18 फ़रवरी 2026

ब्राह्मणवाद से आजादी...!

ब्राह्मणवाद से आजादी...! 


( दलित चेतना और सवर्ण भाग 4)

आज गजाधर चट्टोपाध्याय (राम कृष्ण परमहंस) की जयंती है।  अभी नव ब्राह्मणवादी, नव सामंतवादी और नव प्रतिक्रियावादी प्रतिशोध ले रहे। इसके पीछे इतने सालों का शोषण, दमन कारण बताया गया। रटाया गया। और आज भी रटाया जा रहा। अनुभव कहता है कि यह मिशनरियों इत्यादि के द्वारा प्रायोजित और आर्थिक पोषित अभियान का दुष्परिणाम है। 

अब  राम कृष्ण को देखिए। माता काली का दक्षिणेश्वर मंदिर रानी राजमती ने बनाया। अब उस मंदिर में कोई ब्राह्मण पुजारी बनना नहीं चाहते थे। कारण कि रानी एक शूद्र थी। तब एक ब्राह्मण ही आगे पुजारी बन कर समाज के लिए संदेश दिया। वे थे राम कृष्ण में बड़े भाई..! फिर राम कृष्ण भी बने।

राम कृष्ण परमहंस ने तो अद्वैत वेदांत व्यवहार में उतार कर संदेश दिया। सभी में एक ही ईश्वर।

इतना ही नहीं, राम कृष्ण तो ईसाई, इस्लाम इत्यादि धर्म को भी अनुभव उतार कर संदेश दिया , यतो मत, ततो पथ। रास्ता कोई हो, ईश्वर एक । 

12 फरवरी को स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती थी। इन्होंने भी वेद को ही सत्य माना। पाखंड, परंपरा को तोड़ा। खत्म दिया।

अब मूल बात। दोनों ब्राह्मण थे। तो बस इतना। भेदभाव, छुआछूत, असमानता, गैर बराबरी नहीं थे, ऐसा नहीं है। पर इसके विरुद्ध लड़ाई ब्राह्मणों ने भी लड़ा । सवर्णों ने भी लड़ा। आज इन जैसों को खारीज कर दिया गया। दुख इस बात का है..बस..

02 फ़रवरी 2026

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण 

(अरुण साथी)

भारत सरकार ने अलौकिक बजट पुनः जारी किया। इसकी अलौकिकता न्यारी है। आम आदमी की समझ पर यह भारी है। लौकिक ज्ञान से परे अलौकिक ज्ञान जरूरी है। अतः, इसे अच्छा या खराब मान लेना ही बुद्धिमत्ता है। 

साधारण सी बात है। जो विपक्ष में है, वे इसे बेकार बजट बता रहे। जो पक्ष है, वे इसे साकार बजट बता रहे। इस पक्ष, विपक्ष में आम आदमी चक्कर खा रहा। उसे समझ ही नहीं आ रहा कि क्या समझे। 


अब देखिए, दीदी ने समझाया । यह दलित , महिला, ओबीसी, किसान, युवा विरोधी बजट है। तब खेलावन काका पूछ रहे।


"अरे, तब यह बजट सरकार ने अपने लिए लेकर आई है क्या..?"

तब इसको लेकर मुनि नारद ने ज्ञान दिया।

" देखो वत्स, यह अलौकिक है। फिर भी इसमें सार तत्व को समझ कर इसकी विशालता और व्यापकता को समझा जा सकता है। जैसे समझो । बजट में बच्चों को स्कूल में अब डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें अब बच्चे अपने स्कूल में मोबाइल से रील बनाना सीखेंगे। फिर देश तेजी से आगे बढ़ेगा। उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से देश में बुलेट रेल चल रही। और उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से  देश में स्मार्ट शहर बन रहे। समझे कि नहीं।"


काका कहां चुप रहने वाले। बोले, 

"मुनिनाथ । हमलोग तो बच्चों को रील बनाने से रोकते है। इसे अच्छा नहीं मानते।"

"यही तो लौकिक बातें है। पर समझो। तुम लोग बच्चों को क्यों पढ़ाते हो..? इसीलिए कि वह पढ़ लिख कर कमाई करे! अब इस बार चुनाव में सरकार ने प्रति वर्ष 2 करोड़ को नौकरी और रोजगार देने का वादा किया।"


"यह वादा इसी से पूरा होगा। अभी सर्वाधिक कमाई का साधन मोबाइल है। रील बना कर लोग प्रति महीना लाखों कमा रहे। इसमें कौशल की जरूरत है। हालांकि महिलाओं के लिए कोई कौशल आवश्यक नहीं है। पर पुरुष जबतक कौशल प्राप्त नहीं करेंगे तबतक इस क्षेत्र में कमाई मुश्किल है। इसी उद्देश्य से बच्चों में डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण आवश्यक है।"


अब काका चुप हो गए। मन ही मन सोचें। 

"मोदी अनंत, मोदी कथा अनंत,
यही गुणगान करे सब असंता...!"

