11 नवंबर 2020

नीतीश कुमार इस जीत पर इतरा नहीं सकते, बस; अंत भला तो सब भला


अरुण साथी

सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर दिए गए एकतरफा जीत और बहुमत को आखिरकार साइलेंट वोटरों और महिलाओं ने नकार दिया। अंततः जीत सोशल मीडिया पर दिखने वाले हवाबाजी से हटकर गांव देहात में प्रभावित मतदाताओं की वजह से हुई। देशभर में नरेंद्र मोदी के विरोधी खेमे ने बिहार में भी नरेंद्र मोदी को चित करने के सारे दांव खेल दिए। सभी तरह के हथकंडे भी अपनाएं। एग्जिट पोल के बाद जश्न भी मनाया। परंतु बिहार की जनता ने नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की पिछली सरकार के किए गए कामों को डरते-डरते ही सही अपना समर्थन दे दिया। भाजपा है तो भरोसा है । यह बिहार चुनाव का स्लोगन भी इस बार कारगर रहा।

पहले ही कहा था कि अति पिछड़ा और महिलाओं की ताकत को नकारा नहीं जा सकता। बिहार के बौद्धिक और व्यवसायी वर्ग में लालटेन के आने से डर का माहौल भी होने के बात पहले कह रहा था। आखिरकार यह कारगर हुआ।


हालांकि ज्यादातर सीटों पर बहुत कम अंतर से हुए इस जीत पर नीतीश कुमार और भाजपा वाले इतरा नहीं सकते। जीत के संकेत स्पष्ट हैं। मतदाताओं ने नीतीश कुमार की सरकार को कड़ी चेतावनी दे दी है। 


जनहित से हटकर काम करने, प्रशासनिक दबंगई, भ्रष्टाचार, झूठी शराबबंदी से त्रस्त जनता नीतीश कुमार के साथ तो गई है परंतु चेतावनी भी स्पष्ट दे दी है। 

सरकारी नौकरी के नाम पर नियोजन का अंधकारमय भविष्य देना। जॉब के लिए प्रदर्शन करने पर लाठी खाना। नौकरी के एग्जाम में भ्रष्टाचार और कई साल तक इसे लटकाना। कोर्स खत्म होने में कई साल अधिक लगना, युवाओं के नाराजगी का प्रमुख कारण रहा। इसे नजरअंदाज करना फिर से भारी पड़ सकता है। खासकर बीजेपी के लिए।


इस बार जीत के कई मायने निकाले जाएंगे। सब कुछ कहना जल्दबाजी होगी। परंतु नीतीश कुमार के द्वारा चिराग पासवान को नकार देना गंभीर साबित हुआ। चिराग पासवान साथ होते तो संशय के बादल सुबह में छट गए होते। और यह भी कि तेजस्वी यादव ने पिता की प्रेत छाया से निकलकर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा दी है। अब चुनाव के कुछ दिन पहले सबको साथ लेकर चलने वाले अपने भाषणों को कितना सही ठहराते हैं यह वक्त बताएगा। उनके भाषणों पर कुछ लोगों को भरोसा नहीं हुआ और उनके वापसी का यही एक कारण रहा।


इस चुनाव में बीजेपी की दमदार उपस्थिति बिहार में नए सवेरे के संकेत भी है। आखिरकार 19 लाख युवाओं को रोजगार देने के दांव बीजेपी का कारगर भी हुआ और अंत भला तो सब भला, मेरा आखिरी चुनाव का भावनात्मक संदेश भी लोगों को प्रभावित किया। अब जरूरत है एनडीए के नेताओं को मिल बैठकर आत्मचिंतन करने की। पिछली सरकारी नीतियों की समीक्षा करने की।




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