29 अगस्त 2026

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग।

मुंगेर योग आश्रम का अनुभव : स्वावलंबन, सामूहिकता और सत्संग। 

यह एक सुखद संयोग रहा कि बिहार योग विद्यालय मुंगेर जाना हुआ । 

आश्रम में प्रवेश से पहले कड़े नियमों को कड़ाई से पालन के बारे में संयोजक चैतन्य मूर्ति और राहुल जी ने सब कुछ समझा दिया था।
हमें अन्नपूर्णा भवन में आश्रय मिला। एक कमरे में तीन यात्री। 

कड़े नियमों से पहले तो यही था कि नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करें। मोबाइल प्रयोग वर्जित है (किसी का मोबाइल जब्त नहीं हुआ)। अपने सारे कार्य स्वयं करने हैं। 


संध्या 7:00 बजे के बाद मौन व्रत का पालन करना अनिवार्य होगा। एक दूसरे के कमरे में नहीं जाना है।

सुबह 4:00 बजे से दिनचर्या शुरू होकर 7:00 बजे संध्या समाप्ति है। इसमें योग, कर्म योग, मंत्र उच्चारण, शवासन , सत्संग, वायु साधना में सहभागी होना है। भजन कीर्तन भी शामिल है। योग आश्रम में किसी भी देवी देवता का चित्र अथवा मूर्ति दिखाई नहीं पड़ा।

पूछताछ में यह जानकारी मिली कि यह आश्रम अंग नरेश राजा कर्ण के दान स्थल पर बना हुआ है। इसे कर्ण चौड़ा कहते हैं । यह पहाड़ी क्षेत्र है।

यही से गंगा स्नान और माता चंडी की आराधना के बाद कर्ण सोना इत्यादि दान किया करते थे। 

खैर, पहले दिन भोजन के बाद कुछ देर आराम के बाद मंत्र पाठ में भाग लेने के लिए बगल के आश्रम में जाना था। 

उसके लिए वहां गाड़ी की व्यवस्था थी। पौने तीन बजे सबको पहुंचना था, सभी पहुंच गए। आश्चर्य लगा कि कैसे हम लोग समय के पाबंद हो गए! 

इसके लिए गंगा के किनारे बने पादुका दर्शन सत्संग पीठ में जाना हुआ ।

यह एक खुला कक्ष था । सभी श्रद्धालु पालथी मारकर बैठ गए। सामने महादेव का एक शिवलिंग स्थापित था। जहां श्रृंगार का काम बच्चे कर रहे थे। पता चला कि इस आश्रम में बच्चों का बाल योगी के रूप में प्रशिक्षण और सेवा की भी व्यवस्था है। 

बच्चों को यहां सभ्यता, संस्कृति, गायन, वादन, चित्रकार इत्यादि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 


फिर देखा कि एक सामान्य से थोड़ा कम कद काठी के गेरुआ वस्त्र धारी संत व्यक्तित्व अलमस्ती में चले आ रहे हैं। उनके माथे पर एक विलायती टोपी थी, हाथ में पानी का थर्मस, चेहरे पर मुकुराहट और हल्की-हल्की सफ़ेद दाढ़ी। 

वे सहजता से कुर्सी पर बैठे। घड़ी देखी। 3:00 बज गए। हरि ॐ तत्सत का उच्चारण किया। सब ने साथ दिया। फिर महामृत्युंजय मंत्र के जाप का शुभारंभ हुआ। इससे पहले किसी भी सहज आसन में बैठने, ध्यान करने का निर्देश मिला।

ध्यान करने के लिए आंखों को बंद करने। आती–जाती सांसों को सजगता से देखने। महसूस करने के लिए कहा गया।

पुनः आंखों के सामने एक ज्योति पुंज की कल्पना करने की बात कही गई। पुनः एक साथ तीन बार ॐ का उच्चारण कराया गया पुनः शांति पाठ। पुनः एक साथ तीव्रता से 108 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया गया। 

ॐ उच्चारण और महामृत्युंजय जाप के बाद कुछ अन्य मंत्रों का भी जाप कराया गया । ॐ नमः शिवाय का भी जाप हुआ।

इन सब के बाद वहां की स्थिति सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होने लगा। लगा जैसे सभी जगह महामृत्युंजय का नाद गूंज रहा हो। 

अंदर से कंपन होने जैसा ! जैसे यह नाद दूर किसी क्षितिज से जाकर लौट रही है।एक असीम ऊर्जा तरंग। 


फिर लगातार कई प्रकार की ध्यान मुद्राओं का अभ्यास एक साथ हुआ। 4:00 बजे समाप्ति हुई। समाप्ति से पहले शांति पाठ हुआ। 

