15 अक्टूबर 2026

जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया

जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया 

अभी डांडिया का चलन है। अचानक यह बढ़ा है। गुजरात से महानगर। और अब बिहार के कस्वा से लेकर गांव तक। सभी जगह। इसे बाजारवाद का प्रभाव माना जाता है। और यह है भी । तब भी, खराबी क्या है? आज पूंजीवादी व्यवस्था में हम सभी तो बाजारवाद के प्रभाव में हैं ही। हमारा राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक, सभी आयोजन बाजारवादी है। यह एक सच्चाई ही है। 
अभी अचानक एक दिन सोच रहा था। एक दशक पहले तक दिल्ली जाने में रेलवे स्टेशन पर बोतल में पानी भरकर रेलगाड़ी पकड़ने दौड़ते थे। पानी भरने के लिए आपाधापी। एक कान रेल की सीटी पर रहता था। और आज? बाजारवाद ने ऐसा प्रभाव डाला कि हजार, पांच सौ का पानी ही पी जाते। उसने में भी नकली भी। कहा गया कि बीमारी का खतरा कम होगा, पर आंकड़े कहते है, बीमारी बढ़ गई। खैर, बाजारवादी डांडिया में भी खुशी की तस्वीर मिलती है।

खुशी, एक तो वह खुशी; जो हमारे जीवन में नहीं है। उसे हम अब इसी तरह के आयोजनों के माध्यम से सबको अपने खुश होने को प्रचारित करते है। सेल्फी में मुस्कुराते है। रील में डांस करते है। हंसते है। बाकी  तनाव, अवसाद, कुंठा, प्रतिस्पर्धा तो जीवन में है ही  

दूसरा वह, जो अंदर से खुश है। जो अंदर से खुश है। बस खुश है। चैतन्य। पर बहुत कम। एक चित्र में एक बच्चा अपने माँ के साथ डांडिया खेल रहा है। पिता वीडियो बना रहा। बस, इतनी सी खुशी। और सच्चिदानंद।
 बाकी अभी डांडिया में एक महिला के देह का चित्र हम पुरुष नैतिक ज्ञान बांटते हुए अपने वॉल पर चिपका रहे। मैं सोचता हूं, कि अश्लील रिल्स बनाने वाली महिलाओं का वीडियो करोड़ों लोग देखते है। वह देखने वाला कौन है..? महिला तो देखती नहीं...? फिर यह ज्ञान देने वाले कौन है..? दोहरा चरित्र..! बस, इतना ही। बाकी सब ठीक है.. हां, अपने यहां रोटरी क्लब के द्वारा आयोजित संयमित  डांडिया में मित्रों के आग्रह पर आधे मन से मैं भी गया। फोटो सेशन भी है..बाकी जगह तो हुड़दंग भी होता है...

