07 जुलाई 2026

चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...

चढ़ावा चोरी का सर्वाधिकार सुरक्षित है...

मंदिर में चढ़ावा चोरी की चर्चा गांव चौपाल में चर्चित है। गांव चौपाल में किसिम किसिम के लोग आते हैं। मसूदन बा  पुराने पार्टी के खांटी समर्थक हैं। अब 10 साल से कोई उनको बोलते नहीं देता था। 
जब भी सरकार की कमी निकालते, सब उनको उल्लू धुत्तू करके  लोलिया देता। 

अब मंदिर में चढ़ावा चोरी हुई तो मसूदन बा को मौका मिल गया। चौपाल में वे सीधा कट्टर भगत माहो दा पर धावा बोल दिए। 

"की हो महेंद्र , देख लेलहीं ने तोर धर्मात्मा पार्टी के हाल की हउ.. ई तो भगवानों के घर में चोरी कर लेलको ...?"


माहो दा बेचारे चुप हो गए । पहले जब भी कोई आरोप लगता , वे पुरानी सरकार और उनके नेताओं के भ्रष्टाचार, व्यक्तिगत जीवन की कुंडली निकाल कर रख देते ..!

अब मसूदन बा रोज हल्ला करने लगे..। आज khe काका आ गए। मसूदन बा ने बात छेड़ी ..।

"बताहो तो आजकल लोग भगवानों के चढ़ावा चोरी कर ले हो ..! कलजुग हो, कलजुग..!


खेलावन काका ऐसे भड़के जैसे किसी ने बिगड़ैल कुत्ते को ढेला मार दिया हो...!

"आयां हो मसूदन ... , तों तो आय तक एगो चमन्नी नै देल्हीं हैं,  उल्टे तों तो भगवान के मानवे नै करों हीं त तोड़ा कहा ले उल्टी हो रहलो हैं..!" 


मंदिर हम्मर ! चढ़ावा हम्मर। चोरी करे वाला हम्मर अप्पन..!  तोर बाउजी के की 

मसूदन बाबू खुश हुए तीर निशाने पर लगा है 

तब बोर्ड लगवा दो हो सूचना मंदिर में दिए गए चढ़ावा को चोरी करने का सर्वाधिक कार्य सुरक्षित है कृपया बाहरी लोग इसमें हस्तक्षेप ना करें धन्यवाद...!
(नोट: यह एक व्यंग्य रचना है)

06 जुलाई 2026

फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए, जीवन यात्रा के लिए

फुटबॉल विश्व कप मैच देखिए

मैच में जीवन का अनुभव मिलेगा। कभी भी कोई फॉल कर देगा। कभी येलो कार्ड दिखा कर जीवन संघर्ष में सतर्क होने की चेतावनी मिलेगी। कभी भी अचानक अपनी गलती अथवा गलती से हुई गलती से  रेड कार्ड मिल जाएगा और आप खेल से बाहर। 
पर। खिलाड़ी, निराश नहीं होता। गिव–अप नहीं करता। खेल है। जीवन है। जीवन एक खेल है। 
और, सब कुछ अच्छा, जरा सी गलती और पेनल्टी...! खेल खत्म होने की संभावना, पर सेकेंड के हजारवें हिस्से से खेल बचा लिया जाएगा..!

और सेकेंड के हजारवें हिस्से से हारी बाजी जीत सकते है। जीती बाजी हार सकते है..!

सब कुछ अनिश्चित..! और महाभारत  में अर्जुन ने सिर्फ लक्ष्य (मछली) की आँख देखा, यह पुरानी बात है ! अभी फुटबॉल में खिलाड़ी को सिर्फ लक्ष्य (फ़ुटबॉल) को देखते हुए देखिए..!

और, मैदान में 90 मिनट का खेल केवल 90 मिनट का नहीं होता। 365 दिन 24*7 निरंतर अभ्यास से यह सीखना कि कैसे हार से हारना नहीं चाहिए। जीत का गुमान नहीं करना चाहिए...सबकुछ...!

और टीम भावना  से जीत मिलती है, सीखिए...! और खेल के पीछे एक गुरु होता है। कोच..! वही तो गलती बताता है। गलती सुधारता है। गलती पर डांटता है..! 

कितना कुछ होता है खेल में। एकदम जीवन की तरह..! 

देखिए तो आंसू को। जीत की खुशी का आंसू, हार के दुख का आंसू...!

और, जीत का जश्न... सच्चा आनंद...सबकुछ सर्वोच्च शिखर पर...

आह, जीवन भी तो एक खेल ही है...खेल का मैदान है...

