05 मार्च 2026

क्या हम एक खतरनाक दुनिया में हैं, और हमें केवल खतरनाक बनाया जा रहा..?

क्या हम एक खतरनाक दुनिया में हैं, और हमें केवल खतरनाक बनाया जा रहा..?

अरुण साथी

दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर है। यह खतरा बम से बड़ा, धार्मिक कट्टरता से है। ऐसा कई विश्लेषक मानते है। अभी ईरान, अमेरिका युद्ध में भी यह दिखा। पर एक उससे भी बड़ा खतरा है, उसे सभी नजरअंदाज कर रहे। यह खतरा, सोशल मीडिया का कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। यह खतरा सोशल मीडिया का अल्गोरिथम है। यह अल्गोरिथम, बम से ज्यादा खतरनाक है। 

यह कैसे खतरनाक है, उसे समझने के लिए, आपको अपने मोबाइल के स्क्रीन को देखकर समझना होगा।

खतरा यही, आप जो देखते है। कुछ सेकेंड भी। यह अल्गोरिथम उसे पकड़ लेता है। फिर आपको वही दिखाया जाता। 

मतलब, यदि आप अमेरिका के पक्ष का वीडियो देखते है, तो यह खोज–खोज कर वही दिखाएगा। यदि आप ईरान के पक्ष का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा।

यदि आप मोदी समर्थन का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा। यदि आप विरोध देखते है, तो यह वही दिखाते रहेगा.. !


यदि आप एक धर्म से घृणा का वीडियो देखते है, तो आपको खोज–खोज कर घृणा का वीडियो दिखाया जाएगा। 

इतना ही नहीं, यदि आप, किसी धर्म, व्यक्ति, समाज, देश से प्रेम, सद्भाव का वीडियो देखते है, तो यह वही दिखाएगा। 

तब, खतरा क्या है। समझिए। इस एल्गोरिथम को गांव की घरेलू महिला से लेकर, पॉश घरों की महिलाओं ने पकड़ लिया है। इतना ही नहीं , युवती और कम उम्र की किशोरियों ने भी इसे पकड़ लिया। कैसे, तो महिलाओं को यह पता है कि पुरुष समाज कामुक है। इसमें उम्र की सीमा नहीं है। तो आपके मोबाइल स्क्रीन पर कामुक वीडियो दिखे तो इसके लिए किसी स्त्री को कोसने से अच्छा, पुरुष समाज को कोस सकते है। क्योंकि स्त्री का कामुक, उत्तेजक, या अश्लील वीडियो सबसे अधिक देखा जाता है। और इसे हम, आप देखते है। पर इसे दिखाने वाला एल्गोरिथम ही है ।।



बस यही खतरा है। यह एक पक्ष को दिखाता है। केवल एक पक्ष। अब इस बजह से यदि आपका मन घृणा, हिंसा, कामुकता देखना पसंद करता है तो अल्गोरिदम खोज–खोज कर उसे दिखाता है। 

और तब हमारा मन यह मान लेता है कि दुनिया बहुत बुरी है। कोई धर्म, समाज, स्त्री बहुत बुरी है। तब हम हर पक्ष का केवल एक पक्ष देखते है। 

और इसका दुष्परिणाम भी सामने आ रहा। समाज टूट रहा है। परिवार टूट रहा है। अपने ही अपनों को मौत दे रहे हैं।

क्या इससे बचना संभव नहीं है..? क्योंकि करोड़ों का पैकेज लेने वाले हमें इसी जाल में फंसाने के लिए लगे है!


संभव है, हम चाहें तो बच सकते है! हम अच्छा देखें, प्रेम देखें, सामाजिक और धार्मिक सद्भाव देखें। फिर हमें वहीं दिखेगा। और हमें लगने लगेगा, दुनिया अच्छी है। इसके लोग अच्छे है..


