06 अक्टूबर 2026

भले लोग बहुत हैं (यात्रा वृतांत)

भले लोग बहुत हैं 

यह ट्रक की सवारी का चित्र है। पिछले दिनों मोकामा से घर आना था। इस मार्ग में आज भी यात्री वाहन कम ही चलते हैं। संध्या का समय था। मेरे मित्र अभय जी हमेशा यहां से अपने घर ट्रक अथवा किसी से भी सहयोग लेकर ही पहुंचते हैं। उनका प्रयोग मैंने भी आजमाया। एक दो को हाथ दिया । गाड़ी नहीं रुकी। 

फिर एक को हाथ दिया। ट्रक सामने नहीं रुका। थोड़ी दूर जाकर रुका। दौड़ कर चढ़ गया। अंदर दो लोग थे। आत्मीयता से स्वागत किया। 
"कहां जाना है?"
"बरबीघा"
"मैं सरमेरा जाऊंगा..।"
"ठीक है, वहीं उतार दीजिएगा..।"

बैठ गया। फिर बातचीत शुरू किया। क्या नाम। कहां घर। आदि इत्यादि। औपचारिकता। चालक के बगल में बैठे व्यक्ति ने अपना नाम शायद संजय बताया। घर नालंदा जिला के परवलपुर के सोनचरी।


 हम बिहारी साधारणतः नाम, अथवा पिता का नाम पूछ कर उपनाम से जाति का पता करते है। और यदि यह जुगत काम न आए तो गांव का नाम से भी जाति का पता लग जाता है। 

सो, मेरे गांव का नाम शेरपर जान कर उन्होंने अपनी रिश्तेदारी बताई। मैंने उनके गांव का नाम जानकर, अपने रिश्तेदार का परिचय दिया। और इस तरह, बिना पूछे दोनों एक दूसरे के स्वजातीय का आत्मसात कर लिए। किसी ने किसी से स्पष्ट रूप से जाति नहीं पूछी! 

खैर यात्रा आगे बढ़ी, तो नया बिहार, पुराना बिहार, जंगलराज, संघर्ष और विकास के साथ साथ उद्योग और रोजगार, सबकुछ विमर्श का केंद्र बिंदु रहा। 

चर्चा कि शुरुआत मैंने ही किया। अपनी मातृ भाषा, मगही में। 
पूछा, "कहाँ से आ रहलो..?"
"नेपाल के वीरपुर से।"
"कौची लादले हो.."
"रिफाइन तेल हो.."

इस वार्ता में उन्होंने बताया कि अजीब अर्थव्यवस्था है। बताया कि कुछ केमिकल है जो बिहार से नेपाल जाता है और नेपाल में तेल बनता है फिर उसे बिहार और झारखंड इत्यादि में बेचा जाता है। वह समझाने की भी कोशिश कर रहे थे कि यह सब चीज बिहार में भी बन सकता है, परंतु नहीं बन रहा है।

यह भी बताया कि वह 1995 से ही गाड़ी चला रहे हैं। कमाने खाने में लाज कैसा..? 

 बताया कि पहले कहीं भी कोई रोक कर लूट लेता था, मारपीट करता था। आज यह सब नहीं होता है। सड़क की भी बहुत बिहार में अच्छी हो गई है। हालांकि पुलिस की वसूली पहले जितनी तो नहीं होती, परंतु अभी भी यह जारी है।


एक प्रसंग में बताया कि वह लखीसराय जिला के बड़हिया से सन 2000 में गाड़ी चला कर आ रहे थे तो उनकी गाड़ी को दबंगों ने पकड़ लिया और फिर खेत में ले जाकर उससे एक सप्ताह तक फसल की ढुलाई करवाता रहा और फिर जाने दिया।

खैर, मैं सरमेरा में उतर गया। हालांकि अनुभव नहीं होने की वजह से उतरने के क्रम में धड़ाम से सड़क पर गिर गया, बगल में खड़ी कुछ महिलाएं हंसने लगी।