13 अक्टूबर 2026

युवराज को पीपीएम बन ही देना चाहिए

युवराज को पीपीएम बन ही देना चाहिए अब युवराज को पीपीएम बन ही देना चाहिए । भला बोलिए तो, इतना भीड़, जैसे पूरा देश सड़क पर उतर गया हो। और कितना जनबल दिखाएगा कोई..? अब तो वोट चोरी करके कुर्सी को हथिया लिए लोगों को कुर्सी का त्याग कर ही देना चाहिए।
आखिर त्याग को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। और त्याग करवाने के कितने बड़े-बड़े झेन झी सड़क पर पसीना बहा रहे हैं। सेल्फी, फोटो, रील, वीडियो सभी लाहा लोट है। इसमें कोई आगे आए तो केहुनी भी मार देते है। उधर, कुर्सी के त्याग के इस महा अभियान में कॉकरोच भी जबरदस्त प्रतिस्पर्धा दे रहे हैं। इससे पहले की कुर्सी के प्रबल दावेदार कॉकरोच बन जाएं, युवराज को कुर्सी सौंप देना ही चाहिए। एक अदद कुर्सी के लिए कोई और कितना सैक्रिफाइस करेगा। 56 साल में झेन झी। कई बार पार्टी चुनाव हारी। खुद भी हर गये, पर हौसला नहीं हरा। हौसला कैसे हार जाते । हारने के बाद ठीकरा फोड़ने के लिए कभी ईवीएम मशीन होता है, तो कभी वोट चोरी हो गया। अब सुप्रीम वाले माननीय महोदय से भी इस्तीफा मांग लिया गया है। ठीक ही किया है। भला बोलिए तो, कैसा न्याया..? एक युवराज की बात नहीं मानते हैं! एक युवराज से मिलने से मना कर देते हैं! हटाओ इसको...? खेलावन काका ने पूछा, "बच्चा एक साथ कितने कुर्सी पर बैठोगे..?" युवराज बोले, "आधा दर्जन तो जरूरी है काका! पीपीएम (परमानेंट प्राइम मिनिस्टर) के साथ-साथ पीसीजेआई इत्यादि रहेगा। पूरे कुनबे को सेट करना हैं। "तानाशाही नहीं चलेगी, हाय हाय, हाय हाय!" खेलावन काका टोक दिए "अयां हो मरदे, जब देश में तानाशाही हइ त फेर ई सब नारा कैसे लगा रहलीं हें... तानाशाही नहीं चलेगी, हाय हाय, हाय हाय...?" चुप रहिए काका, पोलटिक्स सबके समझ से बाहर है। अरुण साथी, #कटाक्ष

10 अक्टूबर 2026

तानाशाही नहीं चलेगी । हाय-हाय, हाय- हाय।

तानाशाही नहीं चलेगी । हाय-हाय, हाय- हाय। यह तो तानाशाही है। घोषित आपातकाल है। जुल्म हो रहा है, जुल्म। भला बोलिए तो, सबको पकड़ लिया। जहाज से भी उतरने नहीं दिया। जर्मनी से आने वाले को भी उठा ले गया। हद तो यह की दिल्ली के अभूतपुर्व बादशाह को भी घसीट लिया। और तो और, दीदी को भी पकड़ कर ले गए । इससे बड़ी तानाशाही क्या होगी। खेलावन काका बोलते जा रहे थे। रुक ही नहीं रहे थे । बहुत ही गुस्से में थे । उन्होंने कहा , सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए था । रेल, मेट्रो, बस, सड़क सब बंद कर दिए। और तो और, प्राण वायु, इंटरनेट को भी बंद कर दिया गया । जुल्म हो रहा है देश में, जुल्म। पहले जब आपातकाल लगा था तो कितनी उदारता थी। कितनी संवेदनशीलता थी। कितना न्यायप्रिय शासन था। और जब पहली बार कॉकरोच जंतर मंतर पर आंदोलन करने के लिए आए थे, वह आंदोलन कितना अच्छा था । संसद पर चढ़ने की तैयारी हो गई थी। लठ पर लठ चले थे। कितनों का माथा-कपार लाल-लाल हो गया था और मोबाइल के मायावी का कितना रील वायरल हुआ था। देश भर से मोबाइल के मायावी भी पहुंचे थे और तरह-तरह के डांस, तरह-तरह के गाने वायरल हुए थे। झेन झेन झी- ने कैसे-कैसे मधुर गीत गए थे । उनके कोकिल कंठ से देश के प्रधान के लिए कितने अच्छे-अच्छे बोल निकले थे। सभी का अंत:करण तृप्त हो गया था। और तो और देश भर में हुआ केस भी रद्द हो गया था। तानाशाही नहीं चलेगी । हाय-हाय, हाय- हाय। खिलावन काका बोलते ही जा रहे थे, रुक ही नहीं रहे थे।

09 अक्टूबर 2026

सबका हिसाब होगा..!

सबका हिसाब होगा...!