उसके बाद हमें एक बड़े से कक्ष में ले जाया गया । या कक्ष नहीं कह सकते हैं, एक बड़ा सा टेंट नुमा हॉल । दो बड़े लोहे के पिलरों पर छतरी नुमा टेंट बना हुआ। 

सामने मंच और मंच पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद जी, वायु साधना यज्ञ की तैयारी। 

इससे पहले सत्संग। स्वामी जी का प्रवचन । पर यहां प्रचलित धार्मिक कथा का वाचन , विवरण या विवेचना नहीं। यहां विज्ञान की विवेचना होने लगी। उसी पर आख्यान होने लगा। 

उन्होंने बताया कि वायु एक ऊर्जा है। वायु का मतलब हवा नहीं, ऊर्जा का एक रूपांतरित रूप से है। यही है, तो हम हैं। और कहते हैं कि मेरा शरीर! यह मेरा कौन है? 

फिर समझाया की नासा ने एक ऊर्जा के रूपांतरण पर एक शोध किया जिसमें दुनिया भर के 500 वैज्ञानिकों को शामिल किया गया । उसमें से उनको भी शामिल किया गया, यद्यपि वे वैज्ञानिक नहीं है।

 बताया कि इसमें एक क्वांटम मशीन बनाई गई। यह ऊर्जा को मापता और रूपांतरित कर दूसरी जगह भेज सकता था ।

नासा ने पाया कि इसी मशीन से हम अंतरिक्ष में ऊर्जा भेज कर बीमार वैज्ञानिकों को ठीक कर सकते हैं। बाद में मेडिकल लॉबी ने दबाव में इस पूरे शोध को स्थगित कर दिया। जबकि इससे ऊर्जा के माध्यम से बीमारियों को ठीक किया जा सकता था। 

इस सत्संग की विशेषता यह थी कि इसमें भीड़ नहीं थी। शोर नहीं था। शांति और जिज्ञासा थी।

सभी लोग पालथी मारकर बैठे हुए थे। इसमें विदेशियों की भी बड़ी संख्या थी। 

वहां एक बड़ा टीवी डिस्प्ले भी लगा हुआ था। वही वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी विदेशी महिलाओं की टीम के द्वारा ही संभाला जा रहा था। 


हां, सत्संग से पहले कीर्तन हुआ। सामने एक युवती गा रही थी। पीला वस्त्र पहने। आंखों पर चश्मा लगाए। चेहरा पर हल्की मुस्कान और आभा के साथ गंभीरता ओढ़े हुए। 

जब उन्होंने गायन शुरू किया तो उनके शब्द ऐसे गूंजे , जैसे दूर कहीं, किसी ने बांसुरी बजाई हो! कोकिल कंठ! 

उसके बाद स्वामी जी ॐ उच्चारण के साथ ध्यान और शांति पाठ करवाया। फिर महामृत्युंजय का जाप हुआ। 

हां, स्वामी जी ने यह भी बताया कि महामृत्युंजय जाप को वैज्ञानिकों ने क्वांटम मशीन से मापा और चौंक गए। इसकी ऊर्जा फैली और पूरे नगर को अपने प्रभाव में ले लिया। 

खैर, इतनी देर तक पालथी मार कर बैठने की आदत नहीं रहने से लगभग सभी को परेशानी हो रही थी। कुछ बुजुर्गों को कुर्सी पर सुविधा दी गई थी। घुटने और कमर, मेरे भी जवाब दे रहे थे। पर बैठा रहा। 

इसी बीच गौर किया स्वामी जी के बगल में एक पिंजरा था। उसमें एक मकाउ तोता और वहीं बगल में एक बालक भी बैठा रहा ।


आमतौर पर वायरल और बदनाम बाबाओ के मोबाइल , टीवी में बोल, सुनकर कभी किसी से आकर्षक नहीं रहा, पर निरंजनानंद को देखते ही ओजस्विता और दिव्यता का बोध हुआ। एक परमहंस, एक संत और एक संन्यासी से साक्षात्कार हुआ। 

बस पहले दिन की समाप्ति हो गई। 
फिर 6:30 तक भोजन कर लेना है। थाली, ग्लास, कटोरी लेकर पास ही रखना है। 7:00 बजे आवास बंद होना है। यह सब हो गया। फिर एक बैठक हुई। इसमें संयोजक ने अगले दिन की दिनचर्या की जानकारी दी। 

कर्म योग के बारे में बताया गया। कर्म योग। मतलब, सजगता से अपने दैनिक कार्य को करना। 