05 अक्टूबर 2026

अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म

अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने क्या लिख दिया!
इसे शब्दों में लिख पाना कठिन है। हाँ, जो महसूस हुआ, वह बेहद विचलित करने वाला है। इस महीने में पढ़ा गया यह एक ऐसा उपन्यास है, जो प्रेम-प्रसंग के माध्यम से उपनिषद के ज्ञान को जिस सहजता से रख देता है, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।

कुछ प्रसंग यहाँ रख रहा हूँ। इसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि शायद कोई इसे पढ़कर इस पुस्तक को खरीदने और पढ़ने के लिए प्रेरित हो जाए।

पुस्तक में संन्यास आश्रम से बड़ा गृहस्थ आश्रम बताया गया है।
पढ़ते-पढ़ते समझ आया कि गृहस्थ जीवन निकृष्ट जीवन नहीं है।

आत्मा के प्रसंग में लिखते हैं—
“आँख क्या है? देखने का साधन है। जो देख रहा है, वही आत्मा है।”

“एकांत का ताप बड़ा तप नहीं है।”

"विवाह के माध्यम से पुरुष और स्त्री पूर्णता प्राप्त करते हैं और संसार के सबसे बड़े लक्ष्य—प्रेम—को प्राप्त करते हैं।"

“किसान की स्त्री हूँ, भीख नहीं माँग सकती...?”

“पति की कामना के लिए पति प्रिय नहीं होता, अपने आत्मा की कामना के लिए पति प्रिय होता है!”

“पत्नी की कामना के लिए पत्नी प्रिय नहीं होती, अपने आत्मा की कामना के लिए पत्नी प्रिय होती है!”

एक जगह संवाद है—

“आप बिना परीक्षा किए ही कोई बात मान लेते हैं? विचित्र है। यह तो नेयता हुई। यही शूद्र धर्म है।”

यहाँ एक और बात मन को छूती है—

“कोई चिंता नहीं। रास्ता ही रास्ता बता देता है। कुछ करते-करते ही सही ढंग सीखा जा सकता है।”

वर्तमान राजनीति के लिए भी संवाद है,

"तपस्या और स्वाध्याय के क्षेत्र में राजा का किसी प्रकार का दबाव धर्मसंगत नहीं है।"

विवाह के एक प्रसंग में (दहेज) के संदर्भ में संवाद आता है—
“धन-संपत्ति तो छोटे लोगों में देखी जाती है, ब्राह्मण लोगों में तो विद्या और ज्ञान देखा जाता है।”

और प्रेम...
एक ऋषि कुमार अपनी प्रेयसी जबाला का ध्यान करके ही ध्यानस्थ हो जाता है। बस...

जानश्रुति शूद्र राजा थे—यह भी आभास हुआ कि शूद्र भी राजा होते थे।

यह भी समझ आया कि उपनयन संस्कार गुरु अपने शिष्यों का करते थे और इसका जाति से कोई संबंध नहीं था। 

