30 जुलाई 2026
लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव
लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती: भीड़तंत्र का बढ़ता दबाव
लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि स्वयं को सुधारने की क्षमता में है। इसमें गलतियां होती हैं, सरकारें असफल भी होती हैं, फैसलों पर सवाल भी उठते हैं। लेकिन इन सबका समाधान संविधान, कानून और चुनाव की प्रक्रिया में निहित है। यदि इनकी जगह भीड़ निर्णय लेने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल जाता है।
आज भारत इसी चुनौती के एक कठिन दौर से गुजरता दिखाई देता है।
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध का अधिकार नागरिकों की सबसे बड़ी ताकत है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन जब विरोध प्रदर्शन हिंसा, धमकी, सार्वजनिक अपमान, संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव और कानून को चुनौती देने का माध्यम बनने लगे, तब यह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रह जाता। यह भीड़ के दबाव से व्यवस्था को झुकाने का प्रयास बन जाता है।
दुनिया के अनेक देशों के अनुभव बताते हैं कि भीड़ कभी स्थायी समाधान नहीं देती। बांग्लादेश की हालिया घटनाओं ने दिखाया कि जब भीड़ सत्ता और संस्थाओं पर हावी होती है, तब सबसे पहले लोकतांत्रिक मर्यादाएं टूटती हैं। क्रांति का रोमांच क्षणिक हो सकता है, लेकिन संस्थाओं का क्षरण वर्षों तक राष्ट्र को अस्थिर करता है।
भारत का लोकतंत्र भी इस समय कई दिशाओं से दबाव झेल रहा है। सोशल मीडिया ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन उसी मंच पर भीड़ की मनोवृत्ति भी तेजी से विकसित हुई है। किसी भी मुद्दे पर कुछ घंटों में भावनाओं का ऐसा उबाल पैदा कर दिया जाता है कि तथ्य और तर्क पीछे छूट जाते हैं। ट्रेंड, ट्रोल और वायरल संस्कृति कई बार विवेक पर भारी पड़ती दिखाई देती है।
यह भी सच है कि इस स्थिति के लिए केवल भीड़ को दोष देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। लोकतंत्र संवाद पर चलता है। संवाद की कमी अविश्वास पैदा करती है और अविश्वास आक्रोश को जन्म देता है। पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर समय पर स्पष्ट संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाई जाती तो शायद स्थिति इतनी विस्फोटक नहीं बनती। जनता केवल निर्णय नहीं, उसका तर्क भी सुनना चाहती है।
लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता को विश्वास में लेना भी है। जितना अधिक संवाद होगा, उतनी ही कम अफवाहें और उत्तेजना फैलेंगी। चुप्पी कई बार विपक्ष से अधिक नुकसान सत्ता को पहुंचाती है।
दूसरी ओर, विपक्ष की भी समान जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है, लेकिन उसका माध्यम चुनाव है, न कि भय, अराजकता या संस्थाओं को अस्थिर करने की राजनीति। यदि हर असहमति का उत्तर भीड़ के दबाव से खोजा जाएगा, तो कल कोई भी सरकार सुरक्षित नहीं रहेगी और कोई भी संस्था स्वतंत्र नहीं बचेगी।
चिंता केवल सरकार की नहीं है। चिंता उन संवैधानिक संस्थाओं की भी है, जिन पर लोकतंत्र टिका है। संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका, चुनाव आयोग, स्वतंत्र मीडिया और सुरक्षा बल। इन संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इन्हें अविश्वसनीय बनाने का सुनियोजित प्रयास अंततः पूरे लोकतंत्र को कमजोर करता है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान है। यही संविधान सरकार को सत्ता देता है और जनता को उसे बदलने का अधिकार भी देता है। इसलिए लोकतंत्र में अंतिम फैसला भीड़ नहीं, मतदाता करता है। सड़क पर जुटी भीड़ क्षणिक उत्साह पैदा कर सकती है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य मतदान केंद्र तय करते हैं।
आज आवश्यकता किसी एक दल या विचारधारा की जीत की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा की है। सरकार अधिक संवेदनशील और संवादशील बने, विपक्ष अधिक जिम्मेदार बने और नागरिक यह समझें कि लोकतंत्र की रक्षा केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि संयम और संवैधानिक आचरण से भी होती है।
