03 जनवरी 2026

बेचैन संसार, सोशल मीडिया में हाहाकार और मौत का धार्मिकीकरण

बेचैन संसार, सोशल मीडिया में हाहाकार और मौत का धार्मिकीकरण

अरुण साथी 

वागर्थ का दिसंबर अंक के संपादकीय में संपादक शंभू नाथ जी ने ऐसे सवाल उठा दिए हैं जो  बेचैन करता है...!

और यह बेचैनी तब और बढ़ जाती है जब  भीड़ की हिंसा में कथित धर्म के नाम पर मनुष्यता की मौत हो रही है। और यह बेचैनी और अधिक बेचैन करती है जब भीड़ की हिंसा में मरने वाले का धर्म जानकर कर दुख या आक्रोश व्यक्त करने का चलन चरम पर है। इसमें कोई बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास सहित कई हिंदुओं की मौत पर उबाल ले रहा तो वहीं अपने ही देश में भीड़ की हिंसा पर चुप्पी रखते है।

इसके ठीक उलट, भारत में मुसलमानों की भीड़ की हिंसा में मौत पर दुनिया भर में कोहराम मचाने वाले, बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या पर चुप्पी साध लेते है। और हिंसा तथा मौत का यह धार्मिकीकरण मनुष्यता को मारने का सबसे घातक हथियार बन गया है।

इसी में बांग्लादेश के क्रिकेटर रहमान को आईपीएल के अपने टीम में लेने पर शाहरुख देश द्रोही हो जाते है, तो बीसीसीआई और आईसीसी के प्रमुख जय शाह इस खरीद पर रोक नहीं लगाने पर भी देश भक्त बने रहते हैं। 

और यह भी , क्रिसमस में भारत में सर्व धर्म समभाव खत्म हुआ। दूसरे धर्म के प्रति असम्मान तीक्ष्ण हुआ। पर हम यह नहीं देखते कि कट्टरपंथ की राह चले, अफगानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान इत्यादि देश आज कहां हैं..?

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अब जरा गौर करें। बिहार के नालंदा निवासी अतहर हुसैन साइकिल पर सवार होकर धूम धूम कर कपड़ा बेचते थे। नवादा में 5 दिसंबर को धर्म से घृणा की भेंट वे चढ़ गए। पीट पीट कर उनकी हत्या कर दी गई। यह मामला कितने लोगों को पता है...?

23 दिसम्बर को केरल के वलायर थाना क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के राम नारायण को भीड़ ने बांग्लादेशी कह कर पीट पीट कर मार डाला..!

26 दिसंबर को देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजल चकमा को चीनी समझ कर हत्या कर दी गई...!

सूची लंबी है। पालघर में साधुओं की हत्या, अमृतसर में निगाहों द्वारा हिन्दू युवक की हत्या और वीडियो बना...! अंतहीन सिलसिला है। खैर अब पढ़िए इसे

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उत्तर आधुनिकता, इस संदर्भ में वागर्थ के दिसंबर अंक के संपादकीय में संपादक शंभू नाथ जी ने कई प्रश्न उठाएं  हैं।

एक प्रश्न देखिए, 

"सत्यमेव जयते सत्य नहीं रह गया। हर बार जीतने वाला और जो सबसे कुशलता पूर्वक प्रचारित है, वह सत्य बन गया..?"

यह कितना बड़ा प्रश्न खड़ा किया है इन्होंने? 

"इतिहास को जब-जब राजनीतिक दृष्टिकोण से दोबारा लिखने की कोशिश होगी कुछ बिंदुओं पर अतीत के प्रति अंध श्रद्धा और कुछ बिंदुओं पर अतीत का विस्मरण या अतीत के महान हिस्सों का विस्मरण घटित होगा...?"

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"इन दिनों सत्ताएं रामायण के बाली की तरह है। वे विपक्ष की शक्तियों का अपहरण कर लेती हैं। आमना-सामना होने पर विपक्ष का आधा बल हमेशा बाली के पास आ जाता था। आज वही वाली सिंड्रोम है..?"


यह प्रश्न तो अति गंभीर है, 

"उपभोक्तावाद और राजनीतिक भिन्नतावाद द्वारा लोगों का कैसा सांस्कृतिक आत्म हरण है कि मनुष्य कुछ खुद कुछ सोच नहीं पा रहा। वह किसी भी प्रचारित सूचना पर संदेह नहीं कर पा रहा....?"
बस, इस अंतिम पंक्तियों को कई बार पढ़ें। सोचें, क्या आप स्वयं कुछ सोच पाते है या नहीं...यदि हां तो ठीक है, यदि नहीं तो... सत्यानाश...


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