17 सितंबर 2026

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल युपीआई को पहले अंगेजों की चाय की तरह ही लत लगा दी गई। अब आनलाइन चुंगी बसूला जा रहा। इसमें कुतर्कों का जंजाल भी है। आम आदमी उलझा हुआ है। सरकार यही करती है। उलझा दिया तो काम बन गया। साधारण बुद्धि में जो बात समझ में आई है, वह यह है कि आनलाइन चुंगी का भार आम अदमी पर ही पड़ेगा। तर्क, कुतर्क जो हो। कौन क्या कहता है, इसमें नहीं पड़ना चाहिए। आपके साथ क्या होता है, इसे देखिए। जैसे कि रसोई गैस, चीनी इत्यादि का दाम पांच-दस रुपये बढ़ते ही समोसा और मिठाई का दाम व्यापारी डेढ़ गुणा बढ़ा दिया। उनका साधारण सा तर्क होता है, सबकुछ मंहगा हो गया। तो यह तर्क तो कुतर्क ही है कि आनलाइन चुंगी का भार आम आदमी पर नहीं पड़ेगा। व्यापारी हर भार ग्राहक पर ही देतें हैं। यह व्यापार का प्राथमिक नियम है। जिस बड़े दुकान में चाय या ठंढ़ा पिलाया जाता है, उस दुकान का साधारण बुद्धि का ग्राहक भी यह समझता है कि इसका भार भी उसी के उपर जुटेगा।
अब साधारण भाषा में यह। दो हजार एक रुपये की खरीद पर दस रुपये चुंगी लगेगा। इसमें से आठ रुपये बैंक को ही जाएगा। दो रुपये क्युआर कोड और एप को जाना है। साधारण बात यह कि बैंक पहले से अत्यधिक कमाई में है। अर्थशास्त्र के जानकार अनुमान लगा रहे है की आनलाइन चुंगी से बीस हजार करोड़ से अधिक की कमाई होनी है। तब साधारण आदमी यह क्यों नहीं समझेगा कि यह अमेरिका के दबाब में लिया गया निर्णय है। क्योंकि यह सब नि:शुलक होने पर बीजा और मास्टर कार्ड कंपनी की दाल नहीं गल रही थी। खैर, मुझे तो याद नहीं कि कब पैसे की निकासी बैंक से की है। मोबाइल होना चाहिए। कई बार खाली जेब लेकर पटना आना-जाना हुआ। अभी पिछले महिना परेशानी भी हो गई। महावीर मंदिर के पास एक साधारण से होटल में भोजन किया। निश्चिंत था की आनलाइन देंगे। देने गया तो कहा गया कि नहीं लेगें। मालिक नहीं है। तब काेई उपाय नहीं सूझा। दुकानदार समझ गया। भला मानस था। बोला कभी दे दिजिएगा। खैर, संयोग से एटीएम पास में था। पर पिन याद नहीं था। बड़ी मुश्किल से पैसे निकाल कर उसे शाम में दे गया। उधर, आनलाइन पैसे की वजह से श्रीमति की अपनी परेशानी है। कहती है कि अब तो जेब खाली रहो हो, कि निकालिओ, ई मोदिया जे करै चित्र- टाल का मछली बाजार

12 सितंबर 2026

अथ श्री नाराज फूफा कथा ..

नाराज फूफा ..
(हास्य व्यंग्य: अरुण साथी)

मुखिया जी ने फिर फेंका है। वैसे तो फेंकने की कला में मास्टर डिग्री और शोध कार्य का प्रमाण पत्र देने वाले विश्वविद्यालय का मुखिया जी प्राचार्य हैं, तब भी इस बार का फेंकना प्रमाणिक हो गया है।
फेंकने की इस कला का प्रदर्शन तो मुखिया जी ने तभी कर दिया था, जब कहा था अच्छे दिन आएंगे..! डेढ़ दशक के बाद इसे लपकने वाले आज कारुणिक क्रंदन कर रहे हैं।

खैर, चाय की चौपाल में खेलावन काका से किसी ने पूछा तो उन्होंने विस्तार से व्याख्या की।

"बच्चा, अच्छे दिन आएंगे" में (मेरा) शब्द गुप्त था। "सबका साथ, सबका विकास" में वोट शब्द गुप्त था। अब कोई इसको नहीं समझता है, तो यह उसका अपना दोष है।


मुखिया जी ने फिर फेंका । दिमागी नक्सली। अब सभी जय जय करने लगे। अब वही दिमागी नक्सली जब नीला रंगदारी और तिलचट्टा अवतार में आए तो उनका अक्षत–चंदन से स्वागत किया।

खैर, अब नाराज फूफा ! 

खेलावन काका कहते हैं, 

"फूफा अर्थशास्त्र के उपयोगिता के ह्रास नियम का प्रमाण है। ठीक वैसे ही, जैसे मार्गदर्शक मंडल।

"पहले जिनके घर में आने पर उनका स्वागत 56 भोग से होता था, आज सूखी रोटी के लिए कोई नहीं पूछता..!"

काका ने संत भाव से कहा,

" बच्चा परिवर्तन ही संसार का नियम है!"

जब भी घर में नया मेहमान आता है, पुराने मेहमान फूफा बन जाते हैं।

काका, मन ही मन बुदबुदाने लगे,
"इस रंग बदलती दुनिया में .."
आज बस इतना ही, बाकी सब ठीक है...

