19 नवंबर 2016

कालाधन का मीडिया अर्थशास्त्र और छुटभैय्या रिपोर्टर

नोटबंदी ने एक बार फिर पत्रकारिता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अंधभक्ति और अंधविरोध। चैनल पे यही दिखता है। मैं एक ग्रामीण रिपोर्टर हूँ। गांव-देहात का रहने वाला, छुटभैय्या रिपोर्टर। मेरी बात को स्पेस कहाँ मिलेगी। फिर भी अपना अनुभव लिख दे रहा हूँ, शायद कुछ नजरिया बदले।

आठ तारीख की रात जब नोट बंदी हुयी तो उसी रात 60 बर्षीय शम्भू स्वर्णकार (बरबीघा, बिहार) का निधन हो गया। सुबह मुझे भी जानकारी मिली। मैं छानबीन कर ही रहा था कि एक टीवी ने ब्रेक कर दिया, नोट बंदी से स्वर्ण व्यवसायी का दिल का दौरा पड़ने से निधन!! मैंने जानकारी जुटाने के लिए उसके एक पड़ोसी मित्र को कॉल किया तो वह भड़क कर कहा "भाई वह एक गरीब आदमी है, उसके पास 100/50 नहीं तो 500/1000 का नोट बंद होने से उसे कैसे दिल का दौरा पड़ेगा! तुम मीडिया वालों को तो अब जूते से पिटाई होगी।"

खैर, फिर मैंने एक स्वर्ण व्यवसायी से संपर्क साधा तो वह भी भड़का हुआ था। कहा कि वह सोना जोड़ने का काम करनेवाले कारीगर और मेरा 350 रुपये उधार सौ तकादा में नहीं दिया। उसके बेटे ने भी इसे खारिज कर दिया।अख़बार ने खबर दी "स्वर्ण व्यवसायी की मौत की नोट बंदी से होने की उडी अफ़वाह!!!"

समझिये, नोटबंदी का असर मकान बनाने वाले दिहाड़ी मजदूरों पे कितना पड़ा इस खबर को बनाने  लिए मैं अपने यहाँ मजदूर मंडी गया। लगा की यहाँ तो विपत्ति होगी, वैसा कुछ नहीं मिला। ज्यादातर मजदूर काम पे चले गए, कुछ बचे तो लगा की इनसे ही खबर बना लेता हूँ, पर देखिये, एक बुजुर्ग बयान देने लगे की नोट बंदी की मार पड़ी है और काम नहीं मिल रहा तभी बगल से एक मजदूर भुनभुनाया "ई रिटायर्ड माल हैं सर, कौन काम देगा।" मैं लौट आया। हालाँकि थोड़ा असर मजदूरों पे हुआ ही है, जैसा की लाजिम है पर बकौल मजदूर सब एडजस्ट हो गया है। 500 का नोट 400 में साहूकार ले लेता है।

मैंने पहले भी कहा है "नोटबंदी का अर्थशास्त्र मैं नहीं समझ पाता। तात्कालिक परेशानी थोड़ी है पर लोगों के माथे में यह बात बैठ गयी है कि यह देशहितार्थ है, सो तकलीफ झेल लेंगे। गरीब भी खुश है कि यह अमीरों को मार है।

हाँ, यह भी निश्चित है कि कुछ लोग है ही जो वास्तव में परेशान है। वो बोलते है। उनकी आवाज भी उठती है पर नोटबंदी पे एकबार फिर मीडिया (चैनल) कठघरे में है। इसे आमलोगों में वायरल इस जुमले से समझा जा सकता है कि "नोटबंदी से ndtv पे लोग मर रहे है! आजतक पे थोड़े परेशान है! जी न्यूज़ पे लोग खुश है!!

मेरे जैसा छुटभैय्या रिपोर्टर सबकुछ समझ भी नहीं सकता! मीडिया हॉउस का अपना अर्थशास्त्र है। कालाधन का। निश्चित ही यह उसपे भी प्रहार है। कई न्यूज़ चैनल तो बिल्डरों और माफिया के पैसे से चमक रहा है सो उनको क्यों ख़ुशी होगी? बाकि राजनीति है, मीडिया हॉउस का अपना अपना। कुछ मीडिया मर्डोक भी है। पर देश आम आदमी की ताकत के चलता है, चलता रहेगा..नोटबंदी भला है या बुरा यह भविष्य की गर्त में है..पर नेताओं की बौखलाहट आम आदमी की ख़ुशी बन गयी है..बाकि एकरा से जादे माथा हमरा नै हो..राम राम जी।

15 नवंबर 2016

मोदी डाल-डाल तो कालाधनी पात-पात, देखें कौन किसको देता है मात! "कालाधनी" ने खोजा चोर दरवाजा, आम आदमी को लाइन में लगाया!

