27 जनवरी 2022

यात्रा वृतांत: वनारस में धर्म का धंधा

यात्रा वृतांत: वनारस में धर्म का धंधा 

अरुण साथी

वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यह तस्वीर देख रहे हैं। वर्तमान धार्मिक राजनीतिक हस्तक्षेप और धार्मिकता का प्रतीक भी आप मान सकते हैं । चेहरे पर चमकीले रंग लगाकर भगवान की आकृति बच्चों ने उकेरी है परंतु इसकी फटेहाली इसके अंदर के कपड़ों में आप देख सकते हैं। हालांकि कई लोग बच्चों के साथ सेल्फी ले रहे थे । इसके एवज में बच्चे पैसे भी ले रहे थे।
 मैंने फोटो खींच ली। बच्चे लटक गए। फोटो खींचे हैं। तो पैसा लगेगा। फ्री में फोटो खींचने नहीं देंगे। बहुत बच्चे जिद करने लगे।

 मैं सोचने लगा। यह तो अबोध बच्चे हैं। जब राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर भगवान को बेच रहे हैं तो बच्चे अगर ऐसा कर रहे हैं तो कौन सा पाप है। देश का यही हाल है। हमारा, आपका, सबका। कोई खरीदार है। तो कोई दुकानदार। धर्म का धंधा चोखा चल रहा है।

#भगवा का #जलवा #काशी

#काशी में #भगवाधारी #बाबा ने अचानक से कल्याण हो कह दिया। उत्कंठा जगी। सहयोग राशि बढ़ा दी। अमूमन मैं ऐसा नहीं करता। लाचार और कमजोर की सेवा कर देता हूं । पर ऐसे लोगों का नहीं। फिर भी..

 तभी वहां दूसरे भगवाधारी भी पहुंच गए और खुद के लिए भी मांग करने लगे। मैंने इग्नोर किया तो भड़क गए । ऐसे भड़के जैसे उनका कर्जा रखा हुआ हो। फिर बहस हुई और इसी बात के बीच एक वृद्ध बुजुर्ग #भिखारी भी कूद पड़े और उसे लताड़ लगाने लगे। जबरदस्ती क्यों करते हो। दान खुशी की चीज है। 

मुझसे बोलने लगे

वस्त्र - वस्त्र का अंतर है साहब । यह लोग भगवा पहन कर हम लोगों से भी गए बीते हैं। हम लोग कभी जबरदस्ती नहीं करते परंतु इन लोगों के द्वारा कई लोगों से बहुत बदतमीजी की जाती है। परंतु हम लोग ही तिरस्कार पाते हैं। नाम पता पूछने पर जौनपुर निवासी #बांकेलाल बताया।



04 जनवरी 2022

समाजवादी इत्र

समाजवादी इत्र 

 यह तो जुलुम है भाई ! अब ऐसे लोगों को थर्ड डिग्री ना दे कोई तो क्या करें...? देश से लेकर प्रदेश तक उनका कहर (सॉरी लहर) है और इत्र कारोबारी ने समाजवादी इत्र लांच कर सीधा मुंह पर तमाचा जड़ दिया।

 भाई देखा नहीं कि कैसे अधर्म संसद में एक असंत ने महात्मा को भरे मंच से गाली दी। श्रोताओं ने ताली दी। जैसा कि होना था। बहादुर चुप । तो समझ लेना था कि वर्तमान में महात्मा के अनुयाई नहीं जो एक गाल पर थप्पड़ लगे तो दूसरा गाल आगे कर दे।

 यहां फंडा क्लियर है। ऐसे में किसी कारोबारी की खुल्लम-खुल्ला चुनौती बर्दाश्त से बाहर है। सो आईटी-ईडी नामक विरोधी संघरक यंत्र का प्रयोग मजबूरी में करना पड़ा। अब रोने से क्या फायदा। पहले सोचना चाहिए था।

