02 जून 2021

विपक्ष की अज्ञानता का शिकार हुआ कोविड-19 टीकाकरण: #चलो_टीका_लगवाएं अभियान में जुटे युवा #Lets_get_vaccinated

अरूण साथी


मुझे याद है जब कोविड-19 वैक्सीन देने की शुरुआत होने की सुगबुगाहट हुई थी उसी समय पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे मोदी वैक्सीन का नाम देकर साफ-साफ लेने से इनकार कर दिया था । धीरे-धीरे यह हवा फैलती गई और विपक्ष के नेता राहुल गांधी, असदुद्दीन ओवैसी सहित कई लोगों ने इसे मोदी टीका का नाम दे दिया। इसका दुष्परिणाम आज गांव-गांव देखने को मिल रहा है। हालांकि दुष्परिणाम का यही एकमात्र कारण नहीं है। परंतु यह भी कई कारणों में शामिल है। कोविड-19 टीका देने के लिए गांव जाने वाले लोगों को गाली देकर भगा दिया जा रहा है। एक मोदी विरोध वर्ग के लोग तो बिल्कुल टीका नहीं ले रहे।


घर के दरवाजे बंद किए जा रहे हैं। जिला का पूरा महकमा, अधिकारी, डॉक्टर हाथ जोड़कर गांव वालों को कोविड-19 प्रतिरोधी टीका लेने के लिए आग्रह करते हैं परंतु एक आदमी टीका लेने के लिए आगे नहीं आ रहा। संभवत: पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश होगा जहां जान बचाने वालों को ही दुत्कार कर भगा दिया जा रहा है। यह खतरनाक की स्थिति है और इसके दुष्परिणाम भी सामने आएंगे। यह सब जागरूकता की कमी, अज्ञानता और सोशल मीडिया पर उड़े कई तरह की बातों का भी परिणाम है।
हालांकि यह स्थिति गांव में देखने को मिल रही है जो 45 वर्ष से अधिक लोगों के टीकाकरण का मामला है। 45 वर्ष से कम 18 वर्ष से ऊपर के टीकाकरण में युवाओं का उत्साह देखने को मिल रहा है। परंतु उन लोगों को देने के लिए टीका ही उपलब्ध नहीं हो रहा है।
कोविड-19 प्रतिरोधी टीकाकरण अभियान में सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले युवाओं को आगे आना होगा। अपने घर, गांव, परिवार, रिश्तेदार को जागरूक करके कोविड-19 प्रतिरोधी टीका दिलवाना होगा। हाथ पकड़कर टीका लेने के लिए बूथ तक ले जाना होगा । तभी इस महामारी से हम निपट सकते हैं और मानवता को बचाने में अपना बड़ा योगदान दे सकते हैं । वैसे तो सोशल मीडिया पर कई तरह के अभियान चलते हैं । परंतु आज के दौर में सोशल मीडिया पर चलो टिका लगाए अभियान भी चलाने की जरूरत है। इस अभियान में सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले युवा आगे आएं अपने घर, परिवार, नाते, रिश्तेदार के लोगों को जरूर पूछे कि आपने टीका लगवाया क्या। और नहीं लगवाया तो उसे हाथ पकड़ कर चलो टीका लगवाएं अभियान में शामिल करें और बूथ पर ले जाकर उनको टीकाकरण करवाएं । मानवता की सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता। हालांकि सोशल मीडिया पर फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें वाली बात ही ज्यादा चरितार्थ होती हैद्ध आज के दौर में ₹2 का मास्क बांटकर सोशल मीडिया पर तस्वीर ऐसे दे रहे हैं जैसे उन्होंने सबसे महान काम कर दिया हो। वैसे बंधुओं से निवेदन करूंगा कि उसके जगह यदि 2 लोगों का आप टीका लगवा देते हैं तो ज्यादा उपकार मानवता पर हो सकेगा।

बरिष्ठ पत्रकार के ब्लॉग चौथाखंभा से साभार chouthaakhambha.blogspot.com

01 जून 2021

ठसक

लघु कथा
घर के आगे सफाई कर्मी रोज की तरह आया। राजकुमार ने सोंचा बगल के रखा कचरा भी साफ करा लेते है। कम खर्च में हो जाएगा। ऐसे हजार-पाँच सौ लग जाएंगे। उसने आवाज दी।

"ऐ डोम राजा, तनि ई कचरा भी उठा ला। कुछ खर्च दे देबो।"

उसने ताव भरी नजरों से देखा। 

"हमरा से नै होतो। टेम नै हो।"
"काहे नै होतो, सो-पचास ले ला।"

"सो-पचास! की बुझ्झो हो जी। नंगा-भुख्खा! हमरो बाऊ ठेकेदार है। बड़का। दू दू गो ठेका ले ले हई। ए गो मोकामा। ए गो बाढ़। मुर्दा जराबे वाला सब निहोरा ने करो है श्मशान में..!!!"