29 अगस्त 2026

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग।

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग। 

यह एक सुखद संयोग रहा कि बिहार योग विद्यालय मुंगेर जाना हुआ । 

आश्रम में प्रवेश से पहले कड़े नियमों को कड़ाई से पालन के बारे में संयोजक चैतन्य मूर्ति और राहुल जी ने सब कुछ समझा दिया था।
हमें अन्नपूर्णा भवन में आश्रय मिला। एक कमरे में तीन यात्री। 

कड़े नियमों से पहले तो यही था कि नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करें। मोबाइल प्रयोग वर्जित है (किसी का मोबाइल जब्त नहीं हुआ)। अपने सारे कार्य स्वयं करने हैं। 


संध्या 7:00 बजे के बाद मौन व्रत का पालन करना अनिवार्य होगा। एक दूसरे के कमरे में नहीं जाना है।

सुबह 4:00 बजे से दिनचर्या शुरू होकर 7:00 बजे संध्या समाप्ति है। इसमें योग, कर्म योग, मंत्र उच्चारण, शवासन , सत्संग, वायु साधना में सहभागी होना है। भजन कीर्तन भी शामिल है। योग आश्रम में किसी भी देवी देवता का चित्र अथवा मूर्ति दिखाई नहीं पड़ा।

पूछताछ में यह जानकारी मिली कि यह आश्रम अंग नरेश राजा कर्ण के दान स्थल पर बना हुआ है। इसे कर्ण चौड़ा कहते हैं । यह पहाड़ी क्षेत्र है।

यही से गंगा स्नान और माता चंडी की आराधना के बाद कर्ण सोना इत्यादि दान किया करते थे। 

खैर, पहले दिन भोजन के बाद कुछ देर आराम के बाद मंत्र पाठ में भाग लेने के लिए बगल के आश्रम में जाना था। 

उसके लिए वहां गाड़ी की व्यवस्था थी। पौने तीन बजे सबको पहुंचना था, सभी पहुंच गए। आश्चर्य लगा कि कैसे हम लोग समय के पाबंद हो गए! 

इसके लिए गंगा के किनारे बने पादुका दर्शन सत्संग पीठ में जाना हुआ ।

यह एक खुला कक्ष था । सभी श्रद्धालु पालथी मारकर बैठ गए। सामने महादेव का एक शिवलिंग स्थापित था। जहां श्रृंगार का काम बच्चे कर रहे थे। पता चला कि इस आश्रम में बच्चों का बाल योगी के रूप में प्रशिक्षण और सेवा की भी व्यवस्था है। 

बच्चों को यहां सभ्यता, संस्कृति, गायन, वादन, चित्रकार इत्यादि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 


फिर देखा कि एक सामान्य से थोड़ा कम कद काठी के गेरुआ वस्त्र धारी संत व्यक्तित्व अलमस्ती में चले आ रहे हैं। उनके माथे पर एक विलायती टोपी थी, हाथ में पानी का थर्मस, चेहरे पर मुकुराहट और हल्की-हल्की सफ़ेद दाढ़ी। 

वे सहजता से कुर्सी पर बैठे। घड़ी देखी। 3:00 बज गए। हरि ॐ तत्सत का उच्चारण किया। सब ने साथ दिया। फिर महामृत्युंजय मंत्र के जाप का शुभारंभ हुआ। इससे पहले किसी भी सहज आसन में बैठने, ध्यान करने का निर्देश मिला।

ध्यान करने के लिए आंखों को बंद करने। आती–जाती सांसों को सजगता से देखने। महसूस करने के लिए कहा गया।

पुनः आंखों के सामने एक ज्योति पुंज की कल्पना करने की बात कही गई। पुनः एक साथ तीन बार ॐ का उच्चारण कराया गया पुनः शांति पाठ। पुनः एक साथ तीव्रता से 108 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया गया। 

ॐ उच्चारण और महामृत्युंजय जाप के बाद कुछ अन्य मंत्रों का भी जाप कराया गया । ॐ नमः शिवाय का भी जाप हुआ।

