19 जनवरी 2012

जमाना तो बोन लेस का है फिर कबाब में हड्डी क्यों बनते हो जी....(व्यंग)


अरूण साथी..

बदलते जमाने के साथ साथ जमाने का चलन भी बदल गया है। इस चलन में एक नया चलन स्याही फेंकने का जुड़ गया है वह भी उनपर जो कबाब में हड्डी बनतें है। पहले का दौर और था जब राजा महाराजा कबाब मंे हड्डी पसंद करते थे और बिरबल दरबार की शोभा बढ़ाते थे पर आज जमाना बदला है और कुछ लोग हैं कि बदलना ही नहीं चाहते। उनको यह समझ ही नहीं कि आजकल कबाब में हड्डी लोगों को पसंद नहीं और बोन लेस कबाब ऑन डिमांड है। बाबा ढावा से लेकर दिल्ली के दरबार तक बोन लेस कबाब की ही डिमांड है। अब लोग भी किसिम किसिम के है किन्हीं को शाही बोन लेस कबाब पसंद है तो किन्हीं को मुगलई बोन लेस कबाब। दोनांे कबाब के डिमांड का पता करना है तो भाई लोग युपी चुनाव पर नजर डाल लें, हां चश्मा उतार कर। आजकल शाही बोन लेस कबाब के शौकीन बड़ी संख्या में मिलने लगे है। इसकी फेहरिस्त में अपने लल्लू भैया, दीदी जी, बहन जी और तो और कामरेड भी शामील है। लोग समय समय पर जायका बदलने के लिए कभी शाही बोन लेस कबाब तो कभी मुगलई बोन लेस कबाब की डिमांड में गला फाड़ कर चिल्लाते नजर आतें है।

अब रही बात कबाब में हड्डी की तो यह अब नहीं चलेगा। देखा नहीं बाबा और बुढ़उ का का हाल हुआ। ला-हौल-बिला-कुवत। रामलीला में महाभारत करबा दी बोन लेस के शौकीनों ने। बुढ़उ को तो जंतर मंतर से लेकर आजाद मैदान तक ऐसा पोलिटिकल भूल-भुलैया में फंसाया कि बेचारे की जान पर बन आई। लोग बाग तो यही सोंचतें है, गोया जान है तो जहान है पर बुढ़उ को समझ आये तब न।
भैया, बोन लेस की बात ही निराली है। उनकी तो ठाठ ही ठाठ है। अब आपसे कुछ भी कहां छुपा है, कई लोग रीढ़ की हड्डी निकाल कर बोन लेस बने और माननीय की कुर्सी पर बिराजमान है। जय हो।

(कार्टून- गूगल देवता के सौजन्य से)


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