31 अगस्त 2013

निराशा राम बनाम मौन मोहन बाबा उर्फ संत असंत तू काको जान

मैंने अपने दस साल के बेटे टुन्नालाल से कुछ मुहावरे को समझाने के लिए कहा और उसने उसी तरह से झटका दिया जैसे रूपया आजकल दे रहा है। उसने दो दुनी दो बराबर दो निकाल कर यह समझा दिया कि निराशा राम और मौन मोहन सिंह जी दोनों एक दूसरे के पूरक है। पहले जो बहस हुई जरा देखिए, मैने सवाल पूछा, एक तो चोरी उपर से सीना जोरी? तो जबाब मिला मौन मोहन सिंह ने कहा कि दूसरे देश का विपक्ष पीएम को चोर नहीं कहता। फिर सवाल किया, उल्टे चोर कोतवाल को डांटे? जबाब मिला, सुप्रिम कोर्ट के निर्णय पर खांग्रेसी नेताओं ने कहा कि न्यायालय को भी अपनी सीमा में रहना चाहिए।

अजब गजब जबाब दे रहे हो यार, मैंने डांट लगाई तो उल्टा वही भड़क गया जैसे आजकल निराशा राम भड़के हुए है। खैर मैंने फिर सवाल दागा, चोर चोर मैसेरे भाई? जबाब दिया, राजनीतिक दल को आरटीआई के दायरे में लाने पर सभी दलों ने विरोध किया।
लो कल लो बात!

खैर, अबकी बार एक देहाती कहावत दाग दिया, अच्छा बताओ, चलनी दूसे बढ़नी को? जबाब फिर वहीं झटका बाला, भ्रष्टाचार के मुददे पर विपक्ष ने सदन नहीं चलने दिया। सवाल, खेत खाये गदहा, मार खाए जोल्हा? जबाब मिला? जबाब, बेचारे मौन मोहन सिंह। अच्छा बंदर के हाथ में नारियल? जबाब दिया आजकल न्यूज चैनल वालों कों नहीं देख रहें है.....।
अच्छा बताओ जले पर नमक छिड़कना? जबाब दिया, एंटोनी जी ने सदन में कहा कि पाक सेना के भेष में कुछ आतंकी ने सेना के जवान की हत्या की। फिर सवाल किया, दूध के दांत न टूटना? जबाब मिला, राहुल बाबा के अभी दूध के दांत नहीं टूटे है।  
और अन्त में कुछ और कठिन सवाल करते हुए कबीर दास जी के दोहे को समझाने के लिए कहा.. 

साधू ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं।
पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहिं।।

जबाब मिला, तब तो एक भी साधू अपने यहां नहीं मिलेगें। यहां तो निराशा राम जी पान फूल को छेड़ने की जगह तोड़ रहे है। और फिर उसने भी कुछ कबीर बानी सुना दी...और कहा कि आप ही फैसला कर लो, निराशा राम संत है कि हमारे मौन मोहन बाबा....जय हो जय हो....

साधु सोई जानिये, चलै साधु की चाल।
परमारथ राता रहै, बोलै बचन रसाल।।

मान नहीं अपमान नहीं, ऐसे शीतल संत।
भव सागर से पार हैं, तोरे जम के दंत।।

सन्त मता गजराज का, चालै बन्धन छोड़।
जग कुत्ता पीछे फिरैं, सुनै न वाको सोर।।

बोली ठोली मस्खरी, हंसी खेल हराम।
मद माया और इस्तरी, नहीं सन्तन के काम।।

और कबीरवाणी को सुन मैं तो असमंजस में पड़ गया संत के ये सारे गुण निराशा राम में है या मौन मोहन बाबा में समझ नहीं आ रहा, आपही फैसला कर दिजिए.... 

आशा तजि माया तजै, मोह तजै अरू मान।
हरष शोक निंदा तजै, कहै कबीर संत जान।।

.जय हो जय हो....




25 अगस्त 2013

रिर्पोटर, वेश्या और धोबी का कुत्ता..

