अरुण साथी
सूचना सबके पास है, लेकिन समाचार वही है जिसे पत्रकार मेहनत से खोजकर पाठक तक पहुंचाता है।
बदलते दौर में पत्रकारिता की दुनिया पूरी तरह बदल गई है। मोबाइल, सोशल मीडिया, न्यूज पोर्टल और विभिन्न डिजिटल माध्यमों ने सूचनाओं की पहुंच बेहद आसान बना दी है। किसी घटना के घटते ही उसकी तस्वीर, वीडियो और प्रारंभिक जानकारी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। प्रेस विज्ञप्ति, सरकारी सूचना, पुलिस का बयान, प्रशासनिक आदेश और कार्यक्रमों की जानकारी भी अब पत्रकारों तक पहुंचने का इंतजार नहीं करती। ये सूचनाएं विभिन्न माध्यमों से सबके पास पहुंच जाती हैं।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल है कि जब सामान्य समाचार हर किसी के पास उपलब्ध है, तो अखबार की अलग पहचान क्या होगी? पाठक अखबार क्यों पढ़ेगा? पत्रकार की विशिष्ट भूमिका क्या रह जाएगी?
मेरी नजर में इसका जवाब है- खोजकर लाई गई खबर।
सामान्य सूचना और वास्तविक पत्रकारिता में यही बुनियादी अंतर है। जो सूचना सबके पास खुद चलकर आ रही है, उसे प्रकाशित कर देना पत्रकारिता का एक हिस्सा जरूर है, लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत उस खबर में है, जिसे पत्रकार ने अपनी मेहनत, जिज्ञासा, संपर्क, पड़ताल और फील्ड वर्क के जरिए खोजा हो।
### खबर खोजने की मेहनत ही पत्रकार की पहचान
मान लीजिए किसी गांव में सड़क निर्माण का उद्घाटन हुआ। इसकी सूचना विभाग की ओर से जारी कर दी गई। तस्वीरें और प्रेस विज्ञप्ति भी उपलब्ध करा दी गईं। इस आधार पर खबर तैयार करना अपेक्षाकृत आसान है।
लेकिन पत्रकारिता की असली शुरुआत इसके आगे होती है।
क्या उस सड़क का निर्माण निर्धारित समय पर हुआ? निर्माण में कितनी राशि खर्च हुई? क्या सड़क की गुणवत्ता मानक के अनुरूप है? क्या सड़क बनने से गांव के लोगों की पुरानी समस्या दूर हुई? क्या निर्माण में किसी तरह की अनियमितता हुई? क्या सड़क का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचा, जिनके नाम पर योजना बनाई गई थी?
इन सवालों का जवाब प्रेस विज्ञप्ति में नहीं मिलेगा। इसके लिए पत्रकार को गांव जाना होगा, लोगों से बात करनी होगी, निर्माण स्थल देखना होगा, दस्तावेज जुटाने होंगे और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना होगा।
यही लेग वर्क है। यही खबर को सामान्य सूचना से अलग करता है।
### जो दिखाई नहीं दे रहा, उसे सामने लाना
हर क्षेत्र में ऐसी अनेक कहानियां और समस्याएं होती हैं, जो आमतौर पर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा नहीं बन पातीं। कोई स्कूल वर्षों से शिक्षक की कमी से जूझ रहा है। किसी अस्पताल में जरूरी उपकरण होने के बावजूद उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा। किसी पंचायत में सरकारी योजना का लाभ कागजों पर पूरा है, लेकिन जमीन पर अधूरा। किसी गांव में लोग वर्षों से पुल या सड़क की मांग कर रहे हैं।
इनमें से किसी विषय पर शायद कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं होगी। कोई अधिकारी खुद पत्रकार को इसकी जानकारी नहीं देगा। कोई आयोजन भी नहीं होगा।
पत्रकार को खुद इन विषयों की पहचान करनी होगी। लोगों के बीच जाना होगा। उनकी परेशानी समझनी होगी। तथ्यों की जांच करनी होगी और फिर उसे समाचार का रूप देना होगा।
