02 फ़रवरी 2026

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

यह 5 जनवरी की बात है। सुबह सुबह दरवाजे पर किसी ने आवाज लगाई। 

"बबलुआ, बबलुआ...!"

 बाहर निकला तो देखा इंदल मांझी की माय खड़ी थी। 

पूछा, "की होला"। 

बोली, "फटीचन मर गेलो !"

"कैसे ..?"

"बीमारी से"

"तब, हम की करियो..?"

"कुछ पैसा दहीं, कफन आदि खरीदे ले पैसा नै है... जरावे के लकड़ी के पैसा मिठ्ठू सिंह दे देलकै हैं...!"

मेरे पास नगद कुछ नहीं था। मैं बाजार गया। रितेश को ऑनलाइन भेजकर  नगद लिया। फिर आकर दे दिया। यह चुपचाप हुआ।  

यह एक बहुत लघु प्रसंग है। सार्वजनिक करना निश्चित ही सही नहीं है। पर वर्तमान में जातीय भेदभाव का विषवमन ऐसा है कि केवल सवर्ण होने भर से उसे शोषक बता कर प्रताड़ित किया जा रहा।  मेरा जन्म भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ। परंतु आर्थिक अभाव में वेदना ही सही है।

खैर, मेरा मानना है कि समाज में अच्छे, बुरे लोग हमेशा रहें है। पर अभी प्रायोजित तरीके से सवर्ण के विरुद्ध घृणा फैलाई जा रही। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वंचितों का शोषण नहीं हुआ। दमन नहीं हुआ। अथवा आज भी शोषण, दमन नहीं हो रहा। पर इसका मतलब यह है कि समाज में शोषक केवल जाति से निर्धारित नहीं है। यह एक नीच मानसिकता है। 


आज के समय में समाज को जोड़ने के छोटे छोटे प्रयासों की चर्चा अति आवश्यक है। समाज में रोज रोज ऐसे पहल होते है। समाज को जोड़ने का प्रयास होता रहा। होता रहेगा। 

जारी है..

1 टिप्पणी:

  1. आपका यह अनुभव बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। आपने बिना शोर किए मदद की, यही असली इंसानियत है। आज लोग जाति के नाम पर तुरंत फैसला सुना देते हैं, लेकिन जमीन पर रिश्ते अलग तरह से बनते हैं। हर समाज में अच्छे और बुरे लोग मिलते हैं, इसलिए पूरी जाति को दोष देना सही नहीं लगता।

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