04 सितंबर 2016

जोरू का गुलाम

जोरू का गुलाम
*अरुण साथी*
साथी ने पत्नी जी से पूछा
"बंदरी
जिसे पाकर तुम
अपने जीवन को
बेकार समझती हो,

नाकारा, नल्ला
नासपीटा, कालमुँहा
कहके जिससे
साल भर झगड़ती हो,

उसी मुंहझौंसे के लिए
तुम निर्जला व्रत क्यूँ करती हो..?

बंदरी
खिसियाई,
खिंखियाई
फिर लजाते हुए
फरमाई

"तुम मानों न मानो
पर मैं तुमको बहुत
प्यार करती हूँ,

और
जोरू की गुलामी करते रहो
बस इसीलिए तो व्रत करती हूँ...

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मौत से लड़कर रोहित का चला जाना.. गम दे गया.. (अरुण साथी) मुझे ऑक्सीजन की जरूरत है, कहाँ मिलेगा.…..तकलीफ हो रही है...रोहित का कॉल। एक लड़खड़ात...