान और तालीबानी फरमान अपने हिसाब से नहीं सुधार सका। हमने कोई रास्ता बनाया ही नहीं और हजारों सालों से चिल्ला रहें है युवा रास्ते से भटक गए है!

19 January 2012

जमाना तो बोन लेस का है फिर कबाब में हड्डी क्यों बनते हो जी....(व्यंग)


अरूण साथी..

बदलते जमाने के साथ साथ जमाने का चलन भी बदल गया है। इस चलन में एक नया चलन स्याही फेंकने का जुड़ गया है वह भी उनपर जो कबाब में हड्डी बनतें है। पहले का दौर और था जब राजा महाराजा कबाब मंे हड्डी पसंद करते थे और बिरबल दरबार की शोभा बढ़ाते थे पर आज जमाना बदला है और कुछ लोग हैं कि बदलना ही नहीं चाहते। उनको यह समझ ही नहीं कि आजकल कबाब में हड्डी लोगों को पसंद नहीं और बोन लेस कबाब ऑन डिमांड है। बाबा ढावा से लेकर दिल्ली के दरबार तक बोन लेस कबाब की ही डिमांड है। अब लोग भी किसिम किसिम के है किन्हीं को शाही बोन लेस कबाब पसंद है तो किन्हीं को मुगलई बोन लेस कबाब। दोनांे कबाब के डिमांड का पता करना है तो भाई लोग युपी चुनाव पर नजर डाल लें, हां चश्मा उतार कर। आजकल शाही बोन लेस कबाब के शौकीन बड़ी संख्या में मिलने लगे है। इसकी फेहरिस्त में अपने लल्लू भैया, दीदी जी, बहन जी और तो और कामरेड भी शामील है। लोग समय समय पर जायका बदलने के लिए कभी शाही बोन लेस कबाब तो कभी मुगलई बोन लेस कबाब की डिमांड में गला फाड़ कर चिल्लाते नजर आतें है।

अब रही बात कबाब में हड्डी की तो यह अब नहीं चलेगा। देखा नहीं बाबा और बुढ़उ का का हाल हुआ। ला-हौल-बिला-कुवत। रामलीला में महाभारत करबा दी बोन लेस के शौकीनों ने। बुढ़उ को तो जंतर मंतर से लेकर आजाद मैदान तक ऐसा पोलिटिकल भूल-भुलैया में फंसाया कि बेचारे की जान पर बन आई। लोग बाग तो यही सोंचतें है, गोया जान है तो जहान है पर बुढ़उ को समझ आये तब न।
भैया, बोन लेस की बात ही निराली है। उनकी तो ठाठ ही ठाठ है। अब आपसे कुछ भी कहां छुपा है, कई लोग रीढ़ की हड्डी निकाल कर बोन लेस बने और माननीय की कुर्सी पर बिराजमान है। जय हो।

(कार्टून- गूगल देवता के सौजन्य से)


17 January 2012

प्यार पर पहरा---


प्यार पर पहरा---
जमाना भले बदल गया है पर सोंच नहीं बदली है। बरबीघा थाने में अपने दो माह के बच्चे के साथ इस प्रेमी युगल को गिरफ्तार कर रखा गया है और इनका जुर्म यही है कि इन्होने प्रेम विवाह किया है और वह भी अर्न्तजातिय। लड़की यादव जाति की है और लड़का बढ़ई। दोनों एक ही गोडडी गांव के रहने वाले है और बचपन से एक दूसरे से प्रेम करते थे। लड़का 2010 में एसकेआर कॉलेज में पढ़ता था और इंटर का परीक्षा देने से पुर्व ही घर से भाग कर प्रेम विवाह कर लिया। लड़की के परिजनों ने अपहरण का मामला दर्ज करा दिया और पुलिस भले ही अपराधियों को पकड़ने में नाकाम रहे पर प्रेमी जोड़ों को पकड़ने में तत्परता दिखाती है और दोनों को नवादा जिले के कटौना गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों को शेखपुरा कोर्ट में हाजिर किया जाना  है और फिर जेल..





12 January 2012

एक छोटी सी लव स्टोरी--45


(भतीजे की बिमारी की वजह से दिल्ली जाना हुआ और एक सप्ताह परेशान रहा। फिर कुछ दिनो तक दिल नहीं लगा और जब तक दिल न कहे लिखता ही नहीं हूं... सो देरी के लिए क्षमाप्रार्थना के साथ ही अगला अंक हाजिर है...आशा है आप सबका प्यार पुर्ववत मिलता रहेगा....)

सबकुछ वैसा ही नहीं होता जैसा की हम सोचतें है और वही हो रहा था। सोंचा था क्या, हो गया क्या? पर इस सब के बीच कशमकश जारी थी। हां उसमें अंतर आया था और वह यह कि जहां कल तक कभी कभी अपनी जिंदगी के बारे मे ंसोंचता, वहीं आज हर पल उसी पर विचार कर रहा था। पर इस सोंच-विचार के निहातार्थ बहुत लधु था। क्योंकि वैसा कुछ हो नहीं रहा था जो मैं सोंच रहा था। फिर भी निर्णय के अंतिम पड़ाव पर आकर ही यह खत्म होना था और तब तक लिए यह जारी था। हां, आस पास की घटनाओं और परिस्थितियों का सीधा असर जिंदगी पर पड़ती है और यह हो रहा था। सालों से मनोरंजन के नाम पर एक अदद रेडियो सुनने की आदत थी और उसमें शामिल थी विविध भारती। देर रात विविध भारती को सुनते हुए एक गाना ने जिंदगी में कठोर निर्णय लेने को वाध्य कर दिया। यह गीत लगातार बजा करती थी और संयोग कि आज रात भी बजने लगा-
‘‘जो सोंचते रहोगे
तो काम न चलेगा
जो बढ़ते चलोगे 
तो रास्ता मिलेगा।’’
सो बस बढ़ते जाने का निर्णय ले लिया। आज रात को करीब ग्यारह बजे मैं घर से निकल गया। यह भादो का बरसाती महीना था राजंगीर में मलमास मेला लगा हुआ था। यह दो मासू महिना था और इस अपवित्र माना जाता था।
इस समय गांव में सन्नाटा छाया हुआ था। कहीं एक चराग भी नहीं जल रहा था। करीब आधा धंटा यूं ही इंतजार करता रहा, मन में कई तरह के ख्यालात आते रहे और जिंदगी बार बार इस दौर में मुझे दोराहे पर लाकर खड़ा करती रही। एक मन प्रेम को छोड़ कर भाग जाने को कह रहा था तो एक मन प्रेम के साथ भाग जाने को। माथा सांय सांय कर रहा था और मन में भारी घबराहट हो रही थी। इसी उधेरबुन में उलझा था कि सामने रीना थी। 
‘‘की यार, की सोंचो ही।’’
‘‘सोंचे तो पड़बे करो है, जिंदगी है, पता नै कहां कहां ले जइतै।’’
‘‘चल छोड़ यार, जहां जहां ले जइतै हम दोनो साथ साथ जइबै।’’
बस यही एक ऐसा आश्वासन या यूं कहे की भरोसा था जो दिमाग को दिल से अलग कर देता। जिंदगी के होने का मतलब बदल जाता था और खुद को सबसे बड़ा भग्यवान समझने लगता।
उसके हाथ में एक बड़ा सा थैला था जिसमें कपड़ा-लत्ता रखा हुआ था। उसने उसे मुझे थमा दिया और इसे सावधानी से रखने की बात कही। 
‘‘कौची है एकरा में हो।’’ 
‘‘तेरा एकरा से की मतलब, हमर समान है, सब बता दिऔ’’
‘‘काहे नै बतइमहीं।’’
‘‘कपड़ा लत्ता है और जेवर और रूपया भी।’’
‘‘तब जेवर और रूपया के की काम। केतना है।’’
यह कहते हुए मैंने थैले से सामान निकाल कर देखना प्रारंभ कर दिया। कई जोड़ी कपड़े से लेकर श्रृंगार तक का सारा सामान था और फिर एक थैले में जेबरात और नकदी। बड़ी मात्रा में। यह क्या। मैंने पूछ लिया। वह ठकमका गई।
‘‘केतना रूपया और जेवर है।’’
‘‘ नब्बे हजार रूपया और बीस भर जेबर, सब हमर वियाह के है हमरे पास रख हलै हम ले लेलिऐ।’’
मैं स्तब्ध रह गया। इतना अधिक रूपया और जेवर ले जाने का मतलब था गांव में बदनामी। यह की रूपया और जेवर के लोभ में भगा ले गया। मैंने उसे ले जाने से इंकार दिया। 
‘‘की चाहों हीं, भागला के बाद गांव में सब गरियाबै।’’ 
‘‘काहे, काहे गरियैतै, हमर चीज हम ले जाहीऐ।’’
फिर काफी तकरार और अंत में मैंने इसे लौटा दिया, यह कहते हुए कि जब गरीबी में ंनहीं जीना तो फिर अभी भी समय है, वापस चली जाओ। यह रामवाण था और वह मान गई।