29 मई 2021

महंगाई डायन खाये जात है गाना राजा-द्रोह घोषित

सखी सैंया तो खूबे कमात है, महंगाई डायन खाये जात है। राजा जी ने इस गाने को राजा-द्रोह  घोषित कर दिया है। अभी-अभी भक्ति समाचार प्रसारण चैनलों पर इस खबर की ब्रेकिंग न्यूज़ चली है। बताया गया कि एक अभक्त चैनल पर महंगाई डायन गाना बजाए जाने पर तत्काल बीबीआई ने वहां छापेमारी की और राजा-द्रोह के आरोप में कार्यालय को सील करते हुए  कंपनी के मालिक को जेल में ठूंस दिया।



भक्ति समाचार चैनल पर जब इस खबर का प्रसारण हो रहा था तो कुतर्क कार्यक्रम में राजा जी के खासमखास मंत्री बीरबल ने अपने वक्तव्य में कहा कि राजा को डायन कहना बिल्कुल ही राजा-द्रोह की श्रेणी में आता है। इसमें पाकिस्तान का हाथ है। पाकिस्तान से यह टूलकिट भेजा गया और विपक्षी वामी, सामी, कामी ने मिलकर इस टूलकिट को हवा दी है।

गांव-गांव यह बात जंगल में धुंआ की तरह तेजी से फैल गई। महंगाई डायन गाना किसी की जुबान पर आया तो जेल हो जाएगी। रामखेलावन काका गांव में चौपाल लगाए हुए थे। उधर से रामबुझाबन सिंह गुस्से में भुनभुनाते हुए आ रहे थे।  काका ने पूछा तो भड़क गए। बोले, खेत पटाबे ले ई सुवरथा के नाती दोगुना पैसा मांगों हो। कहलको अरब वाला पानी दोगुना मंहगा हो गेलाें हें। भला बोल्हो, अब की उपजइबों, आ की खाइबों, अ की बचाइबो।


उधर खेलावन काका जब खाने पर घर पहुंचे तो पतोह खाना की थाली ला कर रख दी। कौर मुंह में लेते ही उन्हें अजीब सा लगा।   वे झट से उगल दिए। मन भिन्ना गया। इसमें कोई स्वाद ही नहीं था। उनका गुस्सा कपाड़ पर चढ़ता उससे पहले ही वे डर गए। कोरोना में भी स्वाद चला जाता है। उन्हें भी तो नहीं हो गया। उन्होंने पतोह को आवाज दी। अपना डर बताया । सबको अलग रहने के लिए कहने लगे। ई छुआ-छुत हो। सुनलियो छो हाथ दूर भी उड़ के चल जा हो। सब दूरे रहिया। जाहियो बगैचा में रहबो।

पतोह शांत थी। बिल्कुल ऐसे जैसे टीवी पर कुत्त-भुकबा प्रसारण के दौरान समझदार शांत रहता है। कोई काम नहीं।बोली, बाबू जी। ई कोरोना-तोरोना नै हो। मंहगाई डायन हो। जत्ते पैसे में एक महिना के तेल-मसाला आबो हलो उ अब सोलहवें दिन  झर गेलो। करूआ तेल दु सो के पार हो। अपने के बेटा तो बेराजगार हो। अब चौदह दिन हम्मरे घर चलाबे पड़तो। त बिन तेल मसाला के खाहो। समझ लिहा कोरोना  हो गेलों हें। स्वाद गायब। वैसे भी चौदह दिन कुरन्टीन सरकार रहे ले बोलो हो। रह लिहा। आंय



28 मई 2021

राजा जी के आँसू घड़ियाली आँसू नहीं हो सकते...?

राजा जी के आँसू घड़ियाली आँसू नहीं हो सकते...?

