01 फ़रवरी 2011

खुर्शीद कोई नहीं





साथी तुम चिंगारी को हथेली पर सजाना,
डूब कर आग के दरिया के पार जाना।

हर तरफ जुल्मते है इसलिए,
तुम कहते हो बस, कैसा  है जमाना। 

ये साथी तुम अपनी खामोशी तोड़ों,
है यह गलत, ‘‘खुर्शीद’’ को भी मुंह पर बोलो।

तिस्नगी है उनको तो तुम बस तस्लीम न कर,
बुरा कहने की हिम्मत नहीं, तो बंद कर दो मख्खन लगाना।

यह तिजारत की सियासत है दोस्तों,
साथी तुम तो समझों, बंद कर देगें वे धर्म की दुकान को सजाना।



(खुर्शीद-सुर्य)
(तस्लीम-अभिनन्दन)
(तिस्नगी-तृष्णा)

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...