फिर थके हुए कदमों से बुढ़ा बरगद की गोद में चला गया। सबसे पहले थैले को बुढ़ा बरगद की खोंधड़ में छुपा दिया, कल के लिए। और बातचीत होने लगी। आज और अब हम दोनों सहज नहीं थे। मैं उदास था और वह नर्वस। देर तक बैठे रहे चुपचाप, खामोश। उसकी इस खामोशी ने मुझे भी डरा दिया। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। किसी चुंबकत्व की तरह वह आकर मेरे सीने में समा गई।

        मैंने महसूस किया उसके आंखों में आंसू थे। यह पेंड़ से पत्ते के टूटने का दर्द था और इसमंे कोई विदाई गीत गाने वाला नहीं था। मैंने उसे अपने आगोश में छुपा लिया। देर तक खामोशी की एक चादर लिपटी रही और दोनों एक दूसरे से बातचीत करते रहे। मैं समझ गया वह इस तरह से नहीं भागना चाहती पर जब सारे रास्ते बंद हो गए तो हमदोनों ने यह निर्णय लिया या यूं कि परिस्थिति के हाथों खुद को छोड़ दिया। हम दोनों के जीवन में सिनेमाई कुछ नहीं था बस थी एक कठोर सच्चाई और जीवन का पथरीला रास्ता। मैंने अपनी अंगुली को उसके चेहरे पर सरका दिया और पलकों से टपकते आंसू को सहारा दे दिया पर आंसूओं के बहने का प्रवाह और तेज हो गई और तब मैं खुद को नहीं रोक सका। मेरे आंखों से भी आश्रू की धारा बहने लगी और वह रीना के चेहरे पर आकर गिरने लगी। कोई कुछ नहीं बोल रहा था। खोमोशी ने अपना दामन फैला दिया था। कुछ देर यह दौर चला होगा कि मैंने अपने थरथराते हुए अधर उसकी पलको पर रख दिये, फिर अधरों से अधर मिले, फिर दिल से दिल एक हो गये और देह से देह भी। कहीं कोई विरोध नहीं, कहीं कोई प्रतिरोध नहीं, जैसे समर्पण ही प्रेम हो....।
मैं उसके प्रेम से साहस पाता था और वह मेरे। आज दोनों ने खुद को एक दूसरे को समर्पित कर दिया। जो तुम चाहो, जहां तुम जाओ। दोनों को पता था कि दोनों कितने होशियार थे और कहां तक जा सकते थे। दोनों को पता था कि दोनों दुनियादार नहीं थे, समझदार नहीं थे पर विकल्प के अभाव और विछड़ जाने के भय ने दोनों को मझधार में नय्या उतारने को मजबूर कर दिया। भाग कर जाएगें कहां, दूर दूर तक कोई सहारा देने वाला नहीं, पटना से आगे तक मैं कभी गया नहीं। पर क्या करें, यह कुछ उसी तरह का माहौल था जैसे आत्महत्या के पुर्व का होता है। मेरे मन में हर क्षण यही विचार आ रहे थे कि कोई आये और दोनों को पकड़ ले जाए और भरी समाज में यह बताए कि दोनों भागने वाले थे। फिर क्या, जो हो, सो हो।

गांव में हलचल होने लगी। जानवरो को खाना देने के लिए किसान जगने लगे थे और दूर कहीं प्रतकाली ....की आवजा गुंजने लगी। गांव में बड़े बुजुर्ग प्रतकाली गाते थे जिससे भोर होने का पता चल जाता था। पर आज दोनों में से किसी को भी जाने का मन नहीं था जैसे सूरज उगे भी और दोनों यूं ही बैठे रहंे और रौशनी में प्यार जगमागा जाए।
शेष अलगे किस्त में, बने रहिए।

02 January 2012

यही तो है साथी जिंदगी का बाजार..


पांच वर्ष का भतीजा गोलू जो अपने मामा के पास गया हुआ था की तबीयत खराब होने की वजह से फरीदाबाद जाना हुआ। एक सप्ताह लगभग रहा पर वहां मेरा जी नहीं लगा। या यूं कहें की शहर की रंगीनियों ने मेरा मन नहीं लुभाया या यूं कहें की लगातार क्लिनिक में रहते हुए ही मन ऐसा हो गया, पता नहीं क्यूं पर मन नहीं रमा और फिर 1 जनवरी को ही वहां से भाग आया। एक उदासी और एक खालीपन सा कुछ रहा लगातार। हां जमकर सैंडबीच, बर्गर और कॉफी का मजा लिया।
पर जो हो कुछ अच्छा भी हुआ। जैसे की अकस्मात इमरजेंसी होने की वजह से पहली बार हवाई जहाज से यात्रा करनी पड़ी और एक अलग दुनिया देखने को मिली। असमानता की एक उंची खाई। और फिर फेसबुक दोस्त मनीष कुमार (फरीदाबाद) ने इस आभासी दुनिया की दोस्ती का भास कराया और अस्पताल से लेकर हर जगह मुझे एक अपनापन दिया, लगा ही नहीं की हम दोनों नीजी दोस्त नहीं है। और फिर हरियाणा की महिलाओं की एक सबसे खास बात तो मुझे बहुत अच्छी लगी वह उनका अपने सेहत का ख्याल रखना। सभी महिलाऐं जुती और मौजे पहने दिखी, ग्रामीण भी, मन प्रसन्न हो गया। अपने यहां हो जैसे जुती घर में भी तो ठंढ में महिलाऐं नहीं पहनती और बीबी से रोज किच किच हो जाती है स्वेटर क्यों नहीं पहना, मफलर तो बांधो, पर असर नहीं, खैर 1 जनवरी को दिल्ली धुमने के प्रस्ताव को ठुकरा कर नव वर्ष रेलगाड़ी और औटो मे ंकाटी और अब अपने घर पहूंच गया। भतीजे की भी अस्पताल से छुटटी हो गई।

वहां के बाजार मे धुमते हुए चंद शब्द चुरा कविता की शक्ल दे दी, सोंचा आपके साथ सांझा कर लूं..


