29 अगस्त 2026

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग।

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग। 

यह एक सुखद संयोग रहा कि बिहार योग विद्यालय मुंगेर जाना हुआ । 

आश्रम में प्रवेश से पहले कड़े नियमों को कड़ाई से पालन के बारे में संयोजक चैतन्य मूर्ति और राहुल जी ने सब कुछ समझा दिया था।
हमें अन्नपूर्णा भवन में आश्रय मिला। एक कमरे में तीन यात्री। 

कड़े नियमों से पहले तो यही था कि नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करें। मोबाइल प्रयोग वर्जित है (किसी का मोबाइल जब्त नहीं हुआ)। अपने सारे कार्य स्वयं करने हैं। 


संध्या 7:00 बजे के बाद मौन व्रत का पालन करना अनिवार्य होगा। एक दूसरे के कमरे में नहीं जाना है।

सुबह 4:00 बजे से दिनचर्या शुरू होकर 7:00 बजे संध्या समाप्ति है। इसमें योग, कर्म योग, मंत्र उच्चारण, शवासन , सत्संग, वायु साधना में सहभागी होना है। भजन कीर्तन भी शामिल है। योग आश्रम में किसी भी देवी देवता का चित्र अथवा मूर्ति दिखाई नहीं पड़ा।

पूछताछ में यह जानकारी मिली कि यह आश्रम अंग नरेश राजा कर्ण के दान स्थल पर बना हुआ है। इसे कर्ण चौड़ा कहते हैं । यह पहाड़ी क्षेत्र है।

यही से गंगा स्नान और माता चंडी की आराधना के बाद कर्ण सोना इत्यादि दान किया करते थे। 

खैर, पहले दिन भोजन के बाद कुछ देर आराम के बाद मंत्र पाठ में भाग लेने के लिए बगल के आश्रम में जाना था। 

उसके लिए वहां गाड़ी की व्यवस्था थी। पौने तीन बजे सबको पहुंचना था, सभी पहुंच गए। आश्चर्य लगा कि कैसे हम लोग समय के पाबंद हो गए! 

इसके लिए गंगा के किनारे बने पादुका दर्शन सत्संग पीठ में जाना हुआ ।

यह एक खुला कक्ष था । सभी श्रद्धालु पालथी मारकर बैठ गए। सामने महादेव का एक शिवलिंग स्थापित था। जहां श्रृंगार का काम बच्चे कर रहे थे। पता चला कि इस आश्रम में बच्चों का बाल योगी के रूप में प्रशिक्षण और सेवा की भी व्यवस्था है। 

बच्चों को यहां सभ्यता, संस्कृति, गायन, वादन, चित्रकार इत्यादि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 


फिर देखा कि एक सामान्य से थोड़ा कम कद काठी के गेरुआ वस्त्र धारी संत व्यक्तित्व अलमस्ती में चले आ रहे हैं। उनके माथे पर एक विलायती टोपी थी, हाथ में पानी का थर्मस, चेहरे पर मुकुराहट और हल्की-हल्की सफ़ेद दाढ़ी। 

वे सहजता से कुर्सी पर बैठे। घड़ी देखी। 3:00 बज गए। हरि ॐ तत्सत का उच्चारण किया। सब ने साथ दिया। फिर महामृत्युंजय मंत्र के जाप का शुभारंभ हुआ। इससे पहले किसी भी सहज आसन में बैठने, ध्यान करने का निर्देश मिला।

ध्यान करने के लिए आंखों को बंद करने। आती–जाती सांसों को सजगता से देखने। महसूस करने के लिए कहा गया।

पुनः आंखों के सामने एक ज्योति पुंज की कल्पना करने की बात कही गई। पुनः एक साथ तीन बार ॐ का उच्चारण कराया गया पुनः शांति पाठ। पुनः एक साथ तीव्रता से 108 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया गया। 

ॐ उच्चारण और महामृत्युंजय जाप के बाद कुछ अन्य मंत्रों का भी जाप कराया गया । ॐ नमः शिवाय का भी जाप हुआ।

इन सब के बाद वहां की स्थिति सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होने लगा। लगा जैसे सभी जगह महामृत्युंजय का नाद गूंज रहा हो। 

अंदर से कंपन होने जैसा ! जैसे यह नाद दूर किसी क्षितिज से जाकर लौट रही है।एक असीम ऊर्जा तरंग। 


फिर लगातार कई प्रकार की ध्यान मुद्राओं का अभ्यास एक साथ हुआ। 4:00 बजे समाप्ति हुई। समाप्ति से पहले शांति पाठ हुआ। 

उसके बाद हमें एक बड़े से कक्ष में ले जाया गया । या कक्ष नहीं कह सकते हैं, एक बड़ा सा टेंट नुमा हॉल । दो बड़े लोहे के पिलरों पर छतरी नुमा टेंट बना हुआ। 

सामने मंच और मंच पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद जी, वायु साधना यज्ञ की तैयारी। 

इससे पहले सत्संग। स्वामी जी का प्रवचन । पर यहां प्रचलित धार्मिक कथा का वाचन , विवरण या विवेचना नहीं। यहां विज्ञान की विवेचना होने लगी। उसी पर आख्यान होने लगा। 

उन्होंने बताया कि वायु एक ऊर्जा है। वायु का मतलब हवा नहीं, ऊर्जा का एक रूपांतरित रूप से है। यही है, तो हम हैं। और कहते हैं कि मेरा शरीर! यह मेरा कौन है? 

फिर समझाया की नासा ने एक ऊर्जा के रूपांतरण पर एक शोध किया जिसमें दुनिया भर के 500 वैज्ञानिकों को शामिल किया गया । उसमें से उनको भी शामिल किया गया, यद्यपि वे वैज्ञानिक नहीं है।

 बताया कि इसमें एक क्वांटम मशीन बनाई गई। यह ऊर्जा को मापता और रूपांतरित कर दूसरी जगह भेज सकता था ।

नासा ने पाया कि इसी मशीन से हम अंतरिक्ष में ऊर्जा भेज कर बीमार वैज्ञानिकों को ठीक कर सकते हैं। बाद में मेडिकल लॉबी ने दबाव में इस पूरे शोध को स्थगित कर दिया। जबकि इससे ऊर्जा के माध्यम से बीमारियों को ठीक किया जा सकता था। 

इस सत्संग की विशेषता यह थी कि इसमें भीड़ नहीं थी। शोर नहीं था। शांति और जिज्ञासा थी।

सभी लोग पालथी मारकर बैठे हुए थे। इसमें विदेशियों की भी बड़ी संख्या थी। 

वहां एक बड़ा टीवी डिस्प्ले भी लगा हुआ था। वही वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी विदेशी महिलाओं की टीम के द्वारा ही संभाला जा रहा था। 


हां, सत्संग से पहले कीर्तन हुआ। सामने एक युवती गा रही थी। पीला वस्त्र पहने। आंखों पर चश्मा लगाए। चेहरा पर हल्की मुस्कान और आभा के साथ गंभीरता ओढ़े हुए। 

जब उन्होंने गायन शुरू किया तो उनके शब्द ऐसे गूंजे , जैसे दूर कहीं, किसी ने बांसुरी बजाई हो! कोकिल कंठ! 

उसके बाद स्वामी जी ॐ उच्चारण के साथ ध्यान और शांति पाठ करवाया। फिर महामृत्युंजय का जाप हुआ। 

हां, स्वामी जी ने यह भी बताया कि महामृत्युंजय जाप को वैज्ञानिकों ने क्वांटम मशीन से मापा और चौंक गए। इसकी ऊर्जा फैली और पूरे नगर को अपने प्रभाव में ले लिया। 

खैर, इतनी देर तक पालथी मार कर बैठने की आदत नहीं रहने से लगभग सभी को परेशानी हो रही थी। कुछ बुजुर्गों को कुर्सी पर सुविधा दी गई थी। घुटने और कमर, मेरे भी जवाब दे रहे थे। पर बैठा रहा। 

इसी बीच गौर किया स्वामी जी के बगल में एक पिंजरा था। उसमें एक मकाउ तोता और वहीं बगल में एक बालक भी बैठा रहा ।


आमतौर पर वायरल और बदनाम बाबाओ के मोबाइल , टीवी में बोल, सुनकर कभी किसी से आकर्षक नहीं रहा, पर निरंजनानंद को देखते ही ओजस्विता और दिव्यता का बोध हुआ। एक परमहंस, एक संत और एक संन्यासी से साक्षात्कार हुआ। 

बस पहले दिन की समाप्ति हो गई। 
फिर 6:30 तक भोजन कर लेना है। थाली, ग्लास, कटोरी लेकर पास ही रखना है। 7:00 बजे आवास बंद होना है। यह सब हो गया। फिर एक बैठक हुई। इसमें संयोजक ने अगले दिन की दिनचर्या की जानकारी दी। 

कर्म योग के बारे में बताया गया। कर्म योग। मतलब, सजगता से अपने दैनिक कार्य को करना। 

इसमें सभी को काम बांटे गए। मुझे मुख्य भवन की सफाई का कार्य मिला। शौचालय किसी को भी साफ करनी पड़ सकती है, यह सुनकर कुछ के चेहरे उतर गए। खैर, सब अपने-अपने कमरे में चले गए । किसी से मोबाइल छीनी नहीं गई। क्योंकि चार दिन का सत्र है। एक माह के सत्र में जब्त किया जाता है। मेरे कमरे में रहने वाले सभी ने मोबाइल ऑन किया। घर सूचना दी। और उसमें लग गए।

मैंने घर में कॉल कर सूचना दी। (मुख्य मोबाइल मैं घर पर ही छोड़ आया था। कॉल के लिए एक था) ।और थकान के कारण नींद आ गई। 




25 अगस्त 2026

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय का चार दिवसीय आश्रम प्रवास से लौट आया। जीवन का एक नया अनुभव मिला। जीवन में उन अनुभवों को हमारे जैसा सामान्य आदमी तब तक शत प्रतिशत उतार पाना मुश्किल है, जब तक आदमी हार या थक न जाए। जो इन अनुभवों को जीवन में पहले धारण कर ले, वही संत है। कई थके हारे लोग आश्रम में मिले। सेवानिवृत..के बाद ..!

