08 जून 2009

पत्रकार का पतन

पत्रकार समाज का प्रहरी होता है। क्या यह सच है। बहुत हद तक लोग ऐसा ही समझते है पर सच्चाई इस से इतर है। आज का पत्रकार समाज का आइना नही बल्की ब्यापारी हो गया है। आज पत्रकार सुबह उठकर समाचार नही खोजता बल्की रुपया खोजता है। पत्रकारों का पतन आज चरम पर है एसा मैं चीढ़ कर नही कह रहा । मैं देख कर कह रहा हूँ। समाचार आज सच कम ग़लत अधिक होता है। पैसे लेकर समाचार बनने का आज दौर है। ऐसे दौर me चौथे kambhe को कौन bachayega।

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर अरुण साथी ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। ...