इन सब के बाद वहां की स्थिति सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होने लगा। लगा जैसे सभी जगह महामृत्युंजय का नाद गूंज रहा हो। 

अंदर से कंपन होने जैसा ! जैसे यह नाद दूर किसी क्षितिज से जाकर लौट रही है।एक असीम ऊर्जा तरंग। 


फिर लगातार कई प्रकार की ध्यान मुद्राओं का अभ्यास एक साथ हुआ। 4:00 बजे समाप्ति हुई। समाप्ति से पहले शांति पाठ हुआ। 

उसके बाद हमें एक बड़े से कक्ष में ले जाया गया । या कक्ष नहीं कह सकते हैं, एक बड़ा सा टेंट नुमा हॉल । दो बड़े लोहे के पिलरों पर छतरी नुमा टेंट बना हुआ। 

सामने मंच और मंच पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद जी, वायु साधना यज्ञ की तैयारी। 

इससे पहले सत्संग। स्वामी जी का प्रवचन । पर यहां प्रचलित धार्मिक कथा का वाचन , विवरण या विवेचना नहीं। यहां विज्ञान की विवेचना होने लगी। उसी पर आख्यान होने लगा। 

उन्होंने बताया कि वायु एक ऊर्जा है। वायु का मतलब हवा नहीं, ऊर्जा का एक रूपांतरित रूप से है। यही है, तो हम हैं। और कहते हैं कि मेरा शरीर! यह मेरा कौन है? 

फिर समझाया की नासा ने एक ऊर्जा के रूपांतरण पर एक शोध किया जिसमें दुनिया भर के 500 वैज्ञानिकों को शामिल किया गया । उसमें से उनको भी शामिल किया गया, यद्यपि वे वैज्ञानिक नहीं है।

 बताया कि इसमें एक क्वांटम मशीन बनाई गई। यह ऊर्जा को मापता और रूपांतरित कर दूसरी जगह भेज सकता था ।

नासा ने पाया कि इसी मशीन से हम अंतरिक्ष में ऊर्जा भेज कर बीमार वैज्ञानिकों को ठीक कर सकते हैं। बाद में मेडिकल लॉबी ने दबाव में इस पूरे शोध को स्थगित कर दिया। जबकि इससे ऊर्जा के माध्यम से बीमारियों को ठीक किया जा सकता था। 

इस सत्संग की विशेषता यह थी कि इसमें भीड़ नहीं थी। शोर नहीं था। शांति और जिज्ञासा थी।

सभी लोग पालथी मारकर बैठे हुए थे। इसमें विदेशियों की भी बड़ी संख्या थी। 

वहां एक बड़ा टीवी डिस्प्ले भी लगा हुआ था। वही वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी विदेशी महिलाओं की टीम के द्वारा ही संभाला जा रहा था। 


हां, सत्संग से पहले कीर्तन हुआ। सामने एक युवती गा रही थी। पीला वस्त्र पहने। आंखों पर चश्मा लगाए। चेहरा पर हल्की मुस्कान और आभा के साथ गंभीरता ओढ़े हुए। 

जब उन्होंने गायन शुरू किया तो उनके शब्द ऐसे गूंजे , जैसे दूर कहीं, किसी ने बांसुरी बजाई हो! कोकिल कंठ! 

उसके बाद स्वामी जी ॐ उच्चारण के साथ ध्यान और शांति पाठ करवाया। फिर महामृत्युंजय का जाप हुआ। 

हां, स्वामी जी ने यह भी बताया कि महामृत्युंजय जाप को वैज्ञानिकों ने क्वांटम मशीन से मापा और चौंक गए। इसकी ऊर्जा फैली और पूरे नगर को अपने प्रभाव में ले लिया। 

खैर, इतनी देर तक पालथी मार कर बैठने की आदत नहीं रहने से लगभग सभी को परेशानी हो रही थी। कुछ बुजुर्गों को कुर्सी पर सुविधा दी गई थी। घुटने और कमर, मेरे भी जवाब दे रहे थे। पर बैठा रहा। 

इसी बीच गौर किया स्वामी जी के बगल में एक पिंजरा था। उसमें एक मकाउ तोता और वहीं बगल में एक बालक भी बैठा रहा ।