01 जनवरी 2022

नव वर्ष का सरकारी जूता उपहार

नव वर्ष का सरकारी जूता उपहार

 
अरुण साथी

नव वर्ष पर सरकार ने लोगों के सेहत का ध्यान रखते हुए उपहार दिया है। सरकार ने जूते मंहगे कर दिए हैं। यह एक दूरगामी फैसला है। महंगाई बढ़ाओ भक्तजन संघर्ष समिति की  बहुसदस्य सदस्यों ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी।  कहा गया कि राम का नाम लेकर देश में पेट्रोल महंगा हुआ। डीजल पेट्रोल से कंधा से कंधा मिलाकर पहली बार चल रहा है। यह समतामूलक समाज के निर्माण में एक सर्वश्रेष्ठ कदम है। इसी के साथ रसोई गैस को दोगुना महंगा करके सरकार ने लोगों को अपने पैसे में खुद आग लगाने से रोकने की एक सराहनीय पहल की है। इसका शुभ प्रभाव पड़ा है। अनाज, बिस्कुट, सीमेंट आदि-अनादि वस्तुएं महंगी हुई है।
अच्छे दिन वाली सरकार है आई, कमर जोड़ महंगाई लाई। मजबूत देश के लिए मजबूत कमर का होना जरूरी है। देश की सभ्यता, संस्कृति से लोगों को जोड़ने और उनके सेहत का ख्याल रखने के लिए महंगाई आवश्यक है। लोगों के लिए पैदल चलना, गोबर-गोईठा से खाना बनाना, बैलगाड़ी का प्रयोग करना भारतीय सभ्यता, संस्कृति रही है। इसे पुनर्स्थापित करने के लिए वर्तमान सरकार कृत संकल्पित है।


देश और सभ्यता संस्कृति विरोधी ताकतें सर उठा रही है। ऐसी ताकतें जूता चलाओ आंदोलन शुरू कर सकती है। खुफिया विभाग ने भी यह रिपोर्ट सौंपी है। सरकार ने आनन-फानन में जूता पर जीएसटी बढ़ाकर उसे महंगा करने का निर्णय लिया। अब लोग पैदल चलेंगे तो स्वास्थ्य बढ़िया होगा। वैसे भी आदिम युग में पैदल ही लोग चलते थे। हमारी सभ्यता में जूता पहनने की परंपरा नहीं रही है। यह पाश्चात बीमारी है। पैदल चलना एक्यूप्रेशर का काम भी करता है। कई बीमारियों को दूर भगाता है। ना रहेगा जूता, ना चलेगा जूता। जय श्री राम। नव वर्ष मंगलमय हो।

18 दिसंबर 2021

बलात्कार का आनंद लेता पितृसत्तात्मक समाज

कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस विधायक ने जब बलात्कार रोक नहीं सकती तो उसका आनंद लो जैसे घृणास्पद और नीचतापूर्ण बात कही तो यह पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता का जयघोष ही था। यदि ऐसा नहीं होता तो उस विधानसभा के माननीय अध्यक्ष के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं होती। और उसी विधानसभा में बैठे सभी माननीयों के ठहाके नहीं गूंजते।


ऐसे घृणास्पद कथनों के बाद नीचतापूर्ण राजनीति भी शुरू होती है और कांग्रेस को घेरने के लिए एक बड़ा वर्ग नहीं जुट जाता है जबकि माननीय की मुस्कुराहट पर खामोशी छा जाती है। तर्क-वितर्क में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं के वक्तव्य का उदाहरण देकर अपना चेहरा साफ करने लग जाते हैं। पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा ही होता है और ऐसा ही शायद होता रहेगा। मुलायम सिंह यादव के कथन, लड़कों से गलती हो जाती है से लेकर इसकी लंबी फेहरिस्त है। बेटी बचाओ का नारा बुलंद करने वाले भी अपने दामन पर लगे इस तरह के दाग को धोने के बजाय, छुपाने में ही अपनी प्राथमिकता दिखाते हैं।