बेवजह
भीड़ है
आपाधापी है
कुछ खरीददार
कुछ दुकानदार
कुछ डेढ़ रूपया हरेकमाल की
सोंच रखतें हैं
कुछ मोल भाव कर
सोंचते है
मिल जाए सब कुछ सस्ते में,

कुछ हर कीमत पर बचा लेतें हैं!
कुछ बेकीमत बेच देते घरवार..

यही तो है साथी जिंदगी का बाजार..



24 December 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-44


प्रेम-शायद भाव-संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है। कभी अभिव्यक्ति का माध्यम जुबां होती है तो कभी आंखें और कभी कभी इसकी अभिव्यक्ति मौन होती है। पर मौन अभिव्यक्ति की इस भाषा को पढ़ना ही शायद प्यार है।

आज ऐसा ही कुछ हुआ। वह मेरे घर आ कर धमक गई। शायद वह समझती थी कि पत्र में दिये गए अल्टीमेटम के अनुसार मैं कुछ नहीं सुनूंगा। यह कोई दोपहर का समय था। मैं ओसारे पर बैठा था कि एक खनकती हुई आवाज सुनाई दी।
‘‘की शेरपरवली यहीं रहे के मन करो हो।’’
यह खनकती हुई आवाज चिरपरिचत थी। रीना की आवाज। उसने कुछ अधिक जोर देकर आवाज लगाई ताकि मैं इधर उधर भी होंउ तो सुन सकूं। फूआ और मां डेउढी  में हुई थी और रीना अपनी एक सहेली के साथ आकर धमक गई। मेरा गांव चुंकी बाजार से कुछ ही फासले पर था सो बाजार के बहाने यहां आना मुश्किल नहीं थी। 
‘‘नैहरा है न रीना बउआ, केकरा मन नै करो हई। कहां आइलहो हें।’’ फूआ ने कहा।
‘‘बाजार आइलीओं हल, सोचलिओं तोरा से मिलते चलो हिओं।’’
‘‘बढ़िया कइलहो बउआ, आबों।
मैं लपक कर दरवाजे तक गया। मुझे भरोसा ही नहीं हो रहा था। लगा जैसे दिन में जागते हुए सपना तो नही देख रहा। पर नहीं यह सच था। रीना मेरी मां के पैर पर छुकी हुई थी।
‘‘तोरी, ई रास्ता कैसे भुला गेलही।’’ मेरे मुंह से बरबस निकल गया पर वह कुछ नहीं बोली। यह उसकी नाराजगी जाहिर करने का अपना तरिका था।

फिर रीना और उसकी सहेली को मां ने धर के अंदर बुलाया। उसे ओसारे पर बिछी खटिया पर बैठाया गया। मां ने उसके लिए शरबत बनाने की बात कहते हुए मुझे मोदी जी की दुकान से चीनी लाने के लिए भेज दिया। चीनी लेकर आया तो देखा रीना मां और फूआ के साथ धुलमिल कर बातें कर रही थी। फिर मां ने मुझे शरबत बनाने के लिए कहा और मैं उसी काम में लग गया। और फिर वह लग गई अपने चिर परिचित अंदाज में।
‘‘तेरी, बबलुआ के शरबत बनाबे ले आबो हई शेरपर बली। ऐकरा तो खली लड़े और रूस के भागे ले आबो हई।’’ वह मुखर हो गई। 
‘‘जादे मामा नै बन।’ तोरा से पूछ के सब काम नै करे के है।’’
‘‘तोरी घर आल मेहमान से ऐसे बोलो हई।’’
चलता रहा।
मां, फूआ और रीना, सभी इस सच्चाई को जानते थे। पर सभी औपचारिक रूप से यह जता रहे थे जैसे वह एक मेहमान है, बस। मैं भी उसी अभिनय में लगा रहा। थोड़ी देर में गिलास में शरबत भरने लगा तो रीना उठ कर गिलास मेरे हाथ से छीन लिया। 
‘‘चल हट हमरा नै आबो है की, अपने घर ने हई।’’
यह सारा अभिनय चल रहा था और दोनो समझ रहे थे, एक दूसरे के दिल की हालत। दोनों के अंदर दर्द थे पर जुबां पर हंसी। इसी बीच उसके जाने की बात आ गई और मैं उसको थोड़ी दूर छोड़ने के लिए जाने लगा, तभी दरबाजे पर जैसे ही वह एक क्षण के लिए सभी के आंख से ओछल हुई, फफक कर रो पड़ी।
‘‘जब परबाह नै त प्रेम कैसन, इहे ले हमरा प्यार कलहीं हल, छोड़ देबे ले। इहे यदि प्रेम के परीक्षा है त हम भी इकरा मे फेल नै होबै।’’
‘‘देख अभी हम बड़ी दुख में हिऔ, हमरा माफ कर दे।’’
‘‘इहे से तो, दुख के घड़ी है त हमरा अलग काहे समझो ही, अगर भोला हमरा दुख में तोरा साथ रहेले बदलखीन हें त तो बंचित करे बाला तों के।’’ 
और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और उसके आंखू की एक बूंद हाथों पर आकर गिर पड़े। भोला। फिर वह जाने लगी। थोड़ी दूर तक उसे छोड़ कर आ गया। वह खामोश थी। पर उसकी यह खामोशी दर्द बुझी थी। इसे मैं समझ सकता था। उसने अपनी तरफ से अंतिम कोशिश के तौर पर यह कदम उठाया था।
अगले रोज मैं फूआ के साथ उसके गांव में था। मेरे गांव पहूंचते ही जैसे हवाओं ने जाकर उसे संदेशा दे दिया हो। न मैं उसे देख सका और न उसने मुझे। कम से कम मैं तो उसे भी देखते हुए नहीं ही देख सका। पर मुझे भी भरोसा था कि उसे मेरे आने की खबर मिल गई होगी। अमूमन कई लोग ऐसे वक्त में साथ भी दे देते है। न कहते हुए जानबुझ कर कह देतें है। जैसे की सुनाते हुए कहा दे-बबलुआ आ गेलै। 

कुछ दिन शांति से बीत गया। शायद एक पखबारा। दोनों एक दूसरे से दूर दूर रहने का प्रयास करने लगे ताकि लोगों को लगे कि हमारा बिलगाव हो चुका है। यह कदम दोनों ने उठाया और कहा इसके बारे में किसी ने किसी से नहीं था। यही होता है प्यार। मौन की भाषा। अदृश्य का दृश्य। न देखते हुए भी मैं उसे देख रहा था और वह मुझे महसूस कर रही थी।

