02 जनवरी 2026
बिहार में पुल का गिरना एक आंदोलन
बिहार में पुल का गिरना एक आंदोलन
बिहार में तैयार होने से पहले ही पुल गिर रहे। रोपवे गिर रहा है और कुछ लोग खुश, तो कुछ चिंतित हो रहे। खुश होने वाले लोग ज्यादा है। चिंतित होने वाले कम।
और भला खुश भी क्यों न हुआ जाए। कम से कम गिरते हुए पुल में इतना तो साहस है कि वह बगावत कर सके। वरना आज तो आदमी इतना साहस नहीं कर पाता। यह बगावत नहीं तो और क्या है? यदि यह बगावत नहीं होता तो पुल गिरता ही नहीं!
और पुल के गिरने पर उन लोगों की चिंता बढ़ जाती है, जिनकी संवेदना, नैतिक मूल्य गिर रहे है। और कमिशन बढ़ रहा।
दरअसल , गिरता हुआ पुल इसी बात को लेकर आंदोलन कर रहा। खेलावन काका ने विश्वस्त सूत्रों के हवाले से समाचार निकाला है।
समाचार यह है कि पुल के गिरने पर इसकी जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया। समिति के सामने पुल हाजिर हुआ और बगावत का पक्ष रखते हुए कहा,
बगावत तभी होती जब अति होता है। हर दिन कमीशन बढ़ रहा। इसका भार मेरे ऊपर ही आता है। ऐसे में यदि सब कुछ ठीक रहा तो पुल के गिरने से कई जाने जा सकती है। उन जानों की वजह में मेरी बदनामी होती। उसी बदनामी से बचने के लिए यह आंदोलन है।
तैयार होने से पहले गिर कर सत्ता के कानों तक आवाज पहुंचना ही उद्देश्य है। उनको यह बताते हैं कि पुल गिरने में आपका ही एक मात्र योगदान है। अब यह अलग बात है कि यह आवाज वहीं से दबा दी जाती है। तब भी, हम अपना काम तो कर ही रहे।
आहा, जिंदगी ... नए साल में बचपन में लौटना
आहा, जिंदगी ... नए साल में बचपन में लौटना
नववर्ष की दस्तक के साथ ही बरबीघा के श्री कृष्ण राम रुचि कॉलेज का मैदान सिर्फ एक खेल का स्थल नहीं रहता, वह स्मृतियों, मित्रता और मुस्कान का उत्सव बन जाता है। हर साल अपने मित्रों के साथ क्रिकेट खेलने का यह बहाना दरअसल जीवन की आपाधापी से कुछ पल चुराने का एक सुंदर उपक्रम होता है। जैसे ही बल्ला हाथ में आता है और गेंद हवा में उछलती है, वैसे ही चेहरे पर वर्षों पुरानी वही निश्छल मुस्कान लौट आती है।
मैदान पर उतरते ही समय अपनी गति भूल जाता है। घंटों हँसते-बोलते, एक-दूसरे की टाँग खींचते, कभी किसी की फील्डिंग पर ठहाके लगते हैं तो कभी किसी की ‘शानदार’ मिस-हिट पर पूरा मैदान हँसी से गूँज उठता है। यह सिर्फ क्रिकेट नहीं होता, यह मित्रता का पुनर्जन्म होता है—जहाँ औपचारिकताएँ टूट जाती हैं और दिल खुलकर बोलने लगता है।
यह खेल अपने आप में आनंद का झरना है। यहाँ तनाव पिघल जाता है, जिम्मेदारियों का बोझ हल्का हो जाता है और जीवन कुछ देर के लिए बेहद सरल लगने लगता है। काश, ऐसे पल रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी सहजता से मिल पाते, पर ऐसा संभव अधिकतर मित्रता की गोद में ही होता है। मित्रों की वही टोली, वही अपनापन—यही इन पलों की असली पूँजी है, और इन्हें जीवित रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।
इन क्षणों में हम फिर से बचपन में लौट जाते हैं—जहाँ हार-जीत से ज़्यादा साथ होना मायने रखता है। हाँ, यह सच है कि अगले दो दिन शरीर दर्द से कराहता है, पर वह दर्द भी मीठा लगता है। क्योंकि वह याद दिलाता है कि हम आज भी हँस सकते हैं, खेल सकते हैं और ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। यही तो नए साल की सबसे खूबसूरत शुरुआत है और कुछ घंटे हम अपने तनाव को भूल जाते है...
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