धीरज नहीं तो धर्म कहां..?
लखीसराय के अशोक धाम में तीसरे सोमवारी भगदड़ मचाने से आधा दर्जन से अधिक की मौत हो गई। धर्म स्थलों में अब अपार भीड़ है।
नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार हो जाती है। कुंभ, नालंदा शीतला मंदिर, अशोक धाम, यह लंबी सूची है। आम तौर पर इसके लिए प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया जाता है।
परंतु इसमें श्रद्धालुओं का अधीर होना, सबसे बड़ा कारण है। जल्दी से पूजा कर लें, इसके लिए हम, सब कुछ करेंगे।
आज 3:30 बजे जग कर जल्दी जल्दी तैयार होकर, सपत्नीक पंचबदन स्थान शिव मंदिर गया। पिछले सोमवार से अधिक भीड़। डेढ़ घंटा लाइन में लगे। जब नजदीक पहुंचने को थे तो कई लोग जबरन प्रवेश कर रहे थे। मेरे पीछे भी एक आकर लग गया। डांट कर कहा, " यह कैसा धर्म ? तो दांत निपोर दिया। पुलिस का एक जवान था, बोले तो उसने भी कहा, क्या करें सर, आप लोग ही कहते है, रहने दीजिए, तभी होता है...!
महिला पंक्ति में कई महिलाएं जबरन धक्का मुक्की कर के प्रवेश कर गई...! सभी जगह पुलिस संभव नहीं...!
हम, घंटों लाइन में लगे लोगों को धकिया के घुस जाएंगे। पहुंच, पैरवी, रसूख , का उपयोग करेंगे।
और फिर जोर, जबरदस्ती भी। वहीं, जब भगदड़ होगी तो किसी की लाश से गुजर कर हम पूजा करने से गुरेज नहीं करते..! जब कोई शव यात्रा से आयें तो महिलाएं बिना स्नान धर प्रवेश करने नहीं देती, तो फिर यहाँ..? हम, और हमारी धार्मिकता...?
न धीरज, न संवेदना, न सेवा, न सहयोग...फिर धर्म कहां ? भगवान कहां...? और फिर, रील और सेल्फी कल्चर से भीड़ , भेड़िया धसान है...
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