लोकतंत्र की कमियां लोकतंत्र ही दूर कर सकता है। भीड़तंत्र केवल व्यवस्था को अस्थिर करता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों में संस्थाएं भीड़ के आगे झुकीं, वहां अंततः लोकतंत्र ही सबसे बड़ा पराजित हुआ।
28 जुलाई 2026
छात्र आंदोलन में भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र
भारत के विरुद्ध फेसबुक का षडयंत्र
मुझे पहले दिन से ही लग रहा था कि फेसबुक, इंस्टा जैसी कंपनी भारत में हो रहे छात्र आंदोलन को हवा दे रही है। सोशल मीडिया पर शांतिपूर्वक चीजों को देखने और समझने वाले लोग इसे समझ सकते हैं।
छात्र के आंदोलन को पुलिस के द्वारा छात्रों की पिटाई को काफी बर्बर तरीके से और खूब तेजी से वायरल किया गया । हर किसी के फीड में केवल और केवल इसे ही दिखाया जाता था। यह फेसबुक के एल्गोरिथम के द्वारा जानबूझकर किया गया।
उसे हर किसी को दिखाया गया परंतु छात्र आंदोलन को शांत करने के प्रयास को, छात्र आंदोलन में घुस आए उपद्रवियों के द्वारा किए गए उपद्रव और अराजकता को दबा दिया गया।
उसके रीच को घटा दिया गया। और यह बात पूरी तरह से तब प्रमाणित हो गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी वीडियो को प्रतिबंधित कर दिया गया। हालांकि भारत सरकार ने इस पर संज्ञान लिया है परंतु इस पर और कड़ाई से संज्ञान लेकर सजा देने की जरूरत है। इस देश को, कमजोर करने, गिराने में पूरी दुनिया की ताकत लगी हुई है.. हमें इसे समझना होगा... अफसोस की कथित जेन जी इस साजिश का हिस्सा बन जाते हैं..
21 जुलाई 2026
गुस्सा तो बहुत है.... संसद के आगे हंगामा...
गुस्सा तो बहुत है....
अभी तो लगता है, यार लोकतंत्र में धरना, प्रदर्शन, आमरण अनशन, उग्र–प्रदर्शन, हल्ला–हंगामा.. लाठीचार्ज, पथराव, आंसू गैस सब लोकतांत्रिक है, देश द्रोह नहीं है...! कभी ये सीमाओं में रहेगा, कभी सीमाएं ऐसे टूटेगी, जैसे सैलाब आया हो...! कल संसद के आगे सैलाब दिखा..!
और, कभी कभी लगता है मोदी सरकार भी निष्ठुर है। किसी की नहीं सुनती। पेपर लीक पर चुप्पी । दूसरी बार नीट परीक्षा लिया पर पेपर लीक करने वालों पर ठोस कार्रवाई नहीं दिखी..! और यार, बातचीत ही तो लोकतंत्र है, फिर..?
और, अभी तो यह भी लग रहा कि बीजेपी की सरकार, बोलने की आजादी छीन रही है। बिहार में सोशल मीडिया पर अभद्रता के लिए अब गुंडा एक्ट लगेगा..?
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चुप्पी। बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी, फिर उधव ठाकरे, आम आदमी पार्टी का संसद इत्यादि की पार्टी को हाईजैक करना।
कभी कभी लगता है कि मीडिया पर अंकुश क्यों लगाया गया..?
कभी कभी लगता है, सोनम वांगचुक सज्जन है। जैसे अन्ना हजारे थे। पर वे राजनीतिक साजिश का शिकार नहीं होंगे, क्या गारंटी है..?
और, अभी तो यह भी लगता है, देश का विपक्ष, धूर मोदी विरोधी, श्री लंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह देश के जेन जी को करने के लिए लगातार भड़का रहा है, कहीं भड़क गए तो..?
कभी कभी लगता है, अपना देश लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलता है। यहां सर्व सम्मत नहीं है, यहां बहुमत है। इसका मतलब, आधे से कुछ कम लोग सरकार को नापसंद करते है..।
कभी कभी लगता है, यार बात बात पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार, पेपर लीक, चढ़ावा चोरी को गंभीर अपराध नहीं मानती इसीलिए तो बुलडोजर भी मौन है..!
कभी कभी यह भी लगता है कि जिस देश पर ऐसे ही इतना बोझ है उसपर महिला आरक्षण के बहाने दोगुना सांसदों का बोझ डालने का प्रयास तो सरासर अन्याय है..! और यह अन्याय राष्ट्रवाद के नाम पर तो और असहनीय है..!
कभी कभी तो यह भी लगता है कि यार, इसरो जैसे संस्था से 100 से अधिक वैज्ञानिक छोड़ कर चले गए, क्या अब देश में व्यापार ही होगा, जन सरोकार कुछ नहीं..!
कभी कभी लगता है, यार इस देश में बुलेट रेल और साधारण रेल के डिब्बे की असमानता की खाई को कौन मिटाएगा..?
और देश की पूंजी पर कुछ व्यापारिक घरानों के कब्जे और गीगा वर्कर बन रहे युवा पीढ़ी को कौन संभालेगा..?
