19 अप्रैल 2017

रंडीबाज

रंडीबाज

(लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है)

चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होती थी पर इस साल चैत ने आते ही चेतावनी दे दी कि यह साल बहुत अधिक गर्म रहेगा। चैत के इसी भीषण गर्मी के बीच बाइक ने पेट्रोल खत्म होने की सूचना दी तब भरी दोपहरी में ही पेट्रोल पंप पर पेट्रोल लेने के लिए चला गया। पेट्रोल लेने के बाद पेशाब करने इच्छा हुई और मैं शौचालय की तरफ बढ़ गया। अभी कार्यालय से होकर गुजर ही रहा था की स्तब्ध रह गया।

आंखों को अमूमन छोटे से शहर में इस तरह के नजारे देखने की उम्मीद कतई नहीं थी! फिर भी आंखों को मींच कर नजारे की सत्यता की पुष्टि करने के लिए फिर से देखा, तस्वीर साफ हो गई। पंप का मैनेजर, जिनकी उम्र साठ से पैंसठ वर्ष के बीच होगी, अर्ध नग्न अवस्था में था और उसी आस्था में एक बीस-बाईस साल की महिला भी नजर आयी। स्वभावबस उस कामरत तस्वीर को देखकर पैरों ने पीछे का रास्ता ले लिया। सर झुक गया और मैं अपनी बाइक पर आ गया। इतनी ही देर में शायद मैनेजर की भी नजर मुझ पर पड़ चुकी थी। वह आनन-फानन कमरे से बाहर निकला। अर्ध नग्न ही था। कुछ ही देर में इसी अवस्था में महिला भी निकल गई। पेट्रोल देने वाले कर्मचारी से मैंने पूछ लिया-

"यह सब क्या हो रहा है, दिनदहाड़े! जरा सा भी शर्म-हया नहीं है।"

वह कर्मचारी भी लगता है गुस्से से भरा हुआ था। भड़क उठा।

"की करभो! रंडीबाज है। पकिया रंडीबाज। आगल-पागल केकरो नैय छोड़ो हइ! बेटा घर से भगा देलकै! तोर समाज अइसने हो। ढंकल-छुपल पाप, पाप नइ होबो हइ!"

मैं समझ गया। मेरे अंदर का पत्रकार क्रोध से भर उठा और लगा कि इस घटना को उजागर कर दें। जैसे ही वह महिला बगल से गुजरने लगी मैंने कैमरे में उसकी तस्वीर कैद करनी चाही। हड़बड़ाहट में महिला बगल से गुजर गई। मैंने आगे जाकर तस्वीर लेने का मन बनाया पर फिर उसकी हालत देख कैमरा ऑन नहीं कर सका।

महिला लगभग अर्धनग्न अवस्था में ही हड़बड़ाकर कमरे से बाहर निकल गई थी। उसके ब्लाउज खुले हुए थे पर अपनी साड़ी के आंचल से उसने अपना तन ढंक लिया था। वह एक साधारण महिला थी जिसको देखते ही करुणा का भाव जग जाए। बेबस और लाचार। साड़ी के नाम पे चिथड़ा था। पैर में चप्पल नहीं। बालों में कंघी तक नहीं किया हुआ।

खैर, इसी तरह वह महिला आगे-आगे जा रही थी और मैं अपनी बाइक से उसके पीछे-पीछे जा रहा था। महिला अपने हाथों में कुछ छुपा रखी थी। उसके दोनों मुट्ठी बंद थे। रास्ते भर वह अपनी छाती को छुपाने का प्रयास करती बढ़ती रही।

उसने मुड़कर मुझे देखा। मैंने भी उसको देखो। उसकी आंखों में एक अजीब सी बेचारगी थी। लगा की वह वह रो देगी। फिर भी मैं गुस्से से भरा हुआ था।