"गंभीर चिंता का विषय है। भला ऐसी कोई सरकार होती है। छप्पन इंच का सीना तो मुहावरा निकला। उससे पहले दशमलव लगा हुआ है।"
"बोलिए तो पुलिस को लतियाया, महिला पुलिस को उकसाया, नेता को गरियाया, तब भी चुप्पी है। ऐसे, कैसे लोकतंत्र चलेगा।"

 युवा नेता खेलावन काका से अपना दर्द साझा कर रहे थे।

काका ने भी चमचागीरी की। बोले, 

"सही कहे बेटा। इतना में तो लाठी पीठ पर चित्रकला का प्रदर्शन होना चाहिए। हाथ, पैर के हड्डी का विभाजन तो स्वाभाविक होता। और आंसू गैस तो छोड़िए, बंदूकें गरजती। पर सब चुप है। यह बड़ी साजिश लगती है। 

युवा नेता बोले, 
"हां काका। चिंता का विषय है। खैर, मेरी सरकार आने दीजिए, सब याद रखा जाएगा, सबका हिसाब होगा...!"

अरुण साथी (व्यंग्य)

08 अक्टूबर 2026

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"

भागवत कथा में गोपियों और उद्धव का जो संवाद है वह प्रेम और विरह का ऐसा संवाद है जिसने डूबकर कर सुनने वालों की आँखें भर आती है। 
बिहार सरकार के माननीय मंत्री अशोक चौधरी जी के आवास पर भागवत कथा के श्रवण का सौभाग्य मिला। 

कथावाचक ने श्री कृष्ण, उद्धव और गोपियों के प्रसंग को सारगर्भित तरीके से रखा। वही समापन में रुक्मणी के विवाह का भी प्रेम पूर्ण वर्णन किया। 
भागवत में उद्धव और गोपियों का संवाद प्रेम की पराकाष्ठा का ही संवाद है। 

कहते हैं कि उद्धव को जब अपने योग और ब्रह्म ज्ञान का मान हुआ तो कृष्ण ने उनको गोपियों के पास समझाने के लिए भेज दिया।
उद्धव कहते हैं,

"तजो रे स्याम, भजो रे निर्गुन... 

तुम कृष्ण को भूल जाओ और अपने हृदय में उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करो, जो कभी नष्ट नहीं होता। योग साधना करो।

गोपियाँ कहती हैं,

"ऊधो, मन न भए दस-बीस!" 

हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन (हृदय) नहीं हैं। एक ही मन था, जो श्याम सुंदर (श्रीकृष्ण) के साथ मथुरा चला गया। अब हम तुम्हारे इस निराकार ब्रह्म की आराधना किस मन से करें?

फिर इस भ्रमर गीत का मनोहारी गायन होता है,

उधो मत आइयो समझाने, 
जाके कांटो लगे वही जाने,

मतलब जिसने प्रेम ही नहीं किया, वह प्रेम को क्या समझेगा...?

अंत में उद्धव भी यह समझ जाते हैं कि योग और ज्ञान मार्ग से भी बड़ा प्रेम है...




नाना पाटेकर का जाना

नाना पाटेकर का जाना...

भारतीय सिनेमा जगत में नाना पाटेकर एक ध्रुव तारा के समान थे जो धुप्प रात के अंधेरे में भी रास्ता दिखाते थे। नाना पाटेकर के सिनेमा को जिसने देखा, वह सिनेमा के नाना पाटेकर के किरदार के साथ जीने लगा। 
नाना पाटेकर ने प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर इत्यादि सिनेमा के माध्यम से हमें राष्ट्रभक्त होना, सत्य निष्ठ होना सिखाया। 

नाना पाटेकर के सिनेमा ने ही हमें सत्य के लिए अड़ना भी सिखाया। 

नायक के किरदार के साथ-साथ खलनायक के किरदार में भी जब नाना पाटेकर उतरे तो उसमें भी एक जीवंतता देखी गई। एक दम से डरा देते। 

हालांकि वेलकम जैसे सिनेमा में नाना पाटेकर का हास्य किरदार बहुत प्रभावशाली नहीं रहा परंतु उन्होंने यह भी किया। 

सादर नमन