यह एक सुखद संयोग रहा कि बिहार योग विद्यालय मुंगेर जाना हुआ ।
आश्रम में प्रवेश से पहले कड़े नियमों को कड़ाई से पालन के बारे में संयोजक चैतन्य मूर्ति और राहुल जी ने सब कुछ समझा दिया था।
हमें अन्नपूर्णा भवन में आश्रय मिला। एक कमरे में तीन यात्री।
कड़े नियमों से पहले तो यही था कि नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करें। मोबाइल प्रयोग वर्जित है (किसी का मोबाइल जब्त नहीं हुआ)। अपने सारे कार्य स्वयं करने हैं।
संध्या 7:00 बजे के बाद मौन व्रत का पालन करना अनिवार्य होगा। एक दूसरे के कमरे में नहीं जाना है।
सुबह 4:00 बजे से दिनचर्या शुरू होकर 7:00 बजे संध्या समाप्ति है। इसमें योग, कर्म योग, मंत्र उच्चारण, शवासन , सत्संग, वायु साधना में सहभागी होना है। भजन कीर्तन भी शामिल है। योग आश्रम में किसी भी देवी देवता का चित्र अथवा मूर्ति दिखाई नहीं पड़ा।
पूछताछ में यह जानकारी मिली कि यह आश्रम अंग नरेश राजा कर्ण के दान स्थल पर बना हुआ है। इसे कर्ण चौड़ा कहते हैं । यह पहाड़ी क्षेत्र है।
यही से गंगा स्नान और माता चंडी की आराधना के बाद कर्ण सोना इत्यादि दान किया करते थे।
खैर, पहले दिन भोजन के बाद कुछ देर आराम के बाद मंत्र पाठ में भाग लेने के लिए बगल के आश्रम में जाना था।
उसके लिए वहां गाड़ी की व्यवस्था थी। पौने तीन बजे सबको पहुंचना था, सभी पहुंच गए। आश्चर्य लगा कि कैसे हम लोग समय के पाबंद हो गए!
इसके लिए गंगा के किनारे बने पादुका दर्शन सत्संग पीठ में जाना हुआ ।
यह एक खुला कक्ष था । सभी श्रद्धालु पालथी मारकर बैठ गए। सामने महादेव का एक शिवलिंग स्थापित था। जहां श्रृंगार का काम बच्चे कर रहे थे। पता चला कि इस आश्रम में बच्चों का बाल योगी के रूप में प्रशिक्षण और सेवा की भी व्यवस्था है।
बच्चों को यहां सभ्यता, संस्कृति, गायन, वादन, चित्रकार इत्यादि का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
फिर देखा कि एक सामान्य से थोड़ा कम कद काठी के गेरुआ वस्त्र धारी संत व्यक्तित्व अलमस्ती में चले आ रहे हैं। उनके माथे पर एक विलायती टोपी थी, हाथ में पानी का थर्मस, चेहरे पर मुकुराहट और हल्की-हल्की सफ़ेद दाढ़ी।
वे सहजता से कुर्सी पर बैठे। घड़ी देखी। 3:00 बज गए। हरि ॐ तत्सत का उच्चारण किया। सब ने साथ दिया। फिर महामृत्युंजय मंत्र के जाप का शुभारंभ हुआ। इससे पहले किसी भी सहज आसन में बैठने, ध्यान करने का निर्देश मिला।
ध्यान करने के लिए आंखों को बंद करने। आती–जाती सांसों को सजगता से देखने। महसूस करने के लिए कहा गया।
पुनः आंखों के सामने एक ज्योति पुंज की कल्पना करने की बात कही गई। पुनः एक साथ तीन बार ॐ का उच्चारण कराया गया पुनः शांति पाठ। पुनः एक साथ तीव्रता से 108 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया गया।
ॐ उच्चारण और महामृत्युंजय जाप के बाद कुछ अन्य मंत्रों का भी जाप कराया गया । ॐ नमः शिवाय का भी जाप हुआ।
इन सब के बाद वहां की स्थिति सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होने लगा। लगा जैसे सभी जगह महामृत्युंजय का नाद गूंज रहा हो।
अंदर से कंपन होने जैसा ! जैसे यह नाद दूर किसी क्षितिज से जाकर लौट रही है।एक असीम ऊर्जा तरंग।
फिर लगातार कई प्रकार की ध्यान मुद्राओं का अभ्यास एक साथ हुआ। 4:00 बजे समाप्ति हुई। समाप्ति से पहले शांति पाठ हुआ।
उसके बाद हमें एक बड़े से कक्ष में ले जाया गया । या कक्ष नहीं कह सकते हैं, एक बड़ा सा टेंट नुमा हॉल । दो बड़े लोहे के पिलरों पर छतरी नुमा टेंट बना हुआ।
सामने मंच और मंच पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद जी, वायु साधना यज्ञ की तैयारी।
इससे पहले सत्संग। स्वामी जी का प्रवचन । पर यहां प्रचलित धार्मिक कथा का वाचन , विवरण या विवेचना नहीं। यहां विज्ञान की विवेचना होने लगी। उसी पर आख्यान होने लगा।
उन्होंने बताया कि वायु एक ऊर्जा है। वायु का मतलब हवा नहीं, ऊर्जा का एक रूपांतरित रूप से है। यही है, तो हम हैं। और कहते हैं कि मेरा शरीर! यह मेरा कौन है?
