28 अक्टूबर 2026

नीरज कुमार के बहाने एक जातीवादी विमर्श

नीरज कुमार के बहाने एक जातीवादी विमर्श

विधान परिषद का चुनाव देश भर में था। पटना स्नातक का चुनाव देश में चर्चित हो गया। कारण, अनंत सिंह का पार्टी से विरोध करके नीरज कुमार को हराने के लिए उतरना। 
और फिर देखते देखते जनसुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के साथ होकर पीला गमछा लहराने लगना। वही पीला गमछा, जिसे ओढ़ कर मोकामा में पीयूष में इनको पानी पिलाया था। वही पीके चुप रह गए ।

फिर, देखते देखते सोशल मीडिया में पहली बार विधान परिषद का चुनाव ग्लैमरस हो गया। देखते देखते रीलबाजी होने लगी। फिर, बुलडोजर से फूल बरसने लगे। फिर, देखते देखते गाली, गुत्ता होने लगा। फिर, देखते देखते अस्पताल में भर्ती प्रतिद्वंदी के लिए हिकारत का भाव सामने आया। 

और बस, यह सब बिहार का आम आदमी का मानस चुपचाप देख, पढ़ रहा था। वह कुछ बोल नहीं सकता। क्योंकि उसे डर है। पर वह सौ सोनार की, एक लोहार की तरह चोट करता है। वोट से चोट। बोलती बंद..!

दूसरे तरफ अशोक महतो। निशांत कुमार अभी राजनीति में डेगा डेगी दे रहे। उनको साम, दाम, दंड, भेद सीखने में समय लगेगा। और अचानक अपने ही घर में चुनौती मिल गई। नेता कौन..? कुख्यात या सामान्य आदमी..? फिर आम आदमी ने वोट से चोट कर शंखनाद किया।

असल में यह चुनाव कई मायने के दूसरे एंगल से भी समझना होगा।

बिहार में अभी किसी भी जातीय समाज में कुछ लोग यदि किसी के साथ चले गए तो पूरे जाति को जोड़ कर माहौल बना दिया जाता है। 

यह कोई सूक्ष्मता से नहीं देखता कि जो तथाकथित स्वघोषित नेता बन रहा, उसके साथ समाज का कौन सा वर्ग खड़ा है..?

यह स्वाभाविक है। असामाजिक, कुख्यात, दबंग, बाहुबली, रीलबाज, मुंहफट, गलीबाज, किसी का सम्मान नहीं करनेवाला के साथ उसी स्वभाव के लोग खड़े होते है। इससे पूरे समाज को खड़ा होना मान लेना, गलत है। 

ठीक इसका उलट भी है। समाज में सभ्य, शालीन, जनहित में लड़ने, बोलने वाला, सर्व सुलभ और व्यापक दृष्टिकोण रखने वाले के साथ एक बड़ा वर्ग खड़ा होता है। इसलिए नहीं कि उससे बहुत लगाव है। बल्कि इसलिए कि उसे लगता है कि इसकी हार , उसकी अपनी हार होगी।

बातें बहुत है। पर रीलबाजी से रियल बाजी सर्वथा सार्थक है। सकारात्मक है। और सर्वमान्य है। बस, रीलबाजी में बहके लोगों को ब्रह्मांड का नेता होने का गुमान हो जाता है। फिर सच सामने आता है तो...

हरसिंगार का समय आ गया है...

हरसिंगार का समय आ गया है...

शाम ढलते ही इसकी भीनी-भीनी खुशबू मन में ऐसे घुलने लगती है, जैसे पानी में चीनी। एक ऐसी मिठास, जिसे महसूस करने के लिए किसी शब्द की जरूरत नहीं होती।
और सुबह... ओस में भीगे हरसिंगार के फूल धरती पर ऐसे बिखरे मिलते हैं, मानो किसी ने रात के अँधेरे में विवाह का मंडप सजाया हो। सफेद पंखुड़ियों पर केसरिया डंठल की आभा, जैसे सादगी ने अपने माथे पर सुर्ख तिलक लगा लिया हो।

हरसिंगार केवल खिलता नहीं, वह रात की नीरवता को सुगंध में बदलता है और सुबह धरती को फूलों की चादर ओढ़ा देता है।

कुछ फूल डालियों पर रहकर सुंदर होते हैं, कुछ धरती पर बिखरकर भी अपनी गरिमा बनाए रखते हैं।

हरसिंगार उन्हीं में से एक है... जो झरकर भी आँगन को महका देता है। 

27 अक्टूबर 2026

छत के ऊपर से मुतना

वह छत के ऊपर से मूतता था, आने-जाने वालों पर छींटे पड़ते थे।
एक दिन, जब उसी राह से पूजा करने जा रही थीं महिलाएँ,
वह औंधे मुँह गिरा हुआ था, अपने ही मूत पर...

