अभी तो लगता है, यार लोकतंत्र में धरना, प्रदर्शन, आमरण अनशन, उग्र–प्रदर्शन, हल्ला–हंगामा.. लाठीचार्ज, पथराव, आंसू गैस सब लोकतांत्रिक है, देश द्रोह नहीं है...! कभी ये सीमाओं में रहेगा, कभी सीमाएं ऐसे टूटेगी, जैसे सैलाब आया हो...! कल संसद के आगे सैलाब दिखा..!
और, कभी कभी लगता है मोदी सरकार भी निष्ठुर है। किसी की नहीं सुनती। पेपर लीक पर चुप्पी । दूसरी बार नीट परीक्षा लिया पर पेपर लीक करने वालों पर ठोस कार्रवाई नहीं दिखी..! और यार, बातचीत ही तो लोकतंत्र है, फिर..?
और, अभी तो यह भी लग रहा कि बीजेपी की सरकार, बोलने की आजादी छीन रही है। बिहार में सोशल मीडिया पर अभद्रता के लिए अब गुंडा एक्ट लगेगा..?
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी पर चुप्पी। बंगाल चुनाव के बाद ममता बनर्जी, फिर उधव ठाकरे, आम आदमी पार्टी का संसद इत्यादि की पार्टी को हाईजैक करना।
कभी कभी लगता है कि मीडिया पर अंकुश क्यों लगाया गया..?
कभी कभी लगता है, सोनम वांगचुक सज्जन है। जैसे अन्ना हजारे थे। पर वे राजनीतिक साजिश का शिकार नहीं होंगे, क्या गारंटी है..?
और, अभी तो यह भी लगता है, देश का विपक्ष, धूर मोदी विरोधी, श्री लंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह देश के जेन जी को करने के लिए लगातार भड़का रहा है, कहीं भड़क गए तो..?
कभी कभी लगता है, अपना देश लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलता है। यहां सर्व सम्मत नहीं है, यहां बहुमत है। इसका मतलब, आधे से कुछ कम लोग सरकार को नापसंद करते है..।
कभी कभी लगता है, यार बात बात पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार, पेपर लीक, चढ़ावा चोरी को गंभीर अपराध नहीं मानती इसीलिए तो बुलडोजर भी मौन है..!
कभी कभी यह भी लगता है कि जिस देश पर ऐसे ही इतना बोझ है उसपर महिला आरक्षण के बहाने दोगुना सांसदों का बोझ डालने का प्रयास तो सरासर अन्याय है..! और यह अन्याय राष्ट्रवाद के नाम पर तो और असहनीय है..!
कभी कभी तो यह भी लगता है कि यार, इसरो जैसे संस्था से 100 से अधिक वैज्ञानिक छोड़ कर चले गए, क्या अब देश में व्यापार ही होगा, जन सरोकार कुछ नहीं..!
कभी कभी लगता है, यार इस देश में बुलेट रेल और साधारण रेल के डिब्बे की असमानता की खाई को कौन मिटाएगा..?
और देश की पूंजी पर कुछ व्यापारिक घरानों के कब्जे और गीगा वर्कर बन रहे युवा पीढ़ी को कौन संभालेगा..?
देश में बढ़ रहे मॉल कल्चर और बेरोजगार होते छोटे व्यापारियों की, क्या कोई नहीं सुनेगा..?
अक्सर यह लगता है कि गंभीर बीमारियों में आम आदमी के लिए एम्स सहित बड़े अस्पतालों में बेड नहीं है और मॉल रूपी निजी अस्पताल में इलाज करवाने की जगह, आम आदमी मौत को ही चुनना पसंद करता है..।
कभी कभी यह भी लगता है कि अब तो मॉल रूपी विश्विद्यालय कल्चर है। इसमें तो इंटर के बाद आम आदमी अपने बच्चे को पढ़ा ही नहीं पाएगा.. और जन सरोकार की शिक्षा व्यवस्था को शनै शनै मृतप्राय बनाया जा रहा है..!
अभी तो यह भी लगता है कि यार अपनी बाइक का माइलेज कम हो गया, और सरकार इथेनॉल वाले तेल के झूठे दावे किए जा रही है। वहीं कोई सच बोले तो उसे दबा दिया जाता है..!
कभी कभी लगता है, यार भरत तिवारी तो गरीबों के लिए लड़ रहा था, उसे मार दिया गया..?
और उन सब के बीच यह भी लगता है, यार अन्ना हजारे के बहाने देश ने वेगनआर गाड़ी वाले केजरीवाल को मौका तो दिया। कहा, राजनीति बदलनी है, वही बदल गया।
और अंत में यही लगता है, यार अमेरिका के बोस्टन में पढ़ाई कर रहा दीपके के कॉकरोच जनता पार्टी के साथ देश को क्यों खड़ा होना चाहिए..? जिसमें मुख्य न्यायाधीश के उस कड़के सच को, जिसमें उन्होंने कहा था,
" फर्जी डिग्री वाले बेरोजगार कॉकरोच की तरह है..!"
और दीपके इसी बहाने खुद को भीमवादी बता कर,
भावनाओं को भड़का के, राजनीति कर सकता है, तो उसपर कैसे भरोसा करें..?
बहुत उथल पुथल चल रहा है। बहुत






