10 नवंबर 2009

प्रभास जोशी नही रहे !

पत्रकारिता जगत के एक ऐसे स्तम्भ का चला जाना निश्चित ही दुखद है जिन्होंने आदर्शो को अपने साथ जिया। प्रभास जोशी का जाना वैसा ही है जैसा की घनघोर अंधेरे मे टिमटिमाते एक दीया का बुझ जाना। पत्रकारों के लिए प्रभास जी प्रकाश पुंज की तरह थे जिसे टिमटिमाता देख बादशाह के द्वारा कराके की सर्दी में मौत की सजा पाने वाले का रात भर तलाव में गुजारना।प्रभास जी को दूर दिल्ली में ही नहीं बिहार के एक कस्बाई नगर बरबीघा मे भी शिददत से याद किया जा रहा है। प्रभास जी को याद करते हुए शेखपुरा जिला के बरबीघा में स्थित नवजीवन अशोक पुस्तकालय विमर्श गोष्टी का आयोजन किया गया जिसमे स्थानिये पत्रकारों के अलावा बारी संख्या बुद्हीजिबी मौजूद थे। गोष्टी में प्रभास जी के द्वारा मिडिया के बाजारीकरण का बिरोध किए जाने का मुद्दा बोलते रहा। खास कर प्रभास जी का बेबाकीपन और साहस की चर्चा करते हुआ डॉ नागेश्वर ने कहा की जोशी को aadarsh मन यदि पत्रकारिता किया जे तो देश के आगे कोई समस्या नही रहेगी।




सोशल मीडिया छोड़ो सुख से जियो, एक अनुभव

सोशल मीडिया छोड़ो, सुख से जियो, एक अनुभव अरुण साथी पिछले कुछ महीनों से फेसबुक एडिक्शन (सोशल मीडिया एडिक्शन) से उबरने के लिए संघर्ष करना पड़ा...