देश में बढ़ रहे मॉल कल्चर और बेरोजगार होते छोटे व्यापारियों की, क्या कोई नहीं सुनेगा..?
अक्सर यह लगता है कि गंभीर बीमारियों में आम आदमी के लिए एम्स सहित बड़े अस्पतालों में बेड नहीं है और मॉल रूपी निजी अस्पताल में इलाज करवाने की जगह, आम आदमी मौत को ही चुनना पसंद करता है..।
कभी कभी यह भी लगता है कि अब तो मॉल रूपी विश्विद्यालय कल्चर है। इसमें तो इंटर के बाद आम आदमी अपने बच्चे को पढ़ा ही नहीं पाएगा.. और जन सरोकार की शिक्षा व्यवस्था को शनै शनै मृतप्राय बनाया जा रहा है..!
अभी तो यह भी लगता है कि यार अपनी बाइक का माइलेज कम हो गया, और सरकार इथेनॉल वाले तेल के झूठे दावे किए जा रही है। वहीं कोई सच बोले तो उसे दबा दिया जाता है..!
कभी कभी लगता है, यार भरत तिवारी तो गरीबों के लिए लड़ रहा था, उसे मार दिया गया..?
और उन सब के बीच यह भी लगता है, यार अन्ना हजारे के बहाने देश ने वेगनआर गाड़ी वाले केजरीवाल को मौका तो दिया। कहा, राजनीति बदलनी है, वही बदल गया।
और अंत में यही लगता है, यार अमेरिका के बोस्टन में पढ़ाई कर रहा दीपके के कॉकरोच जनता पार्टी के साथ देश को क्यों खड़ा होना चाहिए..? जिसमें मुख्य न्यायाधीश के उस कड़के सच को, जिसमें उन्होंने कहा था,
" फर्जी डिग्री वाले बेरोजगार कॉकरोच की तरह है..!"
और दीपके इसी बहाने खुद को भीमवादी बता कर,
भावनाओं को भड़का के, राजनीति कर सकता है, तो उसपर कैसे भरोसा करें..?
बहुत उथल पुथल चल रहा है। बहुत
07 जुलाई 2026
चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...
चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...
मंदिर में चढ़ावा चोरी की चर्चा गांव चौपाल में चर्चित है। गांव चौपाल में किसिम किसिम के लोग आते हैं। मसूदन बा पुराने पार्टी के खांटी समर्थक हैं। अब 10 साल से कोई उनको बोलते नहीं देता था।
जब भी सरकार की कमी निकालते, सब उनको उल्लू धुत्तू करके लोलिया देता।
अब मंदिर में चढ़ावा चोरी हुई तो मसूदन बा को मौका मिल गया। चौपाल में वे सीधा कट्टर भगत माहो दा पर धावा बोल दिए।
"की हो महेंद्र , देख लेलहीं ने तोर धर्मात्मा पार्टी के हाल की हउ.. ई तो भगवानों के घर में चोरी कर लेलको ...?"
माहो दा बेचारे चुप हो गए । पहले जब भी कोई आरोप लगता , वे पुरानी सरकार और उनके नेताओं के भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत जीवन की कुंडली निकाल कर रख देते ..!
अब मसूदन बा रोज हल्ला करने लगे..। आज khe काका आ गए। मसूदन बा ने बात छेड़ी ..।
"बताहो तो आजकल लोग भगवानों के चढ़ावा चोरी कर ले हो ..! कलजुग हो, कलजुग..!
खेलावन काका ऐसे भड़के जैसे किसी ने बिगड़ैल कुत्ते को ढेला मार दिया हो...!
"आयां हो मसूदन ... , तों तो आय तक एगो चमन्नी नै देल्हीं हैं, उल्टे तों तो भगवान के मानवे नै करों हीं त तोड़ा कहा ले उल्टी हो रहलो हैं..!"
मंदिर हम्मर ! चढ़ावा हम्मर। चोरी करे वाला हम्मर अप्पन..! तोर बाउजी के की
मसूदन बाबू खुश हुए तीर निशाने पर लगा है
तब बोर्ड लगवा दो हो सूचना मंदिर में दिए गए चढ़ावा को चोरी करने का सर्वाधिक कार्य सुरक्षित है कृपया बाहरी लोग इसमें हस्तक्षेप ना करें धन्यवाद...!
(नोट: यह एक व्यंग्य रचना है)
06 जुलाई 2026
फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए, जीवन यात्रा के लिए
फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए
मैच में जीवन का अनुभव मिलेगा। कभी भी कोई फॉल कर देगा। कभी येलो कार्ड दिखा कर जीवन संघर्ष में सतर्क होने की चेतावनी मिलेगी। कभी भी अचानक अपनी गलती अथवा गलती से हुई गलती से रेड कार्ड मिल जाएगा और आप खेल से बाहर।
पर। खिलाड़ी, निराश नहीं होता। गिव–अप नहीं करता। खेल है। जीवन है। जीवन एक खेल है।
और, सब कुछ अच्छा, जरा सी गलती और पेनल्टी...! खेल खत्म होने की संभावना, पर सेकेंड के हजारवें हिस्से से खेल बचा लिया जाएगा..!