खैर, आश्रम में डिजिटल डिटॉक्स, मेंटल डिटॉक्स और फिजिकल डिटॉक्स हुआ। चार दिनों तक बिना मोबाइल रहा। 

बिना मोबाइल भी जीवन जिया जा सकता। न कोई सेल्फी की होड़। न रील बनाने की प्रतिस्पर्धा। बस सबकुछ अपने लिए। 

आज के दौर में यह मुश्किल है, पर अब इसी की जरूरत है। 

आश्रम में बहुत कुछ सीखा। बहुत कुछ अनुभव हुआ। कुछ कुछ अनुभूति हुई। और सबसे विशेष, स्वामी निरंजनानंद जी से स्नेह मिला। यह अतुल्य और अकल्पनीय रहा। 

स्वामीजी कौन है? यह सवाल मन में उठेगा तक भी इसका जवाब इस इंटरनेट की दुनिया में कम ही मिलेगा। आज अधजल गगरी, छलकत जाए वाले वायरल बाबाओं का दौर है। 

इस दौर में स्वामी निरंजनानंद जी चुपचाप योग और मंत्र विज्ञान पर शोध और साधना कर रहे। दुनिया स्वामी जी के शोध और साधना का लोहा मान चुकी है। पर हम बिहार के लोग, अपने घर में इतनी बड़ी उपलब्धि होने के बाद भी उसका सम्मान नहीं कर रहे। 
खैर, आश्रम प्रवास में 4 बजे से 7 बजे, योग, ध्यान, मंत्र, साधना, कर्म योग (साफ सफाई) जैसे गुरुकुल जीवन का अनुभव मिला। दुनिया के कई देशों के लोग यहां प्रवास करते मिले। 

और इसी में जाना कि जो शारीरिक योग हम करते है, वह योग का दस प्रतिशत हिस्सा ही है।

बस, इतना ही। बाकी बातें फिर कभी



17 अगस्त 2026

धीरज नहीं तो धर्म कहां..?

धीरज नहीं तो धर्म कहां..?

लखीसराय के अशोक धाम में तीसरे सोमवारी भगदड़ मचाने से आधा दर्जन से अधिक की मौत हो गई। धर्म स्थलों में अब अपार भीड़ है।
नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार हो जाती है। कुंभ, नालंदा शीतला मंदिर, अशोक धाम, यह लंबी सूची है। आम तौर पर इसके लिए प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया जाता है। 

परंतु इसमें श्रद्धालुओं का अधीर होना, सबसे बड़ा कारण है। जल्दी से पूजा कर लें, इसके लिए हम, सब कुछ करेंगे। 

आज 3:30 बजे जग कर जल्दी जल्दी तैयार होकर, सपत्नीक  पंचबदन स्थान शिव मंदिर गया। पिछले सोमवार से अधिक भीड़। डेढ़ घंटा लाइन में लगे। जब नजदीक पहुंचने को थे तो कई लोग जबरन प्रवेश कर रहे थे। मेरे पीछे भी एक आकर लग गया। डांट कर कहा, " यह कैसा धर्म ? तो दांत निपोर दिया। पुलिस का एक जवान था, बोले तो उसने भी कहा, क्या करें सर, आप लोग ही कहते है, रहने दीजिए, तभी होता है...!

महिला पंक्ति में कई महिलाएं जबरन धक्का मुक्की कर के प्रवेश कर गई...! सभी जगह पुलिस संभव नहीं...!

हम, घंटों लाइन में लगे लोगों को धकिया के घुस जाएंगे। पहुंच, पैरवी, रसूख , का उपयोग करेंगे। 


और फिर जोर, जबरदस्ती भी। वहीं, जब भगदड़ होगी तो किसी की लाश से गुजर कर हम पूजा करने से गुरेज नहीं करते..! जब कोई शव यात्रा से आयें तो महिलाएं बिना स्नान धर प्रवेश करने नहीं देती, तो फिर यहाँ..? हम, और हमारी धार्मिकता...?

न धीरज, न संवेदना, न सेवा, न सहयोग...फिर धर्म कहां ? भगवान कहां...? और फिर, रील और सेल्फी कल्चर से भीड़ , भेड़िया धसान है...

12 अगस्त 2026

भादो के गर्मी में हिरन मात जा हे..

भादो के गर्मी में हिरन मात जा हे..

देहाती कहावत है। और यह अभी सावन में भी चरितार्थ है। तीखी गर्मी है। सबकी अपनी अपनी समस्या है। किसान परेशान है। 
"रोपनी अब दु कट्ठा भी नै रोपो हो। पहले चार कट्ठा रोप दे हल। रोपनी मिले में भी मुश्किल हो। और ई लहा–लोट रौदा हो..की रोपा होत, रोपनी भाग गेल..!"
रोपनी की अपनी समस्या है। 

" खेत के पानी खल–खल करो हो। एक घड़ी गोर रख के देख लहो, खाल उतर जैतो...? "

और वातानुकूलित कक्ष से धान रोपनी का प्रतिशत बढ़ाने पर रोज मंथन हो रहा। अधिकारी लक्ष्य पूरा करने के लिए नीचे के कर्मी को हड़का रहे। 

वहीं सावन में वर्षा बहुत कम हो रही। 

पर एक सुखद समाचार यह है कि अब पिछले एक, डेढ़ दशक से किसान धान की रोपनी के लिए पूरी तरह वर्षा पर निर्भर नहीं है। अब हर खेत, खंधा में समर्सिबल बोरिंग है।  ट्रांसफार्मर और बिजली है। इसलिए धान का रोपा हो जाता है। 

मजदूर एक बड़ी समस्या है। रोपनी मिलना अब मुश्किल है। 

इसीलिए बड़े किसान अब सहरसा से रोपना (पुरुष) लाते है। उसके रहने, खाने की व्यवस्था देते है। वह बहुत काम निकालता है।

और हां, खेत की मेड़ तक बिजली पहुंचाने की योजना का शुभारंभ मनमोहन सिंह की सरकार ने ही किया था। मुझे अच्छे से याद है। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना। बस इतना ही, बाकी सब ठीक है।

30 जुलाई 2026

लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव

लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि स्वयं को सुधारने की क्षमता में है। इसमें गलतियां होती हैं, सरकारें असफल भी होती हैं, फैसलों पर सवाल भी उठते हैं। लेकिन इन सबका समाधान संविधान, कानून और चुनाव की प्रक्रिया में निहित है। यदि इनकी जगह भीड़ निर्णय लेने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल जाता है। आज भारत इसी चुनौती के एक कठिन दौर से गुजरता दिखाई देता है।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध का अधिकार नागरिकों की सबसे बड़ी ताकत है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब विरोध प्रदर्शन हिंसा, धमकी, सार्वजनिक अपमान, संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव और कानून को चुनौती देने का माध्यम बनने लगे, तब यह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रह जाता। यह भीड़ के दबाव से व्यवस्था को झुकाने का प्रयास बन जाता है। दुनिया के अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि भीड़ कभी स्थायी समाधान नहीं देती। बांग्लादेश की हालिया घटनाओं ने दिखाया कि जब भीड़ सत्ता और संस्थाओं पर हावी होती है, तब सबसे पहले लोकतांत्रिक मर्यादाएं टूटती हैं। क्रांति का रोमांच क्षणिक हो सकता है, लेकिन संस्थाओं का क्षरण वर्षों तक राष्ट्र को अस्थिर करता है। भारत का लोकतंत्र भी इस समय कई दिशाओं से दबाव झेल रहा है। सोशल मीडिया ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन उसी मंच पर भीड़ की मनोवृत्ति भी तेजी से विकसित हुई है। किसी भी मुद्दे पर कुछ घंटों में भावनाओं का ऐसा उबाल पैदा कर दिया जाता है कि तथ्य और तर्क पीछे छूट जाते हैं। ट्रेंड, ट्रोल और वायरल संस्कृति कई बार विवेक पर भारी पड़ती दिखाई देती है। यह भी सच है कि इस स्थिति के लिए केवल भीड़ को दोष देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। लोकतंत्र संवाद पर चलता है। संवाद की कमी अविश्वास पैदा करती है और अविश्वास आक्रोश को जन्म देता है। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर समय पर स्पष्ट संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाई जाती तो शायद स्थिति इतनी विस्फोटक नहीं बनती। जनता केवल निर्णय नहीं, उसका तर्क भी सुनना चाहती है। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता को विश्वास में लेना भी है। जितना अधिक संवाद होगा, उतनी ही कम अफवाहें और उत्तेजना फैलेंगी। चुप्पी कई बार विपक्ष से अधिक नुकसान सत्ता को पहुंचाती है। दूसरी ओर, विपक्ष की भी समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है, लेकिन उसका माध्यम चुनाव है, न कि भय, अराजकता या संस्थाओं को अस्थिर करने की राजनीति। यदि हर असहमति का उत्तर भीड़ के दबाव से खोजा जाएगा, तो कल कोई भी सरकार सुरक्षित नहीं रहेगी और कोई भी संस्था स्वतंत्र नहीं बचेगी। चिंता केवल सरकार की नहीं है। चिंता उन संवैधानिक संस्थाओं की भी है, जिन पर लोकतंत्र टिका है। संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका, चुनाव आयोग, स्वतंत्र मीडिया और सुरक्षा बल। इन संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इन्हें अविश्वसनीय बनाने का सुनियोजित प्रयास अंततः पूरे लोकतंत्र को कमजोर करता है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान है। यही संविधान सरकार को सत्ता देता है और जनता को उसे बदलने का अधिकार भी देता है। इसलिए लोकतंत्र में अंतिम फैसला भीड़ नहीं, मतदाता करता है। सड़क पर जुटी भीड़ क्षणिक उत्साह पैदा कर सकती है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य मतदान केंद्र तय करते हैं। आज आवश्यकता किसी एक दल या विचारधारा की जीत की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा की है। सरकार अधिक संवेदनशील और संवादशील बने, विपक्ष अधिक जिम्मेदार बने और नागरिक यह समझें कि लोकतंत्र की रक्षा केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि संयम और संवैधानिक आचरण से भी होती है। लोकतंत्र की कमियां लोकतंत्र ही दूर कर सकता है। भीड़तंत्र केवल व्यवस्था को अस्थिर करता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों में संस्थाएं भीड़ के आगे झुकीं, वहां अंततः लोकतंत्र ही सबसे बड़ा पराजित हुआ।