मोदी डाल डाल तो कालाधनी पात पात, देखें कौन किसको देता है मात!

"कालाधनी" ने खोजा चोर दरवाजा, आम आदमी को लाइन में लगाया!

"अरुण साथी"

विपक्ष का यह तर्क की कालाधन वाले कहीं लाइन में नहीं है? आम आदमी ही लाइन में है। विपक्ष यही आम आदमी से मिलकर यह बयान देता तो शायद बात उलटी होती। आम आदमी कष्ट के बाद भी खुश है, अपवाद छोड़कर। ऐसा है क्यों..?

बैंक के लाइन में लगे गरीब-गुरबा लोग गुस्सा दिखाते है पर अंत के यह कहके खुश हो जाते है कि कालाधन वापस आएगा..तो देश मजबूत होगा! हालांकि आम आदमी मेरी ही तरह अर्थशास्त्री नहीं है पर उनको लगता है इससे कालाधन निकलेगा..। और उसी लाइन में वह वे दिहाड़ी मजदूर भी है जिनको कालाधनी लोग दिहाड़ी देकर नोट बदलने के लिए लाइन में लगा दी है। बैंकों में कोलाहल हल्का हुआ..! लोग स्वीकार कर चुके है।

खैर
कालाधन के बड़े बड़े मगरमच्छ कालाधन को खपाने का चोर दरवाजा खोज लिया गया है। हो सकता है इसी बहाने कालाधन सफ़ेद हो जाये। बड़े बड़े मगरमच्छ टैक्स सलाहकार से चोरी का उपाय पूछ रहे है। इसी उपाय के तहत अब बड़े बड़े कंपनी, कारखानों के मालिक अब अपने मजदूरों को एक साल या छः माह की सैलरी कैश में दे रहे है। बिहार के कई मजदूरों के परिजन गांव में खुश है। कुछ "कालाधनी" मजदूरों को दिहाड़ी देकर पैसे को बदलने के लिए भेज रहे है।

बृद्धाश्रम छोड़ आए माँ का आदर बढ़ गया और उनके खाते में नोट जमा हो गए, यह आश्चर्य नहीं तो क्या है?

बड़े बड़े कालाधनी नेता-मंत्री भी चोर दरवाजे से कालाधन खपा रहे है। रिश्तेदार, व्यवसायी, और विश्वसनीय कार्यकर्ताओं को पैसे का बंडल थमाया जा रहा! इसका अर्थशास्त्र पर क्या असर होगा और कालाधन वापस आयेगा या सफ़ेद होगा, मेरा माथा काम नहीं करता।

मेरे यहाँ भी कालाधनी नेता कालाधन खपाने के लिए निरीह जनता को मोहरा बना लिया है। उनको दिनभर की मजदूरी दी जाती है और बेचारा आम आदमी लाइन में लगकर 4000 का कालाधन सफ़ेद कर आ जाता है। कुछ अपने खाते में लाख भी जमा कर रहा है, बाद में निकाल कर देने के भरोसे..।

आम आदमी को इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह पैसा उनके ही चूसे खून का है, सो श्री मान बड़े बड़े नेता जी जिस भीड़ का आप हवाला दे रहे है वह आपका ही लगाया हुआ भीड़ है। जो आम आदमी भीड़ में दिख रहा है वह आपने भी जमा किये है..!

कुछ मगरमच्छ खुलेआम 20 से 40 प्रतिशत पे कालाधन खपाने में जुट कर मोटी कमाई कर रहे है। उधर एक विश्वस्त व्यपारी की माने तो चना दाल की कीमत पर लगाम लगाने के लिए जब मोदी जी विदेश से दाल निर्यात किया तो भाव तो गिरे पर कालाबाजारी फिर उस दाल को कालाधन से कालाबाजार में जमा कर लिया, मोदी जी को उसी समय कालेधन की माया समझ में आ गयी।

फिर भी, कालाधन का यह अर्थशास्त्र आम आदमी नहीं समझ पा रहा। आम आदमी ने मोदी जी की बात पे भरोसा किया है। यह भरोसा टूटेगा या रहेगा, भविष्य की गर्त में है।