भयानक कोरोना महामारी में राजा जी ने टीवी पर आँसू क्या बहाए जैसे पक्ष - विपक्ष में सैलाब आ गया। राजा जी का आँसू बहाना सभी भक्ति समाचार प्रसारण माध्यमों में सुर्खियों में रहा । ठीक उसी तरह जैसे राजा जी का तितलियों से अठखेलियां करना और मोर के संग मनुहार करना सुर्खियों में रहा।

गांव के चौपाल में इसी की चर्चा हो रही थी। रामखेलाबन काका कहने लगे। विदेशी हाथों में खेलता विपक्ष अब मर्यादाहीन हो गया है। एक राजा के आँसू को घड़ियाली आँसू कहना निंदनीय है। तभी बटोरन बोला, कैसे गलत है। हो सकता हो सही ही हो। कौन जाने। कोई थर्मामीटर है क्या..? वैसे भी राजा जी का घड़ियाल से बचपन का नाता रहा है। हो सकता हो तभी सीख लिया है...!

इसी चर्चा पर एक दिन राजा जी ने अपने दरबारी बीरबल से पूछ लिया, बताओ; क्या मेरे आंसू घड़ियाली आंसू थे ..? बीरबल तो हाजिर जवाब था। बोल दिया। बिल्कुल नहीं हुजूर! आप के आंसू घड़ियाली आंसू नहीं है! बल्कि घड़ियाल के आंसू , आप के आंसू होते हैं।


महाराज, बीरबल बोलता गया। भला बताइए जिस बेटे को माँ गंगा ने बुलाया हो और उसी राजा के राज में, उसी मां की गोद में आदमी की अनगिनत लाशें तैरती मिले तो उस पतीत पावनी माँ के दर्द से कौन बेदर्द न रो दे...!

महाराज आदमी एक संवेदनशील प्राणी है। वह कितना भी कठोर क्यों ना हो आत्मग्लानि तो उसे भी होती ही है। सुना है ऑक्सीजन के बगैर पटपटा कर मुर्गी की तरह आदमी मर गए ! भला बताइए कौन नहीं रोएगा!

12 मार्च 2021

कसाई

कायं- कुचुर की आवाज से नींद खुल गई। काठगोदाम-हावड़ा रेलगाड़ी के निचले बर्थ पर सो रहा था। नींद खुलते ही बोगी में कई लोगों के सवार होने के आपाधापी और बर्थ पर सामान रखने को लेकर कायं- कुचुर था। नींद खुली तो आंख भी खुल गई। स्टेशन पर वाद्य यंत्र में लखनऊ में आपका स्वागत है की ध्वनि सुनाई दे गई। नवाबों का शहर पहुंच गया।

 
चादर चेहरे से हटाया। बोगी में एक बुर्का नसी मोहतरमा अपने परिवार वालों के साथ प्रवेश कर चुकी थी और सामानों को रखने को लेकर शोर-शराबे थे । आंखें खुली तो सामने मोहतरमा का ही चेहरा था। एक बुर्का नसी मोहतरमा सामने बर्थ पर सामान को रखने और यात्रा की तैयारी में थी। उसके साथ दो किशोर उसके बच्चे थे । पति भी था। मोहतरमा के चेहरे पर नकाब नहीं था। नजर पड़ते ही लखनऊ नवाबी की बातें याद आ गई। खूबसूरत आंखें । कजरारे-कजरारे। खूब गहरा काजल।  होठों पर लाल टुह-टुह लिपस्टिक। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे हल्का-हल्का गुलाबी गाल।
 
तीन-चार बड़े बड़े बैग उपरी बर्थ पर रखा जाने लगा। मोहतरमा को जब बर्थ की जानकारी हुई तो पता चला के ऊपर और बीच का सीट मिला है। सुनते ही मोहतरमा भड़क गई। पति की सिट्टी-पिट्टी गुम। कातर भाव से उसने पत्नी को देखा। वह गुस्से में कहने लगी, एक काम भी ठीक से नहीं कर सकते ना। मेरे को मालूम था यही होगा। नीचे का बर्थ लेना था। बीच का बर्थ ले लिया। पति के मुंह से आवाज नहीं । वह केवल इशारे से सामान को रखने के लिए बच्चों को कह रहा था।

बड़े-बड़े दो बैग को सबसे ऊपर वाले बर्थ पर रखा गया। फिर बीच के बर्थ पर सोने की तैयारी होने लगी। आधी रात का समय। इसी बीच बैग से कंबल निकालने को लेकर चैन खोलने के क्रम में वह उखड़ गया। मोहतरमा का गुस्सा सातवें आसमान पर। पति भीगी बिल्ली।

