31 अक्टूबर 2026

बदलते दौर में पत्रकारिता की असली ताकत खोजी खबरों में है

बदलते दौर में पत्रकारिता की असली ताकत खोजी खबरों में है

अरुण साथी 

सूचना सबके पास है, लेकिन समाचार वही है जिसे पत्रकार मेहनत से खोजकर पाठक तक पहुंचाता है।

बदलते दौर में पत्रकारिता की दुनिया पूरी तरह बदल गई है। मोबाइल, सोशल मीडिया, न्यूज पोर्टल और विभिन्न डिजिटल माध्यमों ने सूचनाओं की पहुंच बेहद आसान बना दी है। किसी घटना के घटते ही उसकी तस्वीर, वीडियो और प्रारंभिक जानकारी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। प्रेस विज्ञप्ति, सरकारी सूचना, पुलिस का बयान, प्रशासनिक आदेश और कार्यक्रमों की जानकारी भी अब पत्रकारों तक पहुंचने का इंतजार नहीं करती। ये सूचनाएं विभिन्न माध्यमों से सबके पास पहुंच जाती हैं।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल है कि जब सामान्य समाचार हर किसी के पास उपलब्ध है, तो अखबार की अलग पहचान क्या होगी? पाठक अखबार क्यों पढ़ेगा? पत्रकार की विशिष्ट भूमिका क्या रह जाएगी?

मेरी नजर में इसका जवाब है- खोजकर लाई गई खबर।

सामान्य सूचना और वास्तविक पत्रकारिता में यही बुनियादी अंतर है। जो सूचना सबके पास खुद चलकर आ रही है, उसे प्रकाशित कर देना पत्रकारिता का एक हिस्सा जरूर है, लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत उस खबर में है, जिसे पत्रकार ने अपनी मेहनत, जिज्ञासा, संपर्क, पड़ताल और फील्ड वर्क के जरिए खोजा हो।

### खबर खोजने की मेहनत ही पत्रकार की पहचान

मान लीजिए किसी गांव में सड़क निर्माण का उद्घाटन हुआ। इसकी सूचना विभाग की ओर से जारी कर दी गई। तस्वीरें और प्रेस विज्ञप्ति भी उपलब्ध करा दी गईं। इस आधार पर खबर तैयार करना अपेक्षाकृत आसान है।

लेकिन पत्रकारिता की असली शुरुआत इसके आगे होती है।

क्या उस सड़क का निर्माण निर्धारित समय पर हुआ? निर्माण में कितनी राशि खर्च हुई? क्या सड़क की गुणवत्ता मानक के अनुरूप है? क्या सड़क बनने से गांव के लोगों की पुरानी समस्या दूर हुई? क्या निर्माण में किसी तरह की अनियमितता हुई? क्या सड़क का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचा, जिनके नाम पर योजना बनाई गई थी?

इन सवालों का जवाब प्रेस विज्ञप्ति में नहीं मिलेगा। इसके लिए पत्रकार को गांव जाना होगा, लोगों से बात करनी होगी, निर्माण स्थल देखना होगा, दस्तावेज जुटाने होंगे और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना होगा।

यही लेग वर्क है। यही खबर को सामान्य सूचना से अलग करता है।

### जो दिखाई नहीं दे रहा, उसे सामने लाना

हर क्षेत्र में ऐसी अनेक कहानियां और समस्याएं होती हैं, जो आमतौर पर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा नहीं बन पातीं। कोई स्कूल वर्षों से शिक्षक की कमी से जूझ रहा है। किसी अस्पताल में जरूरी उपकरण होने के बावजूद उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा। किसी पंचायत में सरकारी योजना का लाभ कागजों पर पूरा है, लेकिन जमीन पर अधूरा। किसी गांव में लोग वर्षों से पुल या सड़क की मांग कर रहे हैं।

इनमें से किसी विषय पर शायद कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं होगी। कोई अधिकारी खुद पत्रकार को इसकी जानकारी नहीं देगा। कोई आयोजन भी नहीं होगा।