पितृसत्तात्मक समाज की गंदी मानसिकता

दरअसल यह पितृसत्तात्मक समाज की गंदी मानसिकता ही है। बलात्कार जैसे धृणित कृत को पितृसत्तात्मक समाज ने हमेशा से ही संरक्षित और पोषित किया है। यदि ऐसा नहीं किया होता तो बलात्कार की पीड़िता ही समाज में निंदनीय नहीं होती। उसके लिए जीना दूभर नहीं होता। उसके लिए समाज आलोचना के दृष्टिकोण नहीं रखता। जबकि बलात्कार करने वाला पुरुष छाती ठोक कर समाज में जी नहीं रहा होता। उसे समाज प्रतिष्ठित नहीं कर रहा होता। उसकी आलोचना हो रही होती। परंतु बलात्कार के मामले में अन्य सभी जघन्य अपराधों से पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता विपरीत है।

यहां पीड़िता को ही कलंकिनी मान लिया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज के कई मामले समाचार संकलन के दौरान देखने को मिले हैं। दो साल में कई बलात्कार के मामले सामने आए हैं। जिसमें कुछ उद्धृत करता हूं। एक बलात्कार के मामले में पैदल अपने गांव जा रही नवविवाहिता को दोपहर के एक बजे गांव के खेत में पूर्ण तरह नग्न कर दो युवकों ने दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया था। इस घटना में आरोपी पकड़े गए। परंतु आज तक उन्हें सजा नहीं हुई। ऐसे कई मामले हैं। जिसमें आरोपियों को कई सालों तक सजावार नहीं ठहराया गया। हाल में ही दुष्कर्म के एक मामले में एक दलित महिला के साथ दुष्कर्म के बाद पूरा पितृसत्तात्मक समाज उसे बचाने में लग गया। प्रशासन, पुलिस और राजनीति का गठजोड़ भी सामने आया। मीडिया के दबाव में प्राथमिकी दर्ज करने की केवल औपचारिकता की गई । 

तीन तलाक और हलाला

दरअसल, पितृ सत्तात्मक समाज का यथार्थ यही है। बेटियों को दबाकर घरों में रखना ही श्रेष्ठकर, इसी सोच का परिचायक है। घरों से निकलने वाली बेटियों को तारती खूंखार आंखें हर जगह  है। ऐसा एक खास धर्म, समाज, वर्ग, जाति में नहीं है। सामान्य तौर पर सभी की यही स्थिति है। कहीं कुछ कम, कहीं कुछ ज्यादा। ऐसा  नहीं होता तो तीन तलाक और हलाला जैसे जघन्य कृत्य को तर्क-कुतर्क से धर्म की आड़ में जायज ठहराने वाला समाज रोड पर आंदोलित नहीं होता। ऐसा नहीं होता तो कोठे पर देह बेचने वाली कलंकिनी केबल नहीं होती, बल्कि उसके खरीदार, तथाकथित प्रतिष्ठित समाज के लोग भी कलंकित कहे जाते।

कल ही बेटियों की शादी की उम्र को 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष निर्धारित किया गया।  उत्तर प्रदेश के एक सपा सांसद ने बेटियों के आवारागर्दी बढ़ने की बात कह कर इसी पितृ सत्तात्मक समाज के जयघोष किया। सरकार की सोचे है कि बेटियों को इससे अपने कैरियर को संवारने का और मौका मिलेगा।  परंतु पितृ सत्तात्मक समाज की सोच है कि बेटियों को अपना कैरियर नहीं बनाना चाहिए। बेटियों को घरों में आज भी चूल्हा-चौका तक ही सीमित रहना चाहिए। यह एक भोगा हुआ सच भी है। तथाकथित प्रगतिशील समाज के निकृष्ट लोग बाहरी आवरण ओढ़ कर स्त्री की स्वतंत्रता की बात तो करते हैं परंतु जब अपने घर में इस तरह की बात होती है तो स्त्री दमन के सभी को कृतियों, साजिशों, नीचता पूर्ण काम को करने से हिचकते नहीं। इसी पितृसत्तात्मक समाज के तथाकथित प्रगतिशील वर्ग के लोग उनकी हां में हां मिलाते हुए बेटियों के दमन को स्वीकार करते हैं। समाज हमेशा से बेटियों को दोयम दर्जे का ही स्थान देता है। कहने की बात और है, करने की बात और। 
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बेटी स्वतंत्र नहीं सोच सकती 
बेटी स्वतंत्र आगे नहीं बढ़ सकती 
बेटी खोंख नहीं सकती 
बेटी बोल नहीं सकती 
बेटी प्रेम नहीं मांग सकती 
बेटी नापसंद नहीं कर सकती 
बेटी ना नहीं कर सकती 
बेटी बाहर नहीं निकल सकती 
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बाबा शंखा-पानी ढार के बिरान कईला जी

