13 फ़रवरी 2011

हंगाम है क्यों बरपा जो प्रिया दत्त और सलमा अंसारी ने सच कह दी है.....



दो बातें एक साथ मन को मथ रही है। पहली यह की सांसद प्रिया दत्त ने कहा कि वेश्याओं को लाइसेंस मिलना चाहिए और दूसरी यह कि उप राष्ट्रपति की पत्नी सलमा अंसारी ने कहा कि बेटियों को मार दिया जाना चाहिए। दोनों बातों को लेकर मीडिया से चौपालों तक हंगामा मचा हुआ है। बहसें हो रही है।

पहली बात पर पहले आतें है। सबसे पहले मैं यह कह दूं कि मैं प्रिया  दत्त के साथ खड़ा हूं। इसलिए नहीं कि इस तरह के विचार को कुछ लोग सराहेगें और कुछ कॉमेंट मिल जाएगें, बल्कि  इसलिए की मेरे विचार से ऐसा किया जाना मानवता के लिहाज से सही होगा। कभी वेश्याओं से पाला तो नहीं पड़ा है पर बचपन से गांव के बरातियों में वेश्याओं का ‘‘नाच का नाच’’ देखा है और मैं शरीफ बनने के लिए यह नहीं कह रहा कि कभी वेश्याओं का नाचना मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं बचपन से ही  इससे बचता रहा हूं। अभी मैं ऐसा ही कुछ झेला है। कथित समाज के प्रतिष्ठित माने जाने वाले एक सज्जन के घर बच्चे के जन्मोत्सव के अवसर पर रंडी की नाच की व्यवस्था की गई थी। माफ किजिएगा, यहां लोग इसी नाम से नाचनेवालियों को संबोधित करतें है। जनाब की तीन पीढ़ी एक साथ रंडी की नाच देखने कम और उसकी ओढ़नी खींचने, छाती दबाने और चुम्मा लेने में एक साथ मशगूल थे। मैं भी आमंत्रित था और भोजन करने के बाद जबरन मुझे भी नाच देखने के लिए रोका गया। बहुत आग्रह-अनुग्रह करके और मैं वहां से जाने का हिम्मत नहीं जुटा सका। नाच प्रारंभ हुआ दस मिनट रूकने के बाद मैं वहां नहीं रूक सक, मेजवान भागे भागे आए तब मैं तपाक से बोला कि मैं यह नहीं देख सकता, मेरे आखों में आंसू भर आए थे। पता नहीं क्यों मैं हमेशा से यह सब देखता हू और भावुक हो जाता हूं।

मेरे मन में जो विचार उस समय आते है वह यह होती है की यह भी किसी की बेटी होगी। किसी की बहन-बीबी होगी।

सवाल यह है कि जिस कथित सभ्य समाज में एक साथ तीन पीढ़ी वेश्याओं का आनन्द लेने से गुरेज नहीं करती वहां यदि वेश्याओं को मान्यता दे दी जाय तो समाज में कौन सी सडा़ंध हो जाएगी। यह समाज तो पहले से ही सड़ा हुआ है। हां एक बात है कि सड़न को छुपा कर रखा जाता है। बाहर नहीं आना चाहिए। सब कुछ बढ़िया। हमलोग वेश्याओं का मजा तो लेना चाहते है पर खुल कर नहीं। सेक्स की इसी पर्दादारी ने हमारे समाज को गंदा किया है।

दूसरी बात यह कि जो सलमा अंसारी ने कही। बेटियों को मार दिया जाना चाहिए। सलमा अंसारी ने कहा तो हंगामा हो गया पर गांव में किसी गरीब के घर जा कर देखिए, उसकी मां रोज कहती है, मर क्यांे नहीं जाती मंुहझौसी, लड़का खोजने में जिंदगी बर्बाद हो रही है। और यह क्यों। मार ही दी जा रही बेटी। छोटे से मेरे शहर मे रोज आधा दर्जन गर्भपात हो रही है कन्या भ्रुण हत्या का। क्यों हो रहा है ऐसा। बेटी क्यों मर रही है। हमही तो हैं गुणहगार। कहीं दहेज, कहीं बलात्कार, कहीं प्रताड़ना। पर सबकुछ ठीक है, सच कोई नहीं कहे। सभी चिल्लातें है पर बिना दहेज अपने बेटे की शादी करने आगे नहीं आते। विचित्र है अपना समाज भी। कभी जना हुआ था हरिद्वार के शांतिकंज आश्रम में। वहां जो लोग सन्यासी बने हुए है उनकी बात बता रहा है। शान से कह रहें है। बेटे की शादी कर दी है। शांति कुंज में तो दहेज लेना पाप है पर किसी को जानने नहीं दिया। सात लाख नकद और गाड़ी मिली।

दरअसल मैं कहूं तो यह कि यह समाज नामक कोई संस्थान है ही नहीं। यह महज बडे लोगों के द्वारा नाम दिया गया एक शब्द मात्र है जिसमें उंचे लोगों के लिए सभी माफ होता है और गरीब पर नियम लागू।

यह तो घोर पाप है अंदर कुछ बाहर कुछ.... अरे एक बार तो सच को स्वीकार कर लो..... कुछ तो सुधरेगा। एक बात तो सोंचनी ही होगी कि हजारों सालों से जिस समाज को हमारे पुर्वज और कथित धर्मगुरू सुधारने की प्रयास कर रहें है वह समाज सुधरने की जगह बिगड़ क्यों रहा है। क्या कमी है सोंचना तो होगा।



कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...