22 अप्रैल 2026

मतलब निकल गया तो...

मतलब निकल गया तो...

महानगरीय संस्कृति में कुछ ज्यादा और वर्तमान मानवीय व्यवहार में कुछ कुछ, कहीं कहीं, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, चलन में है। 
अब पशुओं पर भी यह मानवीय अत्याचार आम है। वह भी उस पालतू के साथ, जिसने आदमी को अपना सबकुछ मान लिया। पालतू कुत्ता के साथ। दिल्ली सहित, महानगरों में यह आम है। कुत्ता को आवारा छोड़ देते हैं। कल दिल्ली के एक पॉश क्षेत्र में यह बहुत दिखा। दुख हुआ।

खैर, उसके कई कारण हो सकते है, जैसे घर, शहर बदलना, कुत्ता का काट लेना.. कुत्ता का बीमार होना, आदि इत्यादि..। तब क्या, हम जिससे प्यार करते हैं, उसे किसी भी कारण से छोड़ देना मानवता तो नहीं है..?

वह भी तब, पालतू कुत्ता अपने पालने वालों के हर खुशी का ध्यान रखता है। उसे अपना मालिक ही सबकुछ लगता है। घर आने पर वह खुशी कोई अपना भी रोज रोज नहीं दे सकता, यह देता है। घर आने का इंतजार, दरवाजे को ताकते रहना, घर आते है नितराने (झूमने) लगना। आदि, इत्यादि। पर इसे दूर से कोई समझ नहीं सकता। प्रेम करके ही प्रेम को जाना जा सकता है।

इसीलिए निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,

"होश वालों को खबर क्या,
बेखुदी क्या चीज है..."

एक निवेदन, शौक के लिए कुत्ता मत पाला करिए। किसी के कहने से भी मत पालिए। मनोरंजन के लिए मत पालिए। कुत्ता पालना एक बड़ी जिम्मेवारी है। परिवार का एक सदस्य बढ़ जाता। और परिवार के सदस्य की देखभाल , प्यार सब कुछ देना पड़ता है। वही फिर लौट कर मिलता है। 

बाकी, पालतू कुत्ते को सड़क पर छोड़ने का पाप, महा पाप है। और कुछ को देखा है, पालतू को सड़क पर छोड़ तो देते है, इसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आप नजर उठा कर देखिए, आसपास...!

इसलिए तो कबीरदास ने कहा है,

"निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय। 
बिना जीव की साँस से, लोह भसम हो जाय॥"

21 अप्रैल 2026

दिल्ली में हूं...

दिल्ली में हूं...  

(यात्रा वृतांत)

सोमवार को दिल्ली आना हुआ। कल तक के लिए। दिल्ली पहले भी आना हुआ। बीच में कई बार आया। अब दिल्ली बहुत कुछ बदल गया। आज पुरानी बातें याद आ गई।
पहले, शायद 1995 या 96 में पहली बार व्यापार के लिए आया था। पता चला था कि सदर बाजार में स्टेशनरी इत्यादि सामान सस्ता मिलता है। एक सहपाठी वहीं, एक दुकान में काम करता था। आया तो, यादें याद आ गई है।
एक छोटी झलक। जेनरल टिकट से यात्रा कर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद रिक्शे वाले से पूछा तो अनजान समझ कर अनाप शनाप पैसे मांगने लगा। एक एक पैसा कमाना, एक एक पैसा बचाना। 
तब  किसी से पूछा, सदर बाजार किधर और कितना दूर है। उसने बताया। मैं पैदल चल दिया। रास्ते में देखा सड़क के किनारे कई महिला, लड़कियां सज संवर कर खड़ी है। वे पुरुषों को इशारे से बुला रही। गांव का एक युवा को यह बेहद चौंकाने वाला लगा। फिर देखा, कुछ को तो बांह पकड़ कर लड़िकयां साथ लेकर चली गई। 

