29 फ़रवरी 2016

जय किसान

बजट की पेचीदगियों को समझना मेरे जैसों के बस में कभी नहीं रहा है। यही कारण था कि बजट में क्या मंहगा हुआ और क्या सस्ता इसी को देख कर बजट के प्रति धारणा बना लेता था। इस बार ऐसा नहीं हुआ।
यह पहली बार है कि बजट में किसानों की चर्चा हो रही है। सुन कर आत्मसंतोष हुआ। जमीन पर किसानों के हितों की बात कहां तक उतरेगी यह कहा नहीं जा सकता, पर देश के बजट में किसानों की बात प्रमुखता से पहली बार देख रहा हूं। यह देश के अन्नदाताओं के लिए भविष्य का द्वारा खोलने वाला है।
हलांकि मैं मजबूती से इस बात को पहले भी कहता रहा हूं कि देश में नयी योजनाओं की बिल्कुल जरूरत नहीं है, जरूरत है योजनओं को सौ की सौ फीसदी जमीन पर उतारने की। योजनाओं की लूट रोकने की। 
खौर, कुछ कमियां है, पर लोकलुभान से दूर बजट में किसानों की बात सुन-समझ कर मेरे जैसे गांव में रहनों वालों के लिए संतोष दे रहा है, शायद कुछ किसानों को भला हो... किसानों को उसके उपज का लागत से अधिक कुछ आमदनी हो... किसानों को उर्वरक उचित मुल्य पर मिले.....आमीन

26 फ़रवरी 2016

इस हमाम में सब नंगे है..क्या बीजेपी, क्या कोंग्रेस, क्या वाम, क्या आप

इस हमाम में सब नंगे है..क्या बीजेपी, क्या कोंग्रेस, क्या वाम, क्या आप

जेनयू में जिस महिषासुर के महिमामंडन की कथा स्मृति ईरानी ने संसद में पर्चा पढ़ी और संसद में जेनयू के छात्रों के गन्दी राजनीति को पर्दाफास करने का दावा किया वही दावा अब बीजेपी के गले की फ़ांस बन गयी है।

स्मृति ने इसे देवी दुर्गा के अपमान से जोड़कर उछाला और अब विपक्ष उसे इस मामले में घेर रही है कि स्मृति में देवी दुर्गा का अपमान किया।

और राजनीति के हमाम की नंगई देखिये कि देवी दुर्गा के अपमान करने के जिस मामले को बीजेपी जैसी स्वघोषित धर्म रक्षक, राष्ट्रवादी पार्टी ने उठाया उसी पार्टी के सांसद आज महिषासुर शहादत दिवस के मुख्य अतिथि रहे उदित राज जी है।

09 फ़रवरी 2016

ढेंकी

ढेंकी,
यही नाम है इसका। पुराने ज़माने में चावल और चूड़ा इसी से बनाया जाता था। इसके लिए महिलाएं हाड़तोड़ मेहनत करती थी।

मैंने माँ और दादी को इसपे मेहनत करते देखा है और इसपे बने चूड़ा का स्वाद भी लिया है, उसकी मिठास आज मुँह में आज भी बरक़रार है...

आपने देखी है क्या?

08 फ़रवरी 2016

एक और कबीर इस दुनिया को अलविदा कह गए..... निदा फाजली को श्रद्धाजंलि

एक और कबीर इस दुनिया को अलविदा कह गए..... निदा फाजली को श्रद्धाजंलि
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मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
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संयोग कहिए कि आज जगजीत सिंह की जयंती के दिन ही निदा फाजली ने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। एक संयोग यह कि भी आज सुबह दस बजे से जगजीत सिंह पे लिखी पोस्ट को फेसबुक पे पोस्ट करना चाह रहा था और फोटो अपलोड नहीं हो रही थी। अंततः जब पोस्ट किया तो उसी के साथ ही निदा फाजली के जाने की खबर मिली। गमगीन खबर। आज के समय में शायद ही उनके जैसे दिलो दिमाग पे चोट करने वाले शायर और कवि फिर कोई मिले...बिल्कुल कबीर की तरह मन की गहराई पे चोट करते थे.....कितने ही गजल गायकों को इनकी लिखी गजल ने बुलंदी तक पहूंचाया...श्रद्धाजंलि स्वरूप उनकी एक रचना...

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना

यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना

घर की तामीर चाहे जैसी हो
इस में रोने की जगह रखना

मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना

मिलना जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना

तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो....और वह दिल हार गई...

1985 की बात है, जब दूरदर्शन पर प्रेम गीत फिल्म आ रही थी और अनीता राज तथा राजब्बर की आदाकारी दिल को छू गई थी। साथ ही दिल में उतर गई थी वह गजल ‘‘होठांे से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो........./....तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो....। इस गजल को जाने कितनी बार गुनगुनाया करता था। उन दिनों में गजल की समझ नहीं थी फिर भी मन को भा गई थी वह गजल...।

बाद के दिनों में जिसके लिए यह गजल गुनगुनाता था वह दिल हार कर मेरी जीत अमर कर दी और फिर बहुत दिनों बाद यह जान सका है कि इस गीत में दिलकश आवाज जगजीत सिंह की है। फिर ‘‘होश बालों को खबर क्या, बेखुदी का चीज है।’’ "झुकी  झुकी सी नजर" / तुमको देखा तो ये ख्याल आया...सरीख अनगिनत गीतों और गजलों ने दिल पर एक गहरी छाप छोड़ी पर किशोरावस्था के उन दिनों में जब देहाती लड़के को एक गीतकार, संगीतकार और गायक की समझ नहीं थी वह आवाज दिल में उतर गई... यह होती ही गायक की अपनी पहचान....

जगजीत सिंह के जाने के बाद भारतीय गजल गायकी की दुनिया में सूनापन सा है.. जाने कब इसे भरा जाएगा......

जयंती पर नमन...

05 फ़रवरी 2016

मन की बात, बस यूँ ही

कभी कभी निराशा में डूब जाता हूँ, जब भबिष्य और वर्तमान की सोंचता हूँ, खास कर तब। पर गुरुदेव ओशो ने सिखाया है प्राकृति के साथ बहो, लड़ो मत। बस बचपन से बहता जा रहा हूँ।

जीवन की नाव हमेशा मझधार के बीच झंझावातों में फंसी रही और मेरे नाव का कभी कोई मांझी न रहा। मैं भी अपने हाथ में कहाँ कभी पतवार थामी, बिना पतवार के चलता रहा हूँ।

जाने कब तक और कहाँ तक जाऊंगा। कभी कभी थक सा जाता हूँ। अब कभी मन समझौतावादी होने का दबाब बनाता है....पर कहाँ हो पता है।

न चारणी करूँगा
न चाकरी करूँगा
जबतक है जान ऐ जिंदगी
तूफानों से लड़ता रहूँगा।।

कमबख्त समाज कहाँ
किसी का हुआ है,
राम से सीता का
परित्याग कराया!

कृष्ण पे भी
कलंक लगाया!

कुंती का नहीं,
कर्ण का
उपहास उड़ाया..

कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...