11 जून 2017

एक गोली मुझे भी मार दो...

एक गोली मुझे भी मार दो न..

(अरुण साथी, बरबीघा, बिहार)
हरिया। यही मेरा नाम है। किसान हूँ, अक्सर किसानों का यही नाम होता है । जब से सरकार ने गोली मारने के बाद एक करोड़ मुआवजा देने का ऐलान किया है तभी से सोच रहा हूं क्यों ना मैं भी मर ही जाऊं। परेशानी यह है कि गोली सरकारी होगी तभी तो एक करोड़ का मुआवजा मिलेगा क्योंकि आत्महत्या करने के बाद कर्ज माफी तक नहीं होती।

खैर, कोशिश करके देखता हूं। हां, इसके लिए कुछ आवश्यक चीजें जरूरी है। जैसे कि किसी विपक्ष के नेता का सहयोग और समर्थन, जो कुछ लोगों को जुटाकर उग्रता कराए और इसी बीच पुलिस गोली चला दे जिसमें मैं मारा जाऊं या फिर मीडिया का समर्थन जो मेरे दर्द को दिखाएं कम, चिल्लाये ज्यादा और पूरे देश में हाय तौबा मच जाए। क्योंकि मरता तो मैं रोज ही हूं पर तब हंगामा नहीं मचता। बिपक्षी नेता और सपक्षी मीडिया खामोश रहती है। सौ रुपये का अनाज उपजा कर अस्सी में बेचना मरने से कम है क्या? पानी, दवा के लिए तिल तिल कर मरना, मरने से कम है क्या? पर एक पैसे का मुआवजा कहां कभी मिलता है। और सोशल मीडिया की तो पूछो मत साहब। शास्त्रों, पुराणों में जिस स्वर्ग की बात कही गयी है वह यही तो है। एक से एक संत महात्मा, छोड़िये। भटके हुए के साथ फालतू में भटकना कैसा।

इसी बीच कभी कभी सोचता हूं कि एक सरकारी गोली खाकर मर भी जाऊं तो एक करोड़ कितना होता है मुझे कहां पता! तीन जीरो या चार जीरो से अधिक पैसे नहीं देखे है इसलिए कितना होगा क्या पता! शायद दो तीन बक्से में आ जाए। अरे, उसे रखूंगा कहाँ! यही परेशानी हो जाएगी। फिर अचानक यह भी सोचने लगा, चलो मान लिया कि सरकार की गोली लगी, तुरंत मर गया तो एक करोड़ मिल जाएगा। बाल-बच्चों के जीवन बन जाएंगे। शायद एक करोड़ में दो-तीन पीढ़ी आराम से काट ले पर इतने पैसे मिलने के बाद मेरे बच्चे किसान भी तो नहीं रहेंगे! वह खेती छोड़ देंगे! अनाज उपजायेगा कौन? लोगों को खिलाएगा कौन? अरे किसान रहकर तिल तिल क्यों मरना। बात खत्म करो। एक बार सरकारी गोली से मारो। सात पुस्तों को धनवान करो। चिंता छोड़ो, सुख से जिओ।

अरे सुना है सरकार हमारी मौत पे एक दिन का उपवास भी करेगी। आह! सुखद! सौभाग्य! यहां तो सालों उपवास करता हूँ तो कोई पूछता नहीं।

अच्छा, ऐसा हो सकता है, क्यों नहीं, हां क्यों नहीं होगा। सरकारी गोली खाओ आंदोलन पूरे देश में चले। हम सब किसान सरकार से कहें कि हमें गोली मार दो। गोली मारने के बाद एक करोड़ का मुआवजा तो मिल ही जाएगा! हाड़ तोड़ मेहनत, खून पसीना बहाकर, खेतों में हल चलाकर, मजदूरी करके हजार नहीं जुटा पाते तो एक गोली खाकर करोड़ों मिले तो
कौन नहीं मरना चाहेगा...चलो, चलो हमसब मरते है...हम सब किसान सरकारी गोली खाकर मरने के लिए तैयार है...आप मुआवजा देने के लिए तैयार रहो, सरकार बहादुर...एक गोली मुझे भी मार दो...



कविवर को नमन

किसान (कविता) / मैथिलीशरण गुप्त हेमन्त में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है हो जाये अच्छी भी फसल...