23 दिसंबर 2018

छुट्टा सांढ़...

( व्यंग्यात्मक रचना है दिल पे न लें)

तीन विकेट उखड़ते ही दो बातें हुई। एक, हूआ हूआ कर रहे सियारों का शोर ऐसे थम गया जैसे रंगा सियार का राजफाश हो गया हो। दूसरा, बच्चा क्लास से लगातार दादा जी और दादी जी की पैरवी से ग्रेस मार्क्स लेकर चौथा क्लास में लगातार चौथी बार फैल कर रहा पप्पू पास हो गया।

दोनों बातों के होते ही, फिर दो बातें हुई। एक, जैसे गांव देहात में एक लबनी धान होते ही डमरू दारू पीकर नितराने लगता है वैसे ही पप्पू की टीम नितराने लगी। दूसरी, गप्पू की टीम ऐसे ओलहन देते हुए अरझि परझि मारने लगी जैसे रामपुरवाली चाची भर ट्रक दहेज लाने वाली नई नवेली दुल्हिनिया को बात बात एक चौका में पीढ़ा नहीं देने के लिए ताना देती हो।

दोनों बातों के होते ही, फिर दो बातें हुई। एक फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप से आम आदमी ऐसे भाग खड़ा हुआ जैसे खेत में छुट्टा सांढ़ के आते ही गाय-गोरु सब साईड धर लेता है, चरने दो मन भर! जो बचेगा उसी को चरेंगे! और सांढ़ चरता कम है, खेत की फसल को बर्बाद ज्यादा करता है। जितना चरता है, जाने कैसे उससे ज्यादा गोबर करता है। गंध मचा देता है। बदबू फैला देता है।

दूसरी बात, फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप पे विजेता टीम ऐसे जश्न रूपी उधम मचाने लगी जैसे राजा जी की भैंस बियाने पे गांव भर जोरदार पार्टी में उधम होता है।

डीजे के फूल वॉल्यूम फूल अश्लील ही नहीं उससे दो कदम दोअर्थी भोजपुरी गाना और नर्तकी नृत्य, बम पटाखा और दोनाली से धड़ाम धड़ाम! जाम पे जाम। सब कुछ।

खैर ई सब के बीच अपने रामखेलाबन काका गांव के चौखंडी पर बक रहे थे।

"देख बौआ, शक्ति के संतुलन जरूरी हउ...उहे होलो..एकरा में अनपच काहे हो...तो सब जे एत्ते एत्ते काम गिना रहली हें से कन्ने हउ। अरे कजगा पर तो सब दिन अच्छा दिन रहबे कैल हें! धरतिया पर ने उतार मर्दे त जनियो..भाषण से कत्ते दिन पेट भरत...!"

(छुट्टा सांढ़ का मतलब समझ नहीं आया हो तो किसी बिहारी से पूछ लीजिएगा..ठीक है..)







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