08 जून 2026

काव्य की स्वर लहरी

काव्य की स्वर लहरी दैनिक जागरण की काव्य संध्या में और हास्य, व्यंग, श्रृंगार, वीर रस और जन सरोकार के कवियों ने जिस तरह काव्य की स्वर लहरी बिखेरी वह अतुल्य था।
दिनकर की कर्मभूमि शेखपुरा की धरतीके सुधी श्रोताओं ने जिस आनंद से लगभग आधी रात तक टिक कर कविता का हृदय से आनंद लिया यह अपने आप में विभोर करने वाला रहा। साहित्य अनुरागी सुधी श्रोताओं की करतल ध्वनियों के निनाद ने इस काव्य संध्या को संगीतमय, अविस्मरणीय काव्य संध्या बना दिया। दैनिक जागरण मीडिया मार्केटिंग के मित्र प्रिंस जी ने कवियों का बेहतरीन संयोजन किया। इस वजह से एक मिनट के लिए भी श्रोता अलसाये नहीं। उमंग, ऊर्जा से भरकर करताल निनाद गूंजता रहा। काव्य पाठ में सभी कवि वृंद साहित्य और काव्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर तो थे ही, सभी अपने अपने शब्दों, प्रस्तुतियां और भावों से सम्मोहित करने वाले रहे। हास्य कवि अमित शुक्ला ने बूढ़ों की शादी पर प्रतिबंध की मांग ऐसे उठाई जैसे सभी के दुखती नस को दवा दिया हो। लोग ठठाते रहे। स्वयं श्रीवास्तव ..! वाणी में सरस्वती का बास । सबको झंकृत कर दिया। अशोक चारण जी ने राजस्थान के वीरता के प्रतीक को मंच पर ही जीवंत कर दिया। नीट पेपर लीक को लेकर सरकार पर व्यंग वाण और राष्ट्रवाद की धारा साथ साथ बहा दी। और नीलोत्पल मृणाल जी, मुरैठा कवि । गांव का मुरैठा विद्रोह और श्रम शक्ति का प्रतीक है। खेत में बैल से हल जोतते हुए किसान के सिर पर हमेशा मुरैठा रहता था। जब गांव में किसी बात से विवाद हो अथवा प्रतिकार, विद्रोह हो और आउ त आउ हो जाये, तो सबसे पहले मुरैठा बंधाता है। मृणाल जी ने अपनी वाणी की अप्रतिम ऊर्जा से इसी विद्रोह को शब्द से साधकर सिंह गर्जना की। सबको अभिभूत कर दिया। और आदरणीय डॉक्टर सरिता जी... मित्र गणनायक जी ने उनके लिए माँ सरिता लिखा है बस..... कवि सम्मेलन की इस महती जिम्मेवारी को मंच पर उतारने में सहयोग करने वाले सभी का हृदय से आभार...

20 मई 2026

देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी

देवघर यात्रा वृतांत : रावणेश्वर महादेव की नगरी में शराब से बदनामी रावणेश्वर महादेव की नगरी देवघर यात्रा पर अचानक जाना हुआ। बाबा नगरी 1993 से कई बार पैदल जाना हुआ। एक बार डाक बम भी गया। इतने सालों बाद, अब बहुत कुछ बदल गया। पर बहुत कुछ नहीं बदला है। सबसे बड़ा बदलाव शराब का है। दरअसल बिहार में शराबबंदी है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग समूह में शराब पीने देवघर जाते है। इसका असर भी दिखा। दरअसल , हमलोग साथियों से साथ शनिवार की शाम गए और रविवार को लौटने की योजना थी। पर वहां पहुंचने पर होटल में कमरा थोड़ा मुश्किल से मिला।
कारण, शराब। स्थानीय लोगों ने बताया कि बिहार से बड़ी संख्या में लोग शनिवार को शराब पीने आते हैं। रविवार को रहते है। सोमवार को पूजा करके लौटते है। यह हाल है। अपने पंडा जी उदय शंकर (दोरंगी पंडा) जी ने भी नकारात्मक अनुभव दिया। बताया कि उनके होटल में बरबीघा के कई लोग शराब पीकर हंगामा कर चुके है। खैर, हम लोगों को एक होटल मिला। शाम में मंदिर गया। वही पुरानी और टूटी फूटी सड़कें। गंदगी, बदबू ..! संकरी गलियां।
शाम में एक नया अनुभव मिला। वहां लाइव कथक नृत्य और गायन समारोह चल रहा था। अभिभूत करने वाला। देर तक आनंद लिया। पता चला कि देवघर के बड़े कथक नृत्य विद्यालय चलने वाले संजय परिहस्त जी गुरु है। उनके समूह की बच्चियों ने अति उत्कृष्ट कथक की प्रस्तुति दी। मैने गुरु जी को इस महान कार्य के लिए जाकर प्रणाम किया। अगले दिन रविवार। 6 बजे मंदिर पहुंचे। पता चला भारी भीड़ है। पंडा जी शीघ्र दर्शनम का कूपन लाकर दिए और बोले कि इसमें मेरा भी कमीशन रहता है। तब भी तीन घंटे लगे। नहीं बदला तो वहीं पंडा का धन लोभ। मुख्य दरवाजे से पहले एक महोदय बस के कंडक्टर की तरह हर प्रवेश करने वाले से नोट बसूल कर उंगली में फंसा के रख रहे थे और तभी आशीर्वाद दे रहे थे। मैने नहीं दिया। आशीर्वाद नहीं..! खैर, अंदर प्रवेश करते ही दिव्य आभा और ओज का आलिंगन। अपने गुरु और आराध्य भोलेनाथ पर जल अर्पित किया। वहां भी नोट देख कर भगवान को आराम से छूने की व्यवस्था। नहीं देने वाले को किनारे से हटाया जाता। अभी अचानक से एक घटना घटी। एक पंडा जी ने पीठ पर हाथ मारा, आशीर्वाद दिया और सिर में शिव लिंग से उठाकर एक माला डाल दी। फिर बड़े सद्भाव से बोले दक्षिणा, मैं भी स्वतःस्फूर्त एक छोटा सा सहगोग कर दिया। यह मेरे स्वभाव के विपरीत था। क्योंकि आज तक मैने ऐसा नहीं किया था। खैर, शिव की मर्जी, शिव ही जाने...