इसी समाज के पितृसत्तात्मक सामाजिक सोच के विरोध की एक बानगी यहां देखने को मिला। जब भोपाल के करेली गांव की एक आईएएस बेटी तपस्या ने अपने पिता को विवाह के समय दान करने से मना कर दिया। बेटियों के विवाह में हिंदू धर्म में बेटी को दान कर पराया करने का एक अमानवीय कृत्य किया जाता है।  बाबा बेटवो से बढ़कर दुलार कैला जी, बाबा शंखा-पानी ढार के बिरान कईला जी। यह गीत, बेटी विवाह का परंपरागत गीत  है।और बेटी को पराया करने के चलन का परिचायक भी। आमतौर पर विवाह के बाद बेटी को पराया धन कहा जाता है। और इसी पराए धन में बेटी दहेज लोभियों के हाथों जलकर मर जाती हैं या सिसक सिसक कर जीती है। समाज उसी के साथ खड़ा होता है। बाकी  यह सब चलता ही रहेगा । बदलने के लिए, मुझे बदलना होगा। हम बदलेंगे युग बदलेगा। टिप्पणी में सकारात्मक बातें कर देना भर कुछ नहीं है। बदलाव अपने स्तर से करना ही देश दुनिया और समाज के बदलाव का जय घोष होगा।

29 नवंबर 2021

स्नेह का रिश्ता

#स्नेही_रिश्ता 

रिश्ते की अहमियत स्नेह से ही है । अपने और पराए की पहचान सुख-दुख में स्नेह से ही होती है। स्नेह ना हो तो अपना भी पराया। स्नेह हो तो पराया अपना। मनीषियों ने भी स्नेह को ही सर्वोत्तम रिश्ता माना है। 

अस्नेही भाई दुर्योधन  ने द्रोपदी का चीरहरण किया। और स्नेही कृष्ण भाई से बढ़कर हुए।

स्नेह ही है जो एक पप्पी (कुत्ता) को परिवार का सदस्य बना देता है। 

मेरे और मेरे परिवार के जीवन में स्नेह सर्वस्व है। स्नेह न हो तो सड़ांध रिश्ते का बोझ ढोना निरर्थक। इसी स्नेह के रिश्ते की डोर से आज मैं पूर्णिया से अपने भतीजे के साथ घर वापस लौटा । वहां के सर्वश्रेष्ठ विद्यालय विद्या विहार में रहकर पढ़ाई करने के दौरान तबीयत बिगड़ने पर मैक्स हॉस्पिटल में भर्ती कराए जाने के बीच कई स्नेहीजनों ने असीम सहयोग दिया। जिससे ICU से निकल आज पुत्र सुरक्षित घर वापसी की। 

इसमें पूर्णिया के पुलिस अधीक्षक दयाशंकर जी लगातार अस्पताल से मॉनिटरिंग करते रहे। शनिवार को तबीयत खराब होने पर मित्र अभय कुमार संजोग से पूर्णिया में ही थे और अभिभावक के रूप में तत्काल अस्पताल पहुंचे। फिर पुनेसरा निवासी बड़े भाई चंदर दा के ससुराल के रिश्तेदारों ने पूर्णिया में रहकर काफी सहयोग किया। फिर हमारे चालक विकास पासवान की बहन ने परिवार जैसा सब कुछ किया। वरुण के सहकर्मी विकास यादव अभिभावक बना।संकट की घड़ी में जब भी कोई साथ खड़ा होता है तो जीवन के अंतिम क्षणों तक मानस पटल पर यादें उकीर्ण हो जाती हैं। 

शेखपुरा से पूर्णिया गए पुलिस अधीक्षक दयाशंकर जी यथा नामः तथो गुणः। लगा नहीं कि मैं अपने घर से दूर परेशानी में हूं। सभी के लिए आभार जैसा शब्द में कम पड़ता है। 

एक लघु कथा: नदी में डूबते बिच्छू को जब संत ने अपने हाथों से बचाया तो बिच्छू ने डंक मार दिया। शिष्य ने पूछा तो संत बोले कि जब बिच्छू डंक मारने के अपने स्वभाव को नहीं छोड़ सकता तो मैं बचने के अपने स्वभाव को क्यों छोड़ दूं...


