25 फ़रवरी 2026

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?

हम अपने अहंकार को देख सकते हैं...?


हम अपने अहंकार को देख सकते हैं। समय समय पर अहंकार, ज्वारभाटा की तरह उठता है। और डुबो देना चाहता है। आदमी के स्व को। हम कोशिश करें तो इसे बड़ी सहजता से देख सकते है। या कहें कि हम सब देख कर भी अनदेखा कर देते है। 
जैसे, किसी समारोह में अगली पंक्ति में बैठने का अहंकार। जैसे, किसी आयोजन में मंचासीन होने का अहंकार। जैसे, किसी सम्मान समारोह में सम्मान पाने का अहंकार। और इस अहंकार पर विजय पाना बड़ा कठिन है । 

अहंकार केवल धन, बल का ही नहीं होता। अहंकार तो ईमानदारी, सच्चाई, ज्ञान और प्रतिष्ठा का भी होता है। और यह सबसे विषैला अहंकार है। मैं भी अपने अहंकार को रोज रोज देखता रहता हूं। मुस्कुराता रहता हूं। साक्षी भाव से। इतना करना भी ध्यान में उतरने जैसा है। 

अहंकार शून्य आदमी होना संभव नहीं है। या तो वह संत होगा, या पागल...। 


दो दिन पहले यह अहंकार शून्य आदमी मिला। यह पागल था या नहीं। कहना मुश्किल....

रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....


रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन, एक अविस्मरणीय अनुभव ....

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ का काव्य-नाट्य रूप में मंचन मेरे लिए सचमुच एक अविस्मरणीय अनुभव रहा। पहली बार इस प्रकार का ओजस्वी और भावप्रवण प्रस्तुतीकरण देखने का अवसर मिला, जिसने मन और चेतना दोनों को आलोकित कर दिया।
जब छात्राओं ने ‘रश्मिरथी’ की पंक्तियों को अपने स्वर दिए, तो प्रतीत हुआ मानो उनकी जिह्वा से ऊर्जा का कोई प्रखर स्रोत फूट पड़ा हो, जो उपस्थित प्रत्येक दर्शक के हृदय में उत्साह और स्पंदन भर रहा हो। सभागार में एक अद्भुत निस्तब्धता छा गई। दर्शक मंत्रमुग्ध रहे।

अवसर था बरबीघा स्थित डिवाइन लाइट पब्लिक स्कूल के वार्षिकोत्सव का, जहाँ इस काव्य-नाट्य मंचन ने कार्यक्रम को गरिमा और गौरव प्रदान किया।

मित्र सुधांशु शेखर की रचनात्मक कल्पनाशक्ति और लीक से हटकर कुछ करने की अदम्य आकांक्षा ने इस प्रस्तुति को संभव बनाया। विद्यार्थियों का अभिनय अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली रहा। वस्त्र सज्जा ने मानो महाभारत के युग को साकार कर दिया हो। संवाद-अदायगी सशक्त, संतुलित और हृदयस्पर्शी थी।
इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए सभी संबंधित जनों के प्रति हृदय से आभार और अभिनंदन।

अरुण साथी 

18 फ़रवरी 2026

ब्राह्मणवाद से आजादी...!

ब्राह्मणवाद से आजादी...! 


( दलित चेतना और सवर्ण भाग 4)

आज गजाधर चट्टोपाध्याय (राम कृष्ण परमहंस) की जयंती है।  अभी नव ब्राह्मणवादी, नव सामंतवादी और नव प्रतिक्रियावादी प्रतिशोध ले रहे। इसके पीछे इतने सालों का शोषण, दमन कारण बताया गया। रटाया गया। और आज भी रटाया जा रहा। अनुभव कहता है कि यह मिशनरियों इत्यादि के द्वारा प्रायोजित और आर्थिक पोषित अभियान का दुष्परिणाम है। 

अब  राम कृष्ण को देखिए। माता काली का दक्षिणेश्वर मंदिर रानी राजमती ने बनाया। अब उस मंदिर में कोई ब्राह्मण पुजारी बनना नहीं चाहते थे। कारण कि रानी एक शूद्र थी। तब एक ब्राह्मण ही आगे पुजारी बन कर समाज के लिए संदेश दिया। वे थे राम कृष्ण में बड़े भाई..! फिर राम कृष्ण भी बने।

राम कृष्ण परमहंस ने तो अद्वैत वेदांत व्यवहार में उतार कर संदेश दिया। सभी में एक ही ईश्वर।

इतना ही नहीं, राम कृष्ण तो ईसाई, इस्लाम इत्यादि धर्म को भी अनुभव उतार कर संदेश दिया , यतो मत, ततो पथ। रास्ता कोई हो, ईश्वर एक । 

12 फरवरी को स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती थी। इन्होंने भी वेद को ही सत्य माना। पाखंड, परंपरा को तोड़ा। खत्म दिया।

अब मूल बात। दोनों ब्राह्मण थे। तो बस इतना। भेदभाव, छुआछूत, असमानता, गैर बराबरी नहीं थे, ऐसा नहीं है। पर इसके विरुद्ध लड़ाई ब्राह्मणों ने भी लड़ा । सवर्णों ने भी लड़ा। आज इन जैसों को खारीज कर दिया गया। दुख इस बात का है..बस..