28 जुलाई 2026

छात्र आंदोलन में भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र

भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र

मुझे पहले दिन से ही लग रहा था कि फेसबुक, इंस्टा जैसी कंपनी भारत में हो रहे छात्र आंदोलन को हवा दे रही है। सोशल मीडिया पर शांतिपूर्वक चीजों को देखने और समझने वाले लोग इसे समझ सकते हैं। 
छात्र के आंदोलन को पुलिस के द्वारा छात्रों की पिटाई को काफी बर्बर तरीके से और खूब तेजी से वायरल किया गया । हर किसी के फीड में केवल और केवल इसे ही दिखाया जाता था। यह फेसबुक के एल्गोरिथम के द्वारा जानबूझकर किया गया।

उसे हर किसी को दिखाया गया परंतु छात्र आंदोलन को शांत करने के प्रयास को, छात्र आंदोलन में घुस आए उपद्रवियों के द्वारा किए गए उपद्रव और अराजकता को दबा दिया गया।

 उसके रीच को घटा दिया गया। और यह बात पूरी तरह से तब प्रमाणित हो गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी वीडियो को प्रतिबंधित कर दिया गया। हालांकि भारत सरकार ने इस पर संज्ञान लिया है परंतु इस पर और कड़ाई से संज्ञान लेकर सजा देने की जरूरत है। इस देश को, कमजोर करने, गिराने में पूरी दुनिया की ताकत लगी हुई है.. हमें इसे समझना होगा... अफसोस की कथित जेन जी इस साजिश का हिस्सा बन जाते हैं..

21 जुलाई 2026

गुस्सा तो बहुत है.... संसद के आगे हंगामा...

गुस्सा तो बहुत है....

अभी तो लगता है, यार लोकतंत्र में धरना, प्रदर्शन, आमरण अनशन, उग्र–प्रदर्शन, हल्ला–हंगामा.. लाठीचार्ज, पथराव, आंसू गैस सब लोकतांत्रिक है, देश द्रोह नहीं है...! कभी ये सीमाओं में रहेगा, कभी सीमाएं ऐसे टूटेगी, जैसे सैलाब आया हो...! कल संसद के आगे सैलाब दिखा..!
और, कभी कभी लगता है मोदी सरकार भी निष्ठुर है। किसी की नहीं सुनती। पेपर लीक पर चुप्पी । दूसरी बार नीट परीक्षा लिया पर पेपर लीक करने वालों पर ठोस कार्रवाई नहीं दिखी..! और यार, बातचीत ही तो लोकतंत्र है, फिर..?
और, अभी तो यह भी लग रहा कि बीजेपी की सरकार, बोलने की आजादी छीन रही है। बिहार में सोशल मीडिया पर अभद्रता के लिए अब गुंडा एक्ट लगेगा..?

राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चुप्पी। बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी, फिर उधव ठाकरे, आम आदमी पार्टी का संसद इत्यादि की पार्टी को हाईजैक करना। 

कभी कभी लगता है कि मीडिया पर अंकुश क्यों लगाया गया..? 

कभी कभी लगता है, सोनम वांगचुक सज्जन है। जैसे अन्ना हजारे थे। पर वे राजनीतिक साजिश का शिकार नहीं होंगे, क्या गारंटी है..?

और, अभी तो यह भी लगता है, देश का विपक्ष, धूर मोदी विरोधी, श्री लंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह देश के जेन जी को करने के लिए लगातार भड़का रहा है, कहीं भड़क गए तो..?

कभी कभी लगता है, अपना देश लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलता है। यहां सर्व सम्मत नहीं है, यहां बहुमत है। इसका मतलब, आधे से कुछ कम लोग सरकार को नापसंद करते है..। 

कभी कभी लगता है, यार बात बात पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार, पेपर लीक, चढ़ावा चोरी को गंभीर अपराध नहीं मानती इसीलिए तो बुलडोजर भी मौन है..!

कभी कभी यह भी लगता है कि जिस देश पर ऐसे ही इतना बोझ है उसपर महिला आरक्षण के बहाने दोगुना सांसदों का बोझ डालने का प्रयास तो सरासर अन्याय है..! और यह अन्याय राष्ट्रवाद के नाम पर तो और असहनीय है..!

कभी कभी तो यह भी लगता है कि यार, इसरो जैसे संस्था से 100 से अधिक वैज्ञानिक छोड़ कर चले गए, क्या अब देश में व्यापार ही होगा, जन सरोकार कुछ नहीं..! 

कभी कभी लगता है, यार इस देश में बुलेट रेल और साधारण रेल के डिब्बे की असमानता की खाई को कौन मिटाएगा..? 


और देश की पूंजी पर कुछ व्यापारिक घरानों के कब्जे और गीगा वर्कर बन रहे युवा पीढ़ी को कौन संभालेगा..? 

देश में बढ़ रहे मॉल कल्चर और बेरोजगार होते छोटे व्यापारियों की, क्या कोई नहीं सुनेगा..?

अक्सर यह लगता है कि गंभीर बीमारियों में आम आदमी के लिए एम्स सहित बड़े अस्पतालों में बेड नहीं है और मॉल रूपी निजी अस्पताल में इलाज करवाने की जगह, आम आदमी मौत को ही चुनना पसंद करता है..।

कभी कभी यह भी लगता है कि अब तो मॉल रूपी विश्विद्यालय कल्चर है। इसमें तो इंटर के बाद आम आदमी अपने बच्चे को पढ़ा ही नहीं पाएगा.. और जन सरोकार की शिक्षा व्यवस्था को शनै शनै मृतप्राय बनाया जा रहा है..!

अभी तो यह भी लगता है कि यार अपनी बाइक का माइलेज कम हो गया, और सरकार इथेनॉल वाले तेल के झूठे दावे किए जा रही है। वहीं कोई सच बोले तो उसे दबा दिया जाता है..!

कभी कभी लगता है, यार भरत तिवारी तो गरीबों के लिए लड़ रहा था, उसे मार दिया गया..? 

और उन सब के बीच यह भी लगता है, यार अन्ना हजारे के बहाने देश ने वेगनआर गाड़ी वाले केजरीवाल को मौका तो दिया। कहा, राजनीति बदलनी है, वही बदल गया। 


और अंत में यही लगता है, यार अमेरिका के बोस्टन में पढ़ाई कर रहा दीपके के कॉकरोच जनता पार्टी के साथ देश को क्यों खड़ा होना चाहिए..? जिसमें मुख्य न्यायाधीश के उस कड़के सच को, जिसमें उन्होंने कहा था, 

" फर्जी डिग्री वाले बेरोजगार कॉकरोच की तरह है..!"

और दीपके इसी बहाने खुद को भीमवादी बता कर,  
भावनाओं को भड़का के, राजनीति कर सकता है, तो उसपर कैसे भरोसा करें..?

बहुत उथल पुथल चल रहा है। बहुत

07 जुलाई 2026

चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...

चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...

मंदिर में चढ़ावा चोरी की चर्चा गांव चौपाल में चर्चित है। गांव चौपाल में किसिम किसिम के लोग आते हैं। मसूदन बा  पुराने पार्टी के खांटी समर्थक हैं। अब 10 साल से कोई उनको बोलते नहीं देता था। 
जब भी सरकार की कमी निकालते, सब उनको उल्लू धुत्तू करके  लोलिया देता। 

अब मंदिर में चढ़ावा चोरी हुई तो मसूदन बा को मौका मिल गया। चौपाल में वे सीधा कट्टर भगत माहो दा पर धावा बोल दिए। 

"की हो महेंद्र , देख लेलहीं ने तोर धर्मात्मा पार्टी के हाल की हउ.. ई तो भगवानों के घर में चोरी कर लेलको ...?"


माहो दा बेचारे चुप हो गए । पहले जब भी कोई आरोप लगता , वे पुरानी सरकार और उनके नेताओं के भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत जीवन की कुंडली निकाल कर रख देते ..!

अब मसूदन बा रोज हल्ला करने लगे..। आज khe काका आ गए। मसूदन बा ने बात छेड़ी ..।

"बताहो तो आजकल लोग भगवानों के चढ़ावा चोरी कर ले हो ..! कलजुग हो, कलजुग..!


खेलावन काका ऐसे भड़के जैसे किसी ने बिगड़ैल कुत्ते को ढेला मार दिया हो...!

"आयां हो मसूदन ... , तों तो आय तक एगो चमन्नी नै देल्हीं हैं,  उल्टे तों तो भगवान के मानवे नै करों हीं त तोड़ा कहा ले उल्टी हो रहलो हैं..!" 


मंदिर हम्मर ! चढ़ावा हम्मर। चोरी करे वाला हम्मर अप्पन..!  तोर बाउजी के की 

मसूदन बाबू खुश हुए तीर निशाने पर लगा है 

तब बोर्ड लगवा दो हो सूचना मंदिर में दिए गए चढ़ावा को चोरी करने का सर्वाधिक कार्य सुरक्षित है कृपया बाहरी लोग इसमें हस्तक्षेप ना करें धन्यवाद...!
(नोट: यह एक व्यंग्य रचना है)

06 जुलाई 2026

फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए, जीवन यात्रा के लिए

फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए

मैच में जीवन का अनुभव मिलेगा। कभी भी कोई फॉल कर देगा। कभी येलो कार्ड दिखा कर जीवन संघर्ष में सतर्क होने की चेतावनी मिलेगी। कभी भी अचानक अपनी गलती अथवा गलती से हुई गलती से  रेड कार्ड मिल जाएगा और आप खेल से बाहर। 
पर। खिलाड़ी, निराश नहीं होता। गिव–अप नहीं करता। खेल है। जीवन है। जीवन एक खेल है। 
और, सब कुछ अच्छा, जरा सी गलती और पेनल्टी...! खेल खत्म होने की संभावना, पर सेकेंड के हजारवें हिस्से से खेल बचा लिया जाएगा..!

और सेकेंड के हजारवें हिस्से से हारी बाजी जीत सकते है। जीती बाजी हार सकते है..!