आज सावन की पुर्णिमा थी। आज के दिन बिना किसी के कहे दोनांे को पता था कि मिलना था। मैं चुपचाप बूढ़ा बरगद की गोद मे जाकर बैठ गया। हल्कि बूंदा बांदी शाम में हो चुकी थी और रात में झिंगुर की आवाज आज एक बार फिर से चिर परिचित सी अपना लगने लगा। कोई और हो तो शायद ही इस रात में यहां बैठे पर मैं, एक अजीब सा शकुन। लगे जैसे कोई साथ हो मेरे हमेशा। एक अदृश्य। मुझे हौसला देता हुआ। डरो मत। जो होना है होगा। रात के ग्यारह बजे के बाद मैं घर से निकला। ग्यारह बजे तक रेडियो पर विविध भारती पर पुराने गीतों का कार्यक्रम सुन रहा था। भुले बिसरे गीत। जान बुझ कर डांट सुन कर भी रेडीयों की आवाज मैं तेज रखता था ताकि वह समझ सके। ग्यारह बजे जब विविध भारती पर गूंज की आज का कार्यक्रम अब यहीं समाप्त होता है तो उसे बंद कर थोड़ी देरे सोने का नाटक किया और फिर निकल गया। घर का दरबाजा बाहर से बद कर दिया। बरगद के पेंड़ के नीचे बैठे हुए करीब तीन से चार धंटा हो चुका होगा। सुबह के होने का एहसास भी होने लगा। वह नहीं आई। जब मैं वहां से उठ कर जाने ही वाला था कि एक छाया सी हिलती हुई दिखाई दी। वह आ रही थी। चांदनी रात थी। टहापोर अंजोरिया। पर उस चांद की चांदनी ने मेरे प्रियतम का जैसे श्रृंगार कर दिया हो। सफेद सलबार सूट में आज वह चमक रही थी। मैंने बांहें फैला दी और वह आकर उसी तरह समा गई जैसे....गाय के बछरे को गहीरबाल खरीद कर ले गया हो और वह खुंटा तोड़ कर भागी और मां से मिल रही हो।

शिकबे शिकायत। रोना धोना। सब हुआ। पर हां आज रोना मेरा अधिक हुआ, रीना का कम। मैं फफक फफक कर रोने लगा। ओह-जैसे जान जाते जाते बची हो। वह मुझे बच्चे की तरह दुलार रही थी। आंसू पोंछ रही थी। ‘‘चुप रहीं न तो। हमरा रहते तों कोई परबाह काहे करो ही। हमरा कुछ होतै तब तोरा कुछ होतै। इहे कठीन घड़ी में तो प्रेम के परीक्षा होबो हई औ हमरा दुनु के पास करे के है अग्निपरीक्षा।’’

ढेर देर तक संवेदनाओं का ज्वार उठता गिरता रहा। दोनों ने इस विपरीत घड़ी  में एक दूसरे का हाथ नहीं छोड़ने का निर्णय लिया। चाहे जो हो। साथ देखेगे।

अब अंतिम निर्णय करना ही होगा। तय हो गया। परसों घर से भाग जाना है। उसने कल रात अपना सामान मुझे लाकर देने की बात कही। ले जाने वाला सब सरिया लेना है।

शेष अलगे किस्त में, बने रहिए।

20 December 2011

जनलोक पाल भगाओ संधर्ष समिति।


     ज मंतर मंतर मुक्ताकाश मंच में जनलोक पाल भगाओ संधर्ष समिति की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता जाने माने  ढोलक डुग्गी राजा ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में डुग्गी राजा ने कहा - मित्रों जिस तरह से इस देश के सर्वोच्च सत्ता  (मैडम) को चुनौती देने का प्रयास किया जा रहा है वह इस देश ही नहीं पूरी दुनिया के नेताओं के लिए खतरनाक है। आज इस बैठक का आयोजन मैडम एवं चिर युवा सह हाइजिनिक दलित प्रेमी युवराज के आदेश पर किया गया है। हमारी सबसे बड़ी चिंता इस विषय को लेकर है कि जिस देशवासियों ने हम जैसे  के भरोस  देश (दूध) की रखवाली का भार छोड़ रखा है उस पर से हमारा अधिकार छिन्ने का प्रयास एक बुढ़ा आदमी कर रहा है। साथियों बंाझ क्या जाने प्रसव पीड़ा का हाल उन्हें क्या पता कि कैसे कैसे तिकड़म और कितने काला धन को खर्च कर हम नोट को वोट में बदलते है और तब जाकर हमे यह अधिकार मिलता है और अब इसपर ही खतरा मंडराने लगा है इसलिए हमें एक जुट होकर इसका विरोध करना चाहिए। वहीं बैठक में अपने विचार व्यक्त करते हुए अधिक वक्ता टिम्पल जी ने कहा कि इस देश को इस जैसे बुढे आदमी से बचाना होगा और इसके लिए जरूरी है कि जनलोक पाल भगाओं संधर्ष समिति के बैनर तले हम लोग एक जुट होकर आंदोलनकारियों पर हमला करें और करायें। हलांकि कई हमले मैंने करा कर देख लिया पर मंुह की खानी पड़ी और जब हमलोगों ने बुढें की फैजी को केश मे फंसाने की कोशीश की तब भी कामयाबी नहीं मिली अतः अब हार कर इस बैठक में ही रणनीति तय कर हमला करना होगा। साथियों हमने मैडम के इशारे पर सोशल मीडिया पर भी अंकुश लगाने का प्रयास किया पर सब मिल कर चिल्लाने लगे। भला बताई, यह भी कोई बात हुई, सर हमार और धर कुत्ते का। वहीं बैठक में बोलते हुए पी चिंता हरण ने कहा कि मित्रों आज के समय जब हमारे प्रमुख फंड मैनेजरों को तिहाड़ की हवा खिला दी गई तब अब मेरे उपर भी विरोधी लग गए है। भला बताई 2 जी हो या 3 जी, जब तक फंड की व्यवस्था नहीं होगी तब तक हमलोग कैसे बार बार सिंहासन पर बैठ सकेगें।
इसी तरह के विचारो के साथ अन्त में बैठक में निर्णय लिया गया कि हर हाल में जनलोक पाल को लटकानों के लिए संधर्ष को तेज करना है वरना हम सभी लोगों को इतिहास कालीदास के रूप में जानेगा। इतनी मेहनत और मशक्त से यहां तक पहूंचते है और जब गंगा ही नहीं बहेगी तो  भला हाथ कैसे धोबेगें। बैठक में एक बाबू साहेब टाइप ने भी खड़ा होकर समिति के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह सब वही लोग करबा रहें है जिन्हें मौका नहीं मिला कमाने का। भला इसमें भ्रष्टाचार कहां कि कुछ पैसा लेकर किसी का काम समय पर कर दिया जाय। अजि महाराज जब नगद नारायण ही नहीं मिलेगा तब भला कौन बुरबक है जो ओवर टाइम करके काम का निवटारा करेगा।

