09 जून 2013

कहीं कौमार्य परीक्षण तो कहीं सेक्स करने पर तीरअंदाज को निकाला, शर्म करो सरकार।

अरूण साथी
लगता ही नहीं कि हम आधुनिक युग में रह रहे है और उसी आदिम युग की रूढ़ीवाद हम पर आज भी हावी है। यदि ऐसा नहीं होता तो एमपी में 350 लड़कियों की शादी से पहले कौमार्य और गर्भवती होने की जांच नहीं होती और पूणे में विश्व तीरअंदाजी टीम की एक महिला और एक पुरूष तीरअंदाज कैंप में सेक्स करते हुए पकड़े जाने पर निकाल नहीं दिए जाते!
दोनों ही घटनाऐं विचलित करती है। पहली घटना एमपी सरकार ने वोट की राजनीति के तहत कन्यादान योजना चलाई है और इसके तहत सरकार अपने खर्चो पर शादी करवाती है और इसी शादी समारोह में भाग लेने वाली कन्याओं का कौमार्य और गर्भवती होने का परीक्षण किया गया। कितनी शर्म की बात है। जिन कन्याओं का सर्वाजनिक तौर पर यह कह दिया जाए की उसका कौमार्य भंग हो चुका है या वह शादी से पहले ही गर्भवती है उसके लिए जिन्दगी मौत के समान हो जाएगी। और खास बात यह कि इन लड़कियों में 90 आदिवासी लड़कियां है।
आज जब हम जानते है कि कौमार्य को तय करने वाली झिल्ली कड़ी मेहनत करने अथवा खेलने कूदने से फट जाती है तो फिर इस परीक्षण का क्या औचित्य? क्या यह उस अधिकारी की धृणित मानसिकता का परिचायक नहीं जिसने इस तरह का कार्य किया? 
अब इस तरह की धृणित कार्य के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माफी मांगी है और इसके जांच की जिम्मेवारी उसी जिले के अधिकारी को दिया गया है। साफ है कि इतना धृणित कार्य करने वाले अधिकारी को बचाने के लिए वहीं लीपापोती का खेल शुरू हो गया। 
वहीं दूसरी घटना झारखण्ड के पवन जाल्को एवं गंुजन कुमारी तीरअंदाज के साथ घटी। दोनों पूणा के कैंप में विश्व कप की तैयारी का प्रशिक्षण ले रहे थे। दोनों की उम्र 21 साल थी। दोनों राजी थे। दोनों ने आपसी सहमति से सेक्स किया। फिर कानून की कौन सी ऐसी धारा है जो यह कहे कि बालिगों को राजी से सेक्स करना अपराध है। पर दोनों को कैंप से निकाल दिया और अब दोनों विश्व चैंपियनशिप में भाग नहीं ले सकेगें।
आदीम युग की कट्टरता छोड़ने के बजाय हम उसे और बढ़ा रहे है। अफसोस की हम तब भी अपने को आधुनिक युग के वासी कहते है?

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