सब कुछ अनिश्चित..! और महाभारत  में अर्जुन ने सिर्फ लक्ष्य (मछली) की आँख देखा, यह पुरानी बात है ! अभी फुटबॉल में खिलाड़ी को सिर्फ लक्ष्य (फ़ुटबॉल) को देखते हुए देखिए..!

और, मैदान में 90 मिनट का खेल केवल 90 मिनट का नहीं होता। 365 दिन 24*7 निरंतर अभ्यास से यह सीखना कि कैसे हार से हारना नहीं चाहिए। जीत का गुमान नहीं करना चाहिए...सबकुछ...!

और टीम भावना  से जीत मिलती है, सीखिए...! और खेल के पीछे एक गुरु होता है। कोच..! वही तो गलती बताता है। गलती सुधारता है। गलती पर डांटता है..! 

कितना कुछ होता है खेल में। एकदम जीवन की तरह..! 

देखिए तो आंसू को। जीत की खुशी का आंसू, हार के दुख का आंसू...!

और, जीत का जश्न... सच्चा आनंद...सबकुछ सर्वोच्च शिखर पर...

आह, जीवन भी तो एक खेल ही है...खेल का मैदान है...

08 जून 2026

काव्य की स्वर लहरी

काव्य की स्वर लहरी दैनिक जागरण की काव्य संध्या में और हास्य, व्यंग, श्रृंगार, वीर रस और जन सरोकार के कवियों ने जिस तरह काव्य की स्वर लहरी बिखेरी वह अतुल्य था।
दिनकर की कर्मभूमि शेखपुरा की धरतीके सुधी श्रोताओं ने जिस आनंद से लगभग आधी रात तक टिक कर कविता का हृदय से आनंद लिया यह अपने आप में विभोर करने वाला रहा। साहित्य अनुरागी सुधी श्रोताओं की करतल ध्वनियों के निनाद ने इस काव्य संध्या को संगीतमय, अविस्मरणीय काव्य संध्या बना दिया। दैनिक जागरण मीडिया मार्केटिंग के मित्र प्रिंस जी ने कवियों का बेहतरीन संयोजन किया। इस वजह से एक मिनट के लिए भी श्रोता अलसाये नहीं। उमंग, ऊर्जा से भरकर करताल निनाद गूंजता रहा। काव्य पाठ में सभी कवि वृंद साहित्य और काव्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर तो थे ही, सभी अपने अपने शब्दों, प्रस्तुतियां और भावों से सम्मोहित करने वाले रहे। हास्य कवि अमित शुक्ला ने बूढ़ों की शादी पर प्रतिबंध की मांग ऐसे उठाई जैसे सभी के दुखती नस को दवा दिया हो। लोग ठठाते रहे। स्वयं श्रीवास्तव ..! वाणी में सरस्वती का बास । सबको झंकृत कर दिया। अशोक चारण जी ने राजस्थान के वीरता के प्रतीक को मंच पर ही जीवंत कर दिया। नीट पेपर लीक को लेकर सरकार पर व्यंग वाण और राष्ट्रवाद की धारा साथ साथ बहा दी। और नीलोत्पल मृणाल जी, मुरैठा कवि । गांव का मुरैठा विद्रोह और श्रम शक्ति का प्रतीक है। खेत में बैल से हल जोतते हुए किसान के सिर पर हमेशा मुरैठा रहता था। जब गांव में किसी बात से विवाद हो अथवा प्रतिकार, विद्रोह हो और आउ त आउ हो जाये, तो सबसे पहले मुरैठा बंधाता है। मृणाल जी ने अपनी वाणी की अप्रतिम ऊर्जा से इसी विद्रोह को शब्द से साधकर सिंह गर्जना की। सबको अभिभूत कर दिया। और आदरणीय डॉक्टर सरिता जी... मित्र गणनायक जी ने उनके लिए माँ सरिता लिखा है बस..... कवि सम्मेलन की इस महती जिम्मेवारी को मंच पर उतारने में सहयोग करने वाले सभी का हृदय से आभार...

20 मई 2026

देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी

देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी रावणेश्वर महादेव की नगरी देवघर यात्रा पर अचानक जाना हुआ। बाबा नगरी 1993 से कई बार पैदल जाना हुआ। एक बार डाक बम भी गया। इतने सालों बाद, अब बहुत कुछ बदल गया। पर बहुत कुछ नहीं बदला है। सबसे बड़ा बदलाव शराब का है। दरअसल बिहार में शराबबंदी है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग समूह में शराब पीने देवघर जाते है। इसका असर भी दिखा। दरअसल , हमलोग साथियों से साथ शनिवार की शाम गए और रविवार को लौटने की योजना थी। पर वहां पहुंचने पर होटल में कमरा थोड़ा मुश्किल से मिला।
कारण, शराब। स्थानीय लोगों ने बताया कि बिहार से बड़ी संख्या में लोग शनिवार को शराब पीने आते हैं। रविवार को रहते है। सोमवार को पूजा करके लौटते है। यह हाल है। अपने पंडा जी उदय शंकर (दोरंगी पंडा) जी ने भी नकारात्मक अनुभव दिया। बताया कि उनके होटल में बरबीघा के कई लोग शराब पीकर हंगामा कर चुके है। खैर, हम लोगों को एक होटल मिला। शाम में मंदिर गया। वही पुरानी और टूटी फूटी सड़कें। गंदगी, बदबू ..! संकरी गलियां।
शाम में एक नया अनुभव मिला। वहां लाइव कथक नृत्य और गायन समारोह चल रहा था। अभिभूत करने वाला। देर तक आनंद लिया। पता चला कि देवघर के बड़े कथक नृत्य विद्यालय चलने वाले संजय परिहस्त जी गुरु है। उनके समूह की बच्चियों ने अति उत्कृष्ट कथक की प्रस्तुति दी। मैने गुरु जी को इस महान कार्य के लिए जाकर प्रणाम किया। अगले दिन रविवार। 6 बजे मंदिर पहुंचे। पता चला भारी भीड़ है। पंडा जी शीघ्र दर्शनम का कूपन लाकर दिए और बोले कि इसमें मेरा भी कमीशन रहता है। तब भी तीन घंटे लगे। नहीं बदला तो वहीं पंडा का धन लोभ। मुख्य दरवाजे से पहले एक महोदय बस के कंडक्टर की तरह हर प्रवेश करने वाले से नोट बसूल कर उंगली में फंसा के रख रहे थे और तभी आशीर्वाद दे रहे थे। मैने नहीं दिया। आशीर्वाद नहीं..! खैर, अंदर प्रवेश करते ही दिव्य आभा और ओज का आलिंगन। अपने गुरु और आराध्य भोलेनाथ पर जल अर्पित किया। वहां भी नोट देख कर भगवान को आराम से छूने की व्यवस्था। नहीं देने वाले को किनारे से हटाया जाता। अभी अचानक से एक घटना घटी। एक पंडा जी ने पीठ पर हाथ मारा, आशीर्वाद दिया और सिर में शिव लिंग से उठाकर एक माला डाल दी। फिर बड़े सद्भाव से बोले दक्षिणा, मैं भी स्वतःस्फूर्त एक छोटा सा सहगोग कर दिया। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। क्योंकि आज तक मैने ऐसा नहीं किया था। खैर, शिव की मर्जी, शिव ही जाने...

16 मई 2026

पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज

पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज

यह पालकी है। बहुत पुरानी पीढ़ी को इसका अनुभव होगा। मुझे भी थोड़ा अनुभव है। 1983 में। मैं 10 वर्ष का था। लखीसराय के नंदनामा से जमुई के घोंघसा बारात गई थी। मुकेश दा दूल्हा थे। मैं सहवाला (दूल्हा से साथ एक छोटा बच्चा रहता है) । दुआर लगने के लिए पालकी से गया था। 
खैर , शायद पहले जमींदार भी पालकी से जाते थे। गांव की नई बहु भी पालकी पर आती, जाती थी।

जमींदार को लेकर बरबीघा का अनुभव लिखते हुए दिनकर जी लिखते है, 
" तेउस गांव के जमींदार दोहरा जीवन जीने के आदि थे। गांव से बाहर आने के लिए वे पालकी से निकलते थे और गांव के बाहर निकल कर वे पैदल जाते  थे..!"


खैर, अभी डीजल, पेट्रोल बचाने का आह्वान और फोटो सेशन चल रहा है। वैसे में हाल में ही बरबीघा के पांक गांव में यह चित्र लिया था। दूल्हे को ले जाने के लिए पालकी कहीं कहीं आज भी यह चलन में है। अब लगता है पुराने दिनों लौटना होगा। पहले हम स्वाबलंबी थे। आज नहीं...

14 मई 2026

जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..

जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..

रात्रि में जैसे ही दरवाजे पर दस्तक दी, एक भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक समाती चली गई।
एक बारगी चौंक गया। अरे, अभी तो हरसिंगार, रात की रानी इत्यादि में फूल भी नहीं हैं, फिर यह मीठी सुगंध कहाँ से...!

सर उठाया तो मधु मालती, गुलाबी और सफेद पंखुड़ी रूपी आँचल के पीछे से मुस्कुरा रही थी। तब भी मैं इधर-उधर देखने लगा, शायद कोई फूल खिला हो... पर कोई नहीं था।

फिर नासिका को मधु मालती के पास ले गया। अरे, सच में यह तो इसी की सुगंध है...! पहली बार यह जाना। मधु मालती भी इतनी भीनी सुगंध बिखेरती है।

पहली बार इसलिए, क्योंकि आज से पहले इसे गाँव में जंगल-झाड़ में उगा हुआ, खिला हुआ देखता रहा। घर में भी रही तो दृष्टि नहीं पड़ी।

क्योंकि इसे सर्वहारा ही मानता था। पर आज इसे अभिजात्य वर्ग जैसा पाकर विश्वास नहीं हुआ.. आज माना, सुगंध और सौंदर्य सर्वहारा और अभिजात्य में विभेद नहीं करते...

