01 दिसंबर 2020

किसान आंदोलन, किसान बिल और एमएसपी का सच



पंजाब और हरियाणा के संदर्भ में कुछ नहीं कह सकता परंतु बिहार के संदर्भ में सरकारी दर पर धान की खरीद का हालत बद से बदतर रहती है। प्रत्येक साल । इस साल 23 नवंबर से धान खरीद करने का आदेश सरकार का है। अभी तक एक सौ ग्राम धान कहीं से किसानों की खरीद नहीं हो रही है। खरीद व्यापारी कर रहे हैं। वह भी 1200 रुपए क्विंटल सरकारी दर 1888 रुपए क्विंटल है।

 वही व्यापारी अब पैक्स अध्यक्ष को यही धान बेच देंगे और पैसे का बंदरबांट होगा। किसान के घर पैसा नहीं आएगा। जो किसान पैक्स अध्यक्ष की खुशामद करेंगे उसके धान की खरीद होगी। परंतु नमी के नाम पर, अधिकारियों के कमीशन के नाम पर, बोरा के नाम पर घपला होगा । 1 क्विंटल की जगह 5 किलो अधिक अनाज लिया जाएगा। नमी के नाम पर, बोरा के नाम पर पैसा लिया जाएगा। और सबसे बड़ी बात यह कि कॉपरेटिव बैंक से किसानों के पैसे का संचालन होगा। कॉपरेटिव बैंक घोटाले बाजों का अड्डा है। 


फर्जी निकासी

एक भी किसान बैंक में पैसा निकालने के लिए नहीं जाते हैं और उसके खाते से पैसा निकल जाता है। धान खरीद करते वक्त ही पैक्स अध्यक्ष बैंक के निकासी स्लिप हस्ताक्षर करा कर खुद जाकर पैसा निकाल लेता है। इसकी जांच हो तो अरबों रुपए का घोटाला बिहार में निकलेगा।


 इस पर अंकुश लगाने के प्रयास सभी असफल हो रहे हैं। इतना ही नहीं किसान के नाम पर पैसा निकालकर पैक्स अध्यक्ष लाखों करोड़ों रुपया सालों-साल यूज़ करता है और किसान पैक्स अध्यक्ष के पास आते जाते थक जाता है। इसी थकावट की वजह से 1200 रुपए ही सही, व्यापारी को धान दिया जा रहा है। किसान के हित में आंदोलन है अथवा नहीं, इस बात में नहीं पड़ना। परंतु किसान बिल में किसान को बाजार से भी जोड़ दिया गया है तो निश्चित रूप से किसानों को फायदा होगा। बाकी सब पॉलिटिक्स है,...

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (02-12-2020) को "रवींद्र सिंह यादव जी को  बिटिया   के शुभ विवाह की  हार्दिक बधाई"  (चर्चा अंक-3903)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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  2. बाकी सब पॉलिटिक्स ह। सत्य वचन ।

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  3. जी, हम बिहारी किसान इस त्रासदी को आजादी के बाद से लेकर आज सत्तर से अधिक वर्षों से झेल रहे हैं। उत्तर बिहार के चीनी मिल हमारा लाखों रुपया लेकर चम्पत हो गए हैं। सरकारी खरीद के नाम पर बिहारी नौकरशाह भ्रष्टाचार और मेडिओकृटी के 'फेविकोल जॉइंट' हैं। सहकारी समिति के नाम पर बिस्कोमान और इसके लुटेरे अध्यक्ष सांसद माननीय तपेश्वर सिंह जी का गौरवशाली इतिहास सबको पता है। चिर काल से लगातार इस लुटती द्रौपदी को चीर प्रदान करने की बात तो दूर, इसे बदस्तूर चीरा जाता रहा है। कोई नेता नहीं, कोई आंदोलन नही। बाकी आप समझदार हैं, खुद समझ लें। पता नहीं ये दलाली कब खत्म होगी!

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