क्या लेकर जाउंगी मायके। यही टूटे हुए चैन का बैग। इतने दिनों तक तो जाने नहीं दिए। पांच साल बाद जा रही हूं। वह भी यह हाल है।

लखनऊ में काठगोदाम ज्यादा देर तक रुकी है। खैर, कोरोना के बाद रेलवे के हालात  बदले-बदले से हैं। बगैर कंफर्म टिकट के यात्रा कोई नहीं कर सकता था तो बहुत भीड़ बोगियों में नहीं थी। हर बोगी में कुछ सीटें खाली थी। तभी अचानक रेलगाड़ी ने चलने की सूचना दे दी। पति बेचारा डब्बे से नीचे उतर कर खिड़की पर आ गया। ठीक से जाना। इस बैग में यह रखा हुआ है। उस बैग में वह रखा हुआ है। समझाते जा रहा था। मोहतरमा गुस्से में ही थे। रेल खुल गई। रेल के खुलते ही दस से पंद्रह मिनट के बाद सोने की तैयारी के बीच मोहतरमा ने बुर्का उतार दिया। गहरी सांस ली। ऐसे जैसे आजदी मिली हो। बालों को लहराया। उसमें अपनी उंगलियों को बड़े अंदाज से चलाया। हाथों में मेंहदी। हरी हरी डिजाइनदार चुड़ियां। कानों में बड़ा का झुमका। बन ठन कर।


गजब, वैसे तो महिलाओं के उम्र का अंदाजा मुश्किल है परंतु दसे से चौदह साल के बच्चों के साथ आई मोहतरमा पैंतिस वर्ष की उम्र की लग रही थी परंतु शारीरिक सौष्ठव ज्यादा ही खाते-पीते परिवार जैसा था। काफी वजनदार। पर उतनी ही आकर्षक।


बुर्के के नीचे मोहतरमा का श्रृंगार भी सामने आ गया। आधुनिक डिजाइनदार सलवार और समीज । उजला बग-बग समीज। नए चलन का। पुराने जमाने के  पुरुषों वाले खलता पजामा जैसा। ऊपर सलवार काले रंग की और उस पर सफेद डिजाइन दार फूल पत्ते। मोहतरमा बेहद खूबसूरत लगने लगी। ऐसे जैसे मोर ने अपने पंख फैला दिया हो।

बरबस मैं भी टुकुर-टुकुर देखने लगा। या यूं कहें कि खो गया। लखनऊ नवाबी के बारे में तो सुन ही रखा था । पहली बार देख रहा था। शारीरिक वजन तो काफी था पर बनावट आकर्षक। ऐसे जैसे कमर के आस-पास के हिस्से को काटकर कमर के ऊपर और कमर के नीचे के हिस्से पर लगा, तराश दिया गया हो।

तीसरे दिन लगातार यात्रा से थका-थका था। इसी बीच मोहतरमा का बोगी में आना रूह अफजा जैसा। आंखों को ठंडक देती हुई। निहारता जा रहा था। जी भर के। अचानक पटना म्यूजियम में रखी यक्षिणी की प्रतिमा याद आ गई। बरबस । वही शारीरिक सौष्ठय। वही वक्षस्थल। अचानक मोहतरमा की नजर मुझ पर पड़ गई। झेंप गया। मोहतरमा बगल वाले अपने बर्थ पर। नींद खुल चुकी थी और नींद उड़ भी गई। खैर वर्थ का लाइट बंद कर दिया गया। उसने चेहरे पर चादर तान ली। जबरन मैं भी। 
 
सुबह जल्दी ही बीच वाले बर्थ को गिरा दिया गया। वह सामने में बैठ गई। बगल में बच्चे। रेल की बोगी अब बदल गई है। अब सभी के हाथों में मोबाइल। कोई भोजपूरी बजा रहा। तो कोई बांग्ला। उसके भी थेे। बच्चों के भी। वह टीवी सिरियल देखने लगी। बच्चे गेम खेलने लगा। और मैं, कभी मोबाइल तो कभी उसे। चोरी-चोरी। आदतन मैं  किसी से बात नहीं करता। सो चुप था। कहां जाना है। अचानक मैं चौंक गया। खुशी और हड़बड़ाहट। पटना। आप। कलकत्ता। बस। तभी गेम खेल रहे मोहतरमा के बेटा से बगल के बुजुर्ग यात्री ने बातचीत शुरू की। पढ़ाई-लिखाई। आदि-इत्यादि। अंत में पूछा। पापा क्या करते है। लड़का ने हाथ से काटने का ईशारा किया। मतलब । लड़के ने बिना झिझके कहा- कसाई है।

