08 मार्च 2026
नीतीश कुमार के बगैर बिहार
बिहार अब नीतीश कुमार के बगैर होगा। और दो दशकों तक सुशासन में जीता बिहार का सामान्य मानस चिंतित हो गया है।
अब बिहार का चिंतित मानस नीतीश कुमार के बगैर बिहार में सुशासन हो सकता है, इसको लेकर सशंकित है।
बिहार के चिंतित मानस में कई वर्ग है । अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सर्वाधिक चिंता बिहार की नारी शक्ति को है । नारी-सशक्तिकरण, बेटियों के जीवन में बदलाव का मानक नीतीश कुमार है। शायद ही दूसरा कोई इतना कर पाए।
एक वह वर्ग है जो भाजपा शासित दूसरे प्रदेशों में वैचारिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रतिद्वंदियों का दमन देख रहा है।
बिहार के समाजवादी मानस को देख नीतीश कुमार ने इसे संतुलित कर रखा था।
एक वर्ग अधिकारियों का है। शासन सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार ने पजामा कुर्ता छाप नेताओं की प्रशासनिक पकड़ को थाना ब्लॉक से लेकर पटना के सचिवालय तक से खत्म कर दिया। यह वर्ग भी चिंतित है।
हालांकि, इसका दुष्परिणाम भी हुआ और कई अधिकारी निरंकुशता तक चले गए। थका हारा बिहार मानस भ्रष्टाचार को सहज स्वीकार कर लिया।
नीतीश कुमार के बगैर बिहार में युवा मानस भी चिंतित है।
जिस स्तर पर बढ़कर उन्होंने नौकरी दी, इसके बाद युवाओं का चिंता उचित ही है।
नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री से हटाने में कई किंतु परंतु हैं। परंतु स्वास्थ्य का कारण एक ठोस बहाना बताया जा रहा है।
अब निशांत कुमार राजनीति में ऐसे उतर रहे हैं जैसे कोई अबोध बालक कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उतर रहा हो।
निशांत कुमार राजनीति के तिकड़मी चक्रव्यूह में उस एकलव्य की तरह हैं, जिसने माता के गर्भ में अपने पिता से, युद्ध का कौशल भी नहीं सीखा है..!
अब अपने कई प्रदेशों में अपने कथित चातुर्य और लोमड़ी कौशल से सत्ता हथिया कर उसे संभालने वाली बीजेपी, बिहार को कैसे संभालेगी, यह एक यक्ष प्रश्न है..।
अभी जो दिखता है, वह यह है कि गुजरात का व्यापारी बिहार के मजदूरों को अपने विकास की सीढ़ी में उपयोग करना अच्छी तरह से जानता है।
और उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाने वाला बिहारी मानस भी इस चातुर्य को समझता है।
अब, इस महीन से अंतर में कब जरा सा इधर-उधर हो जाए , कोई नहीं जानता।
शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जल बिछाएगा, हम नहीं फसेंगे... इस मंत्र को रटने वाला बिहार, जाति के जंजाल में अक्सर फंसता रहा है, परंतु धर्म के जंजाल में फंसने से अक्सर बचत भी रहा है... अब जाति और धर्म का महाजाल बिछ गया है.... बाकी सब ठीक है...पर यह ठीक नहीं है कि अब समाजवाद का अंतिम किला ध्वस्त हो रहा है और वंशवाद की राजनीति के प्रखर विरोध का भी स्वाहा हो रहा है
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