मैं डर गया। सड़क के दूसरे किनारे से सहमा सहमा जाने लगा। सड़क के दूसरे किनारे से एक महिला ने गंदा इशारा किया और गंदी गाली दी। मैं नजरअंदाज करके तेज कदमों से आगे बढ़ता चला गया। और सड़क पार कर गया। 

पूछता पूछता , सदर बाजार पहुंचा। आज भी याद है। रामअतर सिंह, स्वरूप सिंह की दुकान। बेल्ट, बैग इत्यादि । उनका स्वभाव बहुत मिलनसार था। 

मेरा सहपाठी संजय राम, वहीं स्टाफ था। देखा कि उसके साथ भी बहुत अपने जैसा व्यवहार था। मुझे अच्छा लगा। 

अब दिल्ली में मैट्रो है। कैब है। बाइक है। रिक्शा नहीं...

भीषण गर्मी में पहले भी दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी, या कम, आज भी वही। आज भी 2 रुपए गिलास पानी बिकता है। कल भी। 

छोला बटुरा पहली बार दिल्ली में खाया था। तब से जब दिल्ली आया जरूर खाता। अब नहीं। 

और हां, तब संजय राम के यहां ही ठहरा था। पहाडगांव में। 

खूब आनंददायक। मोटा मोटा रोटी, और सब्जी बनाकर खिलाता था। जमीन पर गेंद्रा बिछा कर सो जाना। और भोर...! बस, आगे फिर कभी... 


बाकी दिल्ली के कुछ अपनों से बिना वजह मिलने का प्रयास कर रहा... पर डर लगता है कि यहां के भाग दौर की जिंदगी में किसी को परेशान करना भी ठीक नहीं...


बाकी सब ठीक है...

03 अप्रैल 2026

बेटा (लघु कथा)

बेटा 
(अरुण साथी की लघु कथा)

रामदेव । आजीविका चलाने के लिए वह अपनी जवानी हरियाणा, दिल्ली, गुड़गांव में गार्ड की नौकरी करते बीता दिया। 

इसी बीच उसका इकलौते बेटा आर्मी का जवान बन गया। घूमघाम से शादी की। उम्र के ढलान पर वह  गांव आ गया। 
समय बीता। उसकी जमा पूंजी खत्म हो गई। घर चलाने का खर्च जैसे तैसे चलने लगा। रामदेव की पत्नी भी ज्यादातर बीमार रहती।
रामदेव ने बेटा से कभी कोई पैसे की मांग नहीं रखी। बेटा कभी कभी पत्नी के खाता पर कुछ पैसे भेज देता, जिससे गुजारा होना मुश्किल था।

एक दिन पत्नी के समझाने पर रामदेव में बेटा से बात की।

"बेटा, घर चलाना मुश्किल होता है। तुम्हारी मां भी बीमार है। इस माह पांच हजार भेज देता तो राहत होती।"

बेटा ने तपाक से उत्तर दिया। 

"पिताजी, 50 हजार वेतन है। एक पैसा नहीं बचता। बच्चे की पढ़ाई। घर का किराया। घर चलाने का खर्च। कई तरह का ईएमआई।"

रामदेव चुप हो गया। पर उसके अंदर कुछ टीस रहा था। उसे लगा जैसे उसकी छाती पर किसी हाथी ने अपना पांव रख दिया हो।

वह अतीत में खो गया। उसका वेतन नौ हजार महीना था। बेटा को पटना में तैयारी कराया। हर महीना 5 से 7 हजार खर्च था। किसी किसी महीना तो 10 हजार। पर उसने कभी सोचा तक नहीं। और आज उसे यह जवाब मिला...रामदेव ने डबडबाई आंखों से पत्नी की तरह देखा, उसकी भी आंखों में आंसू थे...!


