02 अप्रैल 2011

कतर से आये मेरे दोस्त शाहीद का एक नायब तोहफा।




यह एक नायाब तोहफा है जो मेरे दोस्त मो. शाहीद हसन ने खाड़ी के देश ‘‘कतर’’ से लाया है। नहीं यह महज एक मामुली सा चाबी रिंग नहीं है। यह इजहारे मोहब्बत का एक ऐसा नमूना है जिसने दिल को बाग-बाग कर दिया। 

मो. शाहीद हसन उर्फ पुटटू ने यह तोहफा कतर से खास अपने दोस्तों के लिए लाया है जिसमें अपने नाम के साथ अपने दोस्तों का नाम लगाया है। जब से यह तोहफा मिला है पता नहीं क्यों मैं बार बार इसे देखता  है  और कई तरह के सवाल मन को हिलकोर दे रही है। वेशक यह सवाल धर्म की है, राजनीति की है, जाति की है, नफरत की है और मोहब्बत की भी।

बेशक यह एक छोटा सा तोहफा है पर इसके अन्दर की भावनाओं को समझा जा सकता है। मेरे दोस्तों में कई मुस्लिम है जिनके साथ मेरा अपनापा है। इन अपनापों के बीच कई बार हिंदू मुस्लिम के नफरत की आग देश में लगी पर अपनापा और बढ़ता ही गया। इससे पहले मैंने एक आलेख लिखा था जिसमें मुस्लिम समाज के प्रति कुछ तल्ख टिप्पणी थी और उसका वाजिव तर्क भी था और आज भी एक वाजिव तर्क है मुस्लिम समाज के उदार होने का, उसके मोहब्बत का।

शाहीद हसन के अब्बा जान के देहान्त की वह घटना जब वह उस समय भी खाड़ी के देश में अपने परिवार के लिए नौकरी कर रहा था और इधर उसके अब्बा का जनाजा निकलना था। शाहीद के बड़े भईया साजिद हसन उर्फ बब्लू भैया ने हमलोंगों को खबर की और हमलोग तीन चार दोस्त उसके घर पर पहुंचे। पुटटू की कमी नहीं खले  इस लिए हमलोगों ने जनाजे को कंधा दिया। जनाजे के साथ साथ हमलोग फैजाबाद मोहल्ले में स्थित मस्जिद में रूके और नमाजे जनाज में भाग लिया। इतना ही नहीं मौलबी के द्वारा बोले गये शब्दों को दुहराया। यानि नमाज अदा की और फिर कब्रिस्तान में जाकर अब्बा को मिट्टी दी।

ईद का त्योहार मेरे लिये भी खास ही होती है और हम सभी साथी ईद के दिन जो उधम मचाते है और खाने को लेकर छीना छपटि होती है वह यादगार है।

साथ ही मैं यह भी साफ कर दूं कि पुटटू हीं नहीं कई अन्य साथी जिसमें मो. युनूस, मो. तनवीर खान शामिल है छठ पर्व पर मेरे घर आकर अथवा छठ घाट पर जाकर प्रसाद ग्रहण करता है। हिंदू धर्म में छठ का अपना ही एक स्थान है और उसके खरना दिन जो प्रसाद बनाता है उसे पवित्र माना जाता है पर उस प्रसाद को भी सभी दोस्त मिल कर ग्रहण करते है और मेरी मां का आर्शीवाद भी लिया जाता है।

कोई भी शादी हो या त्योहार हम लोग साथ साथ मनाते है नहीं लगता है कि हम लोग अलग है। 

कई बातें याद आ जाती है, जब सोंचता हूं। कोई भी समाज भला बुरा हो सकता है पर आदमी, आदमी होता है और इसका संबंध किसी समाज, किसी धर्म और किसी जाति से नहीं होकर आदमी से है।

मोनू खान

मोनू खान। फुटपाथ पर बुक स्टॉल चलाते वक्त मित्रता हुई और कई सालों तक घंटों साथ रहा। मोनू खान, ईश्वर ने उसे असीम दुख दिया था। वह दिव्यांग था। ...