30 अप्रैल 2026

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया दिल्ली ! देश की राजधानी। इसकी लाखों कहानी । एक दिल्ली में अनेक दिल्ली है। हवाई अड्डे से निकल कर कुलीन क्षेत्र की एक दिल्ली है। लुटियंस जोन में एक दिल्ली है। झुग्गी झोपड़ियों में एक अलग दिल्ली। रेलवे स्टेशन पर एक अलग दिल्ली। और प्रेस क्लब में एक अलग दिल्ली..! खैर, बड़े भाई पवन भैया के सानिध्य में प्रेस क्लब जाना हुआ। पहली बार कई चीजों को देखा। एक अलग अनुभूति हुई। जैसे देश की राजधानी के इस हृदयस्थली में देश, विदेश की चिंताओं में उलझते हुए भी घूंट घूंट में चिंता मुक्त होने के कौशल में सभी सिद्धहस्त ..!
अब इस विवरण से इतर, पवन भैया की पुरानी यादें। वर्ष 2005–06 । युवावस्था में पत्रकारिता का जुनून। शिवकुमार दा से पता चला, दिल्ली में जी न्यूज में एक बड़े पत्रकार है, पवन जी। बड़े अच्छे आदमी है। फिर क्या। टीवी का क्रेज उस समय चरमोत्कर्ष पर था। सो। पता लेकर दिल्ली भाग गया। नोएडा फिल्म सीटी। उस समय बसाया जा रहा था। और मुझे कुछ ज्ञान भी नहीं। खैर, पवन भैया से टेलीफोन पर मिले निर्देश का पालन करते हुए बस की सवारी कर नोएडा के आसपास हाई वे पर बस वाले ने उतार दिया। फिर क्या, उमंग चरम। तपती धूप हाई वे नीचे उतरा। फिसल कर गिर पड़ा। दूर दूर तक कोई नहीं था। किसी ने नहीं देखा। संतोष हुआ। पूछते–पछाते पहुंच गया। गार्ड साहब को बताया। वे मैसेज लेकर गए। पवन भैया को पहली बार देखा तो एकबारगी भरोसा ही नहीं हुआ। अरे, ये तो कोई ब्रिटिश है। ये बिहार के कैसे हो सकते हैं! खैर, यह भरम तुरंत टूट गया। "की हाल हो। एत्ते दूर कन्ने आ गेलहो। चलो पहले चाय पी ले जाय।" मगही में एक खनकती हुई आवाज कानों में गूंज उठा तो भरोसा ही नहीं हुआ। यह अत्याधुनिक , प्रभावशाली व्यक्तित्व और यह मगही बोली..! टुकुर टुकुर देखने लगा। साथ चल दिए। जी न्यूज के ऑफ़िस के आगे चारों ओर खेत ही खेत थे। एक चारदीवारी के ऊपर प्लास्टिक देकर एक चाय दुकान चल रही थी। करीब आधा दर्जन लोग सिगरेट के धुएं के साथ चाय की चुस्की ले रहे थे। कोयले के चूल्हे पर चाय खौल रहा था और उसी अनुपात में कई लोगों का मन भी। खौलते हुए मन से लोग कांग्रेस पर उबाल ले रहे थे। मैं समझ गया। सभी पत्रकार ही होंगे..! खैर, चाय पी । फिर बातचीत हुआ। अपनी इच्छा बता दी।
"टीवी में रिपोर्टर बनना चाहते हैं।" तब पवन भैया ने बताया कि वे जी बिजनेस में है। फिर भी में मुख्य न्यूज ग्रुप में प्रयास करेंगे। खैर, वहां से लौट आया। तब से संपर्क बना हुआ है। एक यायावर है पवन भैया, इतना ही। आज पुनः दिल्ली में था। पवन भैया ने प्रेस क्लब बुलाया। मैं पहले पहुंच गया। रिसेप्शन पर बात किया। पहले से निर्देश था। मैं अंदर चला गया। गांव के रिपोर्टर के लिए प्रेस क्लब तीर्थ जैसा है। शाम ढल गई थी। प्रेस क्लब के खुले आकाश में पेड़ के नीचे कई टेबल लगे थे। लोग वहां ठीक वैसे ही आ रहे थे जैसे गोधूली की बेला में चरवाहे गाय के गले की घंटी की टुनुर टुनुर आवाज के साथ कंधे पर लाठी रख कर उसी के ऊपर दोनों हाथ रख, झूमता घर जा रहा हो। हां, एक अलग बात यह कि कई चेहरे ऐसे मुरझाए थे, जैसे शाम में सूरजमुखी का फूल। खैर, पवन भैया आए । इनके साथ भी एक व्यक्ति थे। परिचय कराया। प्रभात जी है। बेगूसराय के । फिर टेबल पर बैठे। "मांस, मछली खा हो..?" "नहीं.." मैने गर्दन डुलाया। पनीर पकौड़ा, आलू पकौड़ा इत्यादि आ गया। और फिर "दारू पीओ हो..." "नहीं..." "दुर्र महराज। तों कौन आदमी हा...प्रभाते नियर !" फिर वे अपने लिए व्हिस्की का ऑर्डर दिए। प्रभात जी और मेरे लिए नींबू शेक। शिप शिप कर चलने लगा। इस बीच कई लोगों से उन्होंने मेरा परिचय कराया। खैर, प्रेस क्लब में नए अनुभव कई हुए। पहला तो यह कि इतनी सज्जनता शराब पिए हुए आदमी को पहली बार देख रहा था। एक दम शांति से। और पहली बार सिनेमा के पर्दे से बाहर सिगरेट के धुएं का छल्ला बना कर बेफिक्र से उड़ाती हुई स्त्री को आँखें मूंद कर शराब की घूंट को गले में उतारता हुआ भी कौतूहल बस, बार बार मुड़ मुड़ कर देख रहा था। फिर दो दिन पवन भैया के यहां रुके..बाकी फिर कभी... बस..

22 अप्रैल 2026

मतलब निकल गया तो...

मतलब निकल गया तो...

महानगरीय संस्कृति में कुछ ज्यादा और वर्तमान मानवीय व्यवहार में कुछ कुछ, कहीं कहीं, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, चलन में है। 
अब पशुओं पर भी यह मानवीय अत्याचार आम है। वह भी उस पालतू के साथ, जिसने आदमी को अपना सबकुछ मान लिया। पालतू कुत्ता के साथ। दिल्ली सहित, महानगरों में यह आम है। कुत्ता को आवारा छोड़ देते हैं। कल दिल्ली के एक पॉश क्षेत्र में यह बहुत दिखा। दुख हुआ।

खैर, उसके कई कारण हो सकते है, जैसे घर, शहर बदलना, कुत्ता का काट लेना.. कुत्ता का बीमार होना, आदि इत्यादि..। तब क्या, हम जिससे प्यार करते हैं, उसे किसी भी कारण से छोड़ देना मानवता तो नहीं है..?

वह भी तब, पालतू कुत्ता अपने पालने वालों के हर खुशी का ध्यान रखता है। उसे अपना मालिक ही सबकुछ लगता है। घर आने पर वह खुशी कोई अपना भी रोज रोज नहीं दे सकता, यह देता है। घर आने का इंतजार, दरवाजे को ताकते रहना, घर आते है नितराने (झूमने) लगना। आदि, इत्यादि। पर इसे दूर से कोई समझ नहीं सकता। प्रेम करके ही प्रेम को जाना जा सकता है।

इसीलिए निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,

"होश वालों को खबर क्या,
बेखुदी क्या चीज है..."

एक निवेदन, शौक के लिए कुत्ता मत पाला करिए। किसी के कहने से भी मत पालिए। मनोरंजन के लिए मत पालिए। कुत्ता पालना एक बड़ी जिम्मेवारी है। परिवार का एक सदस्य बढ़ जाता। और परिवार के सदस्य की देखभाल , प्यार सब कुछ देना पड़ता है। वही फिर लौट कर मिलता है। 

बाकी, पालतू कुत्ते को सड़क पर छोड़ने का पाप, महा पाप है। और कुछ को देखा है, पालतू को सड़क पर छोड़ तो देते है, इसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आप नजर उठा कर देखिए, आसपास...!

इसलिए तो कबीरदास ने कहा है,

"निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय। 
बिना जीव की साँस से, लोह भसम हो जाय॥"

21 अप्रैल 2026

दिल्ली में हूं...

दिल्ली में हूं...  

(यात्रा वृतांत)

सोमवार को दिल्ली आना हुआ। कल तक के लिए। दिल्ली पहले भी आना हुआ। बीच में कई बार आया। अब दिल्ली बहुत कुछ बदल गया। आज पुरानी बातें याद आ गई।
पहले, शायद 1995 या 96 में पहली बार व्यापार के लिए आया था। पता चला था कि सदर बाजार में स्टेशनरी इत्यादि सामान सस्ता मिलता है। एक सहपाठी वहीं, एक दुकान में काम करता था। आया तो, यादें याद आ गई है।
एक छोटी झलक। जेनरल टिकट से यात्रा कर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद रिक्शे वाले से पूछा तो अनजान समझ कर अनाप शनाप पैसे मांगने लगा। एक एक पैसा कमाना, एक एक पैसा बचाना। 
तब  किसी से पूछा, सदर बाजार किधर और कितना दूर है। उसने बताया। मैं पैदल चल दिया। रास्ते में देखा सड़क के किनारे कई महिला, लड़कियां सज संवर कर खड़ी है। वे पुरुषों को इशारे से बुला रही। गांव का एक युवा को यह बेहद चौंकाने वाला लगा। फिर देखा, कुछ को तो बांह पकड़ कर लड़िकयां साथ लेकर चली गई। 

मैं डर गया। सड़क के दूसरे किनारे से सहमा सहमा जाने लगा। सड़क के दूसरे किनारे से एक महिला ने गंदा इशारा किया और गंदी गाली दी। मैं नजरअंदाज करके तेज कदमों से आगे बढ़ता चला गया। और सड़क पार कर गया। 

पूछता पूछता , सदर बाजार पहुंचा। आज भी याद है। रामअतर सिंह, स्वरूप सिंह की दुकान। बेल्ट, बैग इत्यादि । उनका स्वभाव बहुत मिलनसार था। 

मेरा सहपाठी संजय राम, वहीं स्टाफ था। देखा कि उसके साथ भी बहुत अपने जैसा व्यवहार था। मुझे अच्छा लगा। 

अब दिल्ली में मैट्रो है। कैब है। बाइक है। रिक्शा नहीं...