अंत में निदा फ़ाज़ली की यह गजल सब कुछ कहती है,
**"

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया

चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी
जैसी तुम्हें दिखाई दी है सब की वही नहीं है दुनिया

घर में ही मत उसे सजाओ इधर उधर भी ले के जाओ
यूँ लगता है जैसे तुम से अब तक खुली नहीं है दुनिया

भाग रही है गेंद के पीछे जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से अब तक डरी नहीं है दुनिया

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03 मार्च 2026

महामूर्खों की एकजुटता के नाम एक विशेष संदेश

महामूर्खों की एकजुटता के नाम एक विशेष संदेश 

(अरुण साथी, महामूर्ख सम्मेलन का स्वागत भाषण जिसे बुद्धि वालों के द्वारा जानबूझ कर पढ़ने का मौका नहीं दिया गया. )
महामूर्ख सम्मेलन में आए हुए सभी सम्मानित मूर्खों का हम हृदय से अभिनंदन करते हैं । बंदन करते हैं। नंदन करते हैं। चंदन करते हैं।
जैसा कि हम सबको मालूम है कि अभी पृथ्वी से मूर्खों की संख्या में बहुत कमी आ रही है और मूर्खों की प्रजाति विलुक्ति के कगार पर पहुंच गया है।
ऐसे में हम सब की महति जिम्मेवारी बनती है कि मूर्खों के विलुप्ति के कगार से बचाने के लिए मूर्खों की संख्या में लगातार वृद्धि को लेकर हम सब सतत प्रयास करें।
आज जहां डिजिटल और सोशल मीडिया का युग है वहीं अब कृत्रिम मेधा का भी युग आ गया है। ऐसे में अब मूर्खों के लिए कहीं भी कोई स्पेस नहीं बच रहा है।
यह युग हम मूर्खों के लिए बेहद ही खतरनाक है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया की बात करें तो यहां जितने भी लोग अपने-अपने पोस्ट देते हैं उनको देखकर हम सब समझ रहे हैं कि सभी विद्वान, सभी गुनी, सभी सत्यवादी, सभी सत्य निष्ठ और सभी संत, महात्मा, विद्वत जन ही सोशल मीडिया पर हैं। 


ऐसे में हम सब मूर्खों को भी अब सोशल मीडिया पर मूर्खतापूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देना चाहिए ताकि हम लोगों की उपस्थिति भी वहां दर्ज हो सके।

जैसा कि आप लोगों को मालूम है कि आज ही इस दुनिया के सर्वशक्तिमान और सर्वाधिक बुद्धिमान हड़ंप महाराज के द्वारा तेल के खेल में बिना ताज वाले किताबी दुनिया बनाने वाले  खरीफा सहित कई खरीफो की जान ले ली। इतना ही नहीं, इस पृथ्वी के बुद्धिमान प्रजाति में से एक रसिया  के राजा  और पड़ाेसी के बीच चार साल से चल रहा युद्ध भी आदमी के बुद्धिमान होने का परिचय दे रहा है।

दुनिया के कई देशों के बीच बुद्धिमान आदमी, बुद्धिमान आदमी से लड़ रहा है। 

अपने देश में भी आजकल बुद्धिमानों की संख्या बहुत बढ़ गई है। कई जगह बुद्धिमान लोग अपनी (अ)धार्मिक बुद्धिमत्ता से (अ)धर्म के नाम पर जान ले रहे हैं।
 कई जगह इसी बुद्धिमान की श्रेणी में आने वाले लोग जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, रंग के नाम पर भी जान ले रहे हैं।
ऐसे में हम मूर्खों को एकत्रित होकर, संगठित होकर और मजबूती से कार्य करना होगा, ताकि हम लोग हमेशा मूर्खतापूर्ण काम करते हुए आपस में प्रेम और भाईचारा बनाकर रखें।धर्म, जाति, भाषा, रंग के नाम पर हम किसी की जान न लें।

25 फ़रवरी 2026

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?