अच्छा पत्रकार वही है, जो केवल अपने पास आई सूचना पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि अपने आसपास ऐसी खबरें तलाशता है, जिनकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
### लेग वर्क का मतलब केवल घटनास्थल पर पहुंचना नहीं
फील्ड वर्क का अर्थ केवल किसी घटना की तस्वीर खींचना या मौके पर जाकर लोगों का बयान लेना नहीं है। इसके कई स्तर हैं।
* जमीनी पड़ताल: गांव, टोला, बाजार, अस्पताल, स्कूल और सरकारी कार्यालयों में जाकर वास्तविक स्थिति देखना।
* दस्तावेजों की जांच: सरकारी रिकॉर्ड, योजनाओं की सूची, बजट, टेंडर, आदेश और उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन करना।
* लोगों से संवाद: आम नागरिक, लाभार्थी, कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और संबंधित अधिकारियों से बातचीत करना।
* तथ्यों का मिलान: किसी एक व्यक्ति के आरोप को खबर मान लेने के बजाय दूसरे पक्ष और दस्तावेजों से उसकी पुष्टि करना।
* फॉलोअप: प्रकाशित खबर के बाद यह देखना कि उसका असर हुआ या नहीं और समस्या का समाधान निकला या नहीं।
इन तमाम प्रक्रियाओं से गुजरकर तैयार हुई खबर में पत्रकार की मेहनत दिखाई देती है। ऐसी खबर पाठक को नई जानकारी देती है और कई बार व्यवस्था को जवाब देने के लिए भी मजबूर करती है।
### छोटे शहर और जिलों में खोजी पत्रकारिता की बड़ी संभावनाएं
जिला और प्रखंड स्तर पर पत्रकारिता के लिए संभावनाओं की कमी नहीं है। वास्तव में स्थानीय पत्रकार के पास अपने क्षेत्र को समझने का अवसर अधिक होता है। वह जानता है कि किस गांव में कौन सी समस्या पुरानी है, किस सरकारी योजना का लाभ लोगों को नहीं मिल रहा, किस विभाग में क्या कमी है और किन मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगा जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए रेलवे फाटक पर लगने वाला जाम एक सामान्य खबर हो सकती है। लेकिन यदि पत्रकार यह पता लगाए कि जिले में किन-किन रेलवे फाटकों पर प्रतिदिन कितनी देर जाम लगता है, कितने लोग प्रभावित होते हैं, एंबुलेंस और स्कूली वाहनों को कितनी परेशानी होती है, ओवरब्रिज या अंडरपास की मांग कब से लंबित है और जनप्रतिनिधियों ने इसके लिए क्या पहल की है, तो यह एक महत्वपूर्ण जनसरोकार की रिपोर्ट बन जाती है।
इसी तरह सरकारी अस्पताल में मरीजों की भीड़ दिखाना सामान्य कवरेज है। लेकिन डॉक्टरों की स्वीकृत और कार्यरत संख्या, जांच सुविधाओं की उपलब्धता, दवाओं की स्थिति और मरीजों की वास्तविक परेशानी की पड़ताल करना मौलिक पत्रकारिता है।
### सोशल मीडिया की भीड़ में अखबार की अलग पहचान
सोशल मीडिया पर तेजी से खबरें पहुंचाना अब किसी एक संस्थान या पत्रकार की विशेषता नहीं रह गई है। कोई भी व्यक्ति तस्वीर या वीडियो के साथ सूचना प्रसारित कर सकता है। ऐसे में अखबार के लिए केवल तेजी को अपनी ताकत मानना उचित नहीं होगा।
अखबार को ऐसी खबरें देनी होंगी, जिनमें तथ्य हों, विश्वसनीयता हो, संदर्भ हो और पत्रकार की मेहनत हो।
पाठक को यह महसूस होना चाहिए कि अखबार में प्रकाशित खबर केवल कहीं से मिली सूचना नहीं है, बल्कि उसके पीछे किसी पत्रकार ने समय दिया है, सवाल पूछे हैं, लोगों से मुलाकात की है, दस्तावेज देखे हैं और सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश की है।
