मतलब निकल गया तो...
महानगरीय संस्कृति में कुछ ज्यादा और वर्तमान मानवीय व्यवहार में कुछ कुछ, कहीं कहीं, मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं, चलन में है।
अब पशुओं पर भी यह मानवीय अत्याचार आम है। वह भी उस पालतू के साथ, जिसने आदमी को अपना सबकुछ मान लिया। पालतू कुत्ता के साथ। दिल्ली सहित, महानगरों में यह आम है। कुत्ता को आवारा छोड़ देते हैं। कल दिल्ली के एक पॉश क्षेत्र में यह बहुत दिखा। दुख हुआ।
खैर, उसके कई कारण हो सकते है, जैसे घर, शहर बदलना, कुत्ता का काट लेना.. कुत्ता का बीमार होना, आदि इत्यादि..। तब क्या, हम जिससे प्यार करते हैं, उसे किसी भी कारण से छोड़ देना मानवता तो नहीं है..?
वह भी तब, पालतू कुत्ता अपने पालने वालों के हर खुशी का ध्यान रखता है। उसे अपना मालिक ही सबकुछ लगता है। घर आने पर वह खुशी कोई अपना भी रोज रोज नहीं दे सकता, यह देता है। घर आने का इंतजार, दरवाजे को ताकते रहना, घर आते है नितराने (झूमने) लगना। आदि, इत्यादि। पर इसे दूर से कोई समझ नहीं सकता। प्रेम करके ही प्रेम को जाना जा सकता है।
इसीलिए निदा फ़ाज़ली ने लिखा है,
"होश वालों को खबर क्या,
बेखुदी क्या चीज है..."
एक निवेदन, शौक के लिए कुत्ता मत पाला करिए। किसी के कहने से भी मत पालिए। मनोरंजन के लिए मत पालिए। कुत्ता पालना एक बड़ी जिम्मेवारी है। परिवार का एक सदस्य बढ़ जाता। और परिवार के सदस्य की देखभाल , प्यार सब कुछ देना पड़ता है। वही फिर लौट कर मिलता है।
बाकी, पालतू कुत्ते को सड़क पर छोड़ने का पाप, महा पाप है। और कुछ को देखा है, पालतू को सड़क पर छोड़ तो देते है, इसका परिणाम उनको भोगना पड़ता है। आप नजर उठा कर देखिए, आसपास...!
इसलिए तो कबीरदास ने कहा है,
"निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।
बिना जीव की साँस से, लोह भसम हो जाय॥"