पटना के प्रख्यात कवि अरुण कमल जी की यह कविता शायद 10–15 साल पहले पढ़ी। एक साथी से पुस्तक मांगी थी। कई कविताएं थी जो चिंतित करती थी। फिर उस पुस्तक का फोटोस्टेट करके रख लिया। आज खोज रहा। पुस्तक नहीं मिल रही। खैर, यह एक कवि का शाश्वत चिंतन है...आज हम सोशल मीडिया पर छत के ऊपर खड़े होकर छीटें उड़ाते हैं... ऐसे कई लोग देखते है...और फिर औंधे मूँह उसको गिरा हुआ भी देखते है...

24 अक्टूबर 2026

गांव का देसी ओल और हाइब्रिड

#ओल 
यह देसी ओल है। इसे तैयार होने में तीन चार साल लगे। देसी ओल की सब्जी खाना बड़ी चुनौती है। बहुत कुलकुलता है। कुलकुलाना बंद हो इसके लिए बहुत प्रयोग होता है। नींबू का प्रयोग, तेल में छानना इत्यादि। पर तब भी खत्म नहीं होता। कहा जाता है कि इसका औषधीय गुण बहुत है।
अब, हाइब्रीड ओल बाजार में है। कुलकुलाना बंद। यही खूब बिकता है। पर देसी स्वाद नहीं है। गुणवत्ता वह नहीं है। अधिकतर सब्जियों ने यही हुआ है। फूलगोभी में खुशबू गायब। खीरा का तीखापन खत्म आदि..

बस..

23 अक्टूबर 2026

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर यह प्रश्न कई लोगों ने उठाया। उत्तर कहां है..? 
तो उत्तर प्रश्न में ही निहित है। दरअसल, बिहार में भूमिहार (बहुसंख्यक) जमींदारों के विरुद्ध जमींदारी उन्मूलन कानून लाने वाले, दलित को देवघर मंदिर में प्रवेश कराने वाले, और अंग्रेजों के लोहा लेने वाले बिहार केसरी को जब हम भूमिहार जाति के सीमा में बांध दिए, उसी दिन इसकी संभावना मर गई। जो भी महापुरुष हुए, वे जातियों की विसंगतियों का खंडन किया। लड़ाई लड़ी। अपमनित हुए। बिहार केसरी के साथ भी यह हुआ।

अपने राजनीतिक लाभ के लिए कुछ नेताओं ने बिहार केसरी को भी इसी सीमा में बांध दिया। उनका स्वार्थ तो सध गया। बिहार केसरी पिछड़ गए।

यह क्षरण आंबेडकर, पटेल से लेकर सभी महापुरुषों के साथ हुआ है। और इसी में भारत रत्न का मामला छिपा है। श्री बाबू भूमिहार जाति से थे। सवर्ण सहित इस जाति को कल तक बीजेपी का कोर वोट माना जाता था। बीजेपी ने यूजीसी के बहाने, इस जाति सहित सवर्णों को आहिस्ते से किनारे लगा दिया। बिहार में बीजेपी शुरू से ही खुलकर जातिवाद राजनीति करती रही है। इसी में अति पिछड़ा वोट बैंक के हिसाब के कर्पूरी जी को भारत रत्न मिला। श्री बाबू का फाइल किनारे रख दिया। जब कभी जरूरत लगेगी, यह कार्ड भी खेला जाएगा। पर अभी कोई संभावना नहीं दिखती...

19 अक्टूबर 2026

कसाई !

कसाई तो कसाई होता है..

आज मार काट है। बलि प्रथा। जीव हत्या। और आज कसाई की खूब कमाई हुई। पर कसाई कितना क्रूर है, देखिए।

बरबीघा के फैजाबाद मोहल्ले से पिछले कुछ दिनों में कई बकरे और बकरी की चोरी हो चुकी है। आज दोपहर, बीच सड़क से एक बकरी को चोर उठा ले गए। यह मो अंजर का था। उसका पूरा परिवार उसे खोज रहा है। एक बच्ची शिवकुमार जी के घर खोजने आई। वह सीसीटीवी कैमरा में देखने का जिद कर रही थी। वह बहुत उदास थी। कह रही थी, 
"देखिये न सर, अभी पिछले सप्ताह ही बच्चा दी है। उसके पांच बच्चे है। सभी भूख से बिलख रहे है।"

मैं सोच रहा था, उस नन्हे बच्चे की आह कोई ईश्वर सुनता होगा क्या...?