09 मार्च 2021

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं का अपमान



शेखपुरा


अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर महिलाओं के प्रति सम्मान का दिखावा हम सब ने किया। वस्तुस्थिति उससे इतर है । महिलाओं के प्रति आज भी पुरुष सत्तात्मक समाज में दूसरे दर्जे का व्यवहार किया जाता है। उसकी बानगी यह तस्वीर है । एक समारोह में अधिकारी महोदय कुर्सी पर बैठे रहे और जिनके लिए समारोह था उन महिलाओं को जमीन पर बिठा कर रखा।

 वहीं कांग्रेस के नेता तारिक अनवर अपने गांव में वृद्ध महिलाओं को जमीन पर बैठा कर रखा और ₹200 ऐसे बांटे जैसे कुछ बड़ा एहसान कर रहे हैं। इसका वीडियो भी बनाया ।

बस महिलाओं के प्रति दिखावटी सम्मान अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भी सामने आता है । वस्तुस्थिति यह भी है कि आज भी महिला यदि समाज की बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ना चाहती है तो हम उसे आगे बढ़ने नहीं देना चाहते। उसे अपमानित करते हैं। उसे जलील करते हैं। हर संभव प्रयास कर उसे तोड़ना चाहते हैं। इन परेशानियों के बीच साहसी महिलाएं आज भी संघर्ष कर आगे बढ़ रही है यह उनका अपना साहस है।


शेखपुरा में दिखा महिला दिवस पर अलग नजारा

शेखपुरा में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विभिन्न जगहों पर समारोह का आयोजन किया गया। इसी के तहत जिले के बरबीघा प्रखंड में जीविका के द्वारा सम्मान समारोह का आयोजन किया गया । जहां जीविका से जुड़ी महिलाओं का सम्मान किया जाना था। परंतु आलम यह था कि प्रखंड विकास पदाधिकारी सहित कई पदाधिकारी कुर्सी पर बैठे थे और जिन महिलाओं का सम्मान होना था उनको जमीन पर बैठाया गया था।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर बूढ़ी महिलाओं को ₹200 

घाटकुसुंभा प्रखंड के आलापुर गांव में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर वहां के पंचायत के मुखिया के पुत्र मोहम्मद सिद्धकी और कथित रूप से कांग्रेस के प्रदेश महासचिव तारिक अनवर के द्वारा बूढ़ी महिलाओं को जमीन पर बैठाया गया और उनको ₹200 दिए गए। कई महिलाओं को ₹200 वितरित किए गए। इसका वीडियो भी बनाया गया। महिलाओं के प्रति सम्मान का यह कम और पुरुषवादी सत्ता का अधिक परिचायक है।

14 जनवरी 2021

किसान तो बहाना है, मोदी को झुकाना है, मरने से पहले भूत होने का जमाना है


अरुण साथी

सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कृषि कानून बिल को अगले आदेश तक के लिए रोक लगा देने के बाद 4 सदस्य कमेटी बनाने और मध्यस्थता के मामले में किसानों का अड़ियल रुख अपना लिया जाना इस बात के प्रमाणित करने को लेकर काफी है कि इस पूरे आंदोलन में किसानों के हित साधना कम और मोदी को झुकाना ज्यादा नजर आ रहा। सुप्रीम कोर्ट में भी किसानों के अधिवक्ता के द्वारा प्रधानमंत्री पर टिप्पणी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा प्रधानमंत्री का पार्टी इस मामले में नहीं होने की बात कहना इसी की ओर इशारा करता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले आंदोलन समर्थक सुप्रीम कोर्ट का गुणगान कर रहे थे। वही आदेश मन मुताबिक नहीं होने पर आलोचना शुरु कर दिया। एक दिन पहले गुणगान करने वाले गाली देने लगे।