रेप से जीवन खत्म नहीं हो जाता! एक तरफ जब मुंबई में रेप पिड़ित महिला पत्रकार ने यह बात कही तो इससे उसके अन्दर के जज्बे को समझा जा सकता है। समाज के लिए जीने का यह जज्बा ही किसी को एक पत्रकार बनाता है। उसे बुराईयों के खिलाफ निहथ्था लड़ने-भिड़ने का साहस देता है।
दूसरी तरफ युपी के पत्रकार राकेश शर्मा की सीएम के गृह जिले में गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। मीडिया और समाज उस तरह रिएक्ट नहीं करते जिस तरह युपी के एक डीएसपी के मरने पर किया या किसी सेना के शहीद होने पर...।

     यही सवाल मन को मथने लगता है। आखिर किसके लिए और क्यों? हमलोग रोज रोज किसी माफिया और पुलिस प्रशासन से टकराव मोल लेते है। कहीं किसी दलित की आवाज बनतें है तो कहीं जुर्म को बेनकाब करते है, पर क्यों? क्या चंद सिक्कों के लिए? पर सिक्के भी कहां मिलते है? नामी गिरामी अखबार हो या चलंत टाइप, उसके लिए हमारे जैसे रिर्पोटर की हैसियत धोबी के कुत्तों की तरह ही है। जब मन हुआ एक आध रोटी का टुकड़ा फेंक दे दिया, बात खत्म। तभी तो अखबार दस रूपये प्रति न्यूज के हिसाब से आज भी ज्यादातर रिर्पोटरों को मेहनताना देता है और कभी कभी फोटो छप गया तो तीस से पच्चास रूपये। और न्यूज चैनल, नेशनल हो तो उसके लिए सर्वोसर्वा प्रदेश की राजधानी का रिर्पोटर ही महत्व रखता है। जिला रिर्पोटर की खबर पर वह लाखों का वेतन लेता है बाकि जिले वालों के लिए उसके पास बस साल में कुछ स्टोरी के हिसाब से पैसे है और लोकल चैनल तो बस, साल दो साल तक करार के बाद भी पैसा नहीं देते और चूं चपड़ किया तो निकाल बाहर!

    और समाज! जिसके लिए जीने मरने का हम दंभ भरते है वह भी हमें अपने सारोकार की चीज नहीं समझता। उसे लगता है कि हम यह सब अपने मीडिया हाउस के नौकरी के लिए कर रहे है, बस!
बाकि बचा पत्रकारों का भ्रष्टाचार, तो जो जयचंद टाइप मित्र है वह भी कुछ खास नहीं कर पाते। अपने पेट्रोल जला कर यदि किसी नेता लीडर को कवर कर खुश कर दिया तो उनसे कुछ चंद सिक्के मिल जाएगें या फिर दलाली करने वाले मित्र भी दाल रोटी की जुगाड़ से आगे नहीं निकल पायें है। ज्यादा से ज्यादा घर में एलसीडी और फ्रिज सहित बाहरी चकमक कर पाते है, अंदर से खोखला ही। बाकि उनके बिकाउ होने का ढोल ऐसे पीटा जाएगा जैसे दुनिया का सबसे भ्रष्ट वहीं हो।

उदाहरण देखिए। मेरे यहां नगर पंचायत के द्वारा दो करोड़ का टेंडर होना था। सभी ठेकेदारों ने एक दबंग के ईशारे पर मैनेज कर पूरे रेट पर टेंडर भरा, जो पन्द्रह प्रतिशत कम पर भरने वाले थे उसे भगा दिया। एक मित्र को भनक लगी तो पहूंच गए। कैमरा खोला, चमकाया और बैठ गए कुर्सी पर। काफी हिला-हबाला के बाद पांच सौ का एक गांधी जी थमा कर उनको चलता कर दिया गया। जिन्हांेने मैनेज किया वहीं मेरे पास आकर शिकायत भरे अंदाज में कहते है फलांना तो काफी भ्रष्ट है, एक दम से अड़ गया, जब पांच का पत्ता दिया तब खिसका। हद है भाई, दो करोड़ के टेंडर में पन्द्रह प्रतिशत के हिसाब से तीस लाख का बारा न्यारा किया और एक रिर्पोटर को पांच सौ क्या दिया तो सबसे खतम वही हो गया? कई उदाहरण है....खैर।
बात यहीं खत्म नहीं होती। अब तो संपादक जी भी बैठक में कहते है कि रिर्पोटरों की पहचान तो बैनर से ही। दरोगा जी कुर्सी देते है, यह शान किसके पास है?