आमतौर पर वायरल और बदनाम बाबाओ के मोबाइल , टीवी में बोल, सुनकर कभी किसी से आकर्षक नहीं रहा, पर निरंजनानंद को देखते ही ओजस्विता और दिव्यता का बोध हुआ। एक परमहंस, एक संत और एक संन्यासी से साक्षात्कार हुआ। 

बस पहले दिन की समाप्ति हो गई। 
फिर 6:30 तक भोजन कर लेना है। थाली, ग्लास, कटोरी लेकर पास ही रखना है। 7:00 बजे आवास बंद होना है। यह सब हो गया। फिर एक बैठक हुई। इसमें संयोजक ने अगले दिन की दिनचर्या की जानकारी दी। 

कर्म योग के बारे में बताया गया। कर्म योग। मतलब, सजगता से अपने दैनिक कार्य को करना। 

इसमें सभी को काम बांटे गए। मुझे मुख्य भवन की सफाई का कार्य मिला। शौचालय किसी को भी साफ करनी पड़ सकती है, यह सुनकर कुछ के चेहरे उतर गए। खैर, सब अपने-अपने कमरे में चले गए । किसी से मोबाइल छीनी नहीं गई। क्योंकि चार दिन का सत्र है। एक माह के सत्र में जब्त किया जाता है। मेरे कमरे में रहने वाले सभी ने मोबाइल ऑन किया। घर सूचना दी। और उसमें लग गए।

मैंने घर में कॉल कर सूचना दी। (मुख्य मोबाइल मैं घर पर ही छोड़ आया था। कॉल के लिए एक था) ।और थकान के कारण नींद आ गई। 




25 अगस्त 2026

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय का चार दिवसीय आश्रम प्रवास से लौट आया। जीवन का एक नया अनुभव मिला। जीवन में उन अनुभवों को हमारे जैसा सामान्य आदमी तब तक शत प्रतिशत उतार पाना मुश्किल है, जब तक आदमी हार या थक न जाए। जो इन अनुभवों को जीवन में पहले धारण कर ले, वही संत है। कई थके हारे लोग आश्रम में मिले। सेवानिवृत..के बाद ..!

खैर, आश्रम में डिजिटल डिटॉक्स, मेंटल डिटॉक्स और फिजिकल डिटॉक्स हुआ। चार दिनों तक बिना मोबाइल रहा। 

बिना मोबाइल भी जीवन जिया जा सकता। न कोई सेल्फी की होड़। न रील बनाने की प्रतिस्पर्धा। बस सबकुछ अपने लिए। 

आज के दौर में यह मुश्किल है, पर अब इसी की जरूरत है। 

आश्रम में बहुत कुछ सीखा। बहुत कुछ अनुभव हुआ। कुछ कुछ अनुभूति हुई। और सबसे विशेष, स्वामी निरंजनानंद जी से स्नेह मिला। यह अतुल्य और अकल्पनीय रहा। 

स्वामीजी कौन है? यह सवाल मन में उठेगा तक भी इसका जवाब इस इंटरनेट की दुनिया में कम ही मिलेगा। आज अधजल गगरी, छलकत जाए वाले वायरल बाबाओं का दौर है। 

इस दौर में स्वामी निरंजनानंद जी चुपचाप योग और मंत्र विज्ञान पर शोध और साधना कर रहे। दुनिया स्वामी जी के शोध और साधना का लोहा मान चुकी है। पर हम बिहार के लोग, अपने घर में इतनी बड़ी उपलब्धि होने के बाद भी उसका सम्मान नहीं कर रहे। 
खैर, आश्रम प्रवास में 4 बजे से 7 बजे, योग, ध्यान, मंत्र, साधना, कर्म योग (साफ सफाई) जैसे गुरुकुल जीवन का अनुभव मिला। दुनिया के कई देशों के लोग यहां प्रवास करते मिले। 

और इसी में जाना कि जो शारीरिक योग हम करते है, वह योग का दस प्रतिशत हिस्सा ही है।

बस, इतना ही। बाकी बातें फिर कभी