कार्टून= साभार गुगल देवता

18 December 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-43


दर्द, फांकाकशी और बेवशी ने सीने के अंदर आकर घर बसा लिया, जिसका परिणाम हीनता की भावना के रूप में सामने आया। अपने आज तक के कामों पर अफसोस के सिवा अब मेरे पास कुछ नहीं रह गया था। प्यार के लिए सोंचने का वक्त जिंदगी नहीं दे रही थी और जिंदगी के लिए सोंचने भर से काम नहीं चलने वाला, सो कुछ काम करने की ठानी। हलांकि मैं अक्सर ही यही सोंचा करता ‘‘जो तुध भावे नानका, सोई भली तू कर।’’ ईश्वर को जो अच्छा लगे वही होना चाहिए। इस समय ओशो की पुस्तकों ने बड़ा सहारा दिया जिसमें कर्ता भाव से जीवन को जीने का सबक दिया। जिंदगी जीने का नाम है और जीना ही जिंदादिली है। कई तरह के नाकारात्मक भाव घर कर गए और मैं खामोश रहने लगा। हलंाकि जब फूआ के घर था तब भी गरीबी का साथ था पर वहां उससे लड़ने का हौसला भी था और हल बैल और कलम औजार थे पर यहां पिताजी ने इस हौसले को तोड़ दिया। 

     आज भी याद है मुझे, वह कोई अस्सी का दशक था। ईलाके में  अकाल पड़ गया  था और जो किसान महज खेती पर ही निर्भर थे उनकी कोठी खाली हो गई थी अंौर घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। इस सब के बाबजूद आमदनी का कोई जरिया भी नहीं था। पर हां एक भैंस थी जिसने उस अकाल में भी अपने दूध से पूरे परिवार का पेट पाल दिया। बाजार में दूध बेचने मैं ही जाता था और फिर बाजार से खाने के लिए बाजरे का आटा लेकर आता था। गेंहूं का आटा मंहगा था और बाजरे का आटा सस्ता। आकाल से पहले बाजरे का आटा बाजार में नहीं मिलता था पर इस साल अकाल पड़ा था सो बनिये की दुकान में बाजरे का आटा जमकर बिक रहा था। बाजरे का आंटा पांच रूपये पसेरी था तो गेंहूं का आटा पन्द्रह रूपये पसेरी। पर हां बाजरे के आंटे से गेंहूं की रोटी की तरह रोटी नहीं बनती थी, पतली पतली और नरम। बाजरे के आंटे से मोटी रोटी बनती थी जिसे हमलोग मोटकी रोटी कहते थे। फूआ दस बारह इंच गोलाई मे और आधा से पौन इंच मोटी रोटी पका देती सुबह और वही हमलोगों का भोजन होता। दूध के साथ बाजरे की रोटी गूर कर खाते। पर कभी उस हालात में भी गरीबी का मलाल नहीं रहा। संतोष के साथ ही जी रहे थे। बल्कि बाजरे की रोटी और दूध का वह स्वाद आज तक याद है। दूध रोटी के साथ चीनी मिलने की जरूरत नहीं होती थी और वह यूं ही मीठी लगती या शायद यह मन का संतोष था जो मिठास बन कर मुंह के स्वाद में धुल मिठास बन जाती। उसी क्रम में एक वाकया फूफा बारबार सुनाया करते है। ‘‘कैसे हमर बुतरू गरीबी के हालत में भी हमर साथ रहल।’’-  मै एक दिन बाजरे के आंटे का बोरा बाजार से लेकर आ रहा था। जाड़े का मौसम था और बीच रास्ते में बरसात होने लगी। पूरा भींग गया और उसी तरह कंपकपंतें हुए आंटा लेकर घर आया। आंटा का बोरा प्लास्टिक का था सो उसको ज्यादा क्षति नहीं पहूंची।

खैर, गरीबी की भी अपनी यादें होती है पर यदि उस गरीबी में भी गरीबी के होने का एहसास न हो तो गरीबी नहीं होती थी। तो इस तरह के हालत को बचपन से झेतले हुए किशोर हुआ और आज परिस्थितियां सामने और भी विकट थी।

इन्हीं सब चीजों से जुझता जी रहा था कि आज सुबह फूआ आ कर धमक गई। वह मुझे अपने गांव ले जाना चाहती थी। बहुत समझाने बुझाने के बाद जब मैं नहीं माना तो वह गुस्सा भी हो गई।
‘‘हां रे हम निरवंश ही तब ने तो ऐसे करो  हीं, हमर बाल बच्चा रहतै हल त कि करथी हल।’’
अक्सर जब फूआ मुझे अपने बश में करना चाहती थी तो यह उसका अंतिम ब्रहम्सत्र था। वह अपने बांझ होने का दर्द जब उगल देती तो मैं विवश हो जाता पर इस बार मैं ज्यादा ही गुस्से में और निराश था। खास कर घर की परिस्थिति को लेकर। इस बीच मां ने भी बहुत समझाया। 
‘‘की करमहीं बेटा, बाप जब ऐसन हो गेलै तब कौन उपाय, तो जाके  वहीं रह, यहां तो हम सब झेल रहबे कैलिए हें तो काहे ले परेशान ही।’’
मतलब साफ था, मां नहीं चाहती थी की घर के परिस्थिति का मैं शिकार बनू और इस लिए वह मुझे घर से जाने के लिए कह रही थी।

खैर एक हफते तक बाबूजी बाजार नहीं गए और परिस्थिति सामान्य थी। शाम को उन्होंने ने मुझे बुलाया और पैर दबाने के लिए कहा। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। और इसी क्रम में बातों ही बातों में उन्हांेने अपने शराब पीने और उसकी लत की विवशता पर गंभीरता से बातें करने लगे। उनके अंदर भी एक टीस थी जो आज शब्दों के रूप में सामने आ रही थी।
‘‘अहो की करीऐ, बहुत छोड़े ले चाहो ही पर छुटबे नै करो है।’’
‘‘कोशीश करला से कौन काम नै होबो है’’
‘‘हां से तो है मुदा कैसे छुटतै भगवान जाने।’’
अंदर से निकली यह आवाज उनकी विवशत को दर्शा रही थी। कितने ही देर बातचीत चलती रही और बाबूजी के इस आत्मीय लगाव ने मुझे अंदर तक द्रवित कर दिया।

खैर जिंदगी है चलती रहेगी। मेरे लिए रोजगार की तलाश पहली और अंतिम तलाश वर्तमान में थी। इसी कड़ी में आर्मी की बहाली निकली और मैं दौड़ में भाग लेने के लिए कटिहार के लिए चल दिया। महज पच्चास रूपये का जुगाड़ करके मां ने दिया। शेखपुरा रेलबे स्टेशन पर कई दोस्त मिल गए और बिना टिकट रेलवे की सवारी परीक्षार्थियों का जन्म सिद्व अधिकार की तरह कटिहार चला गया। शाम को चला और सुबह दस बजे कटिहार पहूंचा। रेलवे स्टेशन से लेकर मैदान तक हजारांे युवाओं की भीड़। देवा। इस युवा-शैलाव में मेरी कहां जगह? फिर भी आए है तो दौड़ जाते है। दौड़ के लिए मैदान मे गया तो पहले ही चक्कर में हिम्मत पस्त हो गई। कभी दौड़ का अभ्यास नहीं किया था और मैदान में दौड़ने वाले सभी अभ्यस्त थे। दूसरे चक्कर में धड़ाम से गिर पड़ा। किसी ने लंधी मार दी और फिर निराश होकर घर लौट आया। घर आया तो देखा की दोस्त मनोज मेरा इंतजार कर अब लौटने बाला था। मुलाकात हो गई। कई सारी बातें हुई। अन्त में रास्ते में जाते हूए उसने रीना का प्रेम पत्र थमा दिया।