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

यह 5 जनवरी की बात है। सुबह सुबह दरवाजे पर किसी ने आवाज लगाई। 

"बबलुआ, बबलुआ...!"

 बाहर निकला तो देखा इंदल मांझी की माय खड़ी थी। 

पूछा, "की होला"। 

बोली, "फटीचन मर गेलो !"

"कैसे ..?"

"बीमारी से"

"तब, हम की करियो..?"

"कुछ पैसा दहीं, कफन आदि खरीदे ले पैसा नै है... जरावे के लकड़ी के पैसा मिठ्ठू सिंह दे देलकै हैं...!"

मेरे पास नगद कुछ नहीं था। मैं बाजार गया। रितेश को ऑनलाइन भेजकर  नगद लिया। फिर आकर दे दिया। यह चुपचाप हुआ।  

यह एक बहुत लघु प्रसंग है। सार्वजनिक करना निश्चित ही सही नहीं है। पर वर्तमान में जातीय भेदभाव का विषवमन ऐसा है कि केवल सवर्ण होने भर से उसे शोषक बता कर प्रताड़ित किया जा रहा।  मेरा जन्म भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ। परंतु आर्थिक अभाव में वेदना ही सही है।

खैर, मेरा मानना है कि समाज में अच्छे, बुरे लोग हमेशा रहें है। पर अभी प्रायोजित तरीके से सवर्ण के विरुद्ध घृणा फैलाई जा रही। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वंचितों का शोषण नहीं हुआ। दमन नहीं हुआ। अथवा आज भी शोषण, दमन नहीं हो रहा। पर इसका मतलब यह है कि समाज में शोषक केवल जाति से निर्धारित नहीं है। यह एक नीच मानसिकता है। 


आज के समय में समाज को जोड़ने के छोटे छोटे प्रयासों की चर्चा अति आवश्यक है। समाज में रोज रोज ऐसे पहल होते है। समाज को जोड़ने का प्रयास होता रहा। होता रहेगा। 

जारी है..

01 फ़रवरी 2026

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

(दलित चेतना और सवर्ण)

अरुण साथी

पुण्य तिथि पर बिहार केसरी डॉ श्री कृष्ण सिंह को जन्म भूमि (माउर) जाकर नमन किया। अभी चुनाव नहीं है, इसलिए कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। फिर जगह जगह प्रतिमाओं पर लोगों ने माल्यार्पण किया। पुष्पांजलि की। आज के दौर ने बिहार केसरी ज्यादा प्रासंगिक हो गए। अभी महापुरुषों को जातियों में बांट दिया गया है।  श्री बाबू के साथ भी यही हुआ। भूमिहार ब्राह्मणों के कुछ नेताओं ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए यह किया। उनका स्वार्थ सध गया। समाज का नुकसान हो गया। हालांकि बड़ा वर्ग नेताओं के साथ नहीं गया। 
खैर, अभी सोशल मीडिया पर दलित विमर्श और दलित चेतना के नाम पर अर्ध सत्य को प्रसारित कर समाज को बांटने की बड़ा षडयंत्र हो रहा। और समाज बंट भी गया है। दलित वर्ग में सवर्णों के प्रति ऐसा विष बोया गया है दलितों का बौद्धिक वर्ग भी प्रतिशोध ले रहा..! 

1990 का मंडल आग एक बार फिर यूजीसी के बहाने, सुलगाने का प्रयास हुआ। और यह सुलग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर विराम लगाने की पहल की है पर नेताओं के द्वारा इस आग को हवा दी जा रही। 
नेताओं को पता है कि जब तक समाज जलेगा नहीं तब तक उनको कौन पूछेगा...? दुर्भाग्य से इस बार कमंडल वालों ने यह खेल कर दिया है।

हालांकि एक सकारात्मक बात यह हुई इस बार कुछ दलित और ओबीसी ने इसका खुल कर प्रतिरोध किया।  बकाई सोशल मीडिया पर विष वमन कर रहे...!