बात तो सही ही लगती है, साफगोई से कहूं तो शायद अब अपने अहंकार की तुष्टि ही एक मात्र कारण नजर आता है। या फिर अपने खबर को देखने का एक सुख भी है जो स्खलन सुख की ही तरह शकून से भर देता है वरना यदि बच्चों के भविष्य और घर के चुल्हे की सोंचू तो रातों को नींद नहीं आती लगता रहता है कि मर-हेरा गया तो कोई बड़ा सा बीमा भी नहीं कराया, क्या होगा परिवार का.....। ईमानदारी का तंमगा अपने मन में टांगे रहे और पेट में पाव भर अनाज के बिना भी छाति अकड़ा कर जीते रहे... बस।

हम लोगों के लिए न तो मजदूरी का कानून है, न ही मानवाधिकार। मीडिया घराने हमारा शोषण करते है और हम उफ् तक नहीं कर पाते, ठीक कोठे पर बैठे उस वेश्या की तरह जिसके रूप-श्रृंगार के जलबे का मजा तो जवानी में सब लूटते है पर उसके अंदर की तकलीफ चकाचौंध की दुनिया में खो सी जाती है। उसके आंसू अंदर ही अंदर बहते है और उसकी मुस्कान पर दुनिया फिदा हो जाती है.... हाय....


20 अगस्त 2013

सूखे खेतों को देख सोंच रहा हूं कि आजादी के 67 साल बाद भी किसानों के लिए कोई जमीनी योजना क्यों नहीं है?


     सावन की पुर्णिमा हो गई और धान की खेती करने वाले किसान उदास। खेतों में दरारे फटी हुई है और हजारों खर्च कर तैयार बिचड़ा जानवरों का हरा चारा बन रहा है। आसमान की ओर टकटकी लगाए किसान महीनों बारिस का इंतजार करते रहे पर न तो बारिस आई और न ही नदियों में पानी। मेरे शेखपुरा जिले के आसपास के कई जिले इस बार सुखाड़ की चपेट में है और आजादी के 67 साल बाद भी किसानों को लेकर वही वातानुकुलित ऑफिस में बैठ कर कानून बनाने का सिलसिला जारी है।
मैं दुनिया जहान की बातें नहीं करूगा, अपनी बात करूंगा। आज सूखा क्षेत्र घोषित करने के लिए किसान की आवाज तक उठाने वाला कोई नहीं है। मेरे जैसे छोटे किसान ने आठ हजार खर्च किए बिचड़े गिराने में पर मौसम की मार ने बस बेकार कर दिया। 
कविवार घाघ कह गए कि-
‘‘सावन माह बहे पुरबईया।
बेचे बरदा, खरदो गैया।।’’
कि यदि सावन माह में पुरबईया हवा बहती है तो किसान बैल को बेच कर गाय खरीद ले क्योंकि तब धान होने की उम्मीद नहीं रहती है। इस साल ऐसा ही हुआ है। पूरे सावन पुरबईया बयार चलती रही। खंधा का खंधा परीत रह गया। 
पर ऐसा हुआ क्यों? क्योंकि आज भी हम सिंचाई के लिए मौसम पर निर्भर है। हमारे पास अपना कोई साधन नहीं है। इसके लिए पूरी की पूरी व्यवस्था जिम्मेवार है। हमारे यहां आज भी आजादी के आसपास में बने नलकूप ही है जो इस बात को तस्दीक करते है कि उस समय की सरकरों ने मूल चीज को सुधारने पर ध्यान दिया था पर आज 95 प्रतिशत नलकूप बेकार है। हां, फाइलों पर सभी चल रहे है। यदि आज नलकूप सही होते तो धान के खेतों में भी हरियाली होती जबकि इस मद में प्रतिवर्ष अरबों खर्च हो रहे है।

वहीं एक बड़ी समस्या यह है कि आज जो धान का बिचड़ा हम खेतों में डाल रहे है वह हाइब्रीड है जिसका परिणाम यह एक माह का बिचड़ा हो जाने के बाद वह खेत में लगाने लायक ही नहीं रहता जबकि पुराने समय में धान के बिचड़े को एक माह बाद भी खेतों में रोपा जाता था। आज वह मूल धान जिसमें मेरे यहां सीता, मंसूरी, कनक, सोनम, बासमती सहित अनेक बेराइटी थी, सब बिलुप्त हो गई। सरकार और कृषि बैज्ञानिकों ने हाईब्रिड धान की वैज्ञानिक खेती पर बल दिया जिससे आज मूल धान का बिचड़ा किसी किसान के पास नहीं मिलता या कम मिलता है। अब यदि बड़ी बड़ी कंपनियां हाईब्रिड धान का बिचड़ा देना बंद कर दे तो क्या होगा?