कुछ दूर तक पीछा करने के बाद वह महिला बस स्टैंड के एक साधारण से होटल के पास जाकर रुक गई। वहां दो छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे। एक की उम्र पांच साल और दूसरे की तीन साल होगी। वहां पर पहुंचते ही दोनों बच्चे महिला से लिपट गए।

महिला ने बंद मुट्ठी को खोला और दोनों बच्चों को मुट्ठी में छुपाया हुआ सामान दे दिया। तब तक मैं थोड़ा नजदीक आ गया था। देखा कि महिला के हाथ में दस-दस के कुछ नोट थे। वह नोट मिलते ही बच्चों के खुशी का ठिकाना नहीं रहा। बड़े बच्चे ने तत्काल बिस्कुट का एक पैकेट खरीद लाया और वह अबोध भाव से बिस्कुट का आनंद लेने लगा। महिला लगातार मुझको देख रही थी। उसकी आंखों में तिरस्कार था। घृणा थी। क्रोध था। उसकी आंखें बोल रही थी-

"मैं तो एक लाश हूँ! जिंदा लाश! मेरे पीछे क्यों हो, जाओ उस मैनेजर के पीछे। पर नहीं, वह सभ्य समाज है। धनी है। उसका पाप, पाप कभी नहीं होता! पाप का तो गरीबी से ही रिश्तेदारी है! पाप गरीब के माथे ही सजेगा! थू है वैसे समाज को! थू है !!"

तभी बगल में एक परछाई सी आकर खड़ी हो गई। मैं सहम गया। परंतु वह परछाई अट्टहास करने लगी। उसकी हंसी डरावनी थी। वह बोल भी रही थी।
"मैं भूख हूँ, मैं भूख हूँ, ना मैं पुण्य हूँ, ना मैं पाप हूँ, बस भूख हूँ, भूख हूँ, भूख हूँ...." और मैं कैमरा बैग में रख, शर्मिंदगी का बोझ उठाये चुपचाप वहाँ से आगे बढ़ गया।

13 अप्रैल 2017

चंपारण सत्याग्रह का जश्न और आत्मदाह करते किसान-मजदूर पर खामोशी..इतना सन्नाटा क्यों है भाई..

 सत्याग्रह के सौ वर्ष पूरे होने पर एक तरफ बिहार सरकार द्वारा प्रायोजित सरकारी आयोजन में देश के नामी-गिरामी गांधीवादी विचारकों द्वारा अपने-अपने विचार व्यक्त किए जा रहे थे और उन्हीं के साथ मंच साझा करते कुछ राजनीतिज्ञों का गांधीवाद से दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं था! उलट, कई आरोप भी लगे हुए थे। दूसरी तरफ आयोजनस्थल से कुछ किलोमीटर दूरी पर मोतिहारी में गन्ना मजदूर और किसान अपनी मजदूरी के लिए आंदोलन कर रहे थे और दो मजदूर-किसानों ने आत्मदाह कर ली जिसमें एक की मौत हो गई।


 यह विचलित करने वाली खबर है। एक तरफ लाखों-करोड़ों खर्च कर गांधीवाद को विस्तार देने की बात वैसे लोग कह रहे हैं जिनका गांधी बाद से दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं है, वहीं दूसरी तरफ अपनी मेहनत की मजदूरी मांगने के लिए नरेश श्रीवास्तव और सूरज बैठा आत्मदाह कर लेते हैं। सैंकड़ों की भीड़ तमाशबीन बनी रहती है और नरेश श्रीवास्तव की मौत हो जाती है । इस घटना में हृदय विदारक बात यह सामने आती है कि प्रशासन इस पर 25-30 लोगों को नामजद करके 200 अज्ञात को आरोपी बनाता है। जबकि मृतक के पत्नी कंपनी मालिक विमल को अभियुक्त बनाती है। अब देखने वाली बात यह है कि प्रशासन इस प्रसंग को दूसरी तरफ मोड़ना चाहती है। 