इसमें सभी को काम बांटे गए। मुझे मुख्य भवन की सफाई का कार्य मिला। शौचालय किसी को भी साफ करनी पड़ सकती है, यह सुनकर कुछ के चेहरे उतर गए। खैर, सब अपने-अपने कमरे में चले गए । किसी से मोबाइल छीनी नहीं गई। क्योंकि चार दिन का सत्र है। एक माह के सत्र में जब्त किया जाता है। मेरे कमरे में रहने वाले सभी ने मोबाइल ऑन किया। घर सूचना दी। और उसमें लग गए।

मैंने घर में कॉल कर सूचना दी। (मुख्य मोबाइल मैं घर पर ही छोड़ आया था। कॉल के लिए एक था) ।और थकान के कारण नींद आ गई। 




25 अगस्त 2026

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

बिहार योग विद्यालय और हम बिहारी

स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा स्थापित बिहार योग विद्यालय का चार दिवसीय आश्रम प्रवास से लौट आया। जीवन का एक नया अनुभव मिला। जीवन में उन अनुभवों को हमारे जैसा सामान्य आदमी तब तक शत प्रतिशत उतार पाना मुश्किल है, जब तक आदमी हार या थक न जाए। जो इन अनुभवों को जीवन में पहले धारण कर ले, वही संत है। कई थके हारे लोग आश्रम में मिले। सेवानिवृत..के बाद ..!

खैर, आश्रम में डिजिटल डिटॉक्स, मेंटल डिटॉक्स और फिजिकल डिटॉक्स हुआ। चार दिनों तक बिना मोबाइल रहा। 

बिना मोबाइल भी जीवन जिया जा सकता। न कोई सेल्फी की होड़। न रील बनाने की प्रतिस्पर्धा। बस सबकुछ अपने लिए। 

आज के दौर में यह मुश्किल है, पर अब इसी की जरूरत है। 

आश्रम में बहुत कुछ सीखा। बहुत कुछ अनुभव हुआ। कुछ कुछ अनुभूति हुई। और सबसे विशेष, स्वामी निरंजनानंद जी से स्नेह मिला। यह अतुल्य और अकल्पनीय रहा। 

स्वामीजी कौन है? यह सवाल मन में उठेगा तक भी इसका जवाब इस इंटरनेट की दुनिया में कम ही मिलेगा। आज अधजल गगरी, छलकत जाए वाले वायरल बाबाओं का दौर है। 

इस दौर में स्वामी निरंजनानंद जी चुपचाप योग और मंत्र विज्ञान पर शोध और साधना कर रहे। दुनिया स्वामी जी के शोध और साधना का लोहा मान चुकी है। पर हम बिहार के लोग, अपने घर में इतनी बड़ी उपलब्धि होने के बाद भी उसका सम्मान नहीं कर रहे। 
खैर, आश्रम प्रवास में 4 बजे से 7 बजे, योग, ध्यान, मंत्र, साधना, कर्म योग (साफ सफाई) जैसे गुरुकुल जीवन का अनुभव मिला। दुनिया के कई देशों के लोग यहां प्रवास करते मिले। 

और इसी में जाना कि जो शारीरिक योग हम करते है, वह योग का दस प्रतिशत हिस्सा ही है।

बस, इतना ही। बाकी बातें फिर कभी



17 अगस्त 2026

धीरज नहीं तो धर्म कहां..?

धीरज नहीं तो धर्म कहां..?

लखीसराय के अशोक धाम में तीसरे सोमवारी भगदड़ मचाने से आधा दर्जन से अधिक की मौत हो गई। धर्म स्थलों में अब अपार भीड़ है।
नियंत्रण की सारी कोशिशें बेकार हो जाती है। कुंभ, नालंदा शीतला मंदिर, अशोक धाम, यह लंबी सूची है। आम तौर पर इसके लिए प्रशासन को जिम्मेवार ठहराया जाता है। 

परंतु इसमें श्रद्धालुओं का अधीर होना, सबसे बड़ा कारण है। जल्दी से पूजा कर लें, इसके लिए हम, सब कुछ करेंगे। 

आज 3:30 बजे जग कर जल्दी जल्दी तैयार होकर, सपत्नीक  पंचबदन स्थान शिव मंदिर गया। पिछले सोमवार से अधिक भीड़। डेढ़ घंटा लाइन में लगे। जब नजदीक पहुंचने को थे तो कई लोग जबरन प्रवेश कर रहे थे। मेरे पीछे भी एक आकर लग गया। डांट कर कहा, " यह कैसा धर्म ? तो दांत निपोर दिया। पुलिस का एक जवान था, बोले तो उसने भी कहा, क्या करें सर, आप लोग ही कहते है, रहने दीजिए, तभी होता है...!