14 नवंबर 2016

जय की स्टाइल में बीरू की टांग खिंचाई

एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में अपने मित्र को जोड़ने के बाद उनका परिचय जय के अंदाज में कराया..एक स्वस्फूर्त व्यंग्य.. पढ़िए..
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नए साथी का परिचय पत्र साथी की तरफ से।
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श्रीमान अभय कुमार, सकलदेव नगर, बरबीघा निवासी। हाल-मुकाम कटिहार।

पेशा- दूसरे की मौत का भयादोहन करने वाले वाले गिरोह का सरदार*

लक्षण- आदमी के बहुत कम लक्षण है पर आदमी का सबसे बड़ा गुण, पैसे का पीछा शौचालय से लेकर शयनकक्ष तक करने का गुण विद्यमान।

श्री गदर्भ जी महाराज के सभी लक्षण प्रचुरता से विद्यमान। जैसे की ढेंचू ढेंचू भाषा का प्रकांड विद्वान होना। दुलत्ती मारने का प्रशिक्षण जारी है पर अभी तक दुलत्ती मारना सीखे नहीं है।

दांत निपोड़ने के गदर्भ कला में पारंगत। और हाँ लीद करने की कला भी आती है इसलिए आसान नसमझें... और यह कि इनकी भी श्रीमती ( श्री देवी नहीं ) से फटती है..यानि यह दूसरा गुण भी गदर्भ और आदमी के सामान्य रूप से समान है। 

और यह की (दीन) दुनिया से निश्चिन्त है। अपने "काम" को सर्वाधिक प्राथमिकता देते है। पठन कला में माहिर है पर गदर्भ योनी की वजह से यह कला भी बिलुप्त हो गयी।

और हाँ, मेरे मित्र है, फेसबुक फ्रेंड नहीं , सो संभल के कमेंट करिएगा..

और अंत में ये कहीं भी कभी भी सु सु कर सकते है...और श्री मान एसबीआई लाइफ नमक धोबी के गधे है सो आगे आप समझ ही जाईयेगा..

कम लिखना अधिक समझना आपकी परंपरा रही है। बाकी गुण से मैं अभी तक अपरिचित हूँ सो आप लोग खोज ही लीजियेगा..

*(sbi life बीमा कंपनी में मैनेजर)

अरुण साथी का शोले वाली मैसी के सामने जय वाली स्टाइल में अपने मित्र का एक परिचय..अब आपकी बारी है..

08 नवंबर 2016

पत्रकारिता मरी तो लोकतंत्र भी मर जायेगा...

Ndtv पे प्रतिबंध हटाये जाने से कुछ लोग खुश है और कुछ दुखी।  ndtv पे एक दिन का प्रतिबंध लगाए जाने से बहुत लोग बहुत खुश भी थे।

स्वाभाविक है, कुछ लोग गुजरात दंगे पे आज भी खुश होते है। खैर सबकी अपनी-अपनी मानसिकता है। हाँ थोड़ा दुःख है कि कुछ पत्रकार मित्र भी ndtv पे बैन से खुश थे। (सरदाना को पत्रकार नहीं कहा जा सकता..)
कुछ बातें कहने से पहले यह साफ़ कर दूँ की मैंने बैन का विरोध किया, इसका मतलब यह नहीं कि एनडीटीवी के पूर्वाग्रही पत्रकारिता का समर्थन करता हूँ। मैंने कई बार ndtv और रविश कुमार की पत्रकारिता की आलोचना की है।

खैर, कुछ लोग कहते है कि यह एक सहज प्रतिबंध था, मीडिया का आपातकाल नहीं! सही कहते है। यह मीडिया का आपातकाल नहीं था, यह आपातकाल का एक छोटा सा प्रयोग था। राष्ट्रवाद की चाशनी में लिपटी हुयी। यह प्रयोग जन  दबाब में असफल हुआ। भारत यही है। विश्व में भारत का मान इसी से है। भारत सेकुलर राष्ट्र इसलिए है कि भारतीय (बहुसंख्य) सेकुलर है।

खैर, आज ndtv को पूर्ण बैन करने की मांग करने वाले भी बहुत है, होंगे ही। वही लोग बैन के खिलाफ लिखने पे ट्रोल कर रहे थे। स्वाभाविक है उनको ये बाते अच्छी नहीं ही लगेगी। उनके लिए जी न्यूज़ सर्बश्रेष्ठ है पर यही यदि काँग्रेस की सरकार उस समय जी न्यूज़ पे बैन करती तो शायद प्रतिक्रिया यही होती, जो मेरी थी।

