12 सितंबर 2015

कौन शर्मिदा होगा...?


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यादवी पंचायत ने जिस परिवार को गाँव से तड़ीपार कर दिया वह महिला कल अपनी फरियाद लेकर आई और अपने आँचल से बांध रखे कुछ पैसे खबर छापने के लिए देनी लगी । मैं काठ रह गया । मामला मुसापुर,  बरबीघा, शेखपुरा, बिहार का है..


बारह-तेरह साल पत्रकारिता जीवन में ऐसा कई बार हुआ है पर हमेशा यह तेजतर्रार लोगों द्वारा किया जाता था । पहली बार एक पीड़ित आम ग्रामीण महिला द्वारा ऐसा किया था । शुरुआत के दिनों में ऐसा करने वालों पे गुस्सा करता था पर बाद में इस बात की समझ हुयी की ऐसा चलन आम है और इसको तोड़ने की जरुरत है ।

मैंने महिला को समझाया की आपकी खबर मैंने ही पहली बार प्रमुखता से प्रकाशित किया और मैं आपसे मिला तक नहीं था फिर क्यों आज पैसा दे रही है ?

दरअसल एक दौर था मेरे यहाँ जब बिना लिफाफा में पैसा रखे प्रेस विज्ञप्ति तक नहीं आती थी और बाकि बसूली तो खैर कहिये मत । अब शायद कामो बेश इसे ख़त्म करने में सफल रहा हूँ । कम से कम अब न्यूज़ को प्रकाशित करने अथवा रुकबाने के एवज में कोई मुझे पैसा देने का साहस तक नहीं जुटा पाता । और  जब  इसे ही न्यूज़ छप जाये तो कोई पैसा क्यूँ दे.. फिर भी कुछ आज भी है...पर कुछ ही..
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पूछने पर महिला बोली-"बौआ, जहां जहूँ पैसे मांगे हे । सोंचलुं ऐजो लगत । कैसु घर बसा दा ।
महिला के साथ उसकी सास (75 बर्ष) भी थी । बेटे के प्रेम प्रसंग मामले में यादवों ने दो माह पूर्व पंचायत लगा कर बढ़ई परिवार के सारे लोगों को गाँव निकाला दे दिया । उनके मवेशी पे कब्ज़ा कर लिया । घर लूट लिया । महिलाओं के साथ पंचायत में दुर्व्यवहार किया । अब दो माह बाद अन्य लोग गांव में जा बसे पर लड़का के परिवार को बसने नहीं दिया जा रहा है ।
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सुनीता देवी कहती है की उसके एक एकड़ खेत को भी दबंगों ने जोत लिया है । घान लगा दी है । जानवर को बेच दिया है । पुलिस भी उसे ही फटकार लगाती है । वह क्या करे । बेटा गलती किया तो जेल में है । कानून है सजा देगी ।
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समाज के हर क्षेत्र में गिरावट हुयी है । पत्रकारिता भी अछूत नहीं है । समाज के लोग ही यहाँ भी हैं । पर पत्रकारिता की गिरावट से समाज पे दूरगामी असर पड़ा है । जरूत है थोड़ी सी अपने अपने हिस्से की ईमानदारी को बचाये रखने की, इससे बड़ा बदलाव शायद ही हो, पर अँधेरी रात में जुगनू की झिलमिल भी राह दिखती है । एक उम्मीद जागती है । आपने  हिस्से की ईमानदारी बचा लूँ यही बहुत है ...

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर

वोट बैंक में बदला धर्म लोकतंत्र का जहर अरुण साथी ताजिया को अपने कंधे पर उठाए मेरे ग्रामीण युवक बबलू मांझी रात भर जागकर नगर में घूमता रहा। ...