महिला पंक्ति में कई महिलाएं जबरन धक्का मुक्की कर के प्रवेश कर गई...! सभी जगह पुलिस संभव नहीं...!

हम, घंटों लाइन में लगे लोगों को धकिया के घुस जाएंगे। पहुंच, पैरवी, रसूख , का उपयोग करेंगे। 


और फिर जोर, जबरदस्ती भी। वहीं, जब भगदड़ होगी तो किसी की लाश से गुजर कर हम पूजा करने से गुरेज नहीं करते..! जब कोई शव यात्रा से आयें तो महिलाएं बिना स्नान धर प्रवेश करने नहीं देती, तो फिर यहाँ..? हम, और हमारी धार्मिकता...?

न धीरज, न संवेदना, न सेवा, न सहयोग...फिर धर्म कहां ? भगवान कहां...? और फिर, रील और सेल्फी कल्चर से भीड़ , भेड़िया धसान है...

12 अगस्त 2026

भादो के गर्मी में हिरन मात जा हे..

भादो के गर्मी में हिरन मात जा हे..

देहाती कहावत है। और यह अभी सावन में भी चरितार्थ है। तीखी गर्मी है। सबकी अपनी अपनी समस्या है। किसान परेशान है। 
"रोपनी अब दु कट्ठा भी नै रोपो हो। पहले चार कट्ठा रोप दे हल। रोपनी मिले में भी मुश्किल हो। और ई लहा–लोट रौदा हो..की रोपा होत, रोपनी भाग गेल..!"
रोपनी की अपनी समस्या है। 

" खेत के पानी खल–खल करो हो। एक घड़ी गोर रख के देख लहो, खाल उतर जैतो...? "

और वातानुकूलित कक्ष से धान रोपनी का प्रतिशत बढ़ाने पर रोज मंथन हो रहा। अधिकारी लक्ष्य पूरा करने के लिए नीचे के कर्मी को हड़का रहे। 

वहीं सावन में वर्षा बहुत कम हो रही। 

पर एक सुखद समाचार यह है कि अब पिछले एक, डेढ़ दशक से किसान धान की रोपनी के लिए पूरी तरह वर्षा पर निर्भर नहीं है। अब हर खेत, खंधा में समर्सिबल बोरिंग है।  ट्रांसफार्मर और बिजली है। इसलिए धान का रोपा हो जाता है। 

मजदूर एक बड़ी समस्या है। रोपनी मिलना अब मुश्किल है। 

इसीलिए बड़े किसान अब सहरसा से रोपना (पुरुष) लाते है। उसके रहने, खाने की व्यवस्था देते है। वह बहुत काम निकालता है।

और हां, खेत की मेड़ तक बिजली पहुंचाने की योजना का शुभारंभ मनमोहन सिंह की सरकार ने ही किया था। मुझे अच्छे से याद है। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना। बस इतना ही, बाकी सब ठीक है।

