24 जनवरी 2017

देहाती लड़की का लव

देहाती लड़की का लव

(स्थान और सन्दर्भ -एक कसबे की सुनसान गली में प्रेमी युगल का संवाद है। देहाती सी लड़की साधारण भेष-भूषा में है और लड़का सम्पन्न परिवार का लगता है। संवाद स्थानीय मगही भाषा में और सच्ची घटना पे आधारित है।)

लड़का (उग्र होकर)- "छो महीना से कॉल नै करो हीं इहे तोर प्यार हाउ, केकरा से डर लगो हाउ..?"

लड़की (शांतचित) "डरे के कौनो बात नै हइ.. पर माय-बाप,समाज से लाज-बीज तो लगबे करतै ने..."

लड़का-" ई सब बहाना नै बनाउ। इतना डरपोक हीं त प्यार की करो हीं..?"

लड़की- "हमर प्यार के अग्निपरीक्षा मत ले....। अपन्न देख। बड़ी प्यार करो हीं त अभी फोन करके हमर सामने अपन्न बाबूजी के बताऊ...! बोलाऊ यहाँ..!"

लड़का- "ई कैसे होतय...? हमरा लाज-बीज नै है कि...?"

लड़की- "बताउ..!!! मर्दाना होके एतना डरो हीं त हमरा क
काहे ले डरपोक कहो हीं..!!!."

(तभी वहाँ से एक बुजुर्ग गुजर रहे थे। लड़का चुप होकर बगल हट गया।)

लड़की (तंज अंदाज में) "देख लेलीऔ तोर प्रेम औ हिम्मत..! अभी दोसर के देख डर गेलहीं त अपन्न से की हाल होतऊ..! दोसर के डरपोक कहे में जीभ नै कट गेलौ..?"

लड़का- तीन-चार साल पुराना है अपन्न प्यार और दर्शनों दुर्लभ...! कॉल भी नै..! लगो हैय भूल गेलहीं...?

लड़की- "प्यार करो हीं त दिल से करहीं देह से नै...!!! बड़ी देख लेलिऔ तोहर प्यार औ हिम्मत...जे साथ खड़ा नै रह सको हइ...जे दू डेग साथ नै चल सको हइ उ कौची प्यार करतै....!!! तों हमरा भूल जैमहिं पर हम जिनगी भर नै भूलबौ...जहिना जीवन भर ले साथ चले के हिम्मत होतऊ कह दिहें...!!!

मैं ठुकमुक सा सबकुछ सुन रहा था। वहीं बगल में ही खड़ा था। लड़की ने देख के अनदेखा कर दिया था। सबकुछ सुन मन ब्रह्मांड में कहीं खो सा गया..। प्रेम की यह ऊंचाई एक देहाती लड़की की है! शायद सच्चा प्रेम इसी ऊंचाई और गहराई को कहते है। यह गहराई भी तभी आती है जब कोई सच्चा प्रेम करता है...।

13 जनवरी 2017

जय बिहार..!!!!

नशा मुक्त बिहार होगा, अकल्पनीय था ! पर नीतीश जी ने अपने जिद्द से इसे सच कर दिया। अब 21 जनवरी को विश्व के मानचित्र पे नशा मुक्त बिहार की तस्वीर चमकेगी। सेटेलाइट मानव श्रृंखला की तस्वीर खींचेगी। मानव श्रृंखला की यह तस्वीर नशा मुक्त बिहार का होगा। अब इस तस्वीर में हमारी भी एक तस्वीर हो, हमें इसके लिए आगे आना चाहिए।

नशा और बिहार का अनुनाश्रय सम्बन्ध था। गली-गली शराब बिकती थी। शाम ढलते ही रास्ते और सड़कों पे शराबियों का कब्ज़ा होता था। गांव और मोहल्लों में भद्दी-भद्दी गालियों की आवाज हुंकारते थे। मार-कुटाई से पत्नियों की चीत्कार और बच्चों का कारुणिक क्रन्दन आदमी को आदमियत पे अफ़सोस जाहिर करने पे मजबूर करता था। गरीब और ख़ास कर दलित-मजदूर अपनी कमाई का सारा हिस्सा शराब खाने में दे आते थे। घर के चूल्हे रोटी और भात के बगैर उदास रहते थे। बच्चों का भविष्य शराब की मादक उन्माद में डूब कर दम तोड़ देता था। 