जान से भी प्यारे बब्लू।
प्यार क्या होता है शायद तुमसे जुदाई के एहसास से पहले तक नहीं जान सकी थी। शायद शरीर से प्राण के अलग होने पर भी इतनी तकलीफ नहीं होती होगी। होगी भी तो कैसे जब तकलीफ को महसूस करने वाली आत्मा ही नहीं रहेगी तब। पर आज मैं उस तकलीफ को महसूस कर रहीं हूं जो शरीर से आत्मा के जुदा होने पर भी शरीर के तकलीफ को आत्मा भोग रही है। कहतें है प्यार एक पागलपन है फिर इसमें समझदारी की बातें कैसी? धर-परिवार, रिश्ते-नाते और सबसे बढ़कर जिम्मेदारी। मैं सारी चीजों को समझती हूं पर नहीं समझती तो इस बात को कि क्या मैं तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं? कहतें हैं प्यार की परीक्षा मुश्किल वक्त में ही होती है। तो क्या हम इस परीक्षा में असफल हो जाएगें? जिस प्यार के दंभ पर मैं अपने परिवार से सर उठा कर बात करती थी आज वही लोग जब मेरी ओर देखते हैं तो मैं नजर नहीं मिला पाती। क्यों?..................................................................................... 
कैसी भी परिस्थिति हो, कैसा भी समय हो, साथ जियेगें साथ मरेगे।

तुम साथ नहीं हो तो जिंदगी क्या है?
तुम साथ यदि हो तो जिंदगी क्या है!...

तुम पहलु मंे हो तो मौत भी मुझे प्यारी है,
तुम पहलु में नही हो तो मौत से ही यारी है।

जानती हूं मैं, बिना प्यार, शरीर आत्मा बिहीन है,
        फिर अपनी ही लाश ढोना भला कैसी समझदारी है?

तुम यदि एक सप्ताह के अंदर अंदर नहीं आये तो फिर मेरा मरा हुआ मुंह देखोगे...

तुम्हारी प्यारी रीना.....

शेष अगले किस्त में, बने रहिए...

07 December 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-42

जीवन और प्रेम के बीच प्रारंभ हुआ संधर्ष प्रेम की अग्निपरीक्षा थी और इसमें आग के जिस दरिया की बात किसी शायर ने की थी शायद वह इसी संदर्भ में कही होगी, मैं ऐसा सोंच रहा था। रीना के गांव से अपने गांव चला तो आया पर जीवन को पटरी पर न ला सका। अपने पैतृक घर आये हुए एक सप्ताह से अधिक हो गया था पर किसी तरह का काम नहीं कर सका। रोजगार मिले इस कोशिश में अपनी सारी शक्ति लगा दी पर अन्ततोगत्वा कुछ हाथ न आ सका और खाली हाथ शाम में बैठ कर उदासी के साथ बार्ता करता रहता।

शाम ढलते ही सूरज की सिंदूरी किरण प्रियतम की छवि धर कर प्रेम के डूबते जाने का एहसास कराता और निराशा में डूबा मन उगते सूरज की सुखद अनुभुति से बंचित रह जाता। दिन बीतते गए, रात आंखों में कटती गई। नींद आंखों से उसी प्रकार दूर हो गई थी जिस प्रकार मैं रीना से दूर था। 

कहीं खेत खलिहान में बैठे हुए देर शाम झिंगुर की करकश अवाज भी डरावनी नहीं लगती और न ही सियार के हुआं हुआं मुझे कुछ सुनाई देता। अजीब सी तन्हाई और नैराश्य ने आकर अपनी आगोश में मुझे जकड़ लिया था।

जीवन की तल्ख जमीन पर पांव रखते ही सपनों की सच्चाई सामने आने लगी। मन में किसी तरह का रोजगार कर कमा खा लेने की विचार ख्याली बन गए। पहली कोशीश ट्युशन पढ़ाने की सोंची पर इसमें जितनी कठोर बात सुनने को मिली उससे यही लगा की शायद जीवन की जमीन इतनी ही कठोर मिलेगी। गांव के मास्टर साहब शहर में जाकर ट्युशन पढ़ाने का काम करते थे और मुझे पहली झलक के रूप में उनसे मदद की उम्मीद जगी और रास्ते में जब वे साईकिल से जा रहे थे तभी हमने उन्हें रूकवाया। शिष्टाचार निभाते हुए प्रणाम किया और फिर सकुचाते हुए बोला-

‘‘सर हमरो एकागो टीशन धरा देथो हल त कुछ रोजी रोजगार हो जइतै हल।’’
‘‘काहे हो, कहां तो डाक्टर बने बाला हलहीं, की होलऔ। मइया तो बड़ी बड़ाई करो हलौ।’’
‘‘की होलई मास्टर साहब इ ता तांे जनबे करो हो, मदद कर सको हो ता कर हो और एकागो ट्युशन पकड़ा दहो।’’
‘‘ट्युशन की पढ़इमीं हो, ओकरा से अच्छा कटोरा ले के भीख मांग।’’
स्तब्ध रह गया। इतना कह कर वे साईकिल से निकल गए और मुझे बेरोजगार होने की सजा के तौर पर जलती हुई आग में ढकेल गए। सच में आज से पहले जिंदगी को इतने नजदीक से नहीं देखा था और पता ही नहीं था कि यह इतनी कठोर और निर्मम होती है। 


छोटे किसान परिवार होने की वजह से खेत भी अधिक नहीं थी जिससे खेतीबारी करके गुजारा कर सकता था। गांव में मुख्य रूप से सब्जी की खेती की जाती थी जिसमें बैगन की खेती प्रमुखता और प्रचुरता से होती थी और इसी वजह से मेरे गांव को लोग ‘‘बैगन-बेचबा’’ गांव के रूप में जानते थे और अक्सर जब कहीं कुटूम-नाता के यहां जाता था तो यह सुनना पड़ता था, शेरपर, अच्छा बैगन-बेचबा गांव के। कहीं कहीं बड़े बुजुर्ग जहां मजाक का रिस्ता होता वहां एक कहानी सुनाते हुए कहते-

शेरपर में बैगन के खेत में काम कर रहे किसान से जब हाल चाल पुछो तो वह इस प्रकार बताते है। 
‘‘ की हाल चाल हई बाबा।’’
‘‘हां कुटूम, बैगन कनाहा (कीड़ा लगने से सड़ना) हो गेलो।’’
‘‘और घर में सब ठीक ठाक।’’
‘‘की बताईओ, केतना दबाई देलिओ पर फायदा नै करो हो।’’
‘‘बाल-बच्चा सब ठीक हो।’’
‘‘की कहीओ कुंजरा (व्यापारी) ई साल बहुत कम पैसा दे हलो त अपने से बजार में जाके बेचो हिओ बैगन।’’