फिर समझाया की नासा ने एक ऊर्जा के रूपांतरण पर एक शोध किया जिसमें दुनिया भर के 500 वैज्ञानिकों को शामिल किया गया । उसमें से उनको भी शामिल किया गया, यद्यपि वे वैज्ञानिक नहीं है।
बताया कि इसमें एक क्वांटम मशीन बनाई गई। यह ऊर्जा को मापता और रूपांतरित कर दूसरी जगह भेज सकता था ।
नासा ने पाया कि इसी मशीन से हम अंतरिक्ष में ऊर्जा भेज कर बीमार वैज्ञानिकों को ठीक कर सकते हैं। बाद में मेडिकल लॉबी ने दबाव में इस पूरे शोध को स्थगित कर दिया। जबकि इससे ऊर्जा के माध्यम से बीमारियों को ठीक किया जा सकता था।
इस सत्संग की विशेषता यह थी कि इसमें भीड़ नहीं थी। शोर नहीं था। शांति और जिज्ञासा थी।
सभी लोग पालथी मारकर बैठे हुए थे। इसमें विदेशियों की भी बड़ी संख्या थी।
वहां एक बड़ा टीवी डिस्प्ले भी लगा हुआ था। वही वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी विदेशी महिलाओं की टीम के द्वारा ही संभाला जा रहा था।
हां, सत्संग से पहले कीर्तन हुआ। सामने एक युवती गा रही थी। पीला वस्त्र पहने। आंखों पर चश्मा लगाए। चेहरा पर हल्की मुस्कान और आभा के साथ गंभीरता ओढ़े हुए।
जब उन्होंने गायन शुरू किया तो उनके शब्द ऐसे गूंजे , जैसे दूर कहीं, किसी ने बांसुरी बजाई हो! कोकिल कंठ!
उसके बाद स्वामी जी ॐ उच्चारण के साथ ध्यान और शांति पाठ करवाया। फिर महामृत्युंजय का जाप हुआ।
हां, स्वामी जी ने यह भी बताया कि महामृत्युंजय जाप को वैज्ञानिकों ने क्वांटम मशीन से मापा और चौंक गए। इसकी ऊर्जा फैली और पूरे नगर को अपने प्रभाव में ले लिया।
खैर, इतनी देर तक पालथी मार कर बैठने की आदत नहीं रहने से लगभग सभी को परेशानी हो रही थी। कुछ बुजुर्गों को कुर्सी पर सुविधा दी गई थी। घुटने और कमर, मेरे भी जवाब दे रहे थे। पर बैठा रहा।
इसी बीच गौर किया स्वामी जी के बगल में एक पिंजरा था। उसमें एक मकाउ तोता और वहीं बगल में एक बालक भी बैठा रहा ।
आमतौर पर वायरल और बदनाम बाबाओ के मोबाइल , टीवी में बोल, सुनकर कभी किसी से आकर्षक नहीं रहा, पर निरंजनानंद को देखते ही ओजस्विता और दिव्यता का बोध हुआ। एक परमहंस, एक संत और एक संन्यासी से साक्षात्कार हुआ।
बस पहले दिन की समाप्ति हो गई।
फिर 6:30 तक भोजन कर लेना है। थाली, ग्लास, कटोरी लेकर पास ही रखना है। 7:00 बजे आवास बंद होना है। यह सब हो गया। फिर एक बैठक हुई। इसमें संयोजक ने अगले दिन की दिनचर्या की जानकारी दी।
कर्म योग के बारे में बताया गया। कर्म योग। मतलब, सजगता से अपने दैनिक कार्य को करना।
इसमें सभी को काम बांटे गए। मुझे मुख्य भवन की सफाई का कार्य मिला। शौचालय किसी को भी साफ करनी पड़ सकती है, यह सुनकर कुछ के चेहरे उतर गए। खैर, सब अपने-अपने कमरे में चले गए । किसी से मोबाइल छीनी नहीं गई। क्योंकि चार दिन का सत्र है। एक माह के सत्र में जब्त किया जाता है। मेरे कमरे में रहने वाले सभी ने मोबाइल ऑन किया। घर सूचना दी। और उसमें लग गए।
मैंने घर में कॉल कर सूचना दी। (मुख्य मोबाइल मैं घर पर ही छोड़ आया था। कॉल के लिए एक था) ।और थकान के कारण नींद आ गई।
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