02 फ़रवरी 2026

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण

स्कूलों में डिजिटल क्रिएटर का अलौकिक प्रशिक्षण 

(अरुण साथी)

भारत सरकार ने अलौकिक बजट पुनः जारी किया। इसकी अलौकिकता न्यारी है। आम आदमी की समझ पर यह भारी है। लौकिक ज्ञान से परे अलौकिक ज्ञान जरूरी है। अतः, इसे अच्छा या खराब मान लेना ही बुद्धिमत्ता है। 

साधारण सी बात है। जो विपक्ष में है, वे इसे बेकार बजट बता रहे। जो पक्ष है, वे इसे साकार बजट बता रहे। इस पक्ष, विपक्ष में आम आदमी चक्कर खा रहा। उसे समझ ही नहीं आ रहा कि क्या समझे। 


अब देखिए, दीदी ने समझाया । यह दलित , महिला, ओबीसी, किसान, युवा विरोधी बजट है। तब खेलावन काका पूछ रहे।


"अरे, तब यह बजट सरकार ने अपने लिए लेकर आई है क्या..?"

तब इसको लेकर मुनि नारद ने ज्ञान दिया।

" देखो वत्स, यह अलौकिक है। फिर भी इसमें सार तत्व को समझ कर इसकी विशालता और व्यापकता को समझा जा सकता है। जैसे समझो । बजट में बच्चों को स्कूल में अब डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें अब बच्चे अपने स्कूल में मोबाइल से रील बनाना सीखेंगे। फिर देश तेजी से आगे बढ़ेगा। उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से देश में बुलेट रेल चल रही। और उतनी ही तेजी से जितनी तेजी से  देश में स्मार्ट शहर बन रहे। समझे कि नहीं।"


काका कहां चुप रहने वाले। बोले, 

"मुनिनाथ । हमलोग तो बच्चों को रील बनाने से रोकते है। इसे अच्छा नहीं मानते।"

"यही तो लौकिक बातें है। पर समझो। तुम लोग बच्चों को क्यों पढ़ाते हो..? इसीलिए कि वह पढ़ लिख कर कमाई करे! अब इस बार चुनाव में सरकार ने प्रति वर्ष 2 करोड़ को नौकरी और रोजगार देने का वादा किया।"


"यह वादा इसी से पूरा होगा। अभी सर्वाधिक कमाई का साधन मोबाइल है। रील बना कर लोग प्रति महीना लाखों कमा रहे। इसमें कौशल की जरूरत है। हालांकि महिलाओं के लिए कोई कौशल आवश्यक नहीं है। पर पुरुष जबतक कौशल प्राप्त नहीं करेंगे तबतक इस क्षेत्र में कमाई मुश्किल है। इसी उद्देश्य से बच्चों में डिजिटल क्रिएटर का प्रशिक्षण आवश्यक है।"


अब काका चुप हो गए। मन ही मन सोचें। 

"मोदी अनंत, मोदी कथा अनंत,
यही गुणगान करे सब असंता...!"

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

फटीचन मांझी...! (दलित चेतना और सवर्ण)

यह 5 जनवरी की बात है। सुबह सुबह दरवाजे पर किसी ने आवाज लगाई। 

"बबलुआ, बबलुआ...!"

 बाहर निकला तो देखा इंदल मांझी की माय खड़ी थी। 

पूछा, "की होला"। 

बोली, "फटीचन मर गेलो !"

"कैसे ..?"

"बीमारी से"

"तब, हम की करियो..?"

"कुछ पैसा दहीं, कफन आदि खरीदे ले पैसा नै है... जरावे के लकड़ी के पैसा मिठ्ठू सिंह दे देलकै हैं...!"