पत्रकार को खुद इन विषयों की पहचान करनी होगी। लोगों के बीच जाना होगा। उनकी परेशानी समझनी होगी। तथ्यों की जांच करनी होगी और फिर उसे समाचार का रूप देना होगा।

अच्छा पत्रकार वही है, जो केवल अपने पास आई सूचना पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अपने आसपास ऐसी खबरें तलाशता है, जिनकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।

### लेग वर्क का मतलब केवल घटनास्थल पर पहुंचना नहीं

फील्ड वर्क का अर्थ केवल किसी घटना की तस्वीर खींचना या मौके पर जाकर लोगों का बयान लेना नहीं है। इसके कई स्तर हैं।

* जमीनी पड़ताल: गांव, टोला, बाजार, अस्पताल, स्कूल और सरकारी कार्यालयों में जाकर वास्तविक स्थिति देखना।

* दस्तावेजों की जांच: सरकारी रिकॉर्ड, योजनाओं की सूची, बजट, टेंडर, आदेश और उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन करना।

* लोगों से संवाद: आम नागरिक, लाभार्थी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और संबंधित अधिकारियों से बातचीत करना।

* तथ्यों का मिलान: किसी एक व्यक्ति के आरोप को खबर मान लेने के बजाय दूसरे पक्ष और दस्तावेजों से उसकी पुष्टि करना।

* फॉलोअप: प्रकाशित खबर के बाद यह देखना कि उसका असर हुआ या नहीं और समस्या का समाधान निकला या नहीं।

इन तमाम प्रक्रियाओं से गुजरकर तैयार हुई खबर में पत्रकार की मेहनत दिखाई देती है। ऐसी खबर पाठक को नई जानकारी देती है और कई बार व्यवस्था को जवाब देने के लिए भी मजबूर करती है।

### छोटे शहर और जिलों में खोजी पत्रकारिता की बड़ी संभावनाएं

जिला और प्रखंड स्तर पर पत्रकारिता के लिए संभावनाओं की कमी नहीं है। वास्तव में स्थानीय पत्रकार के पास अपने क्षेत्र को समझने का अवसर अधिक होता है। वह जानता है कि किस गांव में कौन सी समस्या पुरानी है, किस सरकारी योजना का लाभ लोगों को नहीं मिल रहा, किस विभाग में क्या कमी है और किन मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगा जाना चाहिए।

उदाहरण के लिए रेलवे फाटक पर लगने वाला जाम एक सामान्य खबर हो सकती है। लेकिन यदि पत्रकार यह पता लगाए कि जिले में किन-किन रेलवे फाटकों पर प्रतिदिन कितनी देर जाम लगता है, कितने लोग प्रभावित होते हैं, एंबुलेंस और स्कूली वाहनों को कितनी परेशानी होती है, ओवरब्रिज या अंडरपास की मांग कब से लंबित है और जनप्रतिनिधियों ने इसके लिए क्या पहल की है, तो यह एक महत्वपूर्ण जनसरोकार की रिपोर्ट बन जाती है।

इसी तरह सरकारी अस्पताल में मरीजों की भीड़ दिखाना सामान्य कवरेज है। लेकिन डॉक्टरों की स्वीकृत और कार्यरत संख्या, जांच सुविधाओं की उपलब्धता, दवाओं की स्थिति और मरीजों की वास्तविक परेशानी की पड़ताल करना मौलिक पत्रकारिता है।

### सोशल मीडिया की भीड़ में अखबार की अलग पहचान

सोशल मीडिया पर तेजी से खबरें पहुंचाना अब किसी एक संस्थान या पत्रकार की विशेषता नहीं रह गई है। कोई भी व्यक्ति तस्वीर या वीडियो के साथ सूचना प्रसारित कर सकता है। ऐसे में अखबार के लिए केवल तेजी को अपनी ताकत मानना उचित नहीं होगा।

अखबार को ऐसी खबरें देनी होंगी, जिनमें तथ्य हों, विश्वसनीयता हो, संदर्भ हो और पत्रकार की मेहनत हो।