ऐसा था मेरा गांव। कम खेत बाले किसान भी बाजार नजदीक होने की वजह से सब्जी की खेती करते पर किसान को बहुत अधिक फायदा नहीं होता। इसका एक प्रमुख कारण किसान का बाजार जाकर सब्जी को नहीं बेचना था और गांव में ही आकर सब्जी के व्यापारी (कुंजरा) खेत की फसल को खरीद लेते, औने पौने दाम पर, पर जो किसान मेहनती और होशियार होते वह बाजार में जाकर सब्जी की टोकरी लेकर बैठ जाते और अच्छी आमदनी करते। सब्जी की खेती के लिए गांव से सटे भीठ्ठा की जमीन चाहिए जहां सिंचाई की सुविधा हो। गांव से थोड़ी दूर पर दस कट्ठा का एक खेत थी जिसमें अरहर की खेती होती थी। अरहर की खेती उसी खेत में होती थी जो सबसे खराब हो पर मैने उसमें सब्जी की खेती करने का निर्णय लिया। घर मे प्रस्ताव रखा, विरोध हुआ पर मुझ पर कुछ करने का जुनून सवार था। सो हल-बैल लेकर निकल गया। हल चलाना फूफा से ही सीखा था। खैर अकेले दम पर उस खेत में बैगन की फसल लगा दिया। कई दिन बीत गए और मेरा एक सुत्री काम था बैगन की फसल की देख रेख करना जैसे यह मेरे लिए एक चुनौती थी अपने आप को अपने ही नजर में साबीत करने की, और कर दिया। 

देर शाम जब घर लौटा तो बाबूजी का कोहराम मचा हुआ था। रोज की तरह दारू की भभका देने बाली गंध घर के बाहर तक महक रही थी। मां रो ही थी। खामोश। चुपचाप। बाबूजी बे-बात कुछ से कुछ बोले जा रहे थे। पिछले अनुभवों को देखते हुए मैं किसी प्रकार का प्रतिवाद नहीं कर रहा था। हर बार सुबह नशा टूटने पर बात करने की सोंचता पर कभी जब बाबूजी नशा में नहीं होते तो बात करने की हिम्मत नहीं होती और कभी सुबह उठकर ही निकल जाते और फिर पीकर ही लौटते। मुझे इस तरह के माहौल को झेलने की आदत नहीं थी। गुस्सैल स्वभाव का होने की वजह से शुरूआत के कुछ दिन जबरदस्त प्रतिबाद किया और बाबूजी को मारने भी दौड़ा पर मां बीच में आकर इस तरह खड़ी हो जाती जैसे...मां अपने बच्चे को कोई बड़ा पाप करने से रोक रही हो।
‘‘की कहतै समाज बेटा।’’


आज फिर वही माहौल था। घर में सभी उदास थे, बाबा दरबाजे पर बैठे बाबूजी को गलिया रहे थे। भाई चुप था और मां रो रही थी। मैं और दिनों को याद कर मां पर ही गुस्सा किया-
‘‘तोरे बजह से यह सब हो रहलौ हें, बिगाड़ देलहीं हें ता भोगहीं।’’ 
‘‘की करीये बेटा, ई बाधा के कुछ सुझबे नै करो है तब।’’ मां ने फिर प्रतिवाद किया। मैं बगल में पड़े खटीया पर लेट गया। अभी कुछ ही क्षण हुआ कि बाबूजी उठे और  मां को एक झापड़ लगा दिया।
मन में आग का गुब्बार सा उठा-फक्काक। हे भोला। बगल में रखी लाठी उठाया और फटाक फटाक, कई लाठी बाबूजी के देह पर। वे गिर पड़े। मां मुझे पीट रही थी और मेरे आंख से अविरल आंश्रू की धारा बह रही थी। हे भोला। मैं आत्मग्लानी से गड़ा जा रहा था और गुस्से से माथे से आग की लपट सी निकल रही थी।


सुबह बाबू जी कराह रहे थे। मां उदास, खाना बना रही थी। बड़की चाची मुझे बुलाकर अपने घर ले गई। समझाने। शायद मां ने कहा होगा। समझाने लगी। -
‘‘बेटा, सहबा सब दिन ऐसने नै हलै। जब तों पैदा होलहीं तब उहे पार्टी में पहला बार दारू पिलकै और साश्रंग खराब हो गेलै। इहे साहबा हलई जे तोरा चाचा के दारू पीला पर मारो हलै और आज अपने पीये लगलै।’’

समझाते हुए चाची अपने घर और पुर्वज की कई सारी बातें बताने लगी। कैसे बाबू जी गांव के गिने चुने उन लोगों में थे जिसने अपने समय में ग्रेजुएट किया। कैसे बाबू जी बेल-बटम शर्ट और फुलपैंट के शौकीन थे। और कई तरह का रोजगार करते हुए काफी कुछ कमाया पर समय ने साथ नहीं दिया और आज यहां पहूंच गए। चाची ने पहली बार यह भी बताया कि हमारा परिवर और पुर्वज काफी सुखी सम्पन्न थे और गांव में प्रमुख और प्रतिष्ठित भी। पंद्रह एकड़ खेत थी और आज गांव के कई संपन्न लोगों के  पुर्वज मेरे यहां आकर नौकर का काम करते थे। पर आज यह हालत हुई कैसे। दो दिन पीढ़ीयों के नाकारापन इसका प्रमुख कारण के रूप में सामने आया। देवा...

शेष अलगे किश्त में, बने रहने का शुक्रिया-----

30 November 2011

एक छोटी सी लव स्टोरी-41


इसी कशमकश के बीच खेत-खंधो में जाकर चुपचाप बैठा रहता या फिर शाम को बुढ़ा बरगद की गोद का सहारा लेता। आज भी उसी बुढ़े बरगद की गोद में बैठ जिंदगी को रास्ते पर लाने का जददोजहद कर रहा था। मन में रह रह कर बाबा के श्राद्धकर्म में घटी घटनाऐं याद आ जाती। खास कर असमानता और भेद-भाव मुझे उद्वेलित कर रहे थे। समाज के पिछडेपन का मुझे यह भेद-भाव सबसे बड़ा कारण लगा। श्राद्धकर्म के विध-विधानों से लेकर भोज-भात तक, हर जगह मुझे इसकी झलक मिलती रही और मैं अन्दर ही अन्दर कुढ़ता रहा। खास कर कई मौकों पर तो मैं उलझ ही गया। वह दिन एकादशा का था। मैं घर में था कि तभी एकदशा स्थल पीपल तर जोर जोर से चिल्लाने की आवाज आने लगी। यह सीताराम नाई की आवाज थी। वह अक्सर इस तरह के काज में पंडित जी से उलझ जाया करता था। हक की खातिर। मौके पर पहूंचा तो बहस चल रही थी। 
‘‘कौन बात के सब समान और रूपया तोर हो जइतो, खटे कोई, खाई कोई। मेहनत मशक्त हम कलिए और सब समनमा तों काहे ले जइभो।’’सीताराम ने जब यह बात कही तो पंडित जी को नागवार गुजरी और वे शास्त्रों से लेकर धर्म तक की बात जोर जोर से कहने लगे। 
‘‘इहे परम्परे है तो तोरा कहला से बदल जइते। आखिर हम बुद्वि के खा ही और तों परिश्रम कें।’’ पंडित जी ने तर्क दिया। दरअसल यह लड़ाई कर्मकांडों में दिए गए दान इत्यादि के वर्तनों और फिर अंत में सभी कर्मकांडों को खत्म करने की फीस को लेकर हो रही थी। परंपरा यही थी। पंडित जी जो मर्जी दें वहीं नाई का होता है जबकि मेहनत का सारा काम नाई ही करते है। सीताराम जी इसी को लेकर झगड़ रहे है।
‘‘सब काम दौड़ दौड़ कर करी हम और खाई घरी पंडित जी, वाह रे परंपरा।’’ सीताराम नाई कप्युनिष्ट पार्टी का मेमबर था और वह सामंतबाद से लेकर वर्गसंधर्ष की बात अक्सर किया करता और इसी को लेकर वह उलझ रहा था। गांव के चौक चौराहे पर यह बाजार मे धूम धूम कर वह बाल दाढ़ी बनाता था। उसके हाथ में एक एक फिट का काठ का वक्सा रहता था जिसमें अस्तुरा से लेकर सब समान रखे होते।