मेरे पास नगद कुछ नहीं था। मैं बाजार गया। रितेश को ऑनलाइन भेजकर  नगद लिया। फिर आकर दे दिया। यह चुपचाप हुआ।  

यह एक बहुत लघु प्रसंग है। सार्वजनिक करना निश्चित ही सही नहीं है। पर वर्तमान में जातीय भेदभाव का विषवमन ऐसा है कि केवल सवर्ण होने भर से उसे शोषक बता कर प्रताड़ित किया जा रहा।  मेरा जन्म भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ। परंतु आर्थिक अभाव में वेदना ही सही है।

खैर, मेरा मानना है कि समाज में अच्छे, बुरे लोग हमेशा रहें है। पर अभी प्रायोजित तरीके से सवर्ण के विरुद्ध घृणा फैलाई जा रही। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वंचितों का शोषण नहीं हुआ। दमन नहीं हुआ। अथवा आज भी शोषण, दमन नहीं हो रहा। पर इसका मतलब यह है कि समाज में शोषक केवल जाति से निर्धारित नहीं है। यह एक नीच मानसिकता है। 


आज के समय में समाज को जोड़ने के छोटे छोटे प्रयासों की चर्चा अति आवश्यक है। समाज में रोज रोज ऐसे पहल होते है। समाज को जोड़ने का प्रयास होता रहा। होता रहेगा। 

जारी है..

01 फ़रवरी 2026

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

(दलित चेतना और सवर्ण)

अरुण साथी

पुण्य तिथि पर बिहार केसरी डॉ श्री कृष्ण सिंह को जन्म भूमि (माउर) जाकर नमन किया। अभी चुनाव नहीं है, इसलिए कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। फिर जगह जगह प्रतिमाओं पर लोगों ने माल्यार्पण किया। पुष्पांजलि की। आज के दौर ने बिहार केसरी ज्यादा प्रासंगिक हो गए। अभी महापुरुषों को जातियों में बांट दिया गया है।  श्री बाबू के साथ भी यही हुआ। भूमिहार ब्राह्मणों के कुछ नेताओं ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए यह किया। उनका स्वार्थ सध गया। समाज का नुकसान हो गया। हालांकि बड़ा वर्ग नेताओं के साथ नहीं गया। 
खैर, अभी सोशल मीडिया पर दलित विमर्श और दलित चेतना के नाम पर अर्ध सत्य को प्रसारित कर समाज को बांटने की बड़ा षडयंत्र हो रहा। और समाज बंट भी गया है। दलित वर्ग में सवर्णों के प्रति ऐसा विष बोया गया है दलितों का बौद्धिक वर्ग भी प्रतिशोध ले रहा..! 

1990 का मंडल आग एक बार फिर यूजीसी के बहाने, सुलगाने का प्रयास हुआ। और यह सुलग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसपर विराम लगाने की पहल की है पर नेताओं के द्वारा इस आग को हवा दी जा रही। 
नेताओं को पता है कि जब तक समाज जलेगा नहीं तब तक उनको कौन पूछेगा...? दुर्भाग्य से इस बार कमंडल वालों ने यह खेल कर दिया है।

हालांकि एक सकारात्मक बात यह हुई इस बार कुछ दलित और ओबीसी ने इसका खुल कर प्रतिरोध किया।  बकाई सोशल मीडिया पर विष वमन कर रहे...!

अब यूजीसी का बवाल थोड़ा शांत हुआ है। पर इसमें कई प्रश्न उठे है। 
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या समाज से भेदभाव, छुआछूत मिटाने की लड़ाई केवल दलितों के नेताओं , समाज सुधारकों ने लड़ी ...? क्या वंचितों को अधिकार दिलाने का श्रेय केवल बाबा साहेब को ही है...?

तो ऐसा नहीं है। संत रैदास, संत कबीर, संत तुकाराम इत्यादि के साथ साथ आदि शंकराचार्य , दयानंद सरस्वती , स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले इत्यादि लंबी सूची है। कईं बड़े नेताओं ने संघर्ष किया।

श्री बाबू ने दलितों को देवघर मंदिर में प्रवेश करा कर भेदभाव के विरुद्ध बड़ी लकीर खींची थी। वहीं जमींदारी उन्मूलन कर समाज में बराबरी की पहल की। दोनों मामले में उनके स्वजातीय उनसे नाराज हुए थे। श्री बाबू को तिरस्कार झेलना पड़ा था...
समाज में बराबरी की पहल समाज में नीचे के स्तर पर  भी हुआ है ।  और गैर बराबरी का विष दलितों का दलितों से भी है। दलितों का पिछड़े से भी है। और तो और ब्राह्मणों का ब्राह्मणों से भी है....लगातार प्रमाणिक रूप से इस पर लिखना शुरू कर रहा हूं...यह कॉलम जारी रहेगा....

(दलित चेतना और सवर्ण)