भीषण गर्मी में पहले भी दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी, या कम, आज भी वही। आज भी 2 रुपए गिलास पानी बिकता है। कल भी। 

छोला बटुरा पहली बार दिल्ली में खाया था। तब से जब दिल्ली आया जरूर खाता। अब नहीं। 

और हां, तब संजय राम के यहां ही ठहरा था। पहाडगांव में। 

खूब आनंददायक। मोटा मोटा रोटी, और सब्जी बनाकर खिलाता था। जमीन पर गेंद्रा बिछा कर सो जाना। और भोर...! बस, आगे फिर कभी... 


बाकी दिल्ली के कुछ अपनों से बिना वजह मिलने का प्रयास कर रहा... पर डर लगता है कि यहां के भाग दौर की जिंदगी में किसी को परेशान करना भी ठीक नहीं...


बाकी सब ठीक है...

03 अप्रैल 2026

बेटा (लघु कथा)

बेटा 
(अरुण साथी की लघु कथा)

रामदेव । आजीविका चलाने के लिए वह अपनी जवानी हरियाणा, दिल्ली, गुड़गांव में गार्ड की नौकरी करते बीता दिया। 

इसी बीच उसका इकलौते बेटा आर्मी का जवान बन गया। घूमघाम से शादी की। उम्र के ढलान पर वह  गांव आ गया। 
समय बीता। उसकी जमा पूंजी खत्म हो गई। घर चलाने का खर्च जैसे तैसे चलने लगा। रामदेव की पत्नी भी ज्यादातर बीमार रहती।
रामदेव ने बेटा से कभी कोई पैसे की मांग नहीं रखी। बेटा कभी कभी पत्नी के खाता पर कुछ पैसे भेज देता, जिससे गुजारा होना मुश्किल था।

एक दिन पत्नी के समझाने पर रामदेव में बेटा से बात की।

"बेटा, घर चलाना मुश्किल होता है। तुम्हारी मां भी बीमार है। इस माह पांच हजार भेज देता तो राहत होती।"

बेटा ने तपाक से उत्तर दिया। 

"पिताजी, 50 हजार वेतन है। एक पैसा नहीं बचता। बच्चे की पढ़ाई। घर का किराया। घर चलाने का खर्च। कई तरह का ईएमआई।"

रामदेव चुप हो गया। पर उसके अंदर कुछ टीस रहा था। उसे लगा जैसे उसकी छाती पर किसी हाथी ने अपना पांव रख दिया हो।

वह अतीत में खो गया। उसका वेतन नौ हजार महीना था। बेटा को पटना में तैयारी कराया। हर महीना 5 से 7 हजार खर्च था। किसी किसी महीना तो 10 हजार। पर उसने कभी सोचा तक नहीं। और आज उसे यह जवाब मिला...रामदेव ने डबडबाई आंखों से पत्नी की तरह देखा, उसकी भी आंखों में आंसू थे...!


14 मार्च 2026

राजगीर में साहित्य, विचार और ध्यान का अनूठा संगम

राजगीर में साहित्य, विचार और ध्यान का अनूठा संगम

ज्ञान की पुण्य धरा नालंदा, जहाँ इतिहास की स्मृतियाँ आज भी ज्ञान की ज्योति बनकर आलोकित होती हैं। उसी धरा पर स्थित राजगीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में अखिल विश्व साहित्य उत्सव का अद्भुत और अनुपम आयोजन सजा। 

चार दिनों तक चल रहे इस साहित्यिक महोत्सव में देश-दुनिया के मूर्धन्य साहित्यकारों, विचारकों और रचनाकारों ने अपने विचारों से बिहार की माटी को मानो फिर से सिंचित कर दिया। लेखक, पत्रकार, चिंतक, दार्शनिक, कवि, शोधार्थी, इतिहासकार, प्रशासनिक अधिकारी और युवा, सभी की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को एक जीवंत बौद्धिक संगम का रूप दे दिया।

इस महोत्सव का संयोजन वैशाली जी ने किया। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जिनका नाम वैशाली है, वे बिहार की नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की हैं। यह तथ्य अपने आप में इस बात का जयघोष है कि बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान आज भी देश और दुनिया के लोगों को आकर्षित करती है।
इसी समारोह में बिहार की माटी की सुगंध को अपने शब्दों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुँचाने वाले प्रखर कवि और छोटे भाई संजीव मुकेश जी के स्नेहिल आमंत्रण पर, साथी सुधांशु शेखर के साथ वहाँ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह केवल एक आयोजन में सहभागिता भर नहीं थी, बल्कि एक नई ऊर्जा, नए अनुभव और नए विचारों से साक्षात्कार का अवसर भी बनी। वहाँ उपस्थित सृजनधर्मी लोगों के चिंतन और संवाद को आत्मसात करना अपने आप में एक समृद्ध अनुभव रहा। 
महोत्सव का समापन जब ऋषिकेश के बाबा कुटानी के वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनियों के बीच ध्यान सत्र से हुआ, तो वातावरण मानो आध्यात्मिक शांति से भर उठा। उस क्षण मन अभिभूत था और हृदय में यह अनुभूति गूंज रही थी कि साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाली एक जीवंत साधना है।

08 मार्च 2026

नीतीश कुमार के बगैर बिहार

बिहार अब नीतीश कुमार के बगैर होगा। और दो दशकों तक सुशासन में जीता बिहार का सामान्य मानस चिंतित हो गया है। अब बिहार का चिंतित मानस नीतीश कुमार के बगैर बिहार में सुशासन हो सकता है, इसको लेकर सशंकित है। बिहार के चिंतित मानस में कई वर्ग है । अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सर्वाधिक चिंता बिहार की नारी शक्ति को है । नारी-सशक्तिकरण, बेटियों के जीवन में बदलाव का मानक नीतीश कुमार है। शायद ही दूसरा कोई इतना कर पाए। एक वह वर्ग है जो भाजपा शासित दूसरे प्रदेशों में वैचारिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रतिद्वंदियों का दमन देख रहा है। बिहार के समाजवादी मानस को देख नीतीश कुमार ने इसे संतुलित कर रखा था। एक वर्ग अधिकारियों का है। शासन सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार ने पजामा कुर्ता छाप नेताओं की प्रशासनिक पकड़ को थाना ब्लॉक से लेकर पटना के सचिवालय तक से खत्म कर दिया। यह वर्ग भी चिंतित है। हालांकि, इसका दुष्परिणाम भी हुआ और कई अधिकारी निरंकुशता तक चले गए। थका हारा बिहार मानस भ्रष्टाचार को सहज स्वीकार कर लिया। नीतीश कुमार के बगैर बिहार में युवा मानस भी चिंतित है। जिस स्तर पर बढ़कर उन्होंने नौकरी दी, इसके बाद युवाओं का चिंता उचित ही है। नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री से हटाने में कई किंतु परंतु हैं। परंतु स्वास्थ्य का कारण एक ठोस बहाना बताया जा रहा है। अब निशांत कुमार राजनीति में ऐसे उतर रहे हैं जैसे कोई अबोध बालक कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उतर रहा हो। निशांत कुमार राजनीति के तिकड़मी चक्रव्यूह में उस एकलव्य की तरह हैं, जिसने माता के गर्भ में अपने पिता से, युद्ध का कौशल भी नहीं सीखा है..! अब अपने कई प्रदेशों में अपने कथित चातुर्य और लोमड़ी कौशल से सत्ता हथिया कर उसे संभालने वाली बीजेपी, बिहार को कैसे संभालेगी, यह एक यक्ष प्रश्न है..। अभी जो दिखता है, वह यह है कि गुजरात का व्यापारी बिहार के मजदूरों को अपने विकास की सीढ़ी में उपयोग करना अच्छी तरह से जानता है। और उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाने वाला बिहारी मानस भी इस चातुर्य को समझता है। अब, इस महीन से अंतर में कब जरा सा इधर-उधर हो जाए , कोई नहीं जानता। शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जल बिछाएगा, हम नहीं फसेंगे... इस मंत्र को रटने वाला बिहार, जाति के जंजाल में अक्सर फंसता रहा है, परंतु धर्म के जंजाल में फंसने से अक्सर बचत भी रहा है... अब जाति और धर्म का महाजाल बिछ गया है.... बाकी सब ठीक है...पर यह ठीक नहीं है कि अब समाजवाद का अंतिम किला ध्वस्त हो रहा है और वंशवाद की राजनीति के प्रखर विरोध का भी स्वाहा हो रहा है

07 मार्च 2026

मुख्यमंत्री की रेस में मेरा भी नाम है..!

मुख्यमंत्री की रेस में मेरा भी नाम है..!

"हेलो, हेलो, हेलो, खेलावन काका बोल रहे हैं..! का हाल वा बउआ..! सब ठीक वा...।"

आज काका बड़ा बेचैन थे। पर उनके आवाज में एक अजीब सा उत्साह भी था। 
मैने कहा, "सब ठीक है काका। बस बिहार की चिंता हो रही है।"

काका बोले, "चिंता का कौउनो बात नहीं है। राजनीति में तो यह सब होता ही रहता है। सब फार्मूला फिट कर दिया गया है।"

"पर काका, यह तो जबरदस्ती है न। चाचा तो सबकुछ इस्मूथली चला हो रहे थे...?"

मैंने पूछा, "काका ई मुख्यमंत्री कौन बनेगा...? यह सवाल तो हजार करोड़ का है..! जिसको देखिए, वही किसी को मुख्यमंत्री बना दे रहा।"


काका उवाच, "बउआ, जब तक कोय मुख्यमंत्री बन नहीं जाता, तब तक के लिए किसी को भी मुख्यमंत्री बना देने से किसी को क्या दिक्कत हो सकती है। लाइक, व्यू और नोट कमाने वालों से लोग एतना जलते काहे हैं...! जलानखोर सब..."

काका ने फिर टोका, "अच्छा सुनो बउआ, क्या तुम मुख्यमंत्री बनना चाहते हो...?

"कौन नहीं चाहेगा काका, क्यों मजाक करते हैं...!"

"अरे, यह मजाक नहीं है। जल्दी से दस रुपये ऑनलाइन से भेजो...!"

काका की बात भला कौन उठाता। मैंने दस रुपये भेज दिए।

बस कुछ ही देर बाद मोबाइल में मेरे मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना का समाचार ब्रेक हो गया...! 

