17 सितंबर 2021

रिलायंस किराना दुकान और ईस्ट इंडिया कंपनी की फीलिंग

रिलायंस किराना दुकान और ईस्ट इंडिया कंपनी की फीलिंग

छोटे से कस्बाई शहर बरबीघा में भी रिलायंस स्मार्ट का किराना दुकान खुल गया। उसमें सब्जी, फल, मसाला, दूध, पनीर, घी, मक्खन से लेकर दाल चावल, बिस्कुट, चाय सभी कुछ उपलब्ध है।
निश्चित ही पूंजीवाद का यह एक सुरसा स्वरूप है। सब कुछ अपने कब्जे में कर लेने की कवायद दिखती है। यह ठीक वैसे ही मुक्तखोरी की बात होगी जैसे जियो मोबाइल। अब हर हाल में ₹200 महीना देना ही होगा। अनुभव लेने मैं भी गया। समान खरीद में आधा घंटा लगा तो बिल बनाने और चेक कर निकलने में एक घंटा।
बहुत कुछ जानकारी नहीं मिल सका पर बहुत भीड़ थी । शुभारंभ को लेकर। ₹16 किलो की भिंडी एक ₹9किलो। लहसुन ₹49 तो गोभी भी ₹49 प्रति पीस, चीनी 40 । बाजार से सस्ता । पता किया तो पता चला कि कंपनी का ही निर्देश है कि बाजार से हर कीमत पर सब्जी की कीमत कम रखना है। चाहे खरीद ऊंची कीमत पर ही क्यों ना हो।

छोटे व्यापारियों, फुटपाथ पर काम करने वाले, ठेला पर सब्जी बेचने वाले, ठेला पर फल बेचने वालों के पेट पर लात मारने की यह एक बड़ी कोशिश है। और इस कोशिश से भगवान भी गरीबों को नहीं बचा सकते। आखिर अम्बानी की कंपनी जो है!

एक जानकारी जो नोटिस में शायद ही किसी ने किया वह यह दे रहा हूं कि कोविड-19 में परदेस से पलायन कर अपने घर आए लोगों का एकमात्र रोजगार का साधन छोटा-छोटा किराना दुकान, सब्जी, फल दुकान बना और गांव, घर, शहर के गली मोहल्ले में किराना दुकान की भरमार हो गई। कमाई भले ही 10-50 हो पर इंगेज लोग हो गए। अब उन पर भी आफत आएगी।
उपभोक्ताओं को निश्चित ही पहली नजर में सामान सस्ता मिल जाएगा। परंतु 1 किलो भिंडी के लिए जब मॉल में लोग जाएंगे तो अतिरिक्त सामानों की खरीदारी का अतिरिक्त बोझ भी बढ़ेगा । ₹9 में 1 किलो भिंडी खरीदेंगे तो एक, दो दूसरों का सामान भी खरीद कर निकलेंगे और मुनाफा मेकअप हो जाएगा। यही फंडा पहली नजर में समझ में आया।

ग्राहकों को भी फायदा है। ठंडा और दूध छोटे से शहर में कीमत से अधिक वसूले जाते हैं। दूध ₹4 प्रति लीटर प्रिंट से अधिक दुकानदार लेते हैं । ठंडा में प्रति बोतल ₹5 एक्स्ट्रा अनिवार्य रूप से ठंडा के नाम पर लिया जाता है। यहां ऐसी बात नहीं है। इसका असर होगा। दुकानदारों को इसपे विचार करना चाहिए। एक दिक्कत जो आम तौर पे दुकानदार करते है वह कम वजन देने का है। यहां वह नहीं है। एक बात यह भी की दुकानदारों में गहरी चिंता है। शाम में सभी दुकानदार यहां समझने बुझने आ रहे। आखिर अब दैत्याकार किराना दुकानदार से प्रतिस्पर्धा है। रणनीति तो बदलनी ही होगी।

यहां पर एक बात नहीं होगी कि जब हम किसी ठेला से सब्जी खरीदते हैं तो उसके घर का चूल्हा जलता है। उसके बच्चे पढ़ते हैं। और उसके घर में खुशहाली आती हैं। परंतु जब हम यहां से खरीदेंगे तो देश के सारी पूंजी के 25 फीसद पर कब्जा करके बैठे चंद लोगों के पूंजी में ही हम इजाफा करेंगे। किसी का भला नहीं हो सकेगा।

कुछ-कुछ ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी फिलिंग होने लगी है। बात भी वैसा ही है। देश में पूंजीवादी सरकार है। गरीबों की सुनने की कोई बात बिल्कुल ही नहीं है और वर्तमान में कोई गांधीजी भी नहीं है जो स्वदेशी आंदोलन जैसा मुद्दा उठा सकें। यहां तो गरीबों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो जाती है।

आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और भूदान आंदोलन जैसे आंदोलनों ने सीलिंग से अधिक जमीन रखने वालों की जमीन पर कब्जा कर लिया। पूंजीवाद की सरकार में देश के 100 पूंजीपतियों के हाथ में 25 फीसद हिस्सा है । पर उसके कब्जे की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता । पर एक न एक दिन गरीब के चूल्हे जब खामोश होंगे तो गरीब की आवाज भी बुलंद होगी। लोकतंत्र में माया फैलाकर बहुत दिनों तक इन आवाजों को दबाकर नहीं रखा जा सकता। रिलायंस किराना दुकान में फल, सब्जी बेचने का विरोध तो किया ही जाना चाहिए। परंतु ऐसा करेगा कौन...? जात, धर्म में बांटें लोगों के शोषण की आवाज भला अब कौन, क्यों और किसलिए उठाएगा...? जय श्री राम...

7 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (24-09-2021) को "तुम रजनी के चाँद बनोगे ? या दिन के मार्त्तण्ड प्रखर ?" (चर्चा अंक- 4197) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. आपने उदाहरण देकर, बहुत ही संक्षिप्‍त में समूची बात कह दी है। साफ लग रहा है कि पूँजीवाद के इस मकडजाल में फँस कर मर जाना ही हमारी नियती बना दी गई है।

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  3. यथार्थ का सटीक चित्रण ।

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  4. इससे सबसे अधिक नुकसान गरीब किसानों और दुकानदारों का होगा जिनकी रोजी रोटी इन्हीं संसाधनों पर टिकी थी इससे गरीबी और अमीरी के बीच की खाई और भी गहरी हो जाएगी कम होने के बजाय यह पूंजीवाद को बढ़ावा ही है जोकि अत्यंत घातक है आने वाले कल के लिए और आज के गरीबों के लिए पर अफसोस गरीबों की यहां किसको पड़ी है यहां तो सबको बस अपनी पड़ी है

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  5. बिल्कुल सही सटीक विश्लेषण मये आतंक पिछले 15वर्षो से बढ़ता हुआ शहरों से कस्बो तक पहुंच गया ठीक डलहौजी के पैर पसारने जैसा अनुभव है।
    साधुवाद।

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  6. गरीब के पेट पर लात है ये.....
    हर हाल में गरीब ही मारा जा रहा है।सही कहा ईस्ट इंडिया कम्पनी जैसा।
    लाजवाब विश्लेषण।

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