14 मार्च 2026

राजगीर में साहित्य, विचार और ध्यान का अनूठा संगम

राजगीर में साहित्य, विचार और ध्यान का अनूठा संगम

ज्ञान की पुण्य धरा नालंदा, जहाँ इतिहास की स्मृतियाँ आज भी ज्ञान की ज्योति बनकर आलोकित होती हैं। उसी धरा पर स्थित राजगीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में अखिल विश्व साहित्य उत्सव का अद्भुत और अनुपम आयोजन सजा। 

चार दिनों तक चल रहे इस साहित्यिक महोत्सव में देश-दुनिया के मूर्धन्य साहित्यकारों, विचारकों और रचनाकारों ने अपने विचारों से बिहार की माटी को मानो फिर से सिंचित कर दिया। लेखक, पत्रकार, चिंतक, दार्शनिक, कवि, शोधार्थी, इतिहासकार, प्रशासनिक अधिकारी और युवा, सभी की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को एक जीवंत बौद्धिक संगम का रूप दे दिया।

इस महोत्सव का संयोजन वैशाली जी ने किया। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जिनका नाम वैशाली है, वे बिहार की नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की हैं। यह तथ्य अपने आप में इस बात का जयघोष है कि बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान आज भी देश और दुनिया के लोगों को आकर्षित करती है।
इसी समारोह में बिहार की माटी की सुगंध को अपने शब्दों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुँचाने वाले प्रखर कवि और छोटे भाई संजीव मुकेश जी के स्नेहिल आमंत्रण पर, साथी सुधांशु शेखर के साथ वहाँ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह केवल एक आयोजन में सहभागिता भर नहीं थी, बल्कि एक नई ऊर्जा, नए अनुभव और नए विचारों से साक्षात्कार का अवसर भी बनी। वहाँ उपस्थित सृजनधर्मी लोगों के चिंतन और संवाद को आत्मसात करना अपने आप में एक समृद्ध अनुभव रहा। 
महोत्सव का समापन जब ऋषिकेश के बाबा कुटानी के वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनियों के बीच ध्यान सत्र से हुआ, तो वातावरण मानो आध्यात्मिक शांति से भर उठा। उस क्षण मन अभिभूत था और हृदय में यह अनुभूति गूंज रही थी कि साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाली एक जीवंत साधना है।

08 मार्च 2026

नीतीश कुमार के बगैर बिहार

बिहार अब नीतीश कुमार के बगैर होगा। और दो दशकों तक सुशासन में जीता बिहार का सामान्य मानस चिंतित हो गया है। अब बिहार का चिंतित मानस नीतीश कुमार के बगैर बिहार में सुशासन हो सकता है, इसको लेकर सशंकित है। बिहार के चिंतित मानस में कई वर्ग है । अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सर्वाधिक चिंता बिहार की नारी शक्ति को है । नारी-सशक्तिकरण, बेटियों के जीवन में बदलाव का मानक नीतीश कुमार है। शायद ही दूसरा कोई इतना कर पाए। एक वह वर्ग है जो भाजपा शासित दूसरे प्रदेशों में वैचारिक, राजनीतिक और धार्मिक प्रतिद्वंदियों का दमन देख रहा है। बिहार के समाजवादी मानस को देख नीतीश कुमार ने इसे संतुलित कर रखा था। एक वर्ग अधिकारियों का है। शासन सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार ने पजामा कुर्ता छाप नेताओं की प्रशासनिक पकड़ को थाना ब्लॉक से लेकर पटना के सचिवालय तक से खत्म कर दिया। यह वर्ग भी चिंतित है। हालांकि, इसका दुष्परिणाम भी हुआ और कई अधिकारी निरंकुशता तक चले गए। थका हारा बिहार मानस भ्रष्टाचार को सहज स्वीकार कर लिया। नीतीश कुमार के बगैर बिहार में युवा मानस भी चिंतित है। जिस स्तर पर बढ़कर उन्होंने नौकरी दी, इसके बाद युवाओं का चिंता उचित ही है। नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री से हटाने में कई किंतु परंतु हैं। परंतु स्वास्थ्य का कारण एक ठोस बहाना बताया जा रहा है। अब निशांत कुमार राजनीति में ऐसे उतर रहे हैं जैसे कोई अबोध बालक कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उतर रहा हो। निशांत कुमार राजनीति के तिकड़मी चक्रव्यूह में उस एकलव्य की तरह हैं, जिसने माता के गर्भ में अपने पिता से, युद्ध का कौशल भी नहीं सीखा है..! अब अपने कई प्रदेशों में अपने कथित चातुर्य और लोमड़ी कौशल से सत्ता हथिया कर उसे संभालने वाली बीजेपी, बिहार को कैसे संभालेगी, यह एक यक्ष प्रश्न है..। अभी जो दिखता है, वह यह है कि गुजरात का व्यापारी बिहार के मजदूरों को अपने विकास की सीढ़ी में उपयोग करना अच्छी तरह से जानता है। और उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाने वाला बिहारी मानस भी इस चातुर्य को समझता है। अब, इस महीन से अंतर में कब जरा सा इधर-उधर हो जाए , कोई नहीं जानता। शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जल बिछाएगा, हम नहीं फसेंगे... इस मंत्र को रटने वाला बिहार, जाति के जंजाल में अक्सर फंसता रहा है, परंतु धर्म के जंजाल में फंसने से अक्सर बचत भी रहा है... अब जाति और धर्म का महाजाल बिछ गया है.... बाकी सब ठीक है...पर यह ठीक नहीं है कि अब समाजवाद का अंतिम किला ध्वस्त हो रहा है और वंशवाद की राजनीति के प्रखर विरोध का भी स्वाहा हो रहा है