पर्व के मायने बदल गए। परंपरा और संस्कृति पे शराब ने कुठराघात किया। बात सरस्वती पूजनोत्सव से शुरू करें तो युवा वर्ग शराब में डूब कर विद्या की देवी का अपमानित और कलंकित करते जरा नहीं झिझकते। सरस्वती प्रतिमा बिसर्जन जुलूस में बेटियों की दुपट्टे खींच लिए जाते और माँ शारदे बेबस होकर देखती रहती। होली की संस्कृति बदल गयी। शराबियों का साम्राज्य सड़कों पे होता। गांव-गांव इसका कुठाराघात हुआ। शहर और गांव के लोग होली में घरों में दुबकने लगे। गांवों में ढोलक, झाल और मंजीरे की आवाज थाम गयी। मनभावन और चुटीले होली गीत की जगह भद्दी भद्दी गालियां गुंजित होने लगी। दशहरा, दिवाली सभी के मायने बदल गए। उत्सव का अर्थ शराब था।
बारात जैसे परम्परा विलुप्तावस्था में पहुँच गयी। लड़ाई-झगड़े के डर से दो दिन तक बाराती के रहने की परंपरा ख़त्म हुयी। सभ्य या कहे सीधे-साधे लोग बारात जाने से परहेज करने लगे। यह कुरीति गांव-गांव पहुंची तो दस और बारह साल के बच्चे शराब खाने में देखे जाने लगे। 

और सबसे अधिक शराब के नशे में सड़क हादसे आम हो गयी थी। शराबी या खुद मारते, या किसी और को मार देते। 

अब यह सब बदल गया। पूर्णतः ऐसा कहना अतिशयोक्ति होगी। जितना बदला यह ही अकल्पनीय था। सड़क हादसे थम गए। गालियों का शोर शराबा रुक गया। सड़कों पे उपद्रव थम गया। सबसे निचले तबके के मजदूर दो पैसा कमा कर घर लौटने लगे। खामोश चूल्हे मुस्कुराकर धुआँ उगलने लगे। बच्चे स्कूल देख लिए। बारात शांति पूर्वक दरबाजे लगने लगे। सम्पन्न हुए नवबर्ष पे शराबबंदी की पहली राहत भरी तस्वीर दिखी। कितना कुछ बदल गया। सबकुछ कैसे बदल सकता है। 

इन सब के साथ ही यह भी सच है कि कुछ युवा शहर और गांव तक में शराब की तस्करी करने लगे। जैसा की स्वाभाविक है। पुलिस और प्रशासन तक हिस्सा बंटता है। पैसे वालों को घर पे शराब पहुँच जाती है। कुछ पकड़े भी जाते है। जो भी हो पर शराब आज बिहार में जघन्य अपराध है। जैसे हत्या, बलात्कार, चोरी अपराध होने की वजह से नहीं रुका वैसे ही शराब भी नहीं रुकेगा। अपराधी अपराध करेंगे। पकडे जाने पे जेल जायेंगे। अब यह हमें तय करना है कि हम असामाजिक और अपराधी के साथ खड़ें होंगे या एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज निर्माण में गिलहरी की तरह सहभागी बनेंगे। जय बिहार।

