09 अक्टूबर 2026

सबका हिसाब होगा..!

सबका हिसाब होगा...!

"गंभीर चिंता का विषय है। भला ऐसी कोई सरकार होती है। छप्पन इंच का सीना तो मुहावरा निकला। उससे पहले दशमलव लगा हुआ है।"
"बोलिए तो पुलिस को लतियाया, महिला पुलिस को उकसाया, नेता को गरियाया, तब भी चुप्पी है। ऐसे, कैसे लोकतंत्र चलेगा।"

 युवा नेता खेलावन काका से अपना दर्द साझा कर रहे थे।

काका ने भी चमचागीरी की। बोले, 

"सही कहे बेटा। इतना में तो लाठी पीठ पर चित्रकला का प्रदर्शन होना चाहिए। हाथ, पैर के हड्डी का विभाजन तो स्वाभाविक होता। और आंसू गैस तो छोड़िए, बंदूकें गरजती। पर सब चुप है। यह बड़ी साजिश लगती है। 

युवा नेता बोले, 
"हां काका। चिंता का विषय है। खैर, मेरी सरकार आने दीजिए, सब याद रखा जाएगा, सबका हिसाब होगा...!"

अरुण साथी (व्यंग्य)

08 अक्टूबर 2026

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"

भागवत कथा में गोपियों और उद्धव का जो संवाद है वह प्रेम और विरह का ऐसा संवाद है जिसने डूबकर कर सुनने वालों की आँखें भर आती है। 
बिहार सरकार के माननीय मंत्री अशोक चौधरी जी के आवास पर भागवत कथा के श्रवण का सौभाग्य मिला। 

कथावाचक ने श्री कृष्ण, उद्धव और गोपियों के प्रसंग को सारगर्भित तरीके से रखा। वही समापन में रुक्मणी के विवाह का भी प्रेम पूर्ण वर्णन किया। 
भागवत में उद्धव और गोपियों का संवाद प्रेम की पराकाष्ठा का ही संवाद है। 

कहते हैं कि उद्धव को जब अपने योग और ब्रह्म ज्ञान का मान हुआ तो कृष्ण ने उनको गोपियों के पास समझाने के लिए भेज दिया।
उद्धव कहते हैं,

"तजो रे स्याम, भजो रे निर्गुन... 

तुम कृष्ण को भूल जाओ और अपने हृदय में उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करो, जो कभी नष्ट नहीं होता। योग साधना करो।

गोपियाँ कहती हैं,

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!" 

हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन (हृदय) नहीं हैं। एक ही मन था, जो श्याम सुंदर (श्रीकृष्ण) के साथ मथुरा चला गया। अब हम तुम्हारे इस निराकार ब्रह्म की आराधना किस मन से करें?

फिर इस भ्रमर गीत का मनोहारी गायन होता है,

उधो मत आइयो समझाने, 
जाके कांटो लगे वही जाने,

मतलब जिसने प्रेम ही नहीं किया, वह प्रेम को क्या समझेगा...?

अंत में उद्धव भी यह समझ जाते हैं कि योग और ज्ञान मार्ग से भी बड़ा प्रेम है...




नाना पाटेकर का जाना

नाना पाटेकर का जाना...

भारतीय सिनेमा जगत में नाना पाटेकर एक ध्रुव तारा के समान थे जो धुप्प रात के अंधेरे में भी रास्ता दिखाते थे। नाना पाटेकर के सिनेमा को जिसने देखा, वह सिनेमा के नाना पाटेकर के किरदार के साथ जीने लगा। 
नाना पाटेकर ने प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर इत्यादि सिनेमा के माध्यम से हमें राष्ट्रभक्त होना, सत्य निष्ठ होना सिखाया। 

नाना पाटेकर के सिनेमा ने ही हमें सत्य के लिए अड़ना भी सिखाया। 

नायक के किरदार के साथ-साथ खलनायक के किरदार में भी जब नाना पाटेकर उतरे तो उसमें भी एक जीवंतता देखी गई। एक दम से डरा देते। 

हालांकि वेलकम जैसे सिनेमा में नाना पाटेकर का हास्य किरदार बहुत प्रभावशाली नहीं रहा परंतु उन्होंने यह भी किया। 

सादर नमन 


06 अक्टूबर 2026

भले लोग बहुत हैं (यात्रा वृतांत)

भले लोग बहुत हैं 

यह ट्रक की सवारी का चित्र है। पिछले दिनों मोकामा से घर आना था। इस मार्ग में आज भी यात्री वाहन कम ही चलते हैं। संध्या का समय था। मेरे मित्र अभय जी हमेशा यहां से अपने घर ट्रक अथवा किसी से भी सहयोग लेकर ही पहुंचते हैं। उनका प्रयोग मैंने भी आजमाया। एक दो को हाथ दिया । गाड़ी नहीं रुकी। 

