14 सितंबर 2015

स्कूल छोड़ नमाज पढ़ने जाते है बच्चे...!

स्कूल छोड़ नमाज पढ़ने जाते है बच्चे...!




(अरुण साथी) 



नमाज़ पढ़ने के लिए स्कूल को बंद कर दिया जाता है । यह पहली बार अनुभव हुआ । शेखपुरा(बिहार) के  रमजानपुर गांव में । जुमे के दिन नमाज के वक्त सभी बच्चे स्कूल से निकल गए । बच्चों से पूछा तो कहा की नमाज पढ़ने जा रहे है । बहुत तकलीफ हुयी । बाद में स्कूल गया तो देखा की सभी मुस्लिम शिक्षक भी नमाज पढ़ने चले गए और एक मात्र हिन्दू शिक्षक स्कूल में है । यानि स्कूल बंद हो गया । टिफिन के बाद फिर स्कूल नहीं खुला । मुस्लिम की अधिक आबादी इस गांव में है । हालांकि हिन्दू बच्चे भी पढ़ते है पर उनको भी छुट्टी मिल जाती है । 


वैसे तो उर्दू विद्यालय को शुक्रवार के दिन बंद ही रखा जाता है जो की गलत है पर हिन्दू विद्यालय ( बच्चों का दिया नाम) भी जुम्मे के दिन नमाज से पहले बंद हो जाते है । छोटे छोटे बच्चे, जिन्हें पढाई करनी चाहिए वो स्कूल छोड़ कर नमाज पढ़ने जाते है । किसी भी कौम के लिए यह सबसे दुखद बात है । शायद मुसलमानों में धार्मिक कट्टरता का एक बड़ा कारक भी यही है । बच्चों की पढाई को धर्म से अधिक महत्व देना चाहिए...आखिर भविष्य में उनको एक नयी दुनिया गढ़नी है । नया समाज बनाना है । यही कारण है की पढ़े लिखे लोग isis से जुड़ कर नरसंहार कर रहे है । क्रूरतम । और मरने वाले भी मुसलमान ही है । कल ही #Ndtv पे एक रिपोर्ट देखि, कैसे लोग अपने देश को छोड़ कर भाग रहे है और यूरोप के देश उन्हें शरण देने से मना कर रहे है ।  

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और समुन्द्र किनारे सीरिया के एक बच्चे का मिला शव किसे मार्मिक न कर गया होगा । रुला के रख दिया । युद्ध ग्रस्त सीरिया से इसके पिता पलायन कर रहे थे और नाव पलट गयी । पूरी दुनिया इस बच्चे की तस्वीर देख रोई है ।  

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और अपने यहाँ औरंगजेब रोड का नाम बदल के पूर्व राष्ट्रपति के नाम पे मो0 कलाम रोड किये जाने पे एतराज किया गया, धार्मिक कट्टरता चरम पे है । हमारे आदर्श कलाम होने चाहिए,जिन्होंने अपनी विद्वता से दुनिया में अपनी पहचान बनायीं न कि औरंगजेब, जिसकी क्रूरता अपनों को भी नहीं बख्सा... 

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हालांकि हिन्दू होने के नाते हिन्दू कट्टरपंथियों को मैं क्लीन चिट नहीं दे रहा । दोनों सामान है । जहर जहर है । हिन्दू और मुसलमान नहीं । 

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पर एक फर्क है, कई हिन्दू अपने धर्म के कट्टरता के खिलाफ आवाज बुलंद करते है और एम् एम् कुलबर्गी की तरह मारे जाते है पर मुस्लिमों में यह नगण्य है (शायद एक आध हों, जैसे तस्लीम नसरीन)  बल्कि कई जागरूक मित्र की उन्मादी पोस्ट मर्माहत कर जाती है ।  

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मेरा सिर्फ यह कहना है की शिक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं, बच्चों को बख्स दो । उसे स्वतंत्र करो । उसे समझने दो । मुक्त होने दो । और तब वह अपना धर्म स्वयं चुन लेगा...जो सेवा, करुणा और प्रेम का होगा.... 


(कृपया तार्किक तर्क दें, तथाकथित धार्मिक कट्टरपंथी मूढ़ों को यहाँ जहर उगलने कीजरुरत नहीं है)

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