अरुण साथी

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05 मार्च 2026

क्या हम एक खतरनाक दुनिया में हैं, और हमें केवल खतरनाक बनाया जा रहा..?

क्या हम एक खतरनाक दुनिया में हैं, और हमें केवल खतरनाक बनाया जा रहा..?

अरुण साथी

दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर है। यह खतरा बम से बड़ा, धार्मिक कट्टरता से है। ऐसा कई विश्लेषक मानते है। अभी ईरान, अमेरिका युद्ध में भी यह दिखा। पर एक उससे भी बड़ा खतरा है, उसे सभी नजरअंदाज कर रहे। यह खतरा, सोशल मीडिया का कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। यह खतरा सोशल मीडिया का अल्गोरिथम है। यह अल्गोरिथम, बम से ज्यादा खतरनाक है। 

यह कैसे खतरनाक है, उसे समझने के लिए, आपको अपने मोबाइल के स्क्रीन को देखकर समझना होगा।

खतरा यही, आप जो देखते है। कुछ सेकेंड भी। यह अल्गोरिथम उसे पकड़ लेता है। फिर आपको वही दिखाया जाता। 

मतलब, यदि आप अमेरिका के पक्ष का वीडियो देखते है, तो यह खोज–खोज कर वही दिखाएगा। यदि आप ईरान के पक्ष का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा।

यदि आप मोदी समर्थन का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा। यदि आप विरोध देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा.. !


यदि आप एक धर्म से घृणा का वीडियो देखते है, तो आपको खोज–खोज कर घृणा का वीडियो दिखाया जाएगा। 

इतना ही नहीं, यदि आप, किसी धर्म, व्यक्ति, समाज, देश से प्रेम, सद्भाव का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाएगा। 

तब, खतरा क्या है। समझिए। इस एल्गोरिथम को गांव की घरेलू महिला से लेकर, पॉश घरों की महिलाओं ने पकड़ लिया है। इतना ही नहीं , युवती और कम उम्र की किशोरियों ने भी इसे पकड़ लिया। कैसे, तो महिलाओं को यह पता है कि पुरुष समाज कामुक है। इसमें उम्र की सीमा नहीं है। तो आपके मोबाइल स्क्रीन पर कामुक वीडियो दिखे तो इसके लिए किसी स्त्री को कोसने से अच्छा, पुरुष समाज को कोस सकते है। क्योंकि स्त्री का कामुक, उत्तेजक, या अश्लील वीडियो सबसे अधिक देखा जाता है। और इसे हम, आप देखते है। पर इसे दिखाने वाला एल्गोरिथम ही है ।।



बस यही खतरा है। यह एक पक्ष को दिखाता है। केवल एक पक्ष। अब इस बजह से यदि आपका मन घृणा, हिंसा, कामुकता देखना पसंद करता है तो अल्गोरिदम खोज–खोज कर उसे दिखाता है। 

और तब हमारा मन यह मान लेता है कि दुनिया बहुत बुरी है। कोई धर्म, समाज, स्त्री बहुत बुरी है। तब हम हर पक्ष का केवल एक पक्ष देखते है। 

और इसका दुष्परिणाम भी सामने आ रहा। समाज टूट रहा है। परिवार टूट रहा है। अपने ही अपनों को मौत दे रहे हैं।

क्या इससे बचना संभव नहीं है..? क्योंकि करोड़ों का पैकेज लेने वाले हमें इसी जाल में फंसाने के लिए लगे है!


संभव है, हम चाहें तो बच सकते है! हम अच्छा देखें, प्रेम देखें, सामाजिक और धार्मिक सद्भाव देखें। फिर हमें वहीं दिखेगा। और हमें लगने लगेगा, दुनिया अच्छी है। इसके लोग अच्छे है..


अंत में निदा फ़ाज़ली की यह गजल सब कुछ कहती है,
**"

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया

चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी
जैसी तुम्हें दिखाई दी है सब की वही नहीं है दुनिया

घर में ही मत उसे सजाओ इधर उधर भी ले के जाओ
यूँ लगता है जैसे तुम से अब तक खुली नहीं है दुनिया

भाग रही है गेंद के पीछे जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से अब तक डरी नहीं है दुनिया

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03 मार्च 2026

महामूर्खों की एकजुटता के नाम एक विशेष संदेश

महामूर्खों की एकजुटता के नाम एक विशेष संदेश 

(अरुण साथी, महामूर्ख सम्मेलन का स्वागत भाषण जिसे बुद्धि वालों के द्वारा जानबूझ कर पढ़ने का मौका नहीं दिया गया. )
महामूर्ख सम्मेलन में आए हुए सभी सम्मानित मूर्खों का हम हृदय से अभिनंदन करते हैं । बंदन करते हैं। नंदन करते हैं। चंदन करते हैं।
जैसा कि हम सबको मालूम है कि अभी पृथ्वी से मूर्खों की संख्या में बहुत कमी आ रही है और मूर्खों की प्रजाति विलुक्ति के कगार पर पहुंच गया है।
ऐसे में हम सब की महति जिम्मेवारी बनती है कि मूर्खों के विलुप्ति के कगार से बचाने के लिए मूर्खों की संख्या में लगातार वृद्धि को लेकर हम सब सतत प्रयास करें।
आज जहां डिजिटल और सोशल मीडिया का युग है वहीं अब कृत्रिम मेधा का भी युग आ गया है। ऐसे में अब मूर्खों के लिए कहीं भी कोई स्पेस नहीं बच रहा है।
यह युग हम मूर्खों के लिए बेहद ही खतरनाक है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया की बात करें तो यहां जितने भी लोग अपने-अपने पोस्ट देते हैं उनको देखकर हम सब समझ रहे हैं कि सभी विद्वान, सभी गुनी, सभी सत्यवादी, सभी सत्य निष्ठ और सभी संत, महात्मा, विद्वत जन ही सोशल मीडिया पर हैं। 


ऐसे में हम सब मूर्खों को भी अब सोशल मीडिया पर मूर्खतापूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए ताकि हम लोगों की उपस्थिति भी वहां दर्ज हो सके।

जैसा कि आप लोगों को मालूम है कि आज ही इस दुनिया के सर्वशक्तिमान और सर्वाधिक बुद्धिमान हड़ंप महाराज के द्वारा तेल के खेल में बिना ताज वाले किताबी दुनिया बनाने वाले  खरीफा सहित कई खरीफो की जान ले ली। इतना ही नहीं, इस पृथ्वी के बुद्धिमान प्रजाति में से एक रसिया  के राजा  और पड़ाेसी के बीच चार साल से चल रहा युद्ध भी आदमी के बुद्धिमान होने का परिचय दे रहा है।

दुनिया के कई देशों के बीच बुद्धिमान आदमी, बुद्धिमान आदमी से लड़ रहा है। 

अपने देश में भी आजकल बुद्धिमानों की संख्या बहुत बढ़ गई है। कई जगह बुद्धिमान लोग अपनी (अ)धार्मिक बुद्धिमत्ता से (अ)धर्म के नाम पर जान ले रहे हैं।
 कई जगह इसी बुद्धिमान की श्रेणी में आने वाले लोग जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, रंग के नाम पर भी जान ले रहे हैं।
ऐसे में हम मूर्खों को एकत्रित होकर, संगठित होकर और मजबूती से कार्य करना होगा, ताकि हम लोग हमेशा मूर्खतापूर्ण काम करते हुए आपस में प्रेम और भाईचारा बनाकर रखें।धर्म, जाति, भाषा, रंग के नाम पर हम किसी की जान न लें।

25 फ़रवरी 2026

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?


हम अपने अहंकार को देख सकते हैं। समय समय पर अहंकार, ज्वारभाटा की तरह उठता है। और डुबो देना चाहता है। आदमी के स्व को। हम कोशिश करें तो इसे बड़ी सहजता से देख सकते है। या कहें कि हम सब देख कर भी अनदेखा कर देते है। 
जैसे, किसी समारोह में अगली पंक्ति में बैठने का अहंकार। जैसे, किसी आयोजन में मंचासीन होने का अहंकार। जैसे, किसी सम्मान समारोह में सम्मान पाने का अहंकार। और इस अहंकार पर विजय पाना बड़ा कठिन है । 

अहंकार केवल धन, बल का ही नहीं होता। अहंकार तो ईमानदारी, सच्चाई, ज्ञान और प्रतिष्ठा का भी होता है। और यह सबसे विषैला अहंकार है। मैं भी अपने अहंकार को रोज रोज देखता रहता हूं। मुस्कुराता रहता हूं। साक्षी भाव से। इतना करना भी ध्यान में उतरने जैसा है। 

अहंकार शून्य आदमी होना संभव नहीं है। या तो वह संत होगा, या पागल...। 


दो दिन पहले यह अहंकार शून्य आदमी मिला। यह पागल था या नहीं। कहना मुश्किल....

रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....


रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन मेरे लिए सचमुच एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। पहली बार इस प्रकार का ओजस्वी और भावप्रवण प्रस्तुतीकरण देखने का अवसर मिला, जिसने मन और चेतना दोनों को आलोकित कर दिया।
जब छात्राओं ने ‘रश्मिरथी’ की पंक्तियों को अपने स्वर दिए, तो प्रतीत हुआ मानो उनकी जिह्वा से ऊर्जा का कोई प्रखर स्रोत फूट पड़ा हो, जो उपस्थित प्रत्येक दर्शक के हृदय में उत्साह और स्पंदन भर रहा हो। सभागार में एक अद्भुत निस्तब्धता छा गई। दर्शक मंत्रमुग्ध रहे।

अवसर था बरबीघा स्थित डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल के वार्षिकोत्सव का, जहाँ इस काव्य-नाट्य मंचन ने कार्यक्रम को गरिमा और गौरव प्रदान किया।

मित्र सुधांशु शेखर की रचनात्मक कल्पनाशक्ति और लीक से हटकर कुछ करने की अदम्य आकांक्षा ने इस प्रस्तुति को संभव बनाया। विद्यार्थियों का अभिनय अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली रहा। वस्त्र सज्जा ने मानो महाभारत के युग को साकार कर दिया हो। संवाद-अदायगी सशक्त, संतुलित और हृदयस्पर्शी थी।
इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए सभी संबंधित जनों के प्रति हृदय से आभार और अभिनंदन।

अरुण साथी 

18 फ़रवरी 2026

ब्राह्मणवाद से आजादी...!