अब यूजीसी का बवाल थोड़ा शांत हुआ है। पर इसमें कई प्रश्न उठे है। 
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या समाज से भेदभाव, छुआछूत मिटाने की लड़ाई केवल दलितों के नेताओं , समाज सुधारकों ने लड़ी ...? क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

तो ऐसा नहीं है। संत रैदास, संत कबीर, संत तुकाराम इत्यादि के साथ साथ आदि शंकराचार्य , दयानंद सरस्वती , स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले इत्यादि लंबी सूची है। कईं बड़े नेताओं ने संघर्ष किया।

श्री बाबू ने दलितों को देवघर मंदिर में प्रवेश करा कर भेदभाव के विरुद्ध बड़ी लकीर खींची थी। वहीं जमींदारी उन्मूलन कर समाज में बराबरी की पहल की। दोनों मामले में उनके स्वजातीय उनसे नाराज हुए थे। श्री बाबू को तिरस्कार झेलना पड़ा था...
समाज में बराबरी की पहल समाज में नीचे के स्तर पर  भी हुआ है ।  और गैर बराबरी का विष दलितों का दलितों से भी है। दलितों का पिछड़े से भी है। और तो और ब्राह्मणों का ब्राह्मणों से भी है....लगातार प्रमाणिक रूप से इस पर लिखना शुरू कर रहा हूं...यह कॉलम जारी रहेगा....

(दलित चेतना और सवर्ण)

28 जनवरी 2026

अथ श्री बहुजन बाबा जी कथा…अध्याय प्रथम – संसिया टैक्स

अथ श्री बहुजन बाबा जी कथा…
अध्याय प्रथम – संसिया टैक्स

अरुण साथी

दुनिया में राजतंत्र की समाप्ति के पश्चात लोकतंत्र का उदय हुआ। लोकतंत्र में वोट बैंक का सर्वोपरि महत्व स्थापित हुआ। तभी बाबा जी ने इस महत्व को भली-भांति समझते हुए एक अति-आधुनिक तथा अति-प्रगतिशील राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा को जन्म दिया। इसे वोट-तंत्र कहा गया। वोट-तंत्र में “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ।
यह सिद्धांत आर्यावर्त नामक राज्य में खूब फला-फूला। अनेक क्षत्रपों ने जातिवाद के इस मूल मंत्र को समझा, उसे व्यवहार में उतारा और देखते-ही-देखते राजा बन बैठे। इस सिद्धांत के अंतर्गत अधिक आबादी वालों ने पहले लघु आबादी वालों की भूमि छीनी, फिर उनकी नौकरियाँ छीन लीं और अंततः उनसे शिक्षा का अधिकार भी छीन लिया।

तब भी बहुजनों को संतोष न हुआ। होना भी नहीं चाहिए था। बहुजनों ने कहा कि एक हज़ार वर्ष पूर्व उनके साथ घोर शोषण हुआ था, जिसका प्रतिशोध लेना अनिवार्य है। इसी सिद्धांत के तहत लघुजनों से बोलने का अधिकार भी छीन लिया गया।

धीरे-धीरे यह अति-प्रगतिशील समाज और अधिक बहुजन-हितकारी होता चला गया। अंततः लघुजनों पर संसिया टैक्स लागू कर दिया गया।

इस व्यवस्था में सांस लेने पर कर (टैक्स) लगाया गया। जितनी बार कोई सांस लेगा, उतनी ही बार उसे कर अदा करना होगा। यह व्यवस्था बहुजनों को अत्यंत प्रिय लगी। इसे न्यायपूर्ण और नीतिसंगत घोषित किया गया। कहा गया कि पुरखों द्वारा किए गए शोषण की भरपाई के लिए इतना तो आवश्यक ही है।

बहुजनों ने उत्सव मनाया। संसिया टैक्स न देने वालों के लिए दंड का विधान किया गया। बकाया कर के लिए “प्रति टैक्स, प्रति कोड़ा” बहुजनों द्वारा लगाए जाने का प्रावधान निर्धारित हुआ।

इससे समस्त बहुजन आह्लादित हो उठे। वे अपने राजा की जय-जयकार करने लगे। अति-आधुनिक और अति-प्रगतिशील राजनीतिक सिद्धांत प्रदान करने वाले बाबा जी की सर्वत्र स्तुति होने लगी। हर ओर बाबा जी की पूजा-अर्चना आरंभ हो गई।

राज्य का नाम परिवर्तित कर नीला अम्बर कर दिया गया। सभी नीले वस्त्र धारण करने लगे, नीला टीका लगाने लगे। जो नीला टीका न लगाता, उसे दंडित किया जाता। उधर, गरीब और लाचार लघुजन धीरे-धीरे सांस लेना कम करने लगे। परिणामस्वरूप वे शीघ्र ही इस लोक को त्याग कर इश्लोक गमन करने लगे। कालांतर में इस धरा-धाम से लघुजन विलुप्त हो गए।