यहां एक बात और महत्वपूर्ण है। खोजी खबर का अर्थ केवल किसी बड़े घोटाले या भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करना नहीं है। किसी छोटे गांव की अनसुनी समस्या, किसी उपेक्षित व्यक्ति की कहानी, किसी सरकारी योजना की जमीनी हकीकत या किसी अच्छी पहल को खोजकर सामने लाना भी खोजपरक पत्रकारिता है।
### पत्रकारिता में पहल की संस्कृति विकसित करनी होगी
इसके लिए पत्रकारों को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। दिनभर प्रेस विज्ञप्ति, कार्यक्रम और प्रशासनिक बैठकों की खबरों में व्यस्त रहने से मौलिक खबरों के लिए समय नहीं निकल पाता। जरूरी है कि प्रत्येक पत्रकार अपने क्षेत्र में लगातार कुछ ऐसे विषयों की तलाश करे, जिन पर सामान्य दिनों में खबरें नहीं बनतीं।
हर दिन यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आज मेरे क्षेत्र में ऐसा क्या हुआ या हो रहा है, जिसकी जानकारी पाठकों को नहीं है? कौन सी समस्या है, जिसे सामने लाने की जरूरत है? कौन सा सरकारी दावा है, जिसकी जमीनी जांच होनी चाहिए? कौन सी अच्छी पहल है, जिसकी जानकारी समाज तक पहुंचनी चाहिए?
इस तरह पत्रकारिता प्रतिक्रियात्मक होने के बजाय पहल करने वाली बनेगी।
### विमर्श के लिए कुछ महत्वपूर्ण सवाल
* क्या हमारी पत्रकारिता प्रेस विज्ञप्ति और प्रशासनिक सूचना पर अधिक निर्भर हो गई है?
* क्या प्रत्येक पत्रकार के पास हर सप्ताह कम से कम एक मौलिक और खुद खोजी गई खबर होनी चाहिए?
* क्या हम रिपोर्टर को फील्ड वर्क और पड़ताल के लिए पर्याप्त समय दे रहे हैं?
* क्या खबरों की संख्या को अधिक महत्व दिया जा रहा है या उनकी गुणवत्ता को?
* क्या हम अपने जिले की ऐसी समस्याएं खोज पा रहे हैं, जिन पर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया?
* क्या प्रकाशित खबरों का फॉलोअप हमारी कार्यशैली का हिस्सा है?
### मेरी मूल बात
पत्रकारिता में तकनीक बदल सकती है, समाचार पहुंचाने के माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकार की मूल भूमिका नहीं बदल सकती। पत्रकार का काम केवल सूचना को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना नहीं है। उसका काम है सूचना के पीछे छिपे तथ्यों को तलाशना, सवाल पूछना, सच्चाई की पुष्टि करना और उसे समाज के सामने रखना।
आज सामान्य समाचार सभी के पास चलकर आ जाता है। इसलिए पत्रकार को उस समाचार की तलाश करनी होगी, जो अभी लोगों तक पहुंचा ही नहीं है।
जिस खबर के लिए पत्रकार को अपने दफ्तर से निकलना पड़े, लोगों के बीच जाना पड़े, सवाल पूछने पड़ें, दस्तावेज खंगालने पड़ें और तथ्यों की पुष्टि करनी पड़े, वही खबर उसकी मौलिकता और मेहनत की पहचान बनती है।
अखबार को बचाने और बढ़ाने का रास्ता भी इसी से निकलेगा। हमें पाठक को वही नहीं बताना है, जो उसे पहले से पता है। हमें वह बताना है, जिसे जानने की उसे जरूरत है, लेकिन जिसे जानने का कोई दूसरा माध्यम उसके पास नहीं है।
सूचना सबके पास है, खबर खोजने की जिम्मेदारी पत्रकार की है। और इसी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाना पत्रकारिता का भविष्य है।