04 दिसंबर 2018

गौ हत्या के नाम पे इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या भीड़ ने नहीं की, विचारधारा ने की है..

अरुण साथी

शहीद सुबोध सिंह इंस्पेक्टर के पुत्र ने हम सब से पूछा है कि "आज हिंदू मुस्लिम विवाद में मेरे पिता की मौत हुई है? कल किसकी होगी? यह भी बता दो यार.. क्या इसका जवाब है हम सब के पास?"

बुलंदशहर में गौ हत्या ने नाराज लोगों ने सुबोध सिंह इंस्पेक्टर सहित दो लोगों की हत्या कर दी। यह हत्या भीड़ का इंसाफ है परंतु इस हत्या से खून के छींटे उन सब के दामन पर हैं जो धर्म और भावनाओं की राजनीति करके ऐन केन प्रकारेण इस तरह की कोशिशों को तर्क वितर्क करके सही ठहराते हैं।

यह आग जो आग लगी है यह एक दिन की नहीं है। बरसों से इसे हवा दी जा रही है। जब भीड़ की हत्या में शामिल हत्यारों को हम फूल-माला देकर सम्मानित करते हैं। सोशल मीडिया पर उनके कसीदे गढ़े जाते हैं और धर्म का जिंदाबाद कहा जाता है तब यह उसी समय तय हो जाता है कि एक हत्यारे के साथ खड़ा होकर कहीं ना कहीं हम भी उस हत्या में शामिल है।

उत्तर प्रदेश में जो हत्या हुई है उसमें कम से कम उन लोगों को शोक व्यक्त करने का जरा भी अधिकार नहीं है जो धर्म की राजनीति को हवा देते हैं। ऐसा जब मैं कह रहा हूं तो इसका मतलब मेरा एक पक्ष से कतई नहीं है। जो लोग शरीयत के नाम पर चीजों को सही ठहराते हुए आंख मूंदकर किसी का विरोध करते हैं वैसे लोग भी इसी में शामिल हैं जो गौ हत्या के नाम पे आदमी की हत्या जैसे मामले में खामोश होकर या तर्क से सही ठहरा कर छाती चौड़ी करते हैं।

आज देश में बिलकुल ही खतरनाक स्थिति है और यह खतरनाक स्थिति केवल इसलिए नहीं है कि एक पक्ष के कट्टरपंथी हावी हैं और उनकी सरकार है। बल्कि इसलिए भी है कि दूसरे पक्ष के लोग केवल एक पक्ष को ही तुष्टीकरण करते रहे जिससे नाराजगी की वजह से दूसरा पक्ष आज भारतीय जनता पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है।

भारत के सेकुलरिज्म को दक्षिणपंथी से उतना खतरा नहीं है जितना सेकुलरिज्म के नाम पर एक पक्ष को समर्थन करने की राजनीत से है।

वोट बैंक के लिए जब हम एक पक्ष का समर्थन करते हैं तो दूसरा पक्ष भी ध्रुवीकरण होता है। आज इस वैश्वीकरण के युग में जब दुनिया मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे रही हो

मेरा देश अमानवीयता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भले ही हम युवा पीढ़ी के डंके बजाते हो परंतु आज युवा पीढ़ी के मन में प्रगतिशीलता, विकासवाद और पोंगापंथी के खंडन की बात नहीं है बल्कि उनके माथे में धर्म का नशा है! उन्माद है! गुस्सा है! जहर है! विस्फोट है! विध्वंस है! सर्वनाश है!

इस आग को वोट के लिए जो भी हवा दे रहे हैं आज नहीं तो कल उनका भी घर चलेगा और जल भी गया है! उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में शहीद इंस्पेक्टर इसी के उदाहरण है। आगे और भी भयावह स्थिति होने वाली है।

सुबोध सिंह को मेरा नमन! सुबोध सिंह की हत्या केवल उस भीड़ ने नहीं की जो उस समय वहां थी बल्कि उसने की है जो उस भीड़ के साथ हमेशा से खड़ी है! हत्यारा होते समाज को मेरा धिक्कार है...

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