17 सितंबर 2026

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल

आनलाइन चुंगी और कुतर्कों का जंजाल युपीआई को पहले अंगेजों की चाय की तरह ही लत लगा दी गई। अब आनलाइन चुंगी बसूला जा रहा। इसमें कुतर्कों का जंजाल भी है। आम आदमी उलझा हुआ है। सरकार यही करती है। उलझा दिया तो काम बन गया। साधारण बुद्धि में जो बात समझ में आई है, वह यह है कि आनलाइन चुंगी का भार आम अदमी पर ही पड़ेगा। तर्क, कुतर्क जो हो। कौन क्या कहता है, इसमें नहीं पड़ना चाहिए। आपके साथ क्या होता है, इसे देखिए। जैसे कि रसोई गैस, चीनी इत्यादि का दाम पांच-दस रुपये बढ़ते ही समोसा और मिठाई का दाम व्यापारी डेढ़ गुणा बढ़ा दिया। उनका साधारण सा तर्क होता है, सबकुछ मंहगा हो गया। तो यह तर्क तो कुतर्क ही है कि आनलाइन चुंगी का भार आम आदमी पर नहीं पड़ेगा। व्यापारी हर भार ग्राहक पर ही देतें हैं। यह व्यापार का प्राथमिक नियम है। जिस बड़े दुकान में चाय या ठंढ़ा पिलाया जाता है, उस दुकान का साधारण बुद्धि का ग्राहक भी यह समझता है कि इसका भार भी उसी के उपर जुटेगा।
अब साधारण भाषा में यह। दो हजार एक रुपये की खरीद पर दस रुपये चुंगी लगेगा। इसमें से आठ रुपये बैंक को ही जाएगा। दो रुपये क्युआर कोड और एप को जाना है। साधारण बात यह कि बैंक पहले से अत्यधिक कमाई में है। अर्थशास्त्र के जानकार अनुमान लगा रहे है की आनलाइन चुंगी से बीस हजार करोड़ से अधिक की कमाई होनी है। तब साधारण आदमी यह क्यों नहीं समझेगा कि यह अमेरिका के दबाब में लिया गया निर्णय है। क्योंकि यह सब नि:शुलक होने पर बीजा और मास्टर कार्ड कंपनी की दाल नहीं गल रही थी। खैर, मुझे तो याद नहीं कि कब पैसे की निकासी बैंक से की है। मोबाइल होना चाहिए। कई बार खाली जेब लेकर पटना आना-जाना हुआ। अभी पिछले महिना परेशानी भी हो गई। महावीर मंदिर के पास एक साधारण से होटल में भोजन किया। निश्चिंत था की आनलाइन देंगे। देने गया तो कहा गया कि नहीं लेगें। मालिक नहीं है। तब काेई उपाय नहीं सूझा। दुकानदार समझ गया। भला मानस था। बोला कभी दे दिजिएगा। खैर, संयोग से एटीएम पास में था। पर पिन याद नहीं था। बड़ी मुश्किल से पैसे निकाल कर उसे शाम में दे गया। उधर, आनलाइन पैसे की वजह से श्रीमति की अपनी परेशानी है। कहती है कि अब तो जेब खाली रहो हो, कि निकालिओ, ई मोदिया जे करै चित्र- टाल का मछली बाजार

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