 गांधीवाद की जो मूल अवधारणा वह यही खत्म हो जाती है। जब हम कहते हैं कि हमें किसान और मजदूरों की बात करनी चाहिए, उस की आवाज उठानी चाहिए तो यह केवल दिखावटी बातें होती है। इसी प्रसंग में आत्मदाह करने वाली खबर को मीडिया ने तरजीही नहीं दी और गांधीवाद के प्रचार-प्रसार की बात को प्रमुखता से स्थान दिया। लोकतंत्र में चौथे खंभे की इस क्षरण को देख कर किसी भी व्यक्ति की संवेदना जगेगी और उसको शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। एक अखबार ने इस खबर को प्रमुखता से स्थान दिया हालांकि उसका प्रसार बहुत ही कम है। खैर, आज सोशल मीडिया के इस दौर में कोई भी बातें दबी छुपी नहीं रह सकती तब बड़े-बड़े समाचार चैनल जब किसी भी सांप्रदायिक मुद्दे पर की गई एक हत्या जो की (नितांत ही निंदनीय है) उसको लगातार इस तरह से पेश करता है जैसे देश में प्रलय आ गया हो और वही मीडिया एक किसान और मजदूर की आत्महत्या और आत्मदाह की खबर को दबा देती है। खासकर तब जब घटना गैर भाजपा शासित प्रदेशों से हो तो सवाल उठने लाजिम है। 


बात महज मीडिया की नहीं है, बात सरकार की संवेदनशीलता की भी है। कैसे आप बड़े बड़े आयोजन में करोड़ों खर्च कर गांधीवाद पर वैसे व्यक्ति से लेक्चर दिलवाते हैं जिनके चाल और चरित्र में गांधीवाद का लेशमात्र भी अंश नहीं है तो लोगों को इन बातों पर विश्वास कैसे होगा। दूसरी तरफ मजदूर और किसान को अपने मेहनत और मजदूरी की कमाई मांगने के लिए धरने पर बैठना पड़ता है और उसे आत्मदाह करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। 


 इसी प्रसंग में गांधीजी की बात जब आती है तो नील की खेती करने वाले किसानों की बदहाली को लेकर राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी को कांग्रेस के कई अधिवेशनों में जाकर चंपारण आने के लिए मजबूर किया और वही राजकुमार शुक्ल आज गुमनाम है। खैर, जब गांधी जी चंपारण आते हैं तो अंग्रेज ऑफिसर विल्सन से उनकी वार्तालाप होती है और विल्सन कहता है कि आपको चंपारण जाने की कोई जरूरत नहीं सभी रिपोर्ट मैं आपको दिखा देता हूं। विल्सन पूछता है "आपका मकसद अच्छा है पर इसके लिए चंपारण जाना जरूरी नहीं है, सरकार लगातार काम कर रहा है। क्या आपने मोर का रिपोर्ट देखा है।" गांधीजी कहते हैं "रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है, उपलब्ध होने पर अवश्य देख लूंगा। रिपोर्ट किस चीज के मुतल्लिक है।" विल्सन कहता है "सरकार बहादुर ने की सर्वे का काम मोर को दिया है। मोर ने इस मामले में रिपोर्ट दिया है। इस रिपोर्ट में रैयतों का कंडीशन और इंडिगो प्लांटेशन के बारे में डिटेल है। आप उसे देख लीजिए।" कहने का मतलब यह है कि एक अंग्रेज अधिकारी भी गांधी जी को रिपोर्ट के सहारे किसानों की बेहतर स्थिति समझाना चाहता है और आज भी हालात वही है। जबकि हम चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर शताबदी जश्न मना रहे हैं। धन्य है हम और धन्य है हमारा लोकतंत्र... कविवर अदम गोंडवी कहते है.. तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है  
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है  
 उधर जम्हूरियत का ढोल पीटेे जा रहे हैं वो  
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है  
 लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में  
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है  
 तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के  
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है..

रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...