फिर एक को हाथ दिया। ट्रक सामने नहीं रुका। थोड़ी दूर जाकर रुका। दौड़ कर चढ़ गया। अंदर दो लोग थे। आत्मीयता से स्वागत किया। 
"कहां जाना है?"
"बरबीघा"
"मैं सरमेरा जाऊंगा..।"
"ठीक है, वहीं उतार दीजिएगा..।"

बैठ गया। फिर बातचीत शुरू किया। क्या नाम। कहां घर। आदि इत्यादि। औपचारिकता। चालक के बगल में बैठे व्यक्ति ने अपना नाम शायद संजय बताया। घर नालंदा जिला के परवलपुर के सोनचरी।


 हम बिहारी साधारणतः नाम, अथवा पिता का नाम पूछ कर उपनाम से जाति का पता करते है। और यदि यह जुगत काम न आए तो गांव का नाम से भी जाति का पता लग जाता है। 

सो, मेरे गांव का नाम शेरपर जान कर उन्होंने अपनी रिश्तेदारी बताई। मैंने उनके गांव का नाम जानकर, अपने रिश्तेदार का परिचय दिया। और इस तरह, बिना पूछे दोनों एक दूसरे के स्वजातीय का आत्मसात कर लिए। किसी ने किसी से स्पष्ट रूप से जाति नहीं पूछी! 

खैर यात्रा आगे बढ़ी, तो नया बिहार, पुराना बिहार, जंगलराज, संघर्ष और विकास के साथ साथ उद्योग और रोजगार, सबकुछ विमर्श का केंद्र बिंदु रहा। 

चर्चा कि शुरुआत मैंने ही किया। अपनी मातृ भाषा, मगही में। 
पूछा, "कहाँ से आ रहलो..?"
"नेपाल के वीरपुर से।"
"कौची लादले हो.."
"रिफाइन तेल हो.."

इस वार्ता में उन्होंने बताया कि अजीब अर्थव्यवस्था है। बताया कि कुछ केमिकल है जो बिहार से नेपाल जाता है और नेपाल में तेल बनता है फिर उसे बिहार और झारखंड इत्यादि में बेचा जाता है। वह समझाने की भी कोशिश कर रहे थे कि यह सब चीज बिहार में भी बन सकता है, परंतु नहीं बन रहा है।

यह भी बताया कि वह 1995 से ही गाड़ी चला रहे हैं। कमाने खाने में लाज कैसा..? 

 बताया कि पहले कहीं भी कोई रोक कर लूट लेता था, मारपीट करता था। आज यह सब नहीं होता है। सड़क की भी बहुत बिहार में अच्छी हो गई है। हालांकि पुलिस की वसूली पहले जितनी तो नहीं होती, परंतु अभी भी यह जारी है।


एक प्रसंग में बताया कि वह लखीसराय जिला के बड़हिया से सन 2000 में गाड़ी चला कर आ रहे थे तो उनकी गाड़ी को दबंगों ने पकड़ लिया और फिर खेत में ले जाकर उससे एक सप्ताह तक फसल की ढुलाई करवाता रहा और फिर जाने दिया।

खैर, मैं सरमेरा में उतर गया। हालांकि अनुभव नहीं होने की वजह से उतरने के क्रम में धड़ाम से सड़क पर गिर गया, बगल में खड़ी कुछ महिलाएं हंसने लगी।


05 अक्टूबर 2026

अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म

अनामदास का पोथा और शूद्र धर्म
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने क्या लिख दिया!
इसे शब्दों में लिख पाना कठिन है। हाँ, जो महसूस हुआ, वह बेहद विचलित करने वाला है। इस महीने में पढ़ा गया यह एक ऐसा उपन्यास है, जो प्रेम-प्रसंग के माध्यम से उपनिषद के ज्ञान को जिस सहजता से रख देता है, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।

कुछ प्रसंग यहाँ रख रहा हूँ। इसका एकमात्र उद्देश्य यह है कि शायद कोई इसे पढ़कर इस पुस्तक को खरीदने और पढ़ने के लिए प्रेरित हो जाए।

पुस्तक में संन्यास आश्रम से बड़ा गृहस्थ आश्रम बताया गया है।
पढ़ते-पढ़ते समझ आया कि गृहस्थ जीवन निकृष्ट जीवन नहीं है।

आत्मा के प्रसंग में लिखते हैं—
“आँख क्या है? देखने का साधन है। जो देख रहा है, वही आत्मा है।”

“एकांत का ताप बड़ा तप नहीं है।”

"विवाह के माध्यम से पुरुष और स्त्री पूर्णता प्राप्त करते हैं और संसार के सबसे बड़े लक्ष्य—प्रेम—को प्राप्त करते हैं।"

“किसान की स्त्री हूँ, भीख नहीं माँग सकती...?”