एक बात और साफ कर दूँ कि बहुत लोग पत्रकारिता पे प्रश्नचिन्ह लगा रहे है, लगनी भी चाहिए। यह हमारी उदारता है कि हम समाज तो गन्दा रखेंगे और दूसरे से इसे साफ़ रखने की उम्मीद! फिर भी मैं इस राय का हूँ कि लाख पतन के बाद भी पत्रकारिता अभी जिन्दा है। जिस दिन पत्रकारिता मरी, उसी दिन देश में लोकतंत्र मारेगा।।

दूसरी बात यह की बैन के बहाने न्यूज़ चैनलों को आत्ममंथन का अवसर मिला है। ndtv बिलाशक पूर्वाग्रही पत्रकारिता करती है। रविश कुमार को नरेंद्र मोदी से नफरत है, यह कैमरे के सामने दिखता है। ठीक उसी तरह जैसे जी न्यूज़ वाले प्रवक्ता पत्रकारिता करते है। सरदाना का मोदी भक्ति कैमरे से सामने मुखर होता है। आज हम कह सकते है कोई मीडिया हॉउस विश्वसनीय नहीं है। कोई इसके तो कोई उसके सापेक्ष है। निरपेक्ष कोई नहीं।

रामनाथ गोयनका अवार्ड देते हुए प्रधानमंत्री ने एक तीखी बात कही थी। उन्होंने कहा कि आज भारतीय मीडिया विश्वसनीय नहीं है। इसके लिए लोग विदेशी मीडिया हॉउस की तरफ देखते है, हमें विश्वसनीय बनना होगा। आज के सन्दर्भ में शायद ही यह हो।

और अंत में
आखिर ऐसा क्यों है कि आज पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ने पे वह लोग हंगामा नहीं करते जो मनमोहन के समय में करते थे! सर्जिकल स्ट्राइक पे तो सभी लोग सीना छपन्न कर लिया पर आज भी रोज जवान शहीद हो रहे तो छाती पिचुक क्यूँ नहीं जाती...! आज भी तो दाल मंहगी है...फिर ॐ शांति क्यूँ? मतलब साफ है, आप भगवा पार्टी के प्रवक्ता है...आम आदमी नहीं...!

(ख़बरदार जो किसी ने आम आदमी के नाम से केजरीवाल का नाम जोड़ा, खून पी जाऊंगा।।। श्रीमान अभी करोड़ों से खेल रहे है)

(नोट:- पोस्ट पे अपनी राय दें, ट्रोल न करें। वैसे ट्रोल वालों को रविश ने कहा था "ओ आप ट्रोल है। नेताजी का लठैत।")

06 नवंबर 2016

छठ की जिम्मेवारी का स्थान्तरण


माँ की जिम्मेवारी बंदरी ने ले ली है। बड़ी जिम्मेवारी है छठ व्रत करना। इस साल पहली बार अर्धांगनी रीना ने यह जिम्मेवारी ली है और छठ कर रही है। माँ दमा की मरीज थी सो तीन साल पहले से ही छठ करना बंद करा दिया। इस साल रीना स्वयं छठ कर रही है।

हमारे लिए छठ अभी तक ग्लैमराइज़्ड नहीं हुआ है। हमारे लिए यह एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है। माँ जब तक छठ की, उसकी कई यादें है। चूल्हे की मिट्टी, गोइठा के लिए गोबर इत्यादि आना। प्रसाद से लेकर अन्य कार्य में हाथ बंटाना। खैर अब यह जिम्मेवारी बंदरी के जिम्मे है। बच्चे माँ के साथ उसी तरह है।
ऐसा लग रहा है जैसे सबकुछ पूर्व निर्धारित हो..।

आध्यात्मिक अनुष्ठान के इस अनुभूति के बीच मालती पोखर तालाब में सेल्फी ली और स्नान करने के बहाने दूर तक तैर लिया। प्रत्येक साल इसी तालाब में तैर लेता हूँ। लगता है कहीं भूल न जायूँ....जय छठ मईया।।

बागों में बहार है, प्रजातंत्र बेकार है..

बागों में बहार है, प्रजातंत्र बेकार है
(अरुण साथी)

गजबे बात हो, खेलाबन काका आज भारी गरम हका!! कहे..कि गांव के चंदू चाचा के दालान पर जे चौकड़ी लगल हे, ओकरा में नायका लड़का सब गर्गदह मचईले हल। सब नमो नमो के जय जय करो हल। खेलाबन काका धान काट के आ रहला हल। हाथ में हँसुआ अ माथा पर हरियर धान। फुदकना टोक देलक-

"का हो काका, नाइकी बहुरिया के नाईका चूड़ा खिलाबे के जोगाड़ कर देल्हो..?"