हम अपने अहंकार को देख सकते हैं। समय समय पर अहंकार, ज्वारभाटा की तरह उठता है। और डुबो देना चाहता है। आदमी के स्व को। हम कोशिश करें तो इसे बड़ी सहजता से देख सकते है। या कहें कि हम सब देख कर भी अनदेखा कर देते है। 
जैसे, किसी समारोह में अगली पंक्ति में बैठने का अहंकार। जैसे, किसी आयोजन में मंचासीन होने का अहंकार। जैसे, किसी सम्मान समारोह में सम्मान पाने का अहंकार। और इस अहंकार पर विजय पाना बड़ा कठिन है । 

अहंकार केवल धन, बल का ही नहीं होता। अहंकार तो ईमानदारी, सच्चाई, ज्ञान और प्रतिष्ठा का भी होता है। और यह सबसे विषैला अहंकार है। मैं भी अपने अहंकार को रोज रोज देखता रहता हूं। मुस्कुराता रहता हूं। साक्षी भाव से। इतना करना भी ध्यान में उतरने जैसा है। 

अहंकार शून्य आदमी होना संभव नहीं है। या तो वह संत होगा, या पागल...। 


दो दिन पहले यह अहंकार शून्य आदमी मिला। यह पागल था या नहीं। कहना मुश्किल....

रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....


रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन मेरे लिए सचमुच एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। पहली बार इस प्रकार का ओजस्वी और भावप्रवण प्रस्तुतीकरण देखने का अवसर मिला, जिसने मन और चेतना दोनों को आलोकित कर दिया।
जब छात्राओं ने ‘रश्मिरथी’ की पंक्तियों को अपने स्वर दिए, तो प्रतीत हुआ मानो उनकी जिह्वा से ऊर्जा का कोई प्रखर स्रोत फूट पड़ा हो, जो उपस्थित प्रत्येक दर्शक के हृदय में उत्साह और स्पंदन भर रहा हो। सभागार में एक अद्भुत निस्तब्धता छा गई। दर्शक मंत्रमुग्ध रहे।

अवसर था बरबीघा स्थित डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल के वार्षिकोत्सव का, जहाँ इस काव्य-नाट्य मंचन ने कार्यक्रम को गरिमा और गौरव प्रदान किया।

मित्र सुधांशु शेखर की रचनात्मक कल्पनाशक्ति और लीक से हटकर कुछ करने की अदम्य आकांक्षा ने इस प्रस्तुति को संभव बनाया। विद्यार्थियों का अभिनय अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली रहा। वस्त्र सज्जा ने मानो महाभारत के युग को साकार कर दिया हो। संवाद-अदायगी सशक्त, संतुलित और हृदयस्पर्शी थी।
इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए सभी संबंधित जनों के प्रति हृदय से आभार और अभिनंदन।

अरुण साथी 

18 फ़रवरी 2026

ब्राह्मणवाद से आजादी...!

ब्राह्मणवाद से आजादी...! 


( दलित चेतना और सवर्ण भाग 4)

आज गजाधर चट्टोपाध्याय (राम कृष्ण परमहंस) की जयंती है।  अभी नव ब्राह्मणवादी, नव सामंतवादी और नव प्रतिक्रियावादी प्रतिशोध ले रहे। इसके पीछे इतने सालों का शोषण, दमन कारण बताया गया। रटाया गया। और आज भी रटाया जा रहा। अनुभव कहता है कि यह मिशनरियों इत्यादि के द्वारा प्रायोजित और आर्थिक पोषित अभियान का दुष्परिणाम है। 

अब  राम कृष्ण को देखिए। माता काली का दक्षिणेश्वर मंदिर रानी राजमती ने बनाया। अब उस मंदिर में कोई ब्राह्मण पुजारी बनना नहीं चाहते थे। कारण कि रानी एक शूद्र थी। तब एक ब्राह्मण ही आगे पुजारी बन कर समाज के लिए संदेश दिया। वे थे राम कृष्ण में बड़े भाई..! फिर राम कृष्ण भी बने।