“पति की कामना के लिए पति प्रिय नहीं होता, अपने आत्मा की कामना के लिए पति प्रिय होता है!”

“पत्नी की कामना के लिए पत्नी प्रिय नहीं होती, अपने आत्मा की कामना के लिए पत्नी प्रिय होती है!”

एक जगह संवाद है—

“आप बिना परीक्षा किए ही कोई बात मान लेते हैं? विचित्र है। यह तो नेयता हुई। यही शूद्र धर्म है।”

यहाँ एक और बात मन को छूती है—

“कोई चिंता नहीं। रास्ता ही रास्ता बता देता है। कुछ करते-करते ही सही ढंग सीखा जा सकता है।”

वर्तमान राजनीति के लिए भी संवाद है,

"तपस्या और स्वाध्याय के क्षेत्र में राजा का किसी प्रकार का दबाव धर्मसंगत नहीं है।"

विवाह के एक प्रसंग में (दहेज) के संदर्भ में संवाद आता है—
“धन-संपत्ति तो छोटे लोगों में देखी जाती है, ब्राह्मण लोगों में तो विद्या और ज्ञान देखा जाता है।”

और प्रेम...
एक ऋषि कुमार अपनी प्रेयसी जबाला का ध्यान करके ही ध्यानस्थ हो जाता है। बस...

जानश्रुति शूद्र राजा थे—यह भी आभास हुआ कि शूद्र भी राजा होते थे।

यह भी समझ आया कि उपनयन संस्कार गुरु अपने शिष्यों का करते थे और इसका जाति से कोई संबंध नहीं था। 

17 सितंबर 2026

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल युपीआई को पहले अंगेजों की चाय की तरह ही लत लगा दी गई। अब आनलाइन चुंगी बसूला जा रहा। इसमें कुतर्कों का जंजाल भी है। आम आदमी उलझा हुआ है। सरकार यही करती है। उलझा दिया तो काम बन गया। साधारण बुद्धि में जो बात समझ में आई है, वह यह है कि आनलाइन चुंगी का भार आम अदमी पर ही पड़ेगा। तर्क, कुतर्क जो हो। कौन क्या कहता है, इसमें नहीं पड़ना चाहिए। आपके साथ क्या होता है, इसे देखिए। जैसे कि रसोई गैस, चीनी इत्यादि का दाम पांच-दस रुपये बढ़ते ही समोसा और मिठाई का दाम व्यापारी डेढ़ गुणा बढ़ा दिया। उनका साधारण सा तर्क होता है, सबकुछ मंहगा हो गया। तो यह तर्क तो कुतर्क ही है कि आनलाइन चुंगी का भार आम आदमी पर नहीं पड़ेगा। व्यापारी हर भार ग्राहक पर ही देतें हैं। यह व्यापार का प्राथमिक नियम है। जिस बड़े दुकान में चाय या ठंढ़ा पिलाया जाता है, उस दुकान का साधारण बुद्धि का ग्राहक भी यह समझता है कि इसका भार भी उसी के उपर जुटेगा।
अब साधारण भाषा में यह। दो हजार एक रुपये की खरीद पर दस रुपये चुंगी लगेगा। इसमें से आठ रुपये बैंक को ही जाएगा। दो रुपये क्युआर कोड और एप को जाना है। साधारण बात यह कि बैंक पहले से अत्यधिक कमाई में है। अर्थशास्त्र के जानकार अनुमान लगा रहे है की आनलाइन चुंगी से बीस हजार करोड़ से अधिक की कमाई होनी है। तब साधारण आदमी यह क्यों नहीं समझेगा कि यह अमेरिका के दबाब में लिया गया निर्णय है। क्योंकि यह सब नि:शुलक होने पर बीजा और मास्टर कार्ड कंपनी की दाल नहीं गल रही थी। खैर, मुझे तो याद नहीं कि कब पैसे की निकासी बैंक से की है। मोबाइल होना चाहिए। कई बार खाली जेब लेकर पटना आना-जाना हुआ। अभी पिछले महिना परेशानी भी हो गई। महावीर मंदिर के पास एक साधारण से होटल में भोजन किया। निश्चिंत था की आनलाइन देंगे। देने गया तो कहा गया कि नहीं लेगें। मालिक नहीं है। तब काेई उपाय नहीं सूझा। दुकानदार समझ गया। भला मानस था। बोला कभी दे दिजिएगा। खैर, संयोग से एटीएम पास में था। पर पिन याद नहीं था। बड़ी मुश्किल से पैसे निकाल कर उसे शाम में दे गया। उधर, आनलाइन पैसे की वजह से श्रीमति की अपनी परेशानी है। कहती है कि अब तो जेब खाली रहो हो, कि निकालिओ, ई मोदिया जे करै चित्र- टाल का मछली बाजार

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