13 अप्रैल 2009

मिडिया का बाजार और बिकते पत्रकार
दस साल से मिडिया जगत से जुरे होने पर आज से पहले गौरव मह्सुश करता था पर आज मुझे शर्म आ रही है की मई एक पत्रकार हूँ। आए भी कौण नही? पहली बार पता लगा की समाचार बिक गया है। एक बैठक कर प्रबंधक हमेई सुचना देतें हे की आपको चुनाव का कवरेज़ नहीं करना है। आब कोए भी चुनावी समाचार छपने के पैसे लगेगे। एकबारगी तो बिश्वाश ही निही हुआ पर यह सच था। हम जिश अख़बार के लिए कम करते थे वह ही नही वाकी सभी अखवार भी बीक गया है। मैं बिहार के शेखपुरा जिले से राष्ट्रीय सहारा मे रिपोर्टिग करता हूँ। जब यह बात हमने अपने मित्र और दैनिक जागरण के रेपोतेर को बताई तो उन्हें विश्वाश ही नही हुआ पर जब उनके अख़बार ने भी यह सुचना दी तो हम सभी सकते मे रह गयी। सच पुछीये तो रुलाई आ गयी। आज से पहले हम लोग ख़ुद को समाज का पहरेदार बताते थे समाचार पर लोग भरोसा करते थे पर आज, भरोषा तो लोग आज भी कर रहे है पर उनके साथ कथित चौथा स्तम्भ धोखा कट रहा है। जो समाचार लोग पढ़ रहे है वह एक झूठ है अख़बार का समाचार बिक गया है। रुपया देकर कोए नेता कुछ भी छापा सकता है। जय हो एस देश का जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है और उष लोकतंत्र में इसके बिरुद्ध बोलने बाला कोए नही। एक मात्र परभात ख़बर मे एस्कोलेकर ख़बर छपी थी बाकी किसे ने बिरोध नही किया सभी पत्रकार जो सच के लिए संगर्ष कर रहे थे आज आहात है। आप और हम इसका बिरोध करें आवाज उठाएं चाहे तरीका कोए भी हो.जय हिंद.

कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...