27 अक्टूबर 2026

छत के ऊपर से मुतना

वह छत के ऊपर से मूतता था, आने-जाने वालों पर छींटे पड़ते थे।
एक दिन, जब उसी राह से पूजा करने जा रही थीं महिलाएँ,
वह औंधे मुँह गिरा हुआ था, अपने ही मूत पर...

पटना के प्रख्यात कवि अरुण कमल जी की यह कविता शायद 10–15 साल पहले पढ़ी। एक साथी से पुस्तक मांगी थी। कई कविताएं थी जो चिंतित करती थी। फिर उस पुस्तक का फोटोस्टेट करके रख लिया। आज खोज रहा। पुस्तक नहीं मिल रही। खैर, यह एक कवि का शाश्वत चिंतन है...आज हम सोशल मीडिया पर छत के ऊपर खड़े होकर छीटें उड़ाते हैं... ऐसे कई लोग देखते है...और फिर औंधे मूँह उसको गिरा हुआ भी देखते है...

24 अक्टूबर 2026

गांव का देसी ओल और हाइब्रिड

#ओल 
यह देसी ओल है। इसे तैयार होने में तीन चार साल लगे। देसी ओल की सब्जी खाना बड़ी चुनौती है। बहुत कुलकुलता है। कुलकुलाना बंद हो इसके लिए बहुत प्रयोग होता है। नींबू का प्रयोग, तेल में छानना इत्यादि। पर तब भी खत्म नहीं होता। कहा जाता है कि इसका औषधीय गुण बहुत है।
अब, हाइब्रीड ओल बाजार में है। कुलकुलाना बंद। यही खूब बिकता है। पर देसी स्वाद नहीं है। गुणवत्ता वह नहीं है। अधिकतर सब्जियों ने यही हुआ है। फूलगोभी में खुशबू गायब। खीरा का तीखापन खत्म आदि..

बस..

23 अक्टूबर 2026

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

बिहार केसरी को भारत रत्न क्यों नहीं...?

डॉ श्रीकृष्ण सिंह की जयंती पर यह प्रश्न कई लोगों ने उठाया। उत्तर कहां है..? 
तो उत्तर प्रश्न में ही निहित है। दरअसल, बिहार में भूमिहार (बहुसंख्यक) जमींदारों के विरुद्ध जमींदारी उन्मूलन कानून लाने वाले, दलित को देवघर मंदिर में प्रवेश कराने वाले, और अंग्रेजों के लोहा लेने वाले बिहार केसरी को जब हम भूमिहार जाति के सीमा में बांध दिए, उसी दिन इसकी संभावना मर गई। जो भी महापुरुष हुए, वे जातियों की विसंगतियों का खंडन किया। लड़ाई लड़ी। अपमनित हुए। बिहार केसरी के साथ भी यह हुआ।

अपने राजनीतिक लाभ के लिए कुछ नेताओं ने बिहार केसरी को भी इसी सीमा में बांध दिया। उनका स्वार्थ तो सध गया। बिहार केसरी पिछड़ गए।

यह क्षरण आंबेडकर, पटेल से लेकर सभी महापुरुषों के साथ हुआ है। और इसी में भारत रत्न का मामला छिपा है। श्री बाबू भूमिहार जाति से थे। सवर्ण सहित इस जाति को कल तक बीजेपी का कोर वोट माना जाता था। बीजेपी ने यूजीसी के बहाने, इस जाति सहित सवर्णों को आहिस्ते से किनारे लगा दिया। बिहार में बीजेपी शुरू से ही खुलकर जातिवाद राजनीति करती रही है। इसी में अति पिछड़ा वोट बैंक के हिसाब के कर्पूरी जी को भारत रत्न मिला। श्री बाबू का फाइल किनारे रख दिया। जब कभी जरूरत लगेगी, यह कार्ड भी खेला जाएगा। पर अभी कोई संभावना नहीं दिखती...

19 अक्टूबर 2026

कसाई !

कसाई तो कसाई होता है..

आज मार काट है। बलि प्रथा। जीव हत्या। और आज कसाई की खूब कमाई हुई। पर कसाई कितना क्रूर है, देखिए।

बरबीघा के फैजाबाद मोहल्ले से पिछले कुछ दिनों में कई बकरे और बकरी की चोरी हो चुकी है। आज दोपहर, बीच सड़क से एक बकरी को चोर उठा ले गए। यह मो अंजर का था। उसका पूरा परिवार उसे खोज रहा है। एक बच्ची शिवकुमार जी के घर खोजने आई। वह सीसीटीवी कैमरा में देखने का जिद कर रही थी। वह बहुत उदास थी। कह रही थी, 
"देखिये न सर, अभी पिछले सप्ताह ही बच्चा दी है। उसके पांच बच्चे है। सभी भूख से बिलख रहे है।"

मैं सोच रहा था, उस नन्हे बच्चे की आह कोई ईश्वर सुनता होगा क्या...?

