भागवत कथा में गोपियों और उद्धव का जो संवाद है वह प्रेम और विरह का ऐसा संवाद है जिसने डूबकर कर सुनने वालों की आँखें भर आती है।
बिहार सरकार के माननीय मंत्री अशोक चौधरी जी के आवास पर भागवत कथा के श्रवण का सौभाग्य मिला।
कथावाचक ने श्री कृष्ण, उद्धव और गोपियों के प्रसंग को सारगर्भित तरीके से रखा। वही समापन में रुक्मणी के विवाह का भी प्रेम पूर्ण वर्णन किया।
भागवत में उद्धव और गोपियों का संवाद प्रेम की पराकाष्ठा का ही संवाद है।
कहते हैं कि उद्धव को जब अपने योग और ब्रह्म ज्ञान का मान हुआ तो कृष्ण ने उनको गोपियों के पास समझाने के लिए भेज दिया।
उद्धव कहते हैं,
"तजो रे स्याम, भजो रे निर्गुन...
तुम कृष्ण को भूल जाओ और अपने हृदय में उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करो, जो कभी नष्ट नहीं होता। योग साधना करो।
गोपियाँ कहती हैं,
"ऊधो, मन न भए दस-बीस!"
हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन (हृदय) नहीं हैं। एक ही मन था, जो श्याम सुंदर (श्रीकृष्ण) के साथ मथुरा चला गया। अब हम तुम्हारे इस निराकार ब्रह्म की आराधना किस मन से करें?
फिर इस भ्रमर गीत का मनोहारी गायन होता है,
उधो मत आइयो समझाने,
जाके कांटो लगे वही जाने,
मतलब जिसने प्रेम ही नहीं किया, वह प्रेम को क्या समझेगा...?
अंत में उद्धव भी यह समझ जाते हैं कि योग और ज्ञान मार्ग से भी बड़ा प्रेम है...