सब के पता हल काका भड़क जईता "तोहर बाप के की लगो हाउ।" ऊ बोझा पटक के भांजे लगला।।

खैर, इहे बीच हाथ में टीवी वाला मोबाइल लेले, पॉकेटमार काट बाल कटइले। (जिसे विराट कट आज कहा जाता है वह पहले पॉकेटमार के पकड़े जाने पे इसी तरह आधा माथ मुड़ा दिया जाता था) मसुदना के लफुआ बेटा गरजे लगल।

"ठीक होलो, ई पाकिस्तानिया चैनल पर इमरजेंसी लगा देलक। जब खोलहो त विरोधे में बोल रहल हें। भला बोलहो! ई कउनो बात होल। विरोधे करे के हो त राजनीति करहो, न्यूज़ चैनल काहे..!!

इतनै में झपुआ टोक देलक "हम तो कहो हियो ई इमरजेंसी ठीके हइ। ई सब ऐसे सुधरे वाला नै हो। चौहत्तर में जे इमरजेंसी लगल हल सुनो हूँ बड़ी अच्छा हल। भ्रष्टाचार बंद। अपराध बंद। केकर मजाल जे खोंख दे, तुरंत अंदर...।"

खदेड़ना बोल बैठल "एनकाउंटर सही हो तब सलाम, फर्जी हो तब लाखों सलाम। ई देश में एसहि कर दहो सबके काम तमाम।"

"हाँ हो, से तो ठीके कहलहीं, ई देश में बड़ी उमताहा सब बैठल हई। कोई पाकिस्तान जिंदाबाद करो हई, कोई भारत के टुकड़ा करो हई। मने जेकर जे मर्जी करे लगो हई। भला बोलहो ई कौन बात होल। ई देश के सुधार करे ले हिटलर के जरुरत है, फाइनल।।"खेसारी भी बोल देलक।

इतनै में काका टोक देलका
"चार दिन के लौंडा ससुर, इमरजेंसी के बात करे हें। तोरा की पता की आज़ादी की होबो हई। गुलामी देखलहिन हैं नै तब? अरे प्रजातंत्र हई तब सब के आज़ादी हई। जेकर मन जे करे। अब कोई बाल बच्चा ख़राब हे त ओकरा कोई बाप मार देहै!"

"हाँ काका, बगैर हिटलर ई देश नै सुधरतो। एकदम ठीक हो रहलो हें। ई विरोधिया सब अनाप-शनाप बोलते रहो हई।" कई लोग सुर में सुर मिला देलक।

काका में माथा जोर-जोर से घूमे लगल। सांय सांय के आवाज आबे लगल, हिटलर, हिटलर, हिटलर....काका के माथा में इमरजेंसी के दिन घूमे लगल। घर से उठा के पुलिस थाना ले गेल और उल्टा लटका के धो देलक हल, एक साल जेल में बंद रहला। आज तक पता नै चलल की उनका गलती की हल। पुलिस भी तब हिटलर बोलो हल अपना के..बाप रे..!

" ई प्रजातंत्र हई बउआ, एकरा में विरोधी के जगह देल जाहै। सब तोरे नियर "मन के बात" कहे करतौ। भाटगिरी औ चारणी सब नै करो हई। कोय कोय होबो हई जे सच बोले के, सच लिखे के बीमारी के मरीज होबो हाइ.. ओकरो रहे दहो...हाँ, बाकि ई देश में अब पाकिस्तान, राष्ट्रवाद, हिन्दू-मुसलमान इहे सब मुद्दा हो...हमर घर में अबरी छठ पर्व में मँहगा रहे से बूंट के दाल नै बनलो !! एकर कोय चिंता हो, इहो धर्म हई। उपजा देलियो औ धान खरीदे वाला कोई नै, बेटा बेरोजगार घर बैठल हई। रेलवे में नौकरी ले दस लाख मांग रहल हें..मने के ई कैसन अच्छा दिन आल समझे में नै आबे हे..बाकि हिटलर हो की औरंगजेब सब के भक्त होबे करो हइ, दुनिया एसहि चलो हई, चले दहो..!!! गाते रहो #बागों_में_बहार _है। हमको कट्टरता से प्यार हे। प्रजातंत्र बेकार है। नमो नमो जयकार है। मन की बात ही समाचार है। बाकी सब न्यूज़ बेकार है। डर के रहो, राजा सरदार है। राष्ट्रवाद सा नाजी हथियार है। आपातकाल आने को तैयार है।

रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...