पाठक को यह महसूस होना चाहिए कि अखबार में प्रकाशित खबर केवल कहीं से मिली सूचना नहीं है, बल्कि उसके पीछे किसी पत्रकार ने समय दिया है, सवाल पूछे हैं, लोगों से मुलाकात की है, दस्तावेज देखे हैं और सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश की है।

यहां एक बात और महत्वपूर्ण है। खोजी खबर का अर्थ केवल किसी बड़े घोटाले या भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना नहीं है। किसी छोटे गांव की अनसुनी समस्या, किसी उपेक्षित व्यक्ति की कहानी, किसी सरकारी योजना की जमीनी हकीकत या किसी अच्छी पहल को खोजकर सामने लाना भी खोजपरक पत्रकारिता है।

### पत्रकारिता में पहल की संस्कृति विकसित करनी होगी

इसके लिए पत्रकारों को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। दिनभर प्रेस विज्ञप्ति, कार्यक्रम और प्रशासनिक बैठकों की खबरों में व्यस्त रहने से मौलिक खबरों के लिए समय नहीं निकल पाता। जरूरी है कि प्रत्येक पत्रकार अपने क्षेत्र में लगातार कुछ ऐसे विषयों की तलाश करे, जिन पर सामान्य दिनों में खबरें नहीं बनतीं।

हर दिन यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आज मेरे क्षेत्र में ऐसा क्या हुआ या हो रहा है, जिसकी जानकारी पाठकों को नहीं है? कौन सी समस्या है, जिसे सामने लाने की जरूरत है? कौन सा सरकारी दावा है, जिसकी जमीनी जांच होनी चाहिए? कौन सी अच्छी पहल है, जिसकी जानकारी समाज तक पहुंचनी चाहिए?

इस तरह पत्रकारिता प्रतिक्रियात्मक होने के बजाय पहल करने वाली बनेगी।

### विमर्श के लिए कुछ महत्वपूर्ण सवाल

* क्या हमारी पत्रकारिता प्रेस विज्ञप्ति और प्रशासनिक सूचना पर अधिक निर्भर हो गई है?

* क्या प्रत्येक पत्रकार के पास हर सप्ताह कम से कम एक मौलिक और खुद खोजी गई खबर होनी चाहिए?

* क्या हम रिपोर्टर को फील्ड वर्क और पड़ताल के लिए पर्याप्त समय दे रहे हैं?

* क्या खबरों की संख्या को अधिक महत्व दिया जा रहा है या उनकी गुणवत्ता को?

* क्या हम अपने जिले की ऐसी समस्याएं खोज पा रहे हैं, जिन पर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया?

* क्या प्रकाशित खबरों का फॉलोअप हमारी कार्यशैली का हिस्सा है?

### मेरी मूल बात

पत्रकारिता में तकनीक बदल सकती है, समाचार पहुंचाने के माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकार की मूल भूमिका नहीं बदल सकती। पत्रकार का काम केवल सूचना को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना नहीं है। उसका काम है सूचना के पीछे छिपे तथ्यों को तलाशना, सवाल पूछना, सच्चाई की पुष्टि करना और उसे समाज के सामने रखना।

आज सामान्य समाचार सभी के पास चलकर आ जाता है। इसलिए पत्रकार को उस समाचार की तलाश करनी होगी, जो अभी लोगों तक पहुंचा ही नहीं है।

जिस खबर के लिए पत्रकार को अपने दफ्तर से निकलना पड़े, लोगों के बीच जाना पड़े, सवाल पूछने पड़ें, दस्तावेज खंगालने पड़ें और तथ्यों की पुष्टि करनी पड़े, वही खबर उसकी मौलिकता और मेहनत की पहचान बनती है।

अखबार को बचाने और बढ़ाने का रास्ता भी इसी से निकलेगा। हमें पाठक को वही नहीं बताना है, जो उसे पहले से पता है। हमें वह बताना है, जिसे जानने की उसे जरूरत है, लेकिन जिसे जानने का कोई दूसरा माध्यम उसके पास नहीं है।

सूचना सबके पास है, खबर खोजने की जिम्मेदारी पत्रकार की है। और इसी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाना पत्रकारिता का भविष्य है।