07 मार्च 2026

मुख्यमंत्री की रेस में मेरा भी नाम है..!

मुख्यमंत्री की रेस में मेरा भी नाम है..!

"हेलो, हेलो, हेलो, खेलावन काका बोल रहे हैं..! का हाल वा बउआ..! सब ठीक वा...।"

आज काका बड़ा बेचैन थे। पर उनके आवाज में एक अजीब सा उत्साह भी था। 
मैने कहा, "सब ठीक है काका। बस बिहार की चिंता हो रही है।"

काका बोले, "चिंता का कौउनो बात नहीं है। राजनीति में तो यह सब होता ही रहता है। सब फार्मूला फिट कर दिया गया है।"

"पर काका, यह तो जबरदस्ती है न। चाचा तो सबकुछ इस्मूथली चला हो रहे थे...?"

मैंने पूछा, "काका ई मुख्यमंत्री कौन बनेगा...? यह सवाल तो हजार करोड़ का है..! जिसको देखिए, वही किसी को मुख्यमंत्री बना दे रहा।"


काका उवाच, "बउआ, जब तक कोय मुख्यमंत्री बन नहीं जाता, तब तक के लिए किसी को भी मुख्यमंत्री बना देने से किसी को क्या दिक्कत हो सकती है। लाइक, व्यू और नोट कमाने वालों से लोग एतना जलते काहे हैं...! जलानखोर सब..."

काका ने फिर टोका, "अच्छा सुनो बउआ, क्या तुम मुख्यमंत्री बनना चाहते हो...?

"कौन नहीं चाहेगा काका, क्यों मजाक करते हैं...!"

"अरे, यह मजाक नहीं है। जल्दी से दस रुपये ऑनलाइन से भेजो...!"

काका की बात भला कौन उठाता। मैंने दस रुपये भेज दिए।

बस कुछ ही देर बाद मोबाइल में मेरे मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना का समाचार ब्रेक हो गया...! 

अरुण साथी

#NitishKumar, #BiharPolitics, #RajyaSabha, #BJP, #JDU, #BiharNews, #PoliticalNews, #NitishKumarNews, #BiharPoliticalCrisis, #RajyaSabhaElection, #BJPJDUAlliance, #BiharCM, #IndianPolitics, #BreakingNewsBihar, #PatnaPolitics, #NDApolitics, #NitishInRajyaSabha, #BiharLeadership, #PoliticalUpdate, #BiharGovernment

Featured Post

मतलब निकल गया तो...