तत्पश्चात सभी बहुजन सुख, शक्ति और समृद्धि के साथ जीवन यापन करने लगे।

इति श्री रेवा-खंडे… अध्याय प्रथम… समाप्त…
प्रेम से बोलिए—बाबा जी जय।

24 जनवरी 2026

रॉलेट एक्ट जैसा UGC का काला कानून वापस लो

रॉलेट एक्ट जैसा UGC का काला कानून वापस लो


संविधान ने जातिगत भेदभाव नहीं होने का अधिकार दिया है। पर हमारे देश के राजनीतिज्ञ जातिगत भेद भाव को वोट की राजनीति के तहत उपयोग कर समाज को बांटा रहे । इसमें कई नाम है। 1919 में अंग्रेजों ने काला कानून रॉलेट एक्ट लाया था। फिर मंडल आंदोलन में बीपी सिंह के बाद लालू यादव ने भूराबाल साफ करो का नारा दिया। मायावती ने तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का विष बेल बोया। इसी पर काम किया। 
बीजेपी और मोदी सरकार ने पहले sc, st ACT पर सुप्रीमकोर्ट का झूठे मुकदमे को देख दिया फैसला बदल कर वही किया। आज यह मुकदमा 95 प्रतिशत झूठा होता है।

अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने UGC के द्वारा पुनः जातिगत भेद भाव की लंबी लकीर खींच दी। 
अब विश्विद्यालय में पढ़ने वाले sc st और obc विद्यार्थी को पीड़ित मान लिया। और सवर्ण समाज को पीड़क, अत्याचारी, खलनायक मान लिया। यही नियम लागू किया गया। अब एक समिति बनेगी जो केवल आरोप लगाने भर से केवल सवर्ण  विद्यार्थी को दोषी माना जाएगा। समिति इसपर कार्रवाई करेगी। 

कॉलेज से निष्कासन, निबंधन रद्द, पुलिस में हवाले और जेल। मतलब, जिस किसी सवर्ण विद्यार्थी पर sc, st, OBC के द्वारा जातिगत भेद भाव का आरोप लगा, उसका जीवन सर्वनाश हो जाएगा। 


इतना ही नहीं, यही स्थिति कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रोफेसर पर भी लागू है । अब, गुरुजी भी इनसे डरे डरे रहेगें।


और यह काला कानून समानता का कानून के नाम पर लाया गया। पर इसमें पहले जांच का प्रावधान नहीं। इसमें झूठा आरोप लगाने पर कोई सजा नहीं...!


यह रोहित बोमिला के केस के बहाने हुआ। वही रोहित बोमिला जो कानूनी रूप से  sc साबित नहीं हुआ। उसकी आत्महत्या के कारण में जातीय भेदभाव स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया। यह सब नरेटिव बनाया गया। 


अब यूजीसी ने एक भयानक काला कानून थोप दिया है। अब बीजेपी और नरेंद्र मोदी की सरकार ने वोट बैंक के लिए बांटने का और बड़ा काम किया। 


यह क्यों हुआ..? यही होता है। नेता यही करते है। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक यही होता है। जो उनके साथ है नेता उसका महत्व नहीं देते। जो जितना प्रखर विरोध में होता है, उसे अपने साथ लाने का सारा जतन नेता करता है। 

यूजीसी के माध्यम से वही किया गया। जो कुछ sc और OBC बीजेपी का प्रखर विरोध करते थे, उसी को साधने के लिए यह किया।


अब जो बीजेपी के प्रबल समर्थक थे। जिनको भक्त कहके गाली दी जाती है, बीजेपी ने उन्हीं पर प्रहार किया। 

अब यह भी समझिए। Sc, st, OBC के विरुद्ध कोई अत्याचार हो। कोई कानून बने , तो कोई न कोई सवर्ण उसका विरोध करेगा। उनके साथ खड़ा होगा। अत्याचार का विरोध करते हुए अपने समाज से लड़ेगा। पर जब सवर्ण पर अत्याचार हो तो सारा का सारा गैर सवर्ण या तो प्रसन्न होगा या मौन साध लेगा।


अब देखिए। समाज के रहकर, कई बार sc के साथ अत्याचार का प्रखर विरोध किया। और पत्रकारीय यात्रा में कई ऐसे लोग को जानता हूं जो sc st ACT के तहत फर्जी मुकदमा करने के लिए प्रसिद्ध है। जरा सा पैसे के लालच में वह किसी पर मुकदमा करता है। क्या ऐसे लोगों की जांच नहीं होनी चाहिए। पर होता यह है कि मुकदमा करने के लिए उनको बिहार सरकार के द्वारा एक लाख तक सरकारी सहायता दी जाती है। 

स्थिति भयावह है। मतलब यह कि अब सवर्णों को इस देश में रहने, जीने का मूलभूत अधिकार तक  यह छीन लिया जाएगा...!

पूरे भारत में सवर्ण समाज 10 प्रतिशत होगा। मतलब अल्पसंख्यक। तब, अब एक ही उपाय बचा है। सारे सवर्ण समाज को उठा कर देश निकाला दे दो। उठा का समुद्र में फेंक दो। या  जब सवर्ण समाज आज भी इतना अत्याचारी है तो इसे भी किसी टापू पर भेज दो। वहीं यह जी लेगा...

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