खानदानी

खानदानी
(कहानी-अरुण साथी)
खदेरन बाबू गाँव के बड़का जमींदार थे। अंग्रेजों के सबसे प्रिय। अब सरकार ने जमींदारी छीन ली थी, पर ठसक नहीं छीन सकी थी। उनका भरा-पूरा परिवार था। अब जमींदारी के नाम पर बस हवेली बची थी। वह भी ढह-ढनमना रही थी।
इतनी उम्र में पहली बार खदेरन बाबू अंदर से व्यथित थे। आज उनकी इस हवेली में पंचायत बैठी थी। आज गोबर राम मुखिया है। अब वही न्याय भी करेगा।

मुखिया के बगल में एक युवक बैठा था। गुस्से से लाल, तमतमाया हुआ।

“हमरो कोर्ट-कचहरी देखल हइय। सहूलियत से हमर हिस्सा दे दहो। हमरो देह में तोहरे खून दौड़ रहलइ हें।”

बगल में हाथ जोड़े, सिर झुकाए एक महिला खड़ी थी। मंगली।

पुरानी बात है। वह पंद्रह साल की रही होगी। माय के साथ चौका-बर्तन में हाथ बँटाने हवेली आती थी। एक दिन खदेरन बाबू ने उसे एक कमरे में खींच लिया।
वह चीखती-चिल्लाती, विलाप करती रही।
घर आकर माय को बताई। माय ने चुप करा दिया।
तब से वह ऐसी चुप हुई कि लोग उसे गूँगी समझने लगे।
तब से वही कमरा, वही खदेरन बाबू, वही हवेली।
बस, अब चीखना-चिल्लाना सिसकियों में बदल गया था।

फिर वही कमरा मंगली का घर हो गया। अब मंगली का नाम रखेलनी हो गया।
आज इस मंगली का बेटा अपना हिस्सा माँग रहा था।
मुखिया ने समझाया,
“घर के बात घर में रह जइतो, खदेरन बाबू। भले बियाह नइ कइलहो, बेटवा तो तोरे हो। समझो कि तीन बेटा हो। नइ तो खानदान के नाक कट जइतो। आजकल कानून बड़ी कड़ा हो गेलइ हइ। जेल भी जाय पड़तो, उ अलगे।”

खदेरन बाबू ने सहमति में सिर हिला दिया।
कागज बना। तीसरा हिस्सा मंगली के नाम हो गया।

15 अक्टूबर 2026

जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया

जितनी मुँह उतनी बातें..सोशल मीडिया 

अभी डांडिया का चलन है। अचानक यह बढ़ा है। गुजरात से महानगर। और अब बिहार के कस्वा से लेकर गांव तक। सभी जगह। इसे बाजारवाद का प्रभाव माना जाता है। और यह है भी । तब भी, खराबी क्या है? आज पूंजीवादी व्यवस्था में हम सभी तो बाजारवाद के प्रभाव में हैं ही। हमारा राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक, सभी आयोजन बाजारवादी है। यह एक सच्चाई ही है। 
अभी अचानक एक दिन सोच रहा था। एक दशक पहले तक दिल्ली जाने में रेलवे स्टेशन पर बोतल में पानी भरकर रेलगाड़ी पकड़ने दौड़ते थे। पानी भरने के लिए आपाधापी। एक कान रेल की सीटी पर रहता था। और आज? बाजारवाद ने ऐसा प्रभाव डाला कि हजार, पांच सौ का पानी ही पी जाते। उसने में भी नकली भी। कहा गया कि बीमारी का खतरा कम होगा, पर आंकड़े कहते है, बीमारी बढ़ गई। खैर, बाजारवादी डांडिया में भी खुशी की तस्वीर मिलती है।

खुशी, एक तो वह खुशी; जो हमारे जीवन में नहीं है। उसे हम अब इसी तरह के आयोजनों के माध्यम से सबको अपने खुश होने को प्रचारित करते है। सेल्फी में मुस्कुराते है। रील में डांस करते है। हंसते है। बाकी  तनाव, अवसाद, कुंठा, प्रतिस्पर्धा तो जीवन में है ही  

दूसरा वह, जो अंदर से खुश है। जो अंदर से खुश है। बस खुश है। चैतन्य। पर बहुत कम। एक चित्र में एक बच्चा अपने माँ के साथ डांडिया खेल रहा है। पिता वीडियो बना रहा। बस, इतनी सी खुशी। और सच्चिदानंद।
 बाकी अभी डांडिया में एक महिला के देह का चित्र हम पुरुष नैतिक ज्ञान बांटते हुए अपने वॉल पर चिपका रहे। मैं सोचता हूं, कि अश्लील रिल्स बनाने वाली महिलाओं का वीडियो करोड़ों लोग देखते है। वह देखने वाला कौन है..? महिला तो देखती नहीं...? फिर यह ज्ञान देने वाले कौन है..? दोहरा चरित्र..! बस, इतना ही। बाकी सब ठीक है.. हां, अपने यहां रोटरी क्लब के द्वारा आयोजित संयमित  डांडिया में मित्रों के आग्रह पर आधे मन से मैं भी गया। फोटो सेशन भी है..बाकी जगह तो हुड़दंग भी होता है...

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