और सेकेंड के हजारवें हिस्से से हारी बाजी जीत सकते है। जीती बाजी हार सकते है..!
सब कुछ अनिश्चित..! और महाभारत में अर्जुन ने सिर्फ लक्ष्य (मछली) की आँख देखा, यह पुरानी बात है ! अभी फुटबॉल में खिलाड़ी को सिर्फ लक्ष्य (फ़ुटबॉल) को देखते हुए देखिए..!
और, मैदान में 90 मिनट का खेल केवल 90 मिनट का नहीं होता। 365 दिन 24*7 निरंतर अभ्यास से यह सीखना कि कैसे हार से हारना नहीं चाहिए। जीत का गुमान नहीं करना चाहिए...सबकुछ...!
और टीम भावना से जीत मिलती है, सीखिए...! और खेल के पीछे एक गुरु होता है। कोच..! वही तो गलती बताता है। गलती सुधारता है। गलती पर डांटता है..!
कितना कुछ होता है खेल में। एकदम जीवन की तरह..!
देखिए तो आंसू को। जीत की खुशी का आंसू, हार के दुख का आंसू...!
और, जीत का जश्न... सच्चा आनंद...सबकुछ सर्वोच्च शिखर पर...
08 जून 2026
काव्य की स्वर लहरी
काव्य की स्वर लहरी
दैनिक जागरण की काव्य संध्या में और हास्य, व्यंग, श्रृंगार, वीर रस और जन सरोकार के कवियों ने जिस तरह काव्य की स्वर लहरी बिखेरी वह अतुल्य था।
दिनकर की कर्मभूमि शेखपुरा की धरतीके सुधी श्रोताओं ने जिस आनंद से लगभग आधी रात तक टिक कर कविता का हृदय से आनंद लिया यह अपने आप में विभोर करने वाला रहा।
साहित्य अनुरागी सुधी श्रोताओं की करतल ध्वनियों के निनाद ने इस काव्य संध्या को संगीतमय, अविस्मरणीय काव्य संध्या बना दिया।
दैनिक जागरण मीडिया मार्केटिंग के मित्र प्रिंस जी ने कवियों का बेहतरीन संयोजन किया। इस वजह से एक मिनट के लिए भी श्रोता अलसाये नहीं। उमंग, ऊर्जा से भरकर करताल निनाद गूंजता रहा।
काव्य पाठ में सभी कवि वृंद साहित्य और काव्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर तो थे ही, सभी अपने अपने शब्दों, प्रस्तुतियां और भावों से सम्मोहित करने वाले रहे।
हास्य कवि अमित शुक्ला ने बूढ़ों की शादी पर प्रतिबंध की मांग ऐसे उठाई जैसे सभी के दुखती नस को दवा दिया हो। लोग ठठाते रहे।
स्वयं श्रीवास्तव ..! वाणी में सरस्वती का बास । सबको झंकृत कर दिया।
अशोक चारण जी ने राजस्थान के वीरता के प्रतीक को मंच पर ही जीवंत कर दिया। नीट पेपर लीक को लेकर सरकार पर व्यंग वाण और राष्ट्रवाद की धारा साथ साथ बहा दी।
और नीलोत्पल मृणाल जी, मुरैठा कवि । गांव का मुरैठा विद्रोह और श्रम शक्ति का प्रतीक है। खेत में बैल से हल जोतते हुए किसान के सिर पर हमेशा मुरैठा रहता था। जब गांव में किसी बात से विवाद हो अथवा प्रतिकार, विद्रोह हो और आउ त आउ हो जाये, तो सबसे पहले मुरैठा बंधाता है।
मृणाल जी ने अपनी वाणी की अप्रतिम ऊर्जा से इसी विद्रोह को शब्द से साधकर सिंह गर्जना की। सबको अभिभूत कर दिया।
और आदरणीय डॉक्टर सरिता जी...
मित्र गणनायक जी ने उनके लिए माँ सरिता लिखा है बस.....
कवि सम्मेलन की इस महती जिम्मेवारी को मंच पर उतारने में सहयोग करने वाले सभी का हृदय से आभार...
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बिहार की शिक्षा नीति पर अक्सर सवाल उठते रहे है और परिक्षाओं में नकल यहां की परंपरा है। बिहार में शराब नीति और शिक्षा नीति दोनों आलोचना...




