नववर्ष की दस्तक के साथ ही बरबीघा के श्री कृष्ण राम रुचि कॉलेज का मैदान सिर्फ एक खेल का स्थल नहीं रहता, वह स्मृतियों, मित्रता और मुस्कान का उत्सव बन जाता है। हर साल अपने मित्रों के साथ क्रिकेट खेलने का यह बहाना दरअसल जीवन की आपाधापी से कुछ पल चुराने का एक सुंदर उपक्रम होता है। जैसे ही बल्ला हाथ में आता है और गेंद हवा में उछलती है, वैसे ही चेहरे पर वर्षों पुरानी वही निश्छल मुस्कान लौट आती है।
मैदान पर उतरते ही समय अपनी गति भूल जाता है। घंटों हँसते-बोलते, एक-दूसरे की टाँग खींचते, कभी किसी की फील्डिंग पर ठहाके लगते हैं तो कभी किसी की ‘शानदार’ मिस-हिट पर पूरा मैदान हँसी से गूँज उठता है। यह सिर्फ क्रिकेट नहीं होता, यह मित्रता का पुनर्जन्म होता है—जहाँ औपचारिकताएँ टूट जाती हैं और दिल खुलकर बोलने लगता है।
यह खेल अपने आप में आनंद का झरना है। यहाँ तनाव पिघल जाता है, जिम्मेदारियों का बोझ हल्का हो जाता है और जीवन कुछ देर के लिए बेहद सरल लगने लगता है। काश, ऐसे पल रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी सहजता से मिल पाते, पर ऐसा संभव अधिकतर मित्रता की गोद में ही होता है। मित्रों की वही टोली, वही अपनापन—यही इन पलों की असली पूँजी है, और इन्हें जीवित रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक है।
इन क्षणों में हम फिर से बचपन में लौट जाते हैं—जहाँ हार-जीत से ज़्यादा साथ होना मायने रखता है। हाँ, यह सच है कि अगले दो दिन शरीर दर्द से कराहता है, पर वह दर्द भी मीठा लगता है। क्योंकि वह याद दिलाता है कि हम आज भी हँस सकते हैं, खेल सकते हैं और ज़िंदगी को पूरी शिद्दत से महसूस कर सकते हैं। यही तो नए साल की सबसे खूबसूरत शुरुआत है और कुछ घंटे हम अपने तनाव को भूल जाते है...
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