इसी तरह सुखाड़ को देखते हुए सरकार ने महज डीजल अनुदान देने की घोषणा करी है जो कि उंट के मुंह में जीरा का फोरन है। वह भी जो किसान ब्लॉक आना जाना करते है उन्हें ही मिलेगा। 

कुल मिलाकर यह कि आजादी के इतने सालों बाद भी हम केवल यह कहने को ही कहते है कि भारत कृषि प्रधान देश है और सत्तर प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है पर उन सत्तर प्रतिशत किसानों के लिए कोई भी योजना जमीन पर नहीं है और हमारे जैसे किसान सोंच रहे है कि इतनी मंहगाई में चावल खरीद कर खाना कैसे सम्भव हो सकेगा या कि जब कोई किसान आत्महत्या करेगा तब उसके दर्द को केवल मीडिया बेचेगी.....

15 अगस्त 2013

हे भारती देखो तुम










हे भारती देखो तुम,
कैसे अपने ही आज लूट रहे,
कैसे आतंकी धर्मभेष में छूट रहे।

हे भारती देखो तुम,
कैसे, गांधी की टोपी आज लुटेरों के सर पर है,
कैसे आज फांकाकशी भगत सिंह के घर पर है।

हे भारती देखो तुम,
आज कैसे जनता की नहीं है चलती,
देखो, कैसे रक्षक ही अस्मत को मलती।

हे भारती देखो तुम,
कैसे अन्नदाता पेट पकड़ कर सो जाते,
और कहीं पिज्जा खा खा कर कारोबारी नहीं अघाते।

हे भारती देखो तुम
अब गंधारी का ब्रत त्याग करो,
एक बार फिर तुम लक्ष्मीबाई का रूप धरो।

अपने ही देश में तिरंगा पराया हो जाएगा।


किसने सोंचा था

‘‘केसरिया’’

आतंक के नाम से जाना जाएगा?

‘‘सादा’’

की सच्चाई गांधी जी के साथ जाएगा?

‘‘हरियाली’’

के देश में किसान भूख से मर जाएगा?


और

कफन लूट लूट कर स्वीस बैंक भर जाएगा?


किसने सोंचा था

लोकतंत्र में
गांधीजी की राह चलने वाला मारा जाएगा।
?

आज भी भगत सिंह फंसी के फंदे पर चढ़़ जाएगा।
?

किसने सोंचा था

भाई भाई का रक्त बहायेगा।
?

देश के सियाशत दां आतंकियों के साथ जाएगा?

अपने ही देश में तिरंगा पराया हो जाएगा।

और हमारा देश
शान से
आजादी का जश्न मनाएगा।


जय हिंद।

11 अगस्त 2013

अब गीत नहीं गाती है गोरैया.....


बहुत से लोगों ने बचपन में गीत गाती गोरैया को देखा होगा... हीरा मोती बैल की जोड़ी और नीलकंठ... बहुत कुछ था बचपन में पर अब सबकुछ खोता जा रहा है..इसी को शब्द दिया है मैंने... थोड़ा सा रूक कर पढ़ें और कुछ कहें... 



अब मुंडेर पर अतिथि के आने की
सूचना लेकर कागा नहीं आता....
अब बाबू जी नहीं लाते धान की बाली
जिसे गीत गाते हुए फोंकती थी गोरैया..
अब छत पर सूखते अनाज अगोरने
नहीं कहती है मां....
अब मकई के खेत में भी
बाबू जी नहीं बनाते है मचान
जिस पर बैठकर उड़ता रहता था
झुंड के झुंड  आते सुग्गों को...
अब श्राद्ध में पितरों को तर्पित
भात खाने वाले चिंड़य-चुनमुन
न जाने कहां खो गए.....
अब मुद्राखोर चील भी न जाने कहां रहता है
जैसे नाराज हो
हमे सड़ाध की सजा दे रहा है....
अब घर से बाहर निकलने पर
नीलकंठ को उड़ा कर
जतरा नहीं बना पाते बाबू जी....
अब तो रंग बिरंगी तितली को देख
पूछती है बेटी
पापा यह कहां मिलेगी......
अब तो सावन में झूले लगाने के लिए
नहीं मिलता है पीपल का दरखत...
अब मां भी
बटवृक्ष और आंवले की पूजा के लिए
बोनासाई घर लाने के लिए कह रही है...
अब हीरा-मोती की कहानी कैसे लिखेगें
प्रेमचंद......
अब खेत में कौन करेगा
हरमोतर......
अब गौ माता को पूजने कहां जाएगी
बहुरिया....
और कहां से आएगा
ठाकुरजी बनाने के लिए
देशी गाय का गोबर....