खैर, फिर काफी हील-हुज्जत के बाद पंडित जी ने अपने दान के समानों में से सीताराम को कुछ दिया। दान और श्राद्धकर्म की भी अजीब परंपरा है और इस अनुभव ने मेरे मन मंे नकारात्क विचार भर दिया है। एकादशा के दिन दान को लेकर मान्यता है कि पंडित जी को दान करने से मृतक को उस समानों का सुख मिलता है। इसी को लेकर एक एक समान जुटाया जाता है। वर्तन-बासन, फोल्डींग, चादर, छात्रा, धोती इत्यादी। बाबा खैनी खाते थे और खैनी नहीं होने पर रामू को बजारा दौड़ाया गया खैनी लाने। इन समानों का अपना एक नेटवर्क है और दान के समान का सुख पंडित जी नही उठा पाते।
इसी को लेकर मैने पूछ लिया-‘‘आं पंडित जी एतना एतना समान मिलो हो कहां रखो हो सब।’’
‘‘कहां रखबै जजमान, सब जाके जौन दुकान से लइलहो है ओकरे यहां बेच देबै।’’ पंडित जी का जबाब सुन झटका लगा।’’ बाद में इस कौतुहल को शांत किया गांव के उमा सिंह ने। 
‘‘अरे की कहथुन पंडित जी। सब दुकान से इनकर फिटिंग है। दस परसेंट कम पर सब समनमा वापस ले ले है।’’

दान से होने वाले पुण्य की एक कड़बी सच्चाई सामने थी। पंडित जी के लिए इन समानांे का कोई औचित्य नहीं था और देने वालों के द्वारा बाजार से एक एक समान खरीदी जाती है कि मृतक इसका प्रयोग करता था इसलिए उपर कष्ट न हो। 
सबसे बड़ा दुख तो मुझे उस दिन हुआ जब भोज पर सब लोगांे को न्यौता गया। भोज की तैयारी करते करते रात के एक बज गए और इतनी रात को सबको भोज खाने के लिए बुलाने के लिए तीन चार नैजवानों का जत्था बिज्जे के लिए निकला। लोग जुटे। इनमें बच्चों की संख्या अधिक थी। घर के आगे की सड़क ही इसका मुख्य साधन बना। समुचे गांव को एक साथ न्यौत दिया गया। सब जुटे और बैठने लगे। तभी देखा कि गोरे बाबू जोर से चिल्लाए। ‘‘
‘‘अरे लेमुआ, ओने कने जा रहलीं हें रे। जना हौ नै कि ओने बाभन बैठल है, जो करीगी मे जाके बैठ।’’
‘‘काहे मालिक, आज हमरा से छुआ जइभो। और मरला पर हमहीं काम दे हिओ’’ लेमुआ भी पी के फलाड था सो जबाब दे दिया। फिर सभी मुसहर टोली के लोगो ंने उसे पकड़ कर एक अलग जगह पर ले गए। एक साथ पंगत में वे नहीं बैठ सकते। दलितो के साथ इस तरह का भेदभाव में मुझे खला। पर देखा कि जब भोज शुरू हो गया तो वहीं गोरेबाबू परोसने वालों को एक एक समान ध्यान से मुसहर टोली के लोगों की तरफ भेजबा रहे थे। भोज मे बच्चों की पत्तलांे पर खास नजर होती है क्योंकि चाहे जो हो जाए वे भोज मे चोरी करेगें ही। भोज का अंतिम समय आ गया और इसकी सूचना बच्चों को दही परोसे जाने के बाद लग जाती है और वे साथ लाए लोटा में बुनिया और जलेबी भरना प्रारंभ कर देते है। यही परंपरा है। कोई इनको टोकता नहीं, अरे बुतरू है। 


वहीं भोज खत्म होने के बाद लेमुआ डोम बाले-बच्चे जूठा पत्तल उठाने में भीड़ जाता है। बड़ी ही उत्साह से। जिस पत्तल पर मिठाई या बुनिया हो उसे देख उसके बांझे खिल जाते और नहीं होने पर चेहरा मुर्झा जाता। मुझसे रहा नहीं गया तो मैने पूछ लिया। 
‘‘की हो लेमू कहे खिसिया रहली है।’’
‘‘की करीओ मालीक, पत्तला पर कुछ रहो है तो बाल बच्चा के कई दिन खाना मिलो है।’’
‘‘कैसे’’ मैने कौतुहलबश पूछ लिया।
‘‘इहे सब पुरीया जिलेबिया घरा ले जाके सुखा दे ही मालिक और फिर कई दिन तक बाल बच्चा के पेट भरो है।’’
‘‘हे भगवान’’
दो तीन दिन बाद देखा तो उसके घर के पास सभी तरह के खाने के समानो को धूप में सुखया जा रहा है। इसमें पूरी और भात भी शामील था। पता चला की इसे सुखा कर रख दिया जाता है और फिर इसी को यह खाते है। जुठन भी किसी की जीवीका का आधार हो सकता है, जानकर झटका लगा। यह इस समाज का एक और पहलू था। मुसहरटोली में गरीबी का यह एक वानगी थी जिसे नजदीक से देखने का मौका मिला और फिर मन भर गया। इसी सबमें खोया था कि तीन चार लोग आकर घेर लिया।
‘‘की रे बड़की बाबा बनो हीं, गांव के लड़की पर नीयत खराब करो हीं।’’ यह अवाज नरेश सिंह के गुर्गे नेपाली दुसाध की थी। उसके साथ दो तीन और थे। बगल में नरेश सिंह के बेटा पहलवाना थी खड़ा था।
‘‘की होलै नेपाली जी, काहे ले गरम हो।’’ मैने हल्के से जबाब दिया।
‘‘की होलै से तोरा नै पता है, गांव के लड़की पर नजर डालो ही और गांव में राजनीति भी करो ही। दुनू गोटी एक साथ नै चलतै।’’ पहलवाना ने कड़कती आवाज में कहा। मैं समझ गया कि यह चुनावी रंजीश को इसी बहाने सधाने की साजीश है। और फिर दे दना दन मेरी धुनाई कर दी गई। मैं किसी तरह से वहां से भाग कर घर आ गया। किसी को इस बात का पता नहीं चला। और फिर मैं इस गांव को छोड़ने का फैसला कर लिया। 
रात एक बज रहे थे और मैं ने अपने हाथ की एक अंगुली पर ब्लेड से हल्का प्रहार कर दिया। खून का हल्का रिसाव होने लगा और फिर एक तिनके के सहारे खून से खत लिखने लगा। ज्यादा कुछ नहीं, बस ‘‘मुझे भूल जाओ।’’ खत को उसतक पहूंचाने का एक ब्रहम्सत्र था उसका चचेरा भाई। उसके पटाया और दोस्ती का हवाला देकर खत उस तक पहूंच जाएगा। और अगली सुबह सूरज के उगने से पहले मैं अपने गांव में था।
शेष अलगे किश्त में, बने रहने का सुक्रिया।