राम कृष्ण परमहंस ने तो अद्वैत वेदांत व्यवहार में उतार कर संदेश दिया। सभी में एक ही ईश्वर।

इतना ही नहीं, राम कृष्ण तो ईसाई, इस्लाम इत्यादि धर्म को भी अनुभव उतार कर संदेश दिया , यतो मत, ततो पथ। रास्ता कोई हो, ईश्वर एक । 

12 फरवरी को स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती थी। इन्होंने भी वेद को ही सत्य माना। पाखंड, परंपरा को तोड़ा। खत्म दिया।

अब मूल बात। दोनों ब्राह्मण थे। तो बस इतना। भेदभाव, छुआछूत, असमानता, गैर बराबरी नहीं थे, ऐसा नहीं है। पर इसके विरुद्ध लड़ाई ब्राह्मणों ने भी लड़ा । सवर्णों ने भी लड़ा। आज इन जैसों को खारीज कर दिया गया। दुख इस बात का है..बस..

02 फ़रवरी 2026

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण 

(अरुण साथी)

भारत सरकार ने अलौकिक बजट पुनः जारी किया। इसकी अलौकिकता न्यारी है। आम आदमी की समझ पर यह भारी है। लौकिक ज्ञान से परे अलौकिक ज्ञान जरूरी है। अतः, इसे अच्छा या खराब मान लेना ही बुद्धिमत्ता है। 

साधारण सी बात है। जो विपक्ष में है, वे इसे बेकार बजट बता रहे। जो पक्ष है, वे इसे साकार बजट बता रहे। इस पक्ष, विपक्ष में आम आदमी चक्कर खा रहा। उसे समझ ही नहीं आ रहा कि क्या समझे। 


अब देखिए, दीदी ने समझाया । यह दलित , महिला, ओबीसी, किसान, युवा विरोधी बजट है। तब खेलावन काका पूछ रहे।


"अरे, तब यह बजट सरकार ने अपने लिए लेकर आई है क्या..?"

तब इसको लेकर मुनि नारद ने ज्ञान दिया।

" देखो वत्स, यह अलौकिक है। फिर भी इसमें सार तत्व को समझ कर इसकी विशालता और व्यापकता को समझा जा सकता है। जैसे समझो । बजट में बच्चों को स्कूल में अब डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें अब बच्चे अपने स्कूल में मोबाइल से रील बनाना सीखेंगे। फिर देश तेजी से आगे बढ़ेगा। उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से देश में बुलेट रेल चल रही। और उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से  देश में स्मार्ट शहर बन रहे। समझे कि नहीं।"


काका कहां चुप रहने वाले। बोले, 

"मुनिनाथ । हमलोग तो बच्चों को रील बनाने से रोकते है। इसे अच्छा नहीं मानते।"

"यही तो लौकिक बातें है। पर समझो। तुम लोग बच्चों को क्यों पढ़ाते हो..? इसीलिए कि वह पढ़ लिख कर कमाई करे! अब इस बार चुनाव में सरकार ने प्रति वर्ष 2 करोड़ को नौकरी और रोजगार देने का वादा किया।"


"यह वादा इसी से पूरा होगा। अभी सर्वाधिक कमाई का साधन मोबाइल है। रील बना कर लोग प्रति महीना लाखों कमा रहे। इसमें कौशल की जरूरत है। हालांकि महिलाओं के लिए कोई कौशल आवश्यक नहीं है। पर पुरुष जबतक कौशल प्राप्त नहीं करेंगे तबतक इस क्षेत्र में कमाई मुश्किल है। इसी उद्देश्य से बच्चों में डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण आवश्यक है।"


अब काका चुप हो गए। मन ही मन सोचें। 

"मोदी अनंत, मोदी कथा अनंत,
यही गुणगान करे सब असंता...!"