अब तो मेरे गांव में भी रोती है मैना
रो रहे हैं तोंते
हुंआ हुंआ कर कर
रो रहा है सियार

जैसे कह रहा है-
‘‘हे भगवान यह आदमी क्यों बनाया
जो तेरी दुनिया में ही विनाश लेकर आया।’’

03 अगस्त 2013

मोदीगिरी-द डिजास्टर मनेजमेंट बनाम अंधों में काना राजा

आउल बाबा परेशान है! ई कौन सा जादू हो गया कि कल तक आउल आउल चिघारने वाले आज नमो नमो मंत्र का जाप करने लगे! कितना सबकुछ किया, कभी दलित के घर जाकर भोजन किया तो भी भीड़ में जाकर लोगों से बतियाया फिर भी...?
आउल बाबा परेशान, अपने कई विदेश के मित्रों से सलाह ली पर किसी ने उचित सलाह नहीं दी। एक दिन उसे एक मित्र ने सलाह दी। मोदीगिरी-द डिजास्टर मनेजमेंट सीखने की। आलउ बाबा ने दिल्ली से लेकर इटली तक ढुंढ़वा लिया कहीं इसका फंडा नहीं मिला। कैसे एकाएक पानी पी पी कर गरियाने वाला मीडिया आज नमो नमो कर रहा है?
नाराज बाबा ने मम्मी से शिकायत की, मोदीगिरी सीखना है। मम्मी जी ने भी अपने सभी पूराने नेताओं को बुलबा लिया। बताओ, मोदीगिरी....।
आखिर क्या हुआ कि सब नमो नमो करने लग गया। किसी ने कहा कि सब कॉपोरेटों का कमाल है, उसी की फंडिग से सारा खेला हो रहा है। किसी ने इसे निक्कर का कमाल बता दिया। वहीं अपने डुग्ग डुग्गी राजा ने सबसे एक कदम आगे बढ़कर इसे अमेरिका की साजिश करार दे दिया। इतना सुनते ही मैडम जी उखड़ गई। ‘‘आपसब को कुछ पता तो होता नहीं बस अमेरिका अमेरिका बोल देते है, अरे उसकी सारी योजनाओं को हम लागू कर ही रहे है फिर वह नमो के साथ क्यूं जाएगा?’’ प्रेट्रोल-डीजल लोग कम खरीदें इसके लिए उसी के ईशारे पर दाम बढ़ाए। हथियार भी उसी से खरीदा?’’ फिर।
धंटो मंथन के बाद किसी के हाथ कुछ नहीं लगा। आउल बाबा परेशान! तभी मैडम का मोबाइल बज उठा। स्क्रीन पर नमो का नाम उभरा। सब अचंभित। मैडम जी वहां से उठ कर किनारे में चली गई, बतियाने। ‘‘हलौ, देखिए आप डुग्ग डुग्गी जैसों को थोड़ा समेटिये, बड़ी मुश्किल से इस मंहगाई और भ्रष्टाचार को किनारे लगाया है। देखे न मेरा फंडा। और हां ई बाटला हाउस पर गेम उलटा पर गया जी। फिर भी अभी ईशरत जहां का मामला है।
थैंक्यू, थैंक्यू, मैडम जी लगातार बोली जा रही थी और अन्त में बोली- ‘‘थैंक्यू नमो जी, आप नहीं होते मंहगाई और भ्रष्टाचार पर चुनाव लड़ने में दोनों को घाटा हो जाता है। अब देखिए सब का पत्ता साफ कर दिया। बाकई आपने बेस्ट पॉलिसी खोज निकाला। थैंक्यू।।’’
उधर से जब मैडम जी आई तो सबकी आंखों में एक सवाल था, जबाब में मैडम ने सिर्फ इतना कहा कि यह हाई लेबल पौलटिक्स है तुम नहीं समझोगे। तुम लोग थोड़ा सावधानी से नमो पर बार करो और हां ध्यान रहे हम केवल धर्म की राजनीति करेगें इधर उधर कोई नहीं भटेका।
मैं क्या करता? सब कुछ चुप चाप सुनता रहता हूं। कौन यह कह कर माथा दरद मोल ले कि नमो की तरह बनने के लिए पहले आम होना पड़ेगा, बीआईपी नहीं? जमीन पर जाकर काम करना होगा आउल बाबा, नौटंकी नहीं?
और अन्त में मेरे मुंह से पता नहीं कैसे निकल ही गया ‘‘ अजी जानते नहीं है आप लोग कि कैसे अपने आउल बाबा देश की गंभीर समस्याओं पर भाग खड़े होते है और जब मंहगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी की समस्या रहेगी तो इसी तरह से अंधों में काना राजा बनता ही रहेगा.....’’

रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...