16 अक्तूबर 2021

दलित सवर्णों से पहले मंदिर में करते हैं प्रवेश, होता है प्रतीकात्मक युद्ध

दलित सवर्णों से पहले मंदिर में करते हैं प्रवेश, होता है प्रतीकात्मक युद्ध
सवर्णों और दलितों के बीच भेदभाव, छुआछूत, शोषण, दमन के किससे से हटकर एक सकारात्मक यथार्थ की दूसरी क़िस्त। हालांकि इस तरह के यथार्थ को ना तो सोशल मीडिया पर ज्यादा उछाल मिलेगा, ना ही बड़े बड़े मीडिया घराने इस को महत्व देंगे। ऐसी बात नहीं है कि सकारात्मक बातें नहीं है पर समाज में घृणा को बढ़ाने के मामले अधिक मिलते हैं। ऐसी बात नहीं होती तो बिहार केसरी डॉक्टर श्री कृष्ण सिंह, ब्राह्मणों और पंडितों से लड़कर मुख्यमंत्री रहते हुए देवघर के मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर इतना संघर्ष नहीं करते। समाज को दलितों से भेदभाव, छुआछूत मिटाने के लिए संदेश नहीं देते।
खुशी-खुशी सवर्ण दलितों से पराजय को स्वीकार करते हैं। खुशी खुशी उन्हें सबसे पहले मंदिर में प्रवेश करने दिया जाता है। खुशी-खुशी जब दलित मंदिर में पूजा कर लेते हैं तब सवर्णों की पूजा शुरु होती है।


शेखपुरा जिले में यह मामला मेहुस गांव में भी देखने को मिलता है। यह भूमिहार बहुल गांव है। यहां माता माहेश्वरी का सिद्धि पीठ है। जहां नवमी के दिन भूमिहार और दलितों के बीच प्रतीकात्मक युद्ध होता है। इस युद्ध में भूमिहार समाज के लोग रावण की सेना बनते हैं और दलित समाज के लोग राम की सेना बनते हैं ।

दोनों के बीच नवमी के दिन प्रतीकात्मक युद्ध होता है । इस युद्ध में भूमिहार समाज के लोग दलितों को मंदिर में प्रवेश करने से रोकते हैं। दोनों सेना में युद्ध होती है और भूमिहार समाज के लोग इसमें खुशी खुशी हार जाते हैं। और फिर दलित मंदिर में खुशी खुशी प्रवेश करते हैं। जिसके बाद सभी तरह की पूजा गांव में शुरू होती है।


यह परंपरा कई सदियों पुरानी है। ग्रामीण अंजेश कुमार कहते हैं कि इस परंपरा के कई मायने हैं। रावण और राम के युद्ध के बहाने दलित समाज को सम्मान देने और आपसी भेदभाव मिटाने को लेकर यह परंपरा वर्षो से चली आ रही है। दलित समाज के लोग पहले मंदिर में प्रवेश करते हैं तभी मंदिर में किसी तरह की पूजा पाठ शुरू होती है। दलितों के मंदिर में प्रवेश की रोक को लेकर देश दुनिया में कई चर्चाएं हैं परंतु यहां माता महेश्वरी के मंदिर में दलित ही पहले मंदिर में प्रवेश करते हैं। प्रतीकात्मक युद्ध होता है। भूमिहार की हार होती है।और दलित मंदिर में प्रवेश कर पूजा का शुभारंभ करते हैं। भाईचारा और सामंजस्य का यह एक अनूठी मिसाल है जो देश में कहीं नहीं मिलेगी।