मरने से पहले भूत

लोकतंत्र में सत्ता को घेरना विपक्ष के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है और इसे शुभ भी माना जाता है। निश्चित रूप से आंदोलन से ही सत्ता निरंकुश नहीं होती। परंतु आंदोलनकारियों के रुख और रवैये से यह स्पष्ट दिखता है कि सीएए में विरोध में असफल लॉबी अब किसान के कंधे पर हल रखकर नरेंद्र मोदी को घेर रहे हैं। जैसे सीएए आंदोलन में मरने से पहले भूत होने का भय दिखाकर शाहीन बाग का हठीला आंदोलन किया गया था वैसे ही किसान बिल का मामला भी है। मरने से पहले भूत होने का भय ज्यादा दिखाया गया है।



गोदी मीडिया और मन लायक रिपोर्टिंग

 सोशल मीडिया के फैशन के युग में गोदी मीडिया का एक फैशन भी चला है। इसमें अपने हिसाब से रिपोर्टिंग नहीं होने पर सत्ता का समर्थन करने का आरोप मीडिया पर लगाकर गोदी मीडिया कहा जाता है परंतु पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नरेंद्र मोदी का विरोध करने वाले मीडिया ग्रुप के लिए नामकरण क्या होगा।


50 दिन से चलने वाले आंदोलन में जिस तरह से नरेंद्र मोदी से पूर्वाग्रही लोग एकजुट होकर मुद्दे को उछाल रहे। आंदोलन को हवा दे रहे। उससे इस बात की आशंका शुरू से ही जाहिर की जा रही थी। सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थों के बीच किसान संगठनों के अड़ियल रुख से यह साफ हो गया।


किसान का बाजारीकरण

किसान बिल के बारे में स्पष्ट रूप से पहले भी कहता रहा हूं कि इसमें किसानों का अहित कहीं नहीं होने वाला है। राजनीतिक एजेंडे के तहत इस मुद्दे को उछाला जा रहा है। किसान का बाजारीकरण होना किसानों के सुनहरे भविष्य के दिशा में एक कदम है। किसान बिल शुद्ध रूप से किसानों का बाजारीकरण ही है।


इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि किसान बिल में मंडी को खत्म करने। कॉन्ट्रैक्ट पर खेती करने। भंडारण की समस्या को लेकर विपक्षी पार्टियां तो आवाज भी उठाती रही है। कुछ क्रांतिकारी रिपोर्टर के कई रिपोर्ट में भी मंडियों को खत्म करने का मुद्दा उछाला गया है।


कांग्रेस के मेनिफेस्टो में भी इस तरह के जिक्र का बात अब सामने आ गया है । राहुल गांधी के वक्तव्य भी वीडियो के रूप में वायरल है। कुल मिलाकर किसान बिल के माध्यम से नरेंद्र मोदी को झुकाने को लेकर वही पूर्वाग्रही लोग मजबूती से लगे हुए हैं। साफ है कि इससे किसानों के हित का कोई मामला जुड़ा हुआ नहीं है।



किसानों के बिल को लेकर विरोध का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीद का है। हालांकि किसान बिल में इसे खत्म करने का कहीं जिक्र नहीं है फिर भी इसे कानूनी जामा पहनाने की मांग उचित है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। मंडियों को खत्म करना एक बेहतर पहल है।

नीतीश कुमार ने मंडियों को खत्म किया



 बिहार में नीतीश सरकार आते ही सबसे पहला काम मंडियों को खत्म किया जाना ही था। हमारा उत्पादन है हम जहां चाहे बेचें। जहां अच्छा दाम मिलेगा वहां बेचेंगे । बिना वजह टैक्स क्यों दिया जाए।


कॉन्ट्रैक्ट आधारित खेती को लेकर बड़े-बड़े व्यापारी घराने के द्वारा किसानों को तबाह कर देने का भ्रम फैलाया जा रहा है । मेरा मानना है कि कांटेक्ट आधारित खेती किसानों के हित में ही होगा। हां इसमें थोड़े से सुधार किसानों के हित में अगर करने की जरूरत है तो बड़े-बड़े जानकार इस पर मिल बैठकर सुझाव दे सकते थे। हालांकि जहां तक मेरी समझ है इसमें किसानों के हित का ख्याल रखा गया है।

विपक्ष की अज्ञानता का शिकार हुआ कोविड-19 टीकाकरण: #चलो_टीका_लगवाएं अभियान में जुटे युवा #Lets_get_vaccinated

अरूण   साथी मुझे याद है जब कोविड-19 वैक्सीन देने की शुरुआत होने की सुगबुगाहट हुई थी उसी समय पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे मोदी वैक्सी...