(हास्य व्यंग्य: अरुण साथी)
मुखिया जी ने फिर फेंका है। वैसे तो फेंकने की कला में मास्टर डिग्री और शोध कार्य का प्रमाण पत्र देने वाले विश्वविद्यालय का मुखिया जी प्राचार्य हैं, तब भी इस बार का फेंकना प्रमाणिक हो गया है।
फेंकने की इस कला का प्रदर्शन तो मुखिया जी ने तभी कर दिया था, जब कहा था अच्छे दिन आएंगे..! डेढ़ दशक के बाद इसे लपकने वाले आज कारुणिक क्रंदन कर रहे हैं।
खैर, चाय की चौपाल में खेलावन काका से किसी ने पूछा तो उन्होंने विस्तार से व्याख्या की।
"बच्चा, अच्छे दिन आएंगे" में (मेरा) शब्द गुप्त था। "सबका साथ, सबका विकास" में वोट शब्द गुप्त था। अब कोई इसको नहीं समझता है, तो यह उसका अपना दोष है।
मुखिया जी ने फिर फेंका । दिमागी नक्सली। अब सभी जय जय करने लगे। अब वही दिमागी नक्सली जब नीला रंगदारी और तिलचट्टा अवतार में आए तो उनका अक्षत–चंदन से स्वागत किया।
खैर, अब नाराज फूफा !
खेलावन काका कहते हैं,
"फूफा अर्थशास्त्र के उपयोगिता के ह्रास नियम का प्रमाण है। ठीक वैसे ही, जैसे मार्गदर्शक मंडल।
"पहले जिनके घर में आने पर उनका स्वागत 56 भोग से होता था, आज सूखी रोटी के लिए कोई नहीं पूछता..!"
काका ने संत भाव से कहा,
" बच्चा परिवर्तन ही संसार का नियम है!"
जब भी घर में नया मेहमान आता है, पुराने मेहमान फूफा बन जाते हैं।
काका, मन ही मन बुदबुदाने लगे,
"इस रंग बदलती दुनिया में .."
आज बस इतना ही, बाकी सब ठीक है...