28 अक्टूबर 2026

नीरज कुमार के बहाने एक जातीवादी विमर्श

नीरज कुमार के बहाने एक जातीवादी विमर्श

विधान परिषद का चुनाव देश भर में था। पटना स्नातक का चुनाव देश में चर्चित हो गया। कारण, अनंत सिंह का पार्टी से विरोध करके नीरज कुमार को हराने के लिए उतरना। 
और फिर देखते देखते जनसुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के साथ होकर पीला गमछा लहराने लगना। वही पीला गमछा, जिसे ओढ़ कर मोकामा में पीयूष में इनको पानी पिलाया था। वही पीके चुप रह गए ।

फिर, देखते देखते सोशल मीडिया में पहली बार विधान परिषद का चुनाव ग्लैमरस हो गया। देखते देखते रीलबाजी होने लगी। फिर, बुलडोजर से फूल बरसने लगे। फिर, देखते देखते गाली, गुत्ता होने लगा। फिर, देखते देखते अस्पताल में भर्ती प्रतिद्वंदी के लिए हिकारत का भाव सामने आया। 

और बस, यह सब बिहार का आम आदमी का मानस चुपचाप देख, पढ़ रहा था। वह कुछ बोल नहीं सकता। क्योंकि उसे डर है। पर वह सौ सोनार की, एक लोहार की तरह चोट करता है। वोट से चोट। बोलती बंद..!

दूसरे तरफ अशोक महतो। निशांत कुमार अभी राजनीति में डेगा डेगी दे रहे। उनको साम, दाम, दंड, भेद सीखने में समय लगेगा। और अचानक अपने ही घर में चुनौती मिल गई। नेता कौन..? कुख्यात या सामान्य आदमी..? फिर आम आदमी ने वोट से चोट कर शंखनाद किया।

असल में यह चुनाव कई मायने के दूसरे एंगल से भी समझना होगा।

बिहार में अभी किसी भी जातीय समाज में कुछ लोग यदि किसी के साथ चले गए तो पूरे जाति को जोड़ कर माहौल बना दिया जाता है। 

यह कोई सूक्ष्मता से नहीं देखता कि जो तथाकथित स्वघोषित नेता बन रहा, उसके साथ समाज का कौन सा वर्ग खड़ा है..?

यह स्वाभाविक है। असामाजिक, कुख्यात, दबंग, बाहुबली, रीलबाज, मुंहफट, गलीबाज, किसी का सम्मान नहीं करनेवाला के साथ उसी स्वभाव के लोग खड़े होते है। इससे पूरे समाज को खड़ा होना मान लेना, गलत है। 

ठीक इसका उलट भी है। समाज में सभ्य, शालीन, जनहित में लड़ने, बोलने वाला, सर्व सुलभ और व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले के साथ एक बड़ा वर्ग खड़ा होता है। इसलिए नहीं कि उससे बहुत लगाव है। बल्कि इसलिए कि उसे लगता है कि इसकी हार , उसकी अपनी हार होगी।

बातें बहुत है। पर रीलबाजी से रियल बाजी सर्वथा सार्थक है। सकारात्मक है। और सर्वमान्य है। बस, रीलबाजी में बहके लोगों को ब्रह्मांड का नेता होने का गुमान हो जाता है। फिर सच सामने आता है तो...

हरसिंगार का समय आ गया है...

हरसिंगार का समय आ गया है...

शाम ढलते ही इसकी भीनी-भीनी खुशबू मन में ऐसे घुलने लगती है, जैसे पानी में चीनी। एक ऐसी मिठास, जिसे महसूस करने के लिए किसी शब्द की जरूरत नहीं होती।
और सुबह... ओस में भीगे हरसिंगार के फूल धरती पर ऐसे बिखरे मिलते हैं, मानो किसी ने रात के अँधेरे में विवाह का मंडप सजाया हो। सफेद पंखुड़ियों पर केसरिया डंठल की आभा, जैसे सादगी ने अपने माथे पर सुर्ख तिलक लगा लिया हो।

हरसिंगार केवल खिलता नहीं, वह रात की नीरवता को सुगंध में बदलता है और सुबह धरती को फूलों की चादर ओढ़ा देता है।