16 मई 2026

पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज

पालकी की सवारी और पुराना स्वाबलंबी समाज

यह पालकी है। बहुत पुरानी पीढ़ी को इसका अनुभव होगा। मुझे भी थोड़ा अनुभव है। 1983 में। मैं 10 वर्ष का था। लखीसराय के नंदनामा से जमुई के घोंघसा बारात गई थी। मुकेश दा दूल्हा थे। मैं सहवाला (दूल्हा से साथ एक छोटा बच्चा रहता है) । दुआर लगने के लिए पालकी से गया था। 
खैर , शायद पहले जमींदार भी पालकी से जाते थे। गांव की नई बहु भी पालकी पर आती, जाती थी।

जमींदार को लेकर बरबीघा का अनुभव लिखते हुए दिनकर जी लिखते है, 
" तेउस गांव के जमींदार दोहरा जीवन जीने के आदि थे। गांव से बाहर आने के लिए वे पालकी से निकलते थे और गांव के बाहर निकल कर वे पैदल जाते  थे..!"


खैर, अभी डीजल, पेट्रोल बचाने का आह्वान और फोटो सेशन चल रहा है। वैसे में हाल में ही बरबीघा के पांक गांव में यह चित्र लिया था। दूल्हे को ले जाने के लिए पालकी कहीं कहीं आज भी यह चलन में है। अब लगता है पुराने दिनों लौटना होगा। पहले हम स्वाबलंबी थे। आज नहीं...

14 मई 2026

जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..

जब भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक प्रवेश कर गई..

रात्रि में जैसे ही दरवाजे पर दस्तक दी, एक भीनी-मीठी सुगंध भीतर तक समाती चली गई।
एक बारगी चौंक गया। अरे, अभी तो हरसिंगार, रात की रानी इत्यादि में फूल भी नहीं हैं, फिर यह मीठी सुगंध कहाँ से...!

सर उठाया तो मधु मालती, गुलाबी और सफेद पंखुड़ी रूपी आँचल के पीछे से मुस्कुरा रही थी। तब भी मैं इधर-उधर देखने लगा, शायद कोई फूल खिला हो... पर कोई नहीं था।

फिर नासिका को मधु मालती के पास ले गया। अरे, सच में यह तो इसी की सुगंध है...! पहली बार यह जाना। मधु मालती भी इतनी भीनी सुगंध बिखेरती है।

पहली बार इसलिए, क्योंकि आज से पहले इसे गाँव में जंगल-झाड़ में उगा हुआ, खिला हुआ देखता रहा। घर में भी रही तो दृष्टि नहीं पड़ी।

क्योंकि इसे सर्वहारा ही मानता था। पर आज इसे अभिजात्य वर्ग जैसा पाकर विश्वास नहीं हुआ.. आज माना, सुगंध और सौंदर्य सर्वहारा और अभिजात्य में विभेद नहीं करते...