30 जुलाई 2026

लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव

लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि स्वयं को सुधारने की क्षमता में है। इसमें गलतियां होती हैं, सरकारें असफल भी होती हैं, फैसलों पर सवाल भी उठते हैं। लेकिन इन सबका समाधान संविधान, कानून और चुनाव की प्रक्रिया में निहित है। यदि इनकी जगह भीड़ निर्णय लेने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल जाता है। आज भारत इसी चुनौती के एक कठिन दौर से गुजरता दिखाई देता है।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध का अधिकार नागरिकों की सबसे बड़ी ताकत है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब विरोध प्रदर्शन हिंसा, धमकी, सार्वजनिक अपमान, संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव और कानून को चुनौती देने का माध्यम बनने लगे, तब यह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रह जाता। यह भीड़ के दबाव से व्यवस्था को झुकाने का प्रयास बन जाता है। दुनिया के अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि भीड़ कभी स्थायी समाधान नहीं देती। बांग्लादेश की हालिया घटनाओं ने दिखाया कि जब भीड़ सत्ता और संस्थाओं पर हावी होती है, तब सबसे पहले लोकतांत्रिक मर्यादाएं टूटती हैं। क्रांति का रोमांच क्षणिक हो सकता है, लेकिन संस्थाओं का क्षरण वर्षों तक राष्ट्र को अस्थिर करता है। भारत का लोकतंत्र भी इस समय कई दिशाओं से दबाव झेल रहा है। सोशल मीडिया ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन उसी मंच पर भीड़ की मनोवृत्ति भी तेजी से विकसित हुई है। किसी भी मुद्दे पर कुछ घंटों में भावनाओं का ऐसा उबाल पैदा कर दिया जाता है कि तथ्य और तर्क पीछे छूट जाते हैं। ट्रेंड, ट्रोल और वायरल संस्कृति कई बार विवेक पर भारी पड़ती दिखाई देती है। यह भी सच है कि इस स्थिति के लिए केवल भीड़ को दोष देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। लोकतंत्र संवाद पर चलता है। संवाद की कमी अविश्वास पैदा करती है और अविश्वास आक्रोश को जन्म देता है। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर समय पर स्पष्ट संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाई जाती तो शायद स्थिति इतनी विस्फोटक नहीं बनती। जनता केवल निर्णय नहीं, उसका तर्क भी सुनना चाहती है। लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता को विश्वास में लेना भी है। जितना अधिक संवाद होगा, उतनी ही कम अफवाहें और उत्तेजना फैलेंगी। चुप्पी कई बार विपक्ष से अधिक नुकसान सत्ता को पहुंचाती है। दूसरी ओर, विपक्ष की भी समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है, लेकिन उसका माध्यम चुनाव है, न कि भय, अराजकता या संस्थाओं को अस्थिर करने की राजनीति। यदि हर असहमति का उत्तर भीड़ के दबाव से खोजा जाएगा, तो कल कोई भी सरकार सुरक्षित नहीं रहेगी और कोई भी संस्था स्वतंत्र नहीं बचेगी। चिंता केवल सरकार की नहीं है। चिंता उन संवैधानिक संस्थाओं की भी है, जिन पर लोकतंत्र टिका है। संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका, चुनाव आयोग, स्वतंत्र मीडिया और सुरक्षा बल। इन संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इन्हें अविश्वसनीय बनाने का सुनियोजित प्रयास अंततः पूरे लोकतंत्र को कमजोर करता है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान है। यही संविधान सरकार को सत्ता देता है और जनता को उसे बदलने का अधिकार भी देता है। इसलिए लोकतंत्र में अंतिम फैसला भीड़ नहीं, मतदाता करता है। सड़क पर जुटी भीड़ क्षणिक उत्साह पैदा कर सकती है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य मतदान केंद्र तय करते हैं। आज आवश्यकता किसी एक दल या विचारधारा की जीत की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा की है। सरकार अधिक संवेदनशील और संवादशील बने, विपक्ष अधिक जिम्मेदार बने और नागरिक यह समझें कि लोकतंत्र की रक्षा केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि संयम और संवैधानिक आचरण से भी होती है। लोकतंत्र की कमियां लोकतंत्र ही दूर कर सकता है। भीड़तंत्र केवल व्यवस्था को अस्थिर करता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों में संस्थाएं भीड़ के आगे झुकीं, वहां अंततः लोकतंत्र ही सबसे बड़ा पराजित हुआ।

28 जुलाई 2026

छात्र आंदोलन में भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र

भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र

मुझे पहले दिन से ही लग रहा था कि फेसबुक, इंस्टा जैसी कंपनी भारत में हो रहे छात्र आंदोलन को हवा दे रही है। सोशल मीडिया पर शांतिपूर्वक चीजों को देखने और समझने वाले लोग इसे समझ सकते हैं। 
छात्र के आंदोलन को पुलिस के द्वारा छात्रों की पिटाई को काफी बर्बर तरीके से और खूब तेजी से वायरल किया गया । हर किसी के फीड में केवल और केवल इसे ही दिखाया जाता था। यह फेसबुक के एल्गोरिथम के द्वारा जानबूझकर किया गया।

उसे हर किसी को दिखाया गया परंतु छात्र आंदोलन को शांत करने के प्रयास को, छात्र आंदोलन में घुस आए उपद्रवियों के द्वारा किए गए उपद्रव और अराजकता को दबा दिया गया।

 उसके रीच को घटा दिया गया। और यह बात पूरी तरह से तब प्रमाणित हो गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी वीडियो को प्रतिबंधित कर दिया गया। हालांकि भारत सरकार ने इस पर संज्ञान लिया है परंतु इस पर और कड़ाई से संज्ञान लेकर सजा देने की जरूरत है। इस देश को, कमजोर करने, गिराने में पूरी दुनिया की ताकत लगी हुई है.. हमें इसे समझना होगा... अफसोस की कथित जेन जी इस साजिश का हिस्सा बन जाते हैं..