20 अक्तूबर 2010

मां की आंख के आंसू कोई नहीं देखता.

यह भले ही अतिस्योक्ती लग रही हो पर सच यही है. आज नारी शक्ति के उपासना के ईस महापर्व दुर्गापूजा पर यह सब एक बार फ़िर से देखने को मिला वह भी व्यापक समाजिक स्वीकारिता के साथ. एक तरफ़ हम नारी की पूजा करते हैं तो दूसरी तरफ़ वहीं नारी का अर्धनग्न  नांच भी आयोजित करते है और इसकी समाजिक मान्यता भी है. यह बुराई गांव से लेकर नगर तक सब जगह देखने को मिलता है. धर्म के आड मे यह सबसे बडा अधर्म है मां की पूजा तो हम करते है पर रोती हुई मां की आंख के आंसू कोई नहीं देखता.

रंडीबाज

रंडीबाज (लघुकथा, एक कल्पकनिक कथा। इस कहानी से किसी व्यक्ति या संस्था को कोई संबंध नहीं है) चैत के महीने में अमूमन बहुत अधिक गर्मी नहीं होत...