लाला बाबू को भावपूर्ण श्रद्धांजलि
लाला बाबू!
आपका नाम केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि उस चेतना का उद्घोष है जिसने परतंत्रता की बेड़ियों को चुनौती दी। बरबीघा थाना के सामने आपकी प्रतिमा का स्थापित होना किसी साधारण घटना का साक्ष्य नहीं, बल्कि इतिहास के मौन को स्वर मिलने जैसा है। यह प्रयास भले ही लघु प्रतीत हो, पर इसका भाव अनंत है, जैसे सूरज के सामने दीया जलाना, फिर भी आस्था के उजास से भरा।
जिस भूमि के लिए आपने अपना सर्वस्व अर्पित किया, उसी जन्मभूमि में आपको वह स्थान देर से मिला, जिसके आप सहज ही अधिकारी थे। यही विडंबना अक्सर हमारे समाज की नियति बन जाती है। जिस चौक को कभी बथान कहा गया, फिर अंग्रेजी सत्ता के दौर में थाना चौक के नाम से जाना गया, उसी चौक ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में आपके कदमों की गूंज सुनी। धरना, प्रदर्शन और साहस की अग्नि में तपे आपके संघर्ष ने विदेशी सत्ता को चुनौती दी और वही चौक आपके नाम से पुकारा जाने लगा, लाला बाबू चौक।
इस नामकरण का प्रथम स्वप्न तत्कालीन नगर पंचायत अध्यक्ष शिवकुमार जी ने देखा। प्रतिमा स्थापना का शिलान्यास भी हुआ, पर राजनीति की उथल-पुथल में यह स्वप्न समय के धुंधलके में खो गया। उस अधूरे स्वप्न को मैंने आत्मसात किया। दो दशकों तक कलम के माध्यम से, अखबारों के पन्नों पर, आपकी स्मृति को जीवित रखने का सतत प्रयास करता रहा।
आज वह स्वप्न साकार हुआ। मंत्री अशोक चौधरी जी द्वारा शिलान्यास, पूर्व सभापति रोशन कुमार की पहल और अनेक हाथों के सामूहिक श्रम से आपकी प्रतिमा अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हुई। राजनीति ने करवटें बदलीं, पर अंततः सत्य और स्मृति ने अपना स्थान पा लिया।
यह मेरे लिए राजनीति नहीं, श्रद्धा है। यह किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि इतिहास के प्रति कृतज्ञता का प्रश्न है। लाला बाबू, यह प्रतिमा नहीं, यह हमारी सामूहिक स्मृति का शिलालेख है। इस सद्कार्य में सहभागी सभी हाथों को साधुवाद, और आपको शत-शत नमन।
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