नीरज कुमार के बहाने एक जातीवादी विमर्श
विधान परिषद का चुनाव देश भर में था। पटना स्नातक का चुनाव देश में चर्चित हो गया। कारण, अनंत सिंह का पार्टी से विरोध करके नीरज कुमार को हराने के लिए उतरना।
और फिर देखते देखते जनसुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के साथ होकर पीला गमछा लहराने लगना। वही पीला गमछा, जिसे ओढ़ कर मोकामा में पीयूष में इनको पानी पिलाया था। वही पीके चुप रह गए ।
फिर, देखते देखते सोशल मीडिया में पहली बार विधान परिषद का चुनाव ग्लैमरस हो गया। देखते देखते रीलबाजी होने लगी। फिर, बुलडोजर से फूल बरसने लगे। फिर, देखते देखते गाली, गुत्ता होने लगा। फिर, देखते देखते अस्पताल में भर्ती प्रतिद्वंदी के लिए हिकारत का भाव सामने आया।
और बस, यह सब बिहार का आम आदमी का मानस चुपचाप देख, पढ़ रहा था। वह कुछ बोल नहीं सकता। क्योंकि उसे डर है। पर वह सौ सोनार की, एक लोहार की तरह चोट करता है। वोट से चोट। बोलती बंद..!
दूसरे तरफ अशोक महतो। निशांत कुमार अभी राजनीति में डेगा डेगी दे रहे। उनको साम, दाम, दंड, भेद सीखने में समय लगेगा। और अचानक अपने ही घर में चुनौती मिल गई। नेता कौन..? कुख्यात या सामान्य आदमी..? फिर आम आदमी ने वोट से चोट कर शंखनाद किया।
असल में यह चुनाव कई मायने के दूसरे एंगल से भी समझना होगा।
बिहार में अभी किसी भी जातीय समाज में कुछ लोग यदि किसी के साथ चले गए तो पूरे जाति को जोड़ कर माहौल बना दिया जाता है।
यह कोई सूक्ष्मता से नहीं देखता कि जो तथाकथित स्वघोषित नेता बन रहा, उसके साथ समाज का कौन सा वर्ग खड़ा है..?
यह स्वाभाविक है। असामाजिक, कुख्यात, दबंग, बाहुबली, रीलबाज, मुंहफट, गलीबाज, किसी का सम्मान नहीं करनेवाला के साथ उसी स्वभाव के लोग खड़े होते है। इससे पूरे समाज को खड़ा होना मान लेना, गलत है।
ठीक इसका उलट भी है। समाज में सभ्य, शालीन, जनहित में लड़ने, बोलने वाला, सर्व सुलभ और व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले के साथ एक बड़ा वर्ग खड़ा होता है। इसलिए नहीं कि उससे बहुत लगाव है। बल्कि इसलिए कि उसे लगता है कि इसकी हार , उसकी अपनी हार होगी।
बातें बहुत है। पर रीलबाजी से रियल बाजी सर्वथा सार्थक है। सकारात्मक है। और सर्वमान्य है। बस, रीलबाजी में बहके लोगों को ब्रह्मांड का नेता होने का गुमान हो जाता है। फिर सच सामने आता है तो...