15 अक्तूबर 2021

बली बोल में दलितों और सवर्णों का सामंजस्य

बली बोल में दलितों और सवर्णों का सामंजस्य

अरुण साथी

सवर्णों के द्वारा (खास, भूमिहार-राजपूत) दलितों से भेदभाव, छुआछूत, शोषण, दमन के किस्से आम हैं। परिणामतः वही भेदभाव, छुआछूत, शोषण, पर कहीं-कहीं दमन विपरीत धारा में बहने लगी है। कई राजनीतिक दल के मुखिया, जनप्रतिनिधि, और सत्ताधीश इसी कुंठा के साथ आगे बढ़ रहे हैं। कुछ सामाजिक, राजनीतिक और सोशल मीडिया पे सक्रिय लोग इसमे लगे है।

राजनीति की रोटियां चिताओं पर सेंकी जाने लगी है। भीम आर्मी जैसे संगठन आग में घी देने लगे। नतीजा नफरत, घृणा चरमोत्कर्ष पर है । यह सच है कि भेदभाव, छुआछूत, और शोषण, दमन के शिकार दलित हुए हैं। यह भी सच है कि इन्हीं सब के विरुद्ध सवर्णों ने आवाज उठाई। संघर्ष किया। लड़ाई लड़ी। जीत भी मिली।

 एक सच यह भी है कि अच्छाइयों को उस तरह से प्रचारित प्रसारित नहीं किया जाता जिस तरह से घृणा को। इसी तरह की एक अच्छाई बरबीघा के पिंजड़ी गांव में देखने को मिलती है। वर्षों से यहां यह परंपरा है । बली बोल। थोड़ा अंधविश्वास! थोड़ी परंपरा। बहुत सारा जातीय समानता।

परंतु इसके बारे में कम लोग ही जानते हैं। इस परंपरा में दलित समुदाय की पूरी टोली भूमिहारों के टोले में घर-घर घूमती है। बली बोल का नारा लगता है। हाथ मे लाठी, तलवार, भला, फरसा, गंडासा लिए हुए। भूमिहार अपने घरों के आगे हथियार, भाला, लाठी, झाड़ू रखते हैं। जिसको लांघ कर यह लोग निकलते हैं। मान्यताओं की माने तो यह सुरक्षा की गारंटी है।

दलित के पैर छूटे सवर्ण


इस परंपरा में दलित भगत श्रवण पासवान की भूमिका रहती है। चार-पांच पीढ़ियों से श्रवण पासवान के पुरखे इसके अगुआ रहे। अब श्रवण अगुआ है। उसके पैर सवर्ण जाति के बच्चे, बुजुर्ग महिलाएं सभी छूते हैं। प्रणाम करते हैं। स्वागत करते। शराब लाल रंग का डिजाइनर कपड़ा लपटे रहते है। वहीं कमर में घुंघरू होता है।



सभी का स्वागत होता है। दान दक्षिणा दिया जाता है। उसी तरह से ही गलियों में बीमार और कमजोर लोग सो जाते हैं और उसको लांघ कर दलितों की टोली चलती है। यह मान्यता है कि इससे निरोग लोग रहते हैं। दशकों से भूमिहारों से टोले में एक जगह बली बोल का समापन खास घड़ा को फोड़कर होता है। जहां घड़ा को फोड़ा जाता है और सभी जाति के लोग वहां घड़े का टुकड़ा अपने अपने घर ले जाते है। यह एक परंपरा दो-तीन सौ  साल पुरानी है। कभी तनाव नहीं हुआ ।कभी भेदभाव नहीं हुआ। कभी दलित सवर्ण का टकराव नहीं हुआ। सभी जाति के लोग मिलकर इसे करते हैं। दुर्भाग्य से इस तरह की अच्छाई को प्रचारित और प्रसारित नहीं किया जाता।

यात्रा वृतांत: वनारस में धर्म का धंधा

यात्रा वृतांत: वनारस में धर्म का धंधा  अरुण साथी वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर यह तस्वीर देख रहे हैं। वर्तमान धार्मिक राजनीतिक हस्तक्षेप और धा...