12 जनवरी 2017

“विवेकानंद और वेश्‍या” – ओशो

ऐसा हुआ कि विवेकानंद अमरीका जाने से पहले और संसार-प्रसिद्ध व्‍यक्‍ति बनने से पहले, जयपुर के महाराजा के महल में ठहरे थे। वह महाराज भक्‍त था, विवेकानंद और रामकृष्‍ण का। जैसे कि महाराज करते है, जब विवेकानंद उसके महल में ठहरने आये,उसने इसी बात पर बड़ा उत्‍सव आयोजित कर दिया। उसने स्‍वागत उत्‍सव पर नाचने ओर गाने के लिए वेश्‍याओं को भी बुला लिया। अब जैसा महा राजाओं का चलन होता है; उनके अपने ढंग के मन होते है। वह बिलकुल भूल ही गया कि नाचने-गाने वाली वेश्‍याओं को लेकर संन्‍यासी का स्‍वागत करना उपयुक्‍त नहीं है। पर कोई और ढंग वह जानता ही नहीं था। उसने हमेशा यही जाना था कि जब तुम्‍हें किसी का स्‍वागत करना हो तो, शराब, नाच, गाना, यही सब चलता था।
विवेकानंद अभी परिपक्‍व नहीं हुए थे। वे अब तक पूरे संन्‍यासी न हुए थे। यदि वे पूरे संन्‍यासी होते, यदि तटस्‍थता बनी रहती तो, फिर कोई समस्‍या ही न रहती। लेकिन वे अभी भी तटस्‍थ नहीं थे। वे अब तक उतने गहरे नहीं उतरे थे पतंजलि में। युवा थे। और बहुत दमनात्‍मक व्‍यक्‍ति थे। अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो बस उन्‍होंने अपना कमरा बंद कर लिया। और बाहर आते ही न थे।
महाराजा आया और उसने क्षमा चाही उनसे। वे बोले, हम जानते ही न थे। इससे पहले हमने किसी संन्‍यासी के लिए उत्‍सव आयोजित नहीं किया था। हम हमेशा राजाओं का अतिथि-सत्‍कार करते है। इसलिए हमें राजाओं के ढंग ही मालूम है। हमें अफसोस है, पर अब तो यह बहुत अपमानजनक बात हो जायेगी। क्‍योंकि यह सबसे बड़ी वेश्‍या है इस देश की। और बहुत महंगी है। और हमने इसे इसको रूपया दे दिया है। उसे यहां से हटने को और चले जाने को कहना तो अपमानजनक होगा। और अगर आप नहीं आते तो वह बहुत ज्‍यादा चोट महसूस करेगी। इसलिए बाहर आयें।
किंतु विवेकानंद भयभीत थे बाहर आने में। इसीलिए मैं कहता हूं कि तब तक अप्रौढ़ थे। तब तक भी पक्‍के संन्‍यासी नहीं हुए थे। अभी भी तटस्‍थता मौजूद थी। मात्र निंदा थी। एक वेश्‍या? वे बहुत क्रोध में थे, और वे बोले,नहीं। फिर वेश्‍या ने गाना शुरू कर दिया। उनके आये बिना। और उसने गया एक संन्‍यासी का गीत। गीत बहुत सुंदर था। गीत कहता है: मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही; यह मालूम मैं मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?
कहते है, विवेकानंद ने अपने कमरे में सुना। वह वेश्‍या रो रही थी। और गा रही थी। और उन्‍होंने अनुभव किया-उस पूरी स्‍थिति का। उन्‍होंने तब अपनी और देखा कि वे क्‍या कर रहे है? बात अप्रौढ़ थी, बचकानी थी। क्‍यों हों वे भयभीत? यदि तुम आकर्षित होते हो तो ही भय होता है। तुम केवल तभी स्‍त्री से भयभीत होओगे। यदि तुम स्‍त्री के आकर्षण में बंधे हो। यदि तुम आकर्षित नहीं हो तो भय तिरोहित हो जाता है। भय है क्‍या? तटस्थता आती है बिना किसी विरोधात्‍मकता के।
वे स्‍वयं को रोक ने सके, इसलिए उन्‍होंने खोल दिये थे द्वार। वे पराजित हुए थे एक वेश्‍या से। वेश्‍या विजयी हुई थी; उन्‍हें बाहर आना ही पडा। वे आये और बैठ गये। बाद में उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, ईश्‍वर द्वारा एक नया प्रकाश दिया गया है मुझे। भयभीत था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी। मेरे भीतर। इसीलिए भयभीत हुआ मैं। किंतु उस स्‍त्री ने मुझे पूरी तरह से पराजित कर दिया था। और मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा। वे अश्रु इतने निर्दोष थे। और वह नृत्‍य गान इतना पावन था कि मैं चूक गया होता। और उसके समीप बैठे हुए, पहली बार मैं सजग हो आया था। कि बात उसकी नहीं है जो बाहर होता है। महत्‍व इस बात का है जो हमारे भीतर होता है।
उस रात उन्‍होंने लखा अपनी डायरी मैं; “अब मैं उस स्‍त्री के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था। और कोई भय न होता।” वे उसके पार जा चूके थे। उस वेश्‍या ने उन्‍हें मदद दी पार जाने में। यह एक अद्भुत घटना थी। रामकृष्‍ण न कर सके मदद, लेकिन एक वेश्‍या ने कर दी मदद।
अत: कोई नहीं जानता कहां से आयेगी। कोई नहीं जानता क्‍या है बुरा? और क्‍या है अच्‍छा? कौन कर सकता है निश्‍चित? मन दुर्बल है और निस्‍सहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण तय मत कर लेना। यही है अर्थ तटस्‍थ होने का।

– ओशो

[पतंजलि: योग सूत्र भाग—1]

एचएम और शिक्षक सरकारी स्कूल में पी रहे थे ताड़ी, शिक्षक ने मिलाया जहर

सरकारी स्कूल में नशीला पदार्थ आया ताड़ी, शिक्षक ने मिलाया जहर शेखपुरा बिहार में शिक्षा व्यवस्था का हाल बदहाल है। सरकारी स्कूल में प्रधानाध्...