ब्राह्मणवाद से आजादी...! 


( दलित चेतना और सवर्ण भाग 4)

आज गजाधर चट्टोपाध्याय (राम कृष्ण परमहंस) की जयंती है।  अभी नव ब्राह्मणवादी, नव सामंतवादी और नव प्रतिक्रियावादी प्रतिशोध ले रहे। इसके पीछे इतने सालों का शोषण, दमन कारण बताया गया। रटाया गया। और आज भी रटाया जा रहा। अनुभव कहता है कि यह मिशनरियों इत्यादि के द्वारा प्रायोजित और आर्थिक पोषित अभियान का दुष्परिणाम है। 

अब  राम कृष्ण को देखिए। माता काली का दक्षिणेश्वर मंदिर रानी राजमती ने बनाया। अब उस मंदिर में कोई ब्राह्मण पुजारी बनना नहीं चाहते थे। कारण कि रानी एक शूद्र थी। तब एक ब्राह्मण ही आगे पुजारी बन कर समाज के लिए संदेश दिया। वे थे राम कृष्ण में बड़े भाई..! फिर राम कृष्ण भी बने।

राम कृष्ण परमहंस ने तो अद्वैत वेदांत व्यवहार में उतार कर संदेश दिया। सभी में एक ही ईश्वर।

इतना ही नहीं, राम कृष्ण तो ईसाई, इस्लाम इत्यादि धर्म को भी अनुभव उतार कर संदेश दिया , यतो मत, ततो पथ। रास्ता कोई हो, ईश्वर एक । 

12 फरवरी को स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती थी। इन्होंने भी वेद को ही सत्य माना। पाखंड, परंपरा को तोड़ा। खत्म दिया।

अब मूल बात। दोनों ब्राह्मण थे। तो बस इतना। भेदभाव, छुआछूत, असमानता, गैर बराबरी नहीं थे, ऐसा नहीं है। पर इसके विरुद्ध लड़ाई ब्राह्मणों ने भी लड़ा । सवर्णों ने भी लड़ा। आज इन जैसों को खारीज कर दिया गया। दुख इस बात का है..बस..

02 फ़रवरी 2026

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण 

(अरुण साथी)

भारत सरकार ने अलौकिक बजट पुनः जारी किया। इसकी अलौकिकता न्यारी है। आम आदमी की समझ पर यह भारी है। लौकिक ज्ञान से परे अलौकिक ज्ञान जरूरी है। अतः, इसे अच्छा या खराब मान लेना ही बुद्धिमत्ता है। 

साधारण सी बात है। जो विपक्ष में है, वे इसे बेकार बजट बता रहे। जो पक्ष है, वे इसे साकार बजट बता रहे। इस पक्ष, विपक्ष में आम आदमी चक्कर खा रहा। उसे समझ ही नहीं आ रहा कि क्या समझे। 


अब देखिए, दीदी ने समझाया । यह दलित , महिला, ओबीसी, किसान, युवा विरोधी बजट है। तब खेलावन काका पूछ रहे।


"अरे, तब यह बजट सरकार ने अपने लिए लेकर आई है क्या..?"

तब इसको लेकर मुनि नारद ने ज्ञान दिया।

" देखो वत्स, यह अलौकिक है। फिर भी इसमें सार तत्व को समझ कर इसकी विशालता और व्यापकता को समझा जा सकता है। जैसे समझो । बजट में बच्चों को स्कूल में अब डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें अब बच्चे अपने स्कूल में मोबाइल से रील बनाना सीखेंगे। फिर देश तेजी से आगे बढ़ेगा। उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से देश में बुलेट रेल चल रही। और उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से  देश में स्मार्ट शहर बन रहे। समझे कि नहीं।"


काका कहां चुप रहने वाले। बोले, 

"मुनिनाथ । हमलोग तो बच्चों को रील बनाने से रोकते है। इसे अच्छा नहीं मानते।"

"यही तो लौकिक बातें है। पर समझो। तुम लोग बच्चों को क्यों पढ़ाते हो..? इसीलिए कि वह पढ़ लिख कर कमाई करे! अब इस बार चुनाव में सरकार ने प्रति वर्ष 2 करोड़ को नौकरी और रोजगार देने का वादा किया।"


"यह वादा इसी से पूरा होगा। अभी सर्वाधिक कमाई का साधन मोबाइल है। रील बना कर लोग प्रति महीना लाखों कमा रहे। इसमें कौशल की जरूरत है। हालांकि महिलाओं के लिए कोई कौशल आवश्यक नहीं है। पर पुरुष जबतक कौशल प्राप्त नहीं करेंगे तबतक इस क्षेत्र में कमाई मुश्किल है। इसी उद्देश्य से बच्चों में डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण आवश्यक है।"


अब काका चुप हो गए। मन ही मन सोचें। 

"मोदी अनंत, मोदी कथा अनंत,
यही गुणगान करे सब असंता...!"

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

यह 5 जनवरी की बात है। सुबह सुबह दरवाजे पर किसी ने आवाज लगाई। 

"बबलुआ, बबलुआ...!"

 बाहर निकला तो देखा इंदल मांझी की माय खड़ी थी। 

पूछा, "की होला"। 

बोली, "फटीचन मर गेलो !"

"कैसे ..?"

"बीमारी से"

"तब, हम की करियो..?"

"कुछ पैसा दहीं, कफन आदि खरीदे ले पैसा नै है... जरावे के लकड़ी के पैसा मिठ्ठू सिंह दे देलकै हैं...!"

मेरे पास नगद कुछ नहीं था। मैं बाजार गया। रितेश को ऑनलाइन भेजकर  नगद लिया। फिर आकर दे दिया। यह चुपचाप हुआ।  

यह एक बहुत लघु प्रसंग है। सार्वजनिक करना निश्चित ही सही नहीं है। पर वर्तमान में जातीय भेदभाव का विषवमन ऐसा है कि केवल सवर्ण होने भर से उसे शोषक बता कर प्रताड़ित किया जा रहा।  मेरा जन्म भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ। परंतु आर्थिक अभाव में वेदना ही सही है।

खैर, मेरा मानना है कि समाज में अच्छे, बुरे लोग हमेशा रहें है। पर अभी प्रायोजित तरीके से सवर्ण के विरुद्ध घृणा फैलाई जा रही। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वंचितों का शोषण नहीं हुआ। दमन नहीं हुआ। अथवा आज भी शोषण, दमन नहीं हो रहा। पर इसका मतलब यह है कि समाज में शोषक केवल जाति से निर्धारित नहीं है। यह एक नीच मानसिकता है। 


आज के समय में समाज को जोड़ने के छोटे छोटे प्रयासों की चर्चा अति आवश्यक है। समाज में रोज रोज ऐसे पहल होते है। समाज को जोड़ने का प्रयास होता रहा। होता रहेगा। 

जारी है..

01 फ़रवरी 2026

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

(दलित चेतना और सवर्ण)

अरुण साथी

पुण्य तिथि पर बिहार केसरी डॉ श्री कृष्ण सिंह को जन्म भूमि (माउर) जाकर नमन किया। अभी चुनाव नहीं है, इसलिए कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। फिर जगह जगह प्रतिमाओं पर लोगों ने माल्यार्पण किया। पुष्पांजलि की। आज के दौर ने बिहार केसरी ज्यादा प्रासंगिक हो गए। अभी महापुरुषों को जातियों में बांट दिया गया है।  श्री बाबू के साथ भी यही हुआ। भूमिहार ब्राह्मणों के कुछ नेताओं ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए यह किया। उनका स्वार्थ सध गया। समाज का नुकसान हो गया। हालांकि बड़ा वर्ग नेताओं के साथ नहीं गया। 
खैर, अभी सोशल मीडिया पर दलित विमर्श और दलित चेतना के नाम पर अर्ध सत्य को प्रसारित कर समाज को बांटने की बड़ा षडयंत्र हो रहा। और समाज बंट भी गया है। दलित वर्ग में सवर्णों के प्रति ऐसा विष बोया गया है दलितों का बौद्धिक वर्ग भी प्रतिशोध ले रहा..! 

1990 का मंडल आग एक बार फिर यूजीसी के बहाने, सुलगाने का प्रयास हुआ। और यह सुलग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर विराम लगाने की पहल की है पर नेताओं के द्वारा इस आग को हवा दी जा रही। 
नेताओं को पता है कि जब तक समाज जलेगा नहीं तब तक उनको कौन पूछेगा...? दुर्भाग्य से इस बार कमंडल वालों ने यह खेल कर दिया है।

हालांकि एक सकारात्मक बात यह हुई इस बार कुछ दलित और ओबीसी ने इसका खुल कर प्रतिरोध किया।  बकाई सोशल मीडिया पर विष वमन कर रहे...!

अब यूजीसी का बवाल थोड़ा शांत हुआ है। पर इसमें कई प्रश्न उठे है। 
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या समाज से भेदभाव, छुआछूत मिटाने की लड़ाई केवल दलितों के नेताओं , समाज सुधारकों ने लड़ी ...? क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

तो ऐसा नहीं है। संत रैदास, संत कबीर, संत तुकाराम इत्यादि के साथ साथ आदि शंकराचार्य , दयानंद सरस्वती , स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले इत्यादि लंबी सूची है। कईं बड़े नेताओं ने संघर्ष किया।

श्री बाबू ने दलितों को देवघर मंदिर में प्रवेश करा कर भेदभाव के विरुद्ध बड़ी लकीर खींची थी। वहीं जमींदारी उन्मूलन कर समाज में बराबरी की पहल की। दोनों मामले में उनके स्वजातीय उनसे नाराज हुए थे। श्री बाबू को तिरस्कार झेलना पड़ा था...
समाज में बराबरी की पहल समाज में नीचे के स्तर पर  भी हुआ है ।  और गैर बराबरी का विष दलितों का दलितों से भी है। दलितों का पिछड़े से भी है। और तो और ब्राह्मणों का ब्राह्मणों से भी है....लगातार प्रमाणिक रूप से इस पर लिखना शुरू कर रहा हूं...यह कॉलम जारी रहेगा....

(दलित चेतना और सवर्ण)