कुछ फूल डालियों पर रहकर सुंदर होते हैं, कुछ धरती पर बिखरकर भी अपनी गरिमा बनाए रखते हैं।

हरसिंगार उन्हीं में से एक है... जो झरकर भी आँगन को महका देता है। 

27 अक्टूबर 2026

छत के ऊपर से मुतना

वह छत के ऊपर से मूतता था, आने-जाने वालों पर छींटे पड़ते थे।
एक दिन, जब उसी राह से पूजा करने जा रही थीं महिलाएँ,
वह औंधे मुँह गिरा हुआ था, अपने ही मूत पर...

पटना के प्रख्यात कवि अरुण कमल जी की यह कविता शायद 10–15 साल पहले पढ़ी। एक साथी से पुस्तक मांगी थी। कई कविताएं थी जो चिंतित करती थी। फिर उस पुस्तक का फोटोस्टेट करके रख लिया। आज खोज रहा। पुस्तक नहीं मिल रही। खैर, यह एक कवि का शाश्वत चिंतन है...आज हम सोशल मीडिया पर छत के ऊपर खड़े होकर छीटें उड़ाते हैं... ऐसे कई लोग देखते है...और फिर औंधे मूँह उसको गिरा हुआ भी देखते है...

24 अक्टूबर 2026

गांव का देसी ओल और हाइब्रिड

#ओल 
यह देसी ओल है। इसे तैयार होने में तीन चार साल लगे। देसी ओल की सब्जी खाना बड़ी चुनौती है। बहुत कुलकुलता है। कुलकुलाना बंद हो इसके लिए बहुत प्रयोग होता है। नींबू का प्रयोग, तेल में छानना इत्यादि। पर तब भी खत्म नहीं होता। कहा जाता है कि इसका औषधीय गुण बहुत है।
अब, हाइब्रीड ओल बाजार में है। कुलकुलाना बंद। यही खूब बिकता है। पर देसी स्वाद नहीं है। गुणवत्ता वह नहीं है। अधिकतर सब्जियों ने यही हुआ है। फूलगोभी में खुशबू गायब। खीरा का तीखापन खत्म आदि..

बस..

23 अक्टूबर 2026

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर यह प्रश्न कई लोगों ने उठाया। उत्तर कहां है..? 
तो उत्तर प्रश्न में ही निहित है। दरअसल, बिहार में भूमिहार (बहुसंख्यक) जमींदारों के विरुद्ध जमींदारी उन्मूलन कानून लाने वाले, दलित को देवघर मंदिर में प्रवेश कराने वाले, और अंग्रेजों के लोहा लेने वाले बिहार केसरी को जब हम भूमिहार जाति के सीमा में बांध दिए, उसी दिन इसकी संभावना मर गई। जो भी महापुरुष हुए, वे जातियों की विसंगतियों का खंडन किया। लड़ाई लड़ी। अपमनित हुए। बिहार केसरी के साथ भी यह हुआ।

अपने राजनीतिक लाभ के लिए कुछ नेताओं ने बिहार केसरी को भी इसी सीमा में बांध दिया। उनका स्वार्थ तो सध गया। बिहार केसरी पिछड़ गए।

यह क्षरण आंबेडकर, पटेल से लेकर सभी महापुरुषों के साथ हुआ है। और इसी में भारत रत्न का मामला छिपा है। श्री बाबू भूमिहार जाति से थे। सवर्ण सहित इस जाति को कल तक बीजेपी का कोर वोट माना जाता था। बीजेपी ने यूजीसी के बहाने, इस जाति सहित सवर्णों को आहिस्ते से किनारे लगा दिया। बिहार में बीजेपी शुरू से ही खुलकर जातिवाद राजनीति करती रही है। इसी में अति पिछड़ा वोट बैंक के हिसाब के कर्पूरी जी को भारत रत्न मिला। श्री बाबू का फाइल किनारे रख दिया। जब कभी जरूरत लगेगी, यह कार्ड भी खेला जाएगा। पर अभी कोई संभावना नहीं दिखती...