06 जून 2011

मुझे ऐसा क्यों लगता है।


रामलीला मैदान में
देख कर रावण लीला
मुझे ऐसा क्यो लगने लगा
जैसे
मैंने ही अपने हाथ में लेकर डंडा
चला दिया हो शहीद की उस बीबी पर
जिसने अपने पति के प्राण देश पर न्योछावर कर भी
रूकना नहीं सीखा
और
आ गई रामलीला मैदान
प्रतिकार करने ?

और मैं घर में टीवी से चिपका
दिन भर
सबकुछ
देखता रहा
बस...

मुझे ऐसा क्यों लगता है कि जिस हाथ ने उसके कपड़े फाड़े
वह मेरे ही हाथ थे
जिससे
प्रजातंत्र का राजा
आज अजानबाहु बन गया है?

पर
वह देह
जिसे ढकने के लिए
विधवा
दूसरों से मांग रही थी एक कमीज
वह तो
भारत मां की देह थी?

मुझे ऐसा क्यों लगता है
जैसे
बाबा की आवाज मुझे शर्मींदा कर रही है
और जब अन्ना निराश होते है
तो आत्मग्लानी से मेरा मन भर जाता है..

मुझे ऐसा क्यों लगता है
जैसे
लहू मेरे ही हाथ में लगी है
और मैं
रगड़ रगड़
साफ कर रहा हूं
पर
यह तो धुलता ही नहीं

पर यह क्या
कैसा है इस लहू कर रंग
.
.
तिरंगा....



पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे

पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या और विरोध के मुखौटे ............................... एक महीने